बुधवार, जनवरी 06, 2010

तू रुकेगा या वक़्त के साथ जायेगा …….

image कल सुबह जब चर्चा करने बैठे तो सबसे पहले पल्लवी की पोस्ट देखी। पल्लवी ने नये साल की शुरुआत के किस्से सुनाये हैं। कभी वे दस्तखत में पिछले साल की तारीख डाल गयीं और कहीं तारीख सही करने में इतना मशगूल हो गयीं कि दस्तखत ही करना भूल गयीं। आप देखिये उनकी पोस्ट साल का पहला दिन...पपड़ी चाट सा! आखिरी तक जाते-जाते पोस्ट संवेदनशील् हो गयी जिसमें वे लिखती हैं:

.एक बच्चे को गोद में उठाकर उछालती हूँ! वो खिलखिला उठता है! अब सारे बच्चे गोद में आने के लिए मचल रहे हैं...उन्हें भी ये उछालने वाला खेल भा गया है! मुझे विश्वास नहीं होता ...मेरी गोद में तीन बच्चे चढ़े हुए हैं...सारे के सारे हलके फुल्के हैं!मैं बहुत बहुत बहुत खुश हूँ! पहले कभी क्यों नहीं आई यहाँ पर.....? आठ बज गए हैं..बच्चों के सोने का टाइम हो गया है! " आपको कभी आना हो तो दोपहर चार बजे आइये...बच्चों का खेलने का समय होता है" केयर टेकर हमें बताती है! बच्चों को बाय करके हम निकलते हैं! " चटाक....एक आवाज़ सुनकर हम पीछे पलटते हैं! " अब सो जाओ चुपचाप...कुछ देर पहले का खिलखिलाता बच्चा गाल सहलाता हुआ बिस्तर के तरफ जा रहा था! मन में कहीं कुछ गहरे तक चटक गया है! मन से दुआ निकलती है...." काश जल्दी से कोई इस बच्चों को यहाँ से गोद लेकर चला जाए!"

imageइस पोस्ट के बाद फ़िर देखी और पढी जीके अवधियाजी की पोस्ट मुझे वही पोस्ट अधिक पसंद आता है जो कि आम पाठकों के लिये लिखी गई हो! इसमें अवधियाजी बताते हैं :

रोज ही मैं हिन्दी ब्लोगों के अधिकतर पोस्टों को पढ़ता हूँ किन्तु मुझे वही पोस्ट अधिक पसंद आता है जो कि आम पाठकों के लिये लिखी गई हो। आम पाठकों के लिये लिखी गई पोस्ट से मेरा मतलब है जिसे पढ़ने से किसी की कुछ जानकारी मिले, उसे कोई सार्थक सन्देश मिले या फिर उसका स्वस्थ मनोरंजन हो।

कल की अवधियाजी की पोस्ट थी क्या टिप्पणियाँ ही किसी पोस्ट की गुणवत्ता का मापदंड हैं? उनका मानना है

मैं तो समझता हूँ कि किसी पोस्ट की गुणवत्ता तय करने वाले वास्तव में उसके पाठकगण हैं न कि टिप्पणियाँ।

इस मामले में संजय् बेंगाणी की टिप्पणी मौजूं है।संजय लिखते हैं:

जब मैं काम की जानकारी जुटाने के लिए कुछ अच्छे अंग्रेजी या अन्य भाषा के ब्लॉग देखता हूँ, वे काफी मेहनत से लिखे होते हैं मगर टिप्पणी होती ही नहीं. या एक दो कहीं कहीं दिख जाती है. वह भी केवल नाइस या थेंक्यू में. और उनके पाठक हजारों में होते हैं.

