मंगलवार, जून 05, 2007

हम अपनी उस खुदकुशी का मातम

वो न मिलें तो है दम निकलता, मिलें तो खुशोय्यों से जान जाती
हम अपनी इस खुदकुशी का मातम, सजा के चिट्ठे में लिख रहे हैं

कभी तो कविता भटक गई है, मिली अगर तो वो टूटी फ़ूटी
बिठा तश्तरी उसे उड़ा कर, वो आज चिट्ठे में लिख रहे हैं

कहीं पे नौटंकियां हुईं हैं, कहीं हवाई सफ़र का चर्चा
उधर वो दुम की कथा उठाकर के आज चिट्ठे में लिख रहे हैं

जमाना गुजरा जुगाड़ करते, मगर न दाढ़ी बढ़ी जरा भी
मगर ये उसकी बड़ी महत्ता को आज चिट्ठे में लिख रहे हैं

जो बात करते तो वक्त रुकता, जो न करें तो हैं खुद को भूले
अजीब है बेकसी का आलम, जो आज चिट्ठे में लिख रहे हैं

लिखे बहुत गीत तो प्यार के अब, चलो नई धुन कोई बजाओ
ये हसरतें दिल की वे सजाकर के आज चिट्ठे में लिख रहे हैं

ब्लागरों ने जो मिल के बैठे, लिये हैं कैसे , कहां पे पंगे
उसी के फोटो सजा सजा कर ये आज चिट्ठे में लिख रहे हैं

लिये बसन्ती नये तराने, है शुक्रिया भी, औ' कुछ है शिकवा
उधर वे खबरी की ही खबरिया क्प आज चिट्ठे में लिख रहे हैं

लगे जो चर्चा के हमको काबिल, इन्हीं की हमने करी है चर्चा
लिखोगे तुम, ये लगी है कैसी. जो आज चिट्ठे में लिख रहे हैं


श्री मोहिन्दर जी ने व्यक्तिगत अनुभव
बताये कि पहले पत्र पत्रिकायें जिन लेखकों की
रचनायें अस्वीकृत कर देतीं थीं पर
ब्लागिंग के बाद ब्लागर्स के लेखन की मांग होने
लगी है .
सुश्री
सुनीता शानू ने इस तरह की बैठक के
सुखद माहौल देखते हुये एक
निश्चित अन्तराल पर करते रहने पर जोर दिया.
रंजना भाटिया रंजु ने ब्लागर एवं
टिप्पणियो के महत्व को रेखांकित किया . इस विषय पर श्री
समीर लाल जी के ब्लागर्स को
प्रोत्साहन को विशेष रूप से रेखांकित किया गया. सुश्री रंजु भाटिया ने कविता
में
रदीफ, काफिया और मीटर के महत्व पर भी चुटकी ली.







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शुक्रवार, जून 01, 2007

पेश है देसी गूगलवा...

दोस्तों अब से नियमित सोमवारी चर्चा के बजाए अब अनियमित, जिस वक्त कुछ उल्लेखनीय दिख गया या सूझ गया की तर्ज पर चर्चा जारी रहेगी. कोशिश रहेगी कि सप्ताह में कम से कम एकाध चर्चा गाहे बेगाहे तो मार ही दें...

इसे नियमित चिट्ठाचर्चाकार कतई व्यवधान स्वरूप न समझें. नियमित चर्चा जारी रहेगी. यदि किसी नियमित चर्चा में व्यवधान सा महसूस होता है तो अपनी राय अवश्य रखें.

तो चलिए आज से इस अनियमित चर्चा की शुरूआत देसी गूगल से करते हैं -

पियवा गइले परदेश फगुनवा रास ना आवे,
ना भेजले कउनो संदेश फगुनवा रास ना आवे।।

ननदी सतावे देवरा सतावे,
रही रही के जुल्मी के याद सतावे।
सासुजी देहली आशीष फगुनवा रास ना आवे।।

सखिया ना भावे नैहर ना भावे,
गोतीया के बोली जइसे आरी चलावे।
नींदियो ना आवे विशेष फगुनवा रास ना आवे।।

बैरी जियरवा कइसो ना माने,
रहि रहि नैना से लोरऽवा चुआवे
काहे नेहिया लगवनी प्राणेश फगुनवा रास ना आवे।।


आगे इस चिट्ठे पर पढ़ें, जहाँ और भी मजेदार चीजें पढ़ने और देखने के लिए हैं!

और, यहाँ भी एक नजर मार सकते हैं - यदि बॉलीवुड गॉसिप में आपको कोई तत्व नजर आता है.

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