मंगलवार, मार्च 09, 2010

हमारी क़िताबों में हमारी औरतें भी न आरक्षण मांगने लगें यार!

हमारी सबेरे की महिला दिवस पर केंद्रित चिट्ठों की ही चर्चा का प्रभाव था शायद कि राज्य सभा में महिला आरक्षण बिल धक्काड़े से पास हो गया। मुझे कोई राजनीतिक समझ नहीं है इस मामले में कि इस बिल के राजनैतिक मतलब क्या होंगे लेकिन मुझे बहुत खुशी है इस बिल के पास होने पर और लगता है कि जो इसका विरोध कर रहे हैं वे समय के चक्र को रोकने का प्रयास कर रहे हैं और शायद अपनी मुंह की ही खायेंगे।

आज ही एक महिला पाइलटों का एक दल भारत से न्यूयार्क हवाई जहाज उड़ाकर ले गया है। टेलीविजन पर महिला पायलटों के आत्मविश्वास पूर्ण चेहरे देखकर खुशी हुई।

चलिये इसी खुशी में पेशे खिदमत हैं चंद एकलाईना। मजा न आये तो दुबारा बांचियेगा। ठीक है न!


  1. और रत्नाकर का ह्रदय परिवर्तन हो गया : और पुराना हृदय रत्नाकर ने आनलाइन नीलामी के लिये अपलोड कर दिया।

  2. व्यंग्यकार को विचारों से क्रांतिकारी भी होना चाहिए :एक हाथ में विचार की तोप और दूसरे में धिक्कार का गुम्मा भी रखना चाहिये!

  3. हे भगवान ! हमें मोटी होने का हक दो !: आखिर हमारा भी तो अपने शरीर का अपने पति की अकल से मैच कराने का मन करता है।

  4. मैं गर न टूटूं .... :तो थोड़ा और मेहनत करना जी! आलसियों की तरह रुक न जाना।

  5. मीठा मीठा गप्प, कड़वा कड़वा थू : यही तो अवसरवादियों की अदा है बू हू हू हू!!!

  6. ...मुझसे बोलो तो प्यार से बोलो :सीधे-सीधे काहे नहीं कहते कि बात मत करो!

  7. स्त्री-विमर्श के लिए वास्तविक-विषय वस्तु को खोजें इस चर्चा में :सबसे पहले खोजने वाले का पॉडकास्ट लौटती पोस्ट में!

  8. बंद करो घर के अन्दर यह ... :...और हिम्मत हो तो निकल के आ जाओ बाहर!

  9. इन्हें स्वामी, संत या बाबा कहकर धर्म को बदनाम न करें : वर्ना किसी दिन धर्म अदालती नोटिस भेजेगा, भागते रह जाओगे!

  10. जिनका दिल टूट जाये उन्हे जनरल नॉलेज की क्या ज़रूरत : वो सीधे जाकर जनरल वार्ड में भर्ती हो जायें, ईसीजी करायें!

  11. मूर्तिभंजक शिल्पकारों का देश :हाथ पर हाथ धरे, चुप ही बैठे हैं ब्लागेश!!

  12. मंथन जारी हैं शेष फिर कभी : महिला बिल पास होने के बाद!

  13. डूमेन ले लो डूमेन….एकदम सस्ता है बाउजी… :लेकर फ़िर भले नीलाम कर देना!

  14. बिन माई-बाप के दो साल से टिकी इस हॉकी टीम को देखिए और समझिए ! : इसके बाद नये सिरे से धिक्कारने लगिये कोई रोक थोड़ी लगी है!

  15. तस्लीमा, रुश्दी और फिदा हुसैन : एक गैंग में शामिल हैं का?

  16. आँखों को धोखा देने वाले वालपेपर्स : आंख बंद करके देखें का?