मेरी इतने दिन की समझ के अनुसार टिप्पणियों का बड़ा जटिल गणित होता है। लेखन् के साथ-साथ अच्छी नेटवर्किंग , व्यवहारकुशलता और आपकी लोकसमझ का योगदान रहता है टिप्पणियों में। मेरी समझ में तो

बहुत दिन के अपने अनुभव से बताते हैं कि टिप्पणी किसी पोस्ट पर आयें या न आयें लिखते रहें। टिप्पणी से किसी की नाराजगी /खुशी न तौले। मित्रों के कमेंट न करने को उनकी नाराजगी से जोड़ना अच्छी बात नहीं है। मित्रों के साथ और तमाम तरह के अन्याय करने के लिये होते हैं। फ़िर यह नया अन्याय किस अर्थ अहो? :)

हमारे लिये टिप्पणी तो मन की मौज है। जब मन , मौका, मूड होगा -निकलगी। टिप्पणी का तो ऐसा है- टिप्पणी करी करी न करी। :)

शुरुआत से ही कुछ ऐसा हुआ हिन्दी ब्लागिंग के साथ कि हम अभी तक टिप्पणी के आकर्षण से बाहर न आ पाये। ज्ञानजी ने अपनी ब्लागपोस्ट पर टिप्पणियां बन्द कीं तो लोगों ने अपनी अपनी समझ के अनुसार बातें की। यह तो इस पोस्ट तक की बात है।अगली पोस्ट में फ़िर् उनका टिप्पणी काउंटर खुलेगा।

शुरुआती दौर में मैं देखता था अंग्रेजी ब्लॉग में आपस में कहा-सुनी काफ़ी होती थी। उतनी शायद अभी भी नहीं होती है हिन्दी ब्लॉगिंग में। इसके बाद कुछ अंग्रेजी ब्लॉगर्स् ने अपने ब्लॉग पर टिप्पणियां बन्द कर दीं। इनमें से एक अमित वर्माका ब्लॉग है। अंग्रेजी के सबसे लोकप्रिय ब्लॉग्स में से एक ब्लॉग है अमित वर्मा का ब्लॉग। अमित वर्मा ने अपने ब्लॉग पर टिप्पणियां बन्द की थीं सन 2005 में। ऐसे ही गौरव सबनीश भी काम भर के पापुलर ब्लॉगर हैं। उनके ब्लॉग पर भी टिप्पणियां बंद हैं। आप अपनी प्रतिक्रिया उनको मेल से भेज सकते हैं। अन्य कई नामधारी ब्लॉगर के ब्लॉग पर टिपियाने के पहले वहां रजिस्टरट्रेशन करना पड़ता है।

कहासुनी की बात् से याद आया कि अमित वर्मा का भी एक विरोधी ब्लॉग था। उसका एकमात्र काम अमित वर्मा का विरोध करना था। उसका नाम भी कुछ इसी तरह था एन्टीअमितवर्मा ब्लॉग। हिन्दी में फ़िलहाल इतने मेहनती और लगनशील लोग नहीं हैं। उसने तो खुले आम लोगों को पैसा देकर अपने ब्लॉग में लिखने के लिये आवाहन भी किया था शायद। अब वो विरोधी ब्लॉग दिखता ही नहीं है मुआ।

जिन लोगों को लगता है कि हिन्दी ब्लॉगिंग में बहुत गंध मची है उनको शायद ये और ये पोस्टें सुकून दें कि जित्ती चिरकुटई अंग्रेजी ब्लॉगिंग में सन 2005 में हो ली हम अभी भी उससे काफ़ी बेहतर स्थिति में हैं।

अब यह बात अलग है कि जहां अंग्रेजी ब्लॉगरों में तमाम लोग समसामयिक लेख भी लिखते हैं वहीं हमारे बुद्धिजीवी हिन्दी ब्लॉगर भाई बेटा कविता सुनाओ तो टॉपी देंगे जैसी बुजुर्गसुलभ लीलाओं में अपना मन लगा रहे हैं और मुग्धा नायिकाओं सरीखे अपने ही सौंदर्य पर रीझ रहे हैं। बहरहाल!

