मंगलवार, अक्तूबर 23, 2007

आलोक जी का रावण अपने मोबाइल के बिल बाँच रहा है

हड़बड़ी में गड़बड़ी होती है ऐसा लोग कहते हैं। कहते तो हम भी हैं लेकिन मानते नहीं हैं। हमें तो लगता है कि हर धांसू काम हड़बड़ी में ही होते हैं जैसे कि यह गुटका चर्चा। है कि नहीं? बतायें, शरमायें नहीं।

१.आलोक जी का रावणज्ञानद्त्त जी के सैलून जैसे ड्ब्बे में सफ़र करते हुये अपने मोबाइल के बिल बाँच रहा है।

२.कृप्या दो जूते की सुरक्षित दूरी बनाये रखें... :वर्ना दोनों पड़ेंगे और चार लोग हंसेंगे।

३.व्योमकेश शास्त्री और बेनाम ब्लॉगरी : दोनों की भूमिकायें ज्ञानदत्त पाण्डेय जी निभायेंगे।

४.शास्त्रीजी आपका आह्वान अधूरा है! :लेकिन आप कानून की कहानी सुना रहें हैं!

५. लक्ष्मण को लंकेश की दीक्षा:सफलता प्राप्त करने के लिए चरणवंदना परम आवश्यक है।

६.पापा नंबर तीन : एस.एम.एस. से चुनें।

७.मेरे घर आना उडन तश्तरी टिप्पणियों की तोप चलाना उड़नतस्तरी।

८.अम्मा में समाई दुनिया... : बाप का पत्ता कटा!

९.आगे चुकता करें :क्योंकि यहां तो एक ढूंढो तो हजा़र मिलते हैं ।

१०.मीडिया से गायब हुए लोक के मुद्दे : मैत्री घर में बरामद।

११.एक प्रिंटर की शहादत!
सब कुछ आफिस के सहकर्मियों द्वारा किया गया।

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6 टिप्‍पणियां:

  1. वाह जी, फुरसतिया जब हड़बड़ी में हों तब भी गजब ढाते हैं।

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  2. सचमुच जमाना फास्ट फूड का है. :) स्वादिष्ट रहा.

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  3. अब फुरसतिया ना रहिये, अब हड़बड़िया हो लीजिये। और इस काम को रोज डेली टाइप कर डालिये।

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  4. बेहतरीन और चौचक. :) जारी रहें, शुभकामनायें.

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