  17. “तू निर्बंध सारी धरती पर घूम सके, अपने दिवाने को चूम सके” : इसके लिये कोलगेट मंजन से दांत चमकाना जरूरी है।

  18. 'सवर्णों' का देश है 'भारत'! :जिसमें एक कठफ़ोड़वा भी रहता है!

  19. वे बिस्तर में पड़ी हैं, पड़ी रहें:इनकी खटिया तो खड़ी थी ही, बिस्तर भी गोल हो गया!

  20. ब्लागवाणी नहीं खुल रहा, अस्थाई आलेख :की वजह से ही न!

  21. हमारी क़िताबों में हमारी औरतें : भी न आरक्षण मांगने लगें यार!



टिप्पणी/प्रतिटिप्पणी


टिप्पणी:प्यार आधार है इस जीवन का
प्यार नफरत में देगा शीतलता
प्यार को यदि समझ ले दुनिया,
तो कोई भी गैर सा नहीं लगता !!
सतीश सक्सेना
प्रतिटिप्पणी:कविता के लिये शुक्रिया सतीश जी, लेकिन ई बात बताइये कि जब प्यार आधार है जीवन का तो ये नफ़रत किधर से आ गई। क्या मिलावटी खोये की तरह प्यार की भी दो-नंबरी सप्लाई होने लगी?

टिप्पणी:गुरुवर अज़दक ने अपनी पोस्ट पर लिखा है .......वही चस्पा कर रहा हूँ ....‘
तुम जानते तुम इतने आसान नहीं, फिर कितना तो सब आसान हो जाता!’
सारी मुश्किलों का सबब यही है .....
डा.अनुराग आर्य
प्रतिटिप्पणी:अजदक जी को गुरू बना लिये? कब? क्या आप भी पटकनी खाये दिखोगे? ऐसा मत करो भाई!

टिप्पणी:ब्लॉग जगत जबरदस्त ढंग से महिलामय हो गया है...जहाँ तहां सब खाली महिलाओं के बारे में ही सोचने में लगे हुए हैं...हमें तो बहुतै आनंद आ रहा है सब देख दूख कर...
बढ़िया चर्चा की आपने....जाते हैं लिंक पकड़ पकड़ के विस्तार टटोलने...रंजना सिंह
प्रतिटिप्पणी:ब्लाग महिलामय होने में सोचने की कौन बात है जी? ये तो आनंद की ही बात है। और जो लिंक टटोलकर गयी थीं आप उनको पकड़कर ही लौट आइये। देखिये एक लाईना लिखे हैं। आइये बांचिये।

टिप्पणी:वाह!!!! चर्चा का शीर्षक बहुत-बहुत सुन्दर है. चर्चा तो सुन्दर है ही, हमेशा की तरह. ये अलग बात है कि इस चर्चा में मेरा लिंक शामिल है सो ज़्यादा अच्छी लग रही है :)मीनू जी की कविता केवल कविता नहीं, वरन एक शाश्वत प्रश्न है. वंदना अवस्थी दुबे
प्रतिटिप्पणी:...और इस शाश्वत प्रश्न के उत्तर कौन किताब में मिलेंगे?

टिप्पणी:कभी-कभी मैं चिट्ठाचर्चा बगैर लेखक का नाम पढ़े ही पढ़ जाती हूँ, प दो-तीन लाइन पढ़ने के बाद ही पता चल जाता है कि यह आपने लिखी है. ये आपकी स्टाइल है.मुक्ति
प्रतिटिप्पणी:अरे वाह! आपकी नजर बड़ी पारखी है। वर्ना कुछ लोग तो हर पोस्ट में पूछने हैं--आज की चर्चा किसकी है? अब हम ठाठ से कह सकते हैं- इहै हमार इस्टाईल बा! है न!