शिवकुमार मिश्र दिनकर के भीषण प्रशंसक हैं। इसी के चलते उन्होंने दिनकरजी को एक ठो पत्र लिखवा दिया हलकान विद्रोही जी से ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' का राष्ट्रकवि 'दिनकर' के नाम पत्र। अरविन्द मिश्रजी को लगा कि लोगों के ज्ञानकी परीक्षा लेनी चाहिये सो उन्होंने आवाहन किया कौन बताएगा पहली लाईन का अर्थ .......समर शेष है! उन्होंने यह भी कह दिया कि जो इस पहली लाइन का अर्थ् बतायेगा वे उसकी शागिर्दी कर लेंगे। पता चला बहुत् लोग इसी डर से इस सरल सी कविता का अर्थ नहीं बता रहे हैं कि कहीं मिश्रजी उनके शागिर्द न बन जायें। यह क्या कुछ ऐसे ही नहीं है जैसे लोग इंगलैंड के ओपनर क्रिकेटर ज्यॉफ़ बायकाट को एकदिवसीय क्रिकेट में आउट करने के बजाय खिलाने रहने में ज्यादा उत्सुक रहते थे ताकि इंग्लैंड की रनगति कछुआ चाल बनी रहे। मिश्रजी की इस पोस्ट पर अजित वडनेरकरजी का कहना है:

इस ब्लाग जगत में अरविंद मिश्र से ज्यादा शरारती व्यक्ति और कोई नहीं है, इस नतीजे पर अब पहुंच चुका हूं। लोग इनकी शरारतों पर न जाकर इन्हें संजीदगी से भी लेते हैं, ये इनकी शख्सियत का अलग पहलू है। कुछ खास लोगों को इनकी ये दोनों अदाएं नहीं भाती हैं।

नीरज गोस्वामीजी मरहूम नासिर काजमी की किताब के बारे में बताते हैं। उनकी गजल के कुछ नमूने देख लिये जायें:

imageकड़वे ख़्वाब ग़रीबों के

मीठी नींद अमीरों की

रात गये तेरी यादें

जैसे बारिश तीरों की

मुझसे बातें करती है

ख़ामोशी तस्वीरों की

कुलवंत हैप्पी ने समीरलाल का इंटरव्यू ले डाला। देखिये विस्तार से।

क्या आप बिहारियों को भी अच्छा लग रहा है? में रवीश कुमार का बिहार विमर्श है। बिहार की 11फ़ीसदी से अधिक की विकास दर से उत्साहित होकर वे अपने मन की बात कहते हैं:

image बिहार के प्रवासी लोग अपने अपने शहरों में राज्य की छवि को लेकर काफी चिंतित रहते हैं। ये उनकी किसी भी कामयाब पहचान को प्रभावित करता है। अगर आप यू ट्यूब देखेंगे तो उसमें पटना शहर को लेकर कितने तरह के वीडियो हैं। विदेशों में बसे लोग पटना की चंद इमारतों को खूबसूरत लगने वाले एंगल से शूट कर उन्हें अंग्रेजी गाने के साथ परोस रहे हैं। दावा करते हैं कि देखो, ये है पटना। किसी की मत सुनो,अपनी आंखों से देख लो। और बिस्कोमान का एफिल टावर नुमा शाट घूमने लगता है। कोने में पड़ा कृष्ण मेमोरियल वीडियो में बुर्ज दुबई की तरह दिखने लगता है। वीडियो अपलोड करने वाला कहता है,देखा पटना गांव नहीं हैं। बिहार को लेकर नई किस्म की इस उत्कंठा पर और नज़र डालनी चाहिए। दिवाली के दिन मैंने अपने इसी ब्लॉग पर वीडियो में बसता एक शहर लिखा था। जिसमें पटना को लेकर बिहारी अभिलाषाओं की झलक मिलती है।

बिहार से जुड़े कई साथियों के अलावा अन्य साथियों ने इस पोस्ट पर उत्साही टिप्पणियां की हैं।

पंकज सुबीर जी द्वारा आयोजित इस तरही मुशायरे में ये गजलें भी देखिये तो सही!

