मंगलवार, जून 12, 2007

धन्यवाद-मैं पी लेता हूँ

आज मिल कर हम करें हर एक उसका धन्यावाद
कर गया जो टिप्पणी जाकर कहीं भी, धन्यवाद
तुमने सब बातें पढ़ीं हैं जो कि चिट्ठे पर लिखी
लिख गये हो चार अक्षर, वक्त लेकर धन्यवाद
और जिनको आ नहीं पाया तनिक लिखना कभी
इसलिये वे टिप्पणी कर हीन पाये धन्यवाद
टिप्पणी ने जो बढ़ाया जोश चिट्ठाकार का
आज हर उस टिप्पणीकर्ता का करता धन्यवाद


( यह सूर्यास्त का सुन्दर चित्र- उन्मुक्तजी के चिट्ठे से )

और चिट्ठों के यहां अब देख लें क्या गुल खिले
माया की कड़ियाम लिये कुछ और मुक्तक बन गये
चन्द्रमुख के चित्र छायाचित्रकारी का विषय
लग रही सोमेश को गर्मी भयंकर देखिये

बिम्ब जो प्रतिबिम्ब में दिखला रहे ताऊ उसे
आप पायेंगे रखा मैने उसे फ़ूटनोट पर
और संजय भाई किसको जानते, किसको नहीं
खान जी क्या चीज हैं नायाब लाये खोजकर


-जब ढेरों टिप्पणी मिलती हैं
या मुश्किल उनकी गिनती है
जब कोई कहे अब मत लिखना
बस आपसे इतनी विनती है
जब माहौल कहीं गरमाता हो
या कोई मिलने आता हो
जब ब्लॉगर मीट में कोई हमें
ईमेल भेज बुलवाता हो.
तब ऐसे में मैं खुश होकर
बस प्यार की झप्पी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.
---------------------


पान खायें और फिर कुछ प्रेरणायें लीजिये
दर्द ये हिन्दोस्तां का है समूचा देखिये
एक उलझी सी गज़ल के शेर भी पढ़िये हुज़ूर
जो सुना देखा नहीं है, अब उसे पढ़ लीजिये

गर्मियों की दोपहर में प्यार के किस्से सुनें
और तुम जो हो कवि तो क्या जरूरी सब सुनें
इक कहानी का विसर्जन हो रहा आरंभ में
जीना है दुश्वार दिल्ली में इन्हें भी तो सुनें

दुनियादारी की बातों को मोहिन्दर बतलाते हैं
जोगलिखी में मुम्बई के किस्से संजय बतलाते हैं
गर फ़िरदौस बररुए कहते जाते हैं उन्मुक्त कहां
मिला उन्हें सम्मान पुराणिक जी यह भी बतलाते हैं

मिर्ची सेठ हमेशा ही कुछ नई खबर लेकर आये
जीतू भाई बे फिर से कुछ अपने फोटू दिखलाये
डायबिटीज और उसके कुछ उपचारों वाले नुस्खे
एक गज़ल इरफ़ान साब की कोई यहाँ पर पढ़वाये



है खुली कहां पर मधुशाला
किसने पी क्यों पी है हाला
अब उड़नतश्तरी के बिन ही
देखो कैसे उड़ते लाला





Post Comment

Post Comment

रविवार, जून 10, 2007

फुरसतिया टाईम्‍स न फुरफरिया टाईम्‍स- ये है चिट्ठाचर्चा टाईम्‍स


कृपया ध्‍यान दें कि किसी भी चर्चा की तरह ऊपर का मसाला लिंकों से लदा हुआ है, पूरे अखबार को माऊस से सहलाते हुए पढ़ें ताकि कोई लिंक छूट न जाए।
अब भाई लोग तरस खाएं,क्‍योंकि पारा 45 से ऊपर है पास रखा कूलर, हीटर हो गया लगता है। और माना कि चिट्ठा चर्चाकार हो जाना हमारे सद्य सशक्तिकरण का प्रमाण है पर फिर भी इससे ज्‍यादा इंक ब्‍लॉगिंग में हमारा दम फूल रहा है और वैसे भी कॉपी पेस्‍ट से उद्धरण देना अभी हमें इंक ब्‍लॉगिंग में आता नहीं हैं इसलिए कविताओं की चर्चा टाईप करके ही की जा रही है। ऊपर के हिस्‍से में भी यदि कोई लिंक गड़बडा गया तो हमें 'सशक्‍त अनाड़ी' समझ क्षमा करें।

हॉं तो काव्‍यचर्चा: गर्मी में कविताएं खूब लिखी जाती हैं और पढ़ भी ली जाती हैं- पढ़ें तो टिप्‍पणी भी करें कैसे ये बताया है हिंद-युग्‍म पर, सीखें और फिर तुषार की कविता दान पर टिप्‍पणी करें। अतीत की गहराईयों में खोना चाहें तो युनुस के साथ मेंहदी हसन व गुलाम अली या विजेंद्र के साथ जावेद अख्‍तर का आनंद लें।

मै बंजारा,
वक्त के कितने शहरो से गुजरा हूँ
लेकिन,
वक्त के इक शहर से जाते जाते
मुडके देख रहा हूँ
सोच रहा हूँ
तुमसे मेरा ये नाता भी टूट रहा है
तुमने मुझको छोडा था जिस शहर मे आके
वक्त का अब वो शहर भी मुझसे छूट रहा है..

या फिर सुनें गज़लें मुनीर न्‍याजी की, बहादुर शाह जफ़र की या निज़ाम रामपुरी की।

आज की चर्चा में बस इतना ही। भूल-चूक लेनी देनी।

Post Comment

Post Comment

Google Analytics Alternative