टिप्पणी:लतगर्द हो गया संसद में महिला दिवस! कौन ब्लॉगर हैं जो हुये होंगे प्रसन्न!? ज्ञानदत्त पाण्डेय
प्रतिटिप्पणी: अरे ज्ञानजी कल जो लतगर्दी किये थे उनको आज वर्दी वाले उठा के फ़ेंक दिये बाहर - चिरकुट बेनामी टिप्पणी की तरह। अब तो बिल पास हो गया। आगे भी होइऐ जायेगा देखियेगा।

टिप्पणीबहुत धन्यवाद अनूप जी. सम्मानित महसूस करती हूँ जब आप जैसे सम्वेदनशील साहित्यकार की लेखनी मेरी भी रचना का उल्लेख करती है.साहित्य में घुसपैठ करती, एक भौतिक विज्ञानी के लिए इससे सुखद और क्या होगा? सरिता जी की रचना मर्मस्पर्शी है. शुभकामनाएँ.मीनू खरे
प्रतिटिप्पणीमीनूजी, मैं कोई साहित्यकार नहीं हूं। बस एक पाठक की हैसियत से रचना अच्छी लगी सो पसंद बन गयी। सरिता शर्मा जी की यह कविता कभी पॉडकास्ट करके आपको सुनवाऊंगा। बहुत अच्छी लगेगी कविता उनकी आवाज में सुनने से।

टिप्पणीअहा.. बहुत सारे लिंक एक साथ सहेज दिये, घंटों का इंतजाम हो गया.. विस्तृत चर्चा..!
वैसे हुआ तो और भी बहुत कुछ है महिला दिवस पर!! कार्तिकेय मिश्र
प्रतिटिप्पणीक्या बहुत कुछ हो गया महिला दिवस में? वो वाली बात हो गयी? बताओ भी या खाली टिपियाते ही रहोगे?

टिप्पणीअरे अनूप जी, जब कभी भी हम वाणी का गला दबावेंगे तो ..हाँ , नहीं, पता नहीं...का संशय थोड़े ही न होगा.....उ हो बस हा हा हा हा ..ही होगा ...
बाकी चर्चा जोरदार रही है....और होली बीत गई है तो का हुआ ...फिकिर नॉट...जो होगा देखा जाएगा....हाँ नहीं तो...!!! अदा
प्रतिटिप्पणीअभी लेटेस्ट किसका गला है हाथ में जरा अपडेट कीजियेगा अदा जी?


टिप्पणी:अगर आप हिंदी साहित्य की दुर्लभ पुस्तकें जैसे उपन्यास, कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह, निबंध इत्यादि डाउनलोड नहीं करना चाहते है तो कृपया मानसिक हलचल पर पधारें । ज्ञानदत्त पाण्डेय
प्रतिटिप्पणी:क्या मानसिक हलचल पर कोई साफ़्टवेयर काम नहीं करता?

टिप्पणी:@ इसी यात्रा के दौरान वे ज्ञानजी और गिरिजेश राव से भी मिले और उनको भला आदमी बता दिया। होली का मौका है कोई किसी को कुछ भी कह सकता है।
गुरुजी, तनिक दायें बायें ताक के! होली बीते जमा छः दिन हो गये, अब कोई भी मानहानि का दावा कर सकता है। कार्तिकेय मिश्र
प्रतिटिप्पणी:अरे भाई यहां कल तक रंग खेला गया है। मानहानि होली में भी होने लगी? घोर कलयुग!


टिप्पणी:सार्थक चर्चा। खासकर मनमोहन सिंह वाला कार्टून बहुत पसंद आया, आप कह रहे हैं कि इसे डूबे जी ने बनाया है। डूबे जी?…॥:)
कविता जी की कविता में खुद को देख पा रहे हैं। सरिता जी की मौजूं कविता भी बहुत भायी। विनीत जी की बात विचारणीय है। सबसे ज्यादा मन छुआ सतीश सक्सेना जी की कविता ने,इस कविता को हम पहले भी उनके ब्लोग पर पढ़ चुके हैं पर आज फ़िर से पढ़ना अच्छा लगा। अनीता कुमार
प्रतिटिप्पणी:शुक्रिया! देखिये हमने सतीश सक्सेना जी की कविता पहले कभी नहीं पढ़ी फ़िर भी पसन्द आ गया। इसका मतलब चाहे एक बार पढ़िये या कई बार असर तो होता ही है!

अन्य सभी तारीफ़ी टिप्पणियों के लिये आभार!

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....मुझसे बोलो तो प्यार से बोलो



कल सारे विश्व में १०० वां अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस धूमधाम से मनाया गया। देश की संसद में धूम-धड़क्का हुआ। धूम-धाम से महिला आरक्षण बिल पेश किया गया। हंगामा हुआ। बिल फ़ाड़ा गया। वोटिंग हो नहीं पायी। आगे देखिये क्या होता है। आज प्रधानमंत्री जी ने सर्वदलीय बैठक बुलाई है।

इस मौके पर प्रमोद ताम्बट ने नारी मुक्ति आंदोलन के अपहरण के किस्से सुनाये! हरि शर्मा जी ने औरत क्या है पर कविता सुनाई तो ई-पंडित ने चुटकुला।

सिद्धेश्वरजी ने पुरानी डायरी से अपनी एक पुरानी कविता के हवाले से नारी के बारे में बताया कि वह अब भी पत्थर तोड़ रही है तो अविनाश वाचस्पति ने नारी के साथ-साथ हिंदी की स्थिति पर भी चिंतन कर लिया! उधर हिमांशु ने नारी की तरफ़ से कविता वक्तव्य जारी करते हुये सूचित किया
पर,
अब
अतीत की नियति-रेखाओं को लुप्त कर
मैं नव्य-जीवन की राह लूँगी,
सच की आधारशिला पर गढूँगी


इस मौके पर सोनल रस्तोगी ने कविता लिखी पहचानों मुझे तो पतिनुमा प्राणी ने बताया पांच माह की गर्भवती महिला ने पति को मगरमच्छ के मुंह से बचाया

रेणु अगाल का कहना है
कई साल महिला आरक्षण विधेयक के विरोध के नायाब तरीकों--बिल की प्रतियाँ फाड़ना जैसे साहसिक क़दमों के बावजूद अगर ये हो ही रहा है तो अब पुरुषों ने ठान ली है कि उसे इस सारे खेल में अपने फ़ायदे के बारे में सोचना है.


नीरज गोस्वामीजी ने भी महिला दिवस के शुभ अवसर पर किसी शायरा की किताब की बात की। शायरा संयोग से ब्लॉगर (डॉ.कविता किरण) भी हैं। जिन्होंने प्रेम दिवस के मौके पर अपने ब्लॉग पर लिखा था-

डूबना तेरे ख्यालों में भला लगता है
तेरी यादों से बिछुड़ना भी सजा लगता है।



इस मौके पर विनोद भावुक नेनारी शक्ति को सलाम किया तो राहुल बोलेमैं सबको सलाम नहीं करूंगा

इसी मौके पर ये संस्मरण देखिये सिस्टर बन गई एड्स पीडि़तों की दीदी और चुड़ैल समझकर लड़के डर गए

संजय बेंगाणी ने सवाल पूछा जनाना राज चला गया है या आ रहा है? अपने लेख में संजय ने अपने विचार रखते हुये लिखा:
महिलाओं की कुछ बातें जिनसे मैं सहमत नहीं हूँ
वे महिलाएं जिनसे सहानुभुति है
वे महिलाएं जिनसे शिकायत है

जिन महिलाओं से संजय को शिकायत है उनके बारे में लिखते हुये वे बताते हैं-
स्वतंत्रता का अर्थ गैर जिम्मेदार होना कतई नहीं हो सकता. जहाँ कामकाजी महिलाओं को अपने परिवार के लिए आर्थिक सम्बल बनी हुई देखता हूँ, कुछ एक घटनाएं विचलित करने वाली भी हुई है. कमाने लगी महिलाएं परिवार में न रह सकी. पुरूष कमाता है, परिवार बना रहता है, महिला कमाए और परिवार से अलग हो जाए, मात्र इसलिए कि अब वह किसी पर निर्भर नहीं, अजीब लगता है.
इसी में उन्होंने अपने चच्चा के द्वारा दी गयी सूचना दी-“जनाना राज इन्दीरा के साथ खत्म हो गया" लेकिन वे चच्चा की बात से शायद सहमत नहीं हैं इसीलिये कहते हैं
आने वाला समय महिलाओं के अनुकुल ही होगा. अतः पुरूष सावधान रहे….राज गया नहीं, आ रहा है


राहुल उपाध्याय का दर्द सुनिये जी
जब तुम आई थी
तब कुछ कोपलें उग आई थी
और वसंत का आगमन हुआ था

अब वो फूल बन गई हैं
और शूल सी चुभती है

तुम मेरे कितने पास थी
और मैं तुमसे कितना दूर!


इस मौके पर रेखा श्रीवास्तव जी ने कविता लिखी :
एक शतक
ये भी बना,
क्या सुलझी है सौ गुत्थियाँ भी?
शायद नहीं?


ज्योति सिंह लिखती हैं:
आग पर चल कर दूसरों को ठंडक देती है,
असीम दर्द सहकर जीवन को जन्म देती है,
पुरूष को हर रूप में प्यार का संबल देती है,
जीवन संध्या में हर पल उम्मीद की रौशनी देती है....


लता हया जी की गुजारिश है कि नारी दिवस के मौके पर इस पोस्टर को अवश्य पढ़ा जाये।

डिम्पल की कविता के अंश हैं:
औरते जो हर रोज़,
मीलो दूर से पानी लाती.
कोसो दूर से चारा.
या कोई फैशन शो में हो रही कैट वॉक..

दंगे और सेलफोन.
अनपढ़ता या धार्मिक कट्टरपन..

ये कोई कविता नहीं,
किसी भाषा के रोज़ प्रयोग में आने वाले कुछ शब्द मात्र है,
गढ़ लेते है जिनके अर्थ सुविधा अनुसार हम..
हमारी अंतिम प्राथमिकता.

ज्यादा सोचने कि जरूरत नहीं.


आभाजी आज के हालात में अपनी बात कहती हैं। अपनी बात मतलब एक स्त्री की बात:
तुम्हारे साथ वन-वन भटकूँगी
कंद मूल खाऊँगी
सहूँगी वर्षा आतप सुख-दुख
तुम्हारी कहाऊँगी
पर सीता नहीं मैं
धरती में नहीं समाऊँगी।


कविता वाचक्नवीजी कभी पूरी नींद तक भी न सोने वाली औरतों के बारे में बताती हैं तो शिखा वार्ष्णेय एक स्त्री के अरमानों की झलक दिखाती हैं जिसका सच अंतत: यही है:
बालक के दूध की बोतल
हावी होने लगी विचारों पर,
पति के लिए नाश्ता
अभी तक नही बना,
और रात का खाना हो गया
हावी उसके मनोभावों पर.
और वो जगत की जननी,
ममता मयी रचना ईश्वर की,
भूल गई सब और बढ चली
वहीं जहाँ से आई थी,
मैत्रेई और गार्गी के इस देश की
वो करुण वत्सला नारी थी


महिला दिवस के मौके पर शिखाजी से हुई बातचीत सुनिये यहां

इस मौके पर इलाहाबाद के लंतरान कहते हैं-अगले जनम मोहे बेटा न कीजो इसी शीर्षक से लिखी एक पोस्ट में समीरलाल ने भगवान से मनाया था:
बस प्रभु, अब सुन लो इत्ती अरज हमारी...
अगले जनम में बना देईयो हमका नारी..


भगवान ने समीरलाल की अर्जी पर विचार किया या नहीं यह पता नहीं चला लेकिन उनके ब्लॉग के चार साल पूरे हो गये। उनको एक बार फ़िर से बधाई।

महिला दिवस के मौके पर वंदनाजी बजरिये दुष्यन्त कुमार कहती हैं:
एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है,
आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है.

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,
यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है

इसी मौके पर उन्होंने भी अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मध्य-प्रदेश जनसम्पर्क विभाग द्वारा जारी रचना पेश की।

स्वप्निल भारतीय का सवाल है-हर तरफ है दुशासन, कहाँ तक बचेगी द्रौपदी? सतीश सक्सेनाजी मां, बहन और महिला नेत्रियों से अपनी बात कहते हैं। महिला नेत्रियों से वे कहते हैं
क्या शिकवा है क्या हुआ तुम्हे
क्यों आँख पे पट्टी बाँध रखी,
क्यों नफरत लेकर, तुम दिल में
रिश्ते, परिभाषित करती हो,
हम पुरूष ह्रदय, सम्मान सहित, कुछ याद दिलाने बैठे हैं!


इस मौके पर विनीत कुमार ने चोखेरेबाली पर लिखे अपने लेख में अपनी बात रखी की:



अब जिस वर्चुअल स्पेस में एक स्त्री अपने अनुभवो को,समस्याओं को,तकलीफों और गैरबराबरी को सामने ला रही है,उसी स्पेस में ये मर्दवादी लेखक इन तमाम तरह की कुंठाओं और सहज सुख की तलाश कर रहे हैं। इस पर बार-बार विमर्श का लेबल चस्पाए जा रहे हैं। ऐसे में लेखक का फर्क सीधे-सीधे स्त्री के स्त्री होने और मर्द के मर्द होने को लेकर नहीं है बल्कि फर्क इस बात को लेकर है कि दोनों का इस स्पेस का इस्तेमाल अलग-अलग मतलब के लिए है। इसलिए वर्चुअल स्पेस में स्त्री सवालों को लेकर जो कुछ भी लिखा जा रहा है उसमें सामंती सोच,कुंठा और फ्रस्ट्रेशन का एक बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है। इसी समय प्रतिकार में ही सही एक स्त्री जब जबाब देती है तो उसे सरोगेट प्लेजर का एहसास होता है। ऐसे में ये लेखन जितना प्रत्युत्तर की मांग करता है उससे कहीं ज्यादा इग्नोरेंस की मांग करता है। हमें चस्पाए गए लेबलों की जांच करनी होगी और इन मर्दवादी लेखकों के तात्कालिक सुख की मानसिकता को हतोत्साहित करना होगा।



इसी के साथ शब्दों के सफ़र में आज देखिये-टट्टी की ओट और धोखे की टट्टी

मेरी पसंद



बचपन से सुना था
माँ के मुँह से
कि
यह घर मेरा नहीं है
जब मैं बड़ी हो जाऊँगी
तो मुझे
शादी होकर जाना है
अपने घर.

शादी के बाद
ससुराल में सुना करती हूँ
जब तब...

अपने घर से क्या लेकर आई है
जो यहाँ राज करेगी?
यह तेरा घर नही है,
जो अपनी चलाना चाहती है...

यहाँ वही होगा जो हम चाहेंगे,
यह हमारा घर है, हमारा !
कुछ समझी?
मीनू खरे



और अंत में


फ़िलहाल इतना ही। आज अधिकतर रचनायें महिला दिवस पर केंद्रित हैं। इस मौके पर डा.सरिता शर्मा की ये पंक्तियां शायद मौजूं हों:

पहले कमरे की खिड़कियां खोलो
फिर हवाओं में खुशबुयें घोलो,
सह न पाऊंगी अब मैं तल्खियां
मुझसे बोलो तो प्यार से बोलो ।

नीचे का कार्टून चंद्रशेखर हाड़ा जी के ब्लॉग से है। उसके नीचे वाला कार्टून डूबेजी का (बनाया)है।




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