यहां पेश है मनोज कुमार का एक लेख और उस पर घुघुती बासूतीजी की प्रतिक्रिया।

मनोज कुमार का लेख

फिरोजाबाद का नाम भारत के कोने कोने में जाना जाता है तो इसलिये कि वहां किसम किसम की चूड़ियां बनती हैं। शायद बिंदी और सिंदूर बनाने का काम भी होता होगा। इस बारे में मेरी जानकारी थोड़ी कम है। जब स्त्रियां श्रृंगार की इन महत्वपूर्ण वस्तुओं का त्याग करना आरंभ कर देंगी तो फिरोजाबाद के कारखाने मर जाएंगे। एक दो नहींे सैकड़ों परिवारों के समक्ष भूखों मरने की नौबत आ जाएगी। भारत में जिस तरह कई प्राचीन लघु और गृह उद्योग खत्म होते रहे हैं, वैसे ही एक और लघु और गृह उद्योग खामोषी से मर जाएगा। बिलकुल उसी तरह जिस तरह पावरलूम खत्म होते जा रहे हैं, जिस तरह भोपाल का जरी उद्योग सांसें गिन रहा है। आधुनिक मषीनें कपड़े बुन रही हैं और महंगे लेदर के पर्स।क्या चूड़ी, बिंदी और सिंदूर त्यागने से स्त्री आजाद हो जाएगी? क्या वह श्रृंगार की इन वस्तुओं का उपयोग नहीं करेगी तो उसकी षान पर कोई फर्क पड़ जाएगा, षायद
नहीं। इसे और विस्तार से देखना होगा कि किस तरह हमारी भारतीय अर्थव्यवस्था को चैपट करने के लिये खेल खेला जा रहा है। भारतीय स्त्रियों के साथ ही भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं को भी भेंट चढ़ाया जा रहा है।

तो फिरोजाबाद की चूड़ियां ढूंढ़ते रह जाओगे

घुघुती बासूती की प्रतिक्रिया

बहुत रोचक बात कही है। संसार कभी भी किसी के लिए रुका नहीं रहता। वह बदलता रहता है, प्रगति करता रहता है। यदि चूड़ी, बिंदी और सिंदूर का उपयोग केवल इसलिए किया जाए कि इससे लोगों को रोजगार मिलता है तो शायद हमें वापिस लकड़ी के चूल्हे जलाने होंगे, उपले जलाने होंगे, पुरुषों को धोती, लंगोट,बंडी पहननी होगी, मोची गठित जूते पहनने होंगे, खड़ाऊँ पहनने होंगे,शनि देव को तेल दान करना होगा,बैलगाड़ी व घोड़ागाड़ी उपयोग करने होंगे,पीतल व मिट्टी के बर्तन उपयोग करने होंगे,आदि आदि..........

अन्यथा बहुत से लोगों का रोजगार चले जाएगा!

बात कुछ जमी नहीं! सीधे से कहिए कि स्त्रियों को चूड़ी, बिंदी और सिंदूर का उपयोग करना चाहिए क्योंकि उन्हें यह सब धारण करता देख आपके मन को सुकून मिलता है। क्यों व्यर्थ में इसे रोजगार से जोड़ रहे हैँ? वैसे तर्क के लिए आप कुलिओं का जिक्र भी कर रहे हैं। वैसे वह एक बाद में आया विचार सा ही है।
सिगरेट, बीड़ी पीना बंद करने की भी ऐसी ही हानियाँ होंगी। पटाखे बजाना छोड़ने की भी। सूची बहुत लम्बी है।

पुरुष जितना समय स्त्री के वस्त्रों, साज श्रृंगार व पहनावे पर सोचकर व्यर्थ करते हैं यदि अपने पहनावे व रखरखाव पर लगाएँ तो................घुघूती बासूती

अब कुछ कवितायें भी देखिये। संगीता स्वरूपजी और पुष्पेन्द्र सिंह को पहली बार पढ़ा ,अच्छा लगा। आप भी देखिये:

image अरे ! मैं यहाँ हूँ ...
सुनते ही -
जैसे ही पलटी
कि
फिसल गया था पांव
और संभाल लिया था मुझे
तुमने अपनी बाँहों में ।
आज भी
सुरक्षा - कवच बना हुआ है
मेरे लिए
तुम्हारी बाहों का दायरा

बाँहों का दायरा

संगीता स्वरूप

बचपन से जो ख्वाब संजोया वो पूरा कब होगा !
अपने अपने घर में सब का रैन बसेरा कब होगा !!
खेतों में लहलहाती फसलें आँखों में हो उम्मीदें !
हर बच्चे के हाथ किताबें ऐसा मंजर कब होगा !!
रात और दिन बस एक ही मसला रोटी का !
कोई न भूखा सोने पाए ऐसा शुभ दिन कब होगा !!
नारी को भी पुरुषों सा समता का अधिकार मिले !
सब का दर्द अपना सा लगे ऐसा आलम कब होगा !!
घर -घर में है शीत युद्ध और मतभेदों की दीवारें !
चहुँदिश से बस प्यार ही बरसे ऐसा मौसम कब होगा !!

अपना क्या है....... image

वस्ल का हिज्र से मुकाबला क्या है|
जिंदगी जीने का फलसफा क्या है ||
अक्सर पूंछता हूँ इन परिंदों से |
झगडती शरहदों का मसला क्या है||
नब्ज़ है दबी सी दिल हैरान सा |
बेतरतीब इश्क़ का माज़रा क्या है ||
जिंदगी मैने तुझे देखा करीब से |
इस भरे जहाँ में अपना क्या है ||
तू रुकेगा या वक़्त के साथ जायेगा
बता तेरा आखिरी फैसला क्या है ||

पुष्पेन्द्र सिंह

पीडी के पास हाथ से लिखा पत्र आया तो मुस्कराने लगे,मारे खुशी के इतराने लगे और लगे हाथ किस्से सुनाने लगे-खुशियों का जरिया : ई-मेल या स्नेल-मेल

साहित्य एक तपस्या है, साधना है!! ऐसा बता रहे हैं ललित शर्माजी। देखिये।

महेन्द्र मिश्र रिटायर्ड हो लिये हैं। घर आ गये हैं लेकिन पुराने कागज उनको परेशान करते हैं और वे लिखते हैं-

पुराने कागज के चंद टुकड़ो से - "उनकी यादो में,अब हम विरह गीत गाने लगे हैं" अब किसकी याद है, कैसा विरह है यह मिसिरजी का निजी मामला है।

जगदीश भाटिया जानकारी देते हैं बरह में हिंदी टाइपिंग कैसे करें How to type in Hindi with Baraha

अनिलकान्त को पढिये तो ऐसा लगता है कि गद्यगीत पढ़ रहे हैं। देखिये आप भी:

image उन नीम के झरते हुए पीले पत्तों और उतरकर गाढे होते हुए अँधेरे के बीच चलती हुई बातें बहुत दूर तक चली गयी थीं । हम अपने अपने क़दमों की आहटों से अन्जान बहुत दूर निकल गये थे । तब उसने यूँ ही एकपल ठहरते हुए कहा था ....
-यह नीम की ही पत्तियाँ झड रही हैं न...
-हाँ, शायद पतझड़ का मौसम है ।
-नहीं ये अँधेरे का मौसम है...लगता है अँधेरा हौले हौले झड़ता हुआ गहरा रहा है ।

उस खामोश फैली हुई चाँदनी में उसके ओंठ तितली के पंखों की तरह खुले और काँपे थे और उसकी पलकें सीपियों की तरह मुंद गयीं थीं...जिस पल दोनों के ओठों के स्पर्श ने उस यादगार गहराए हुए पल को एक खुशनुमा न भूलने वाली याद बना लिया था । खुलती और बंद होती सीपियों का वह संसार एक अध्याय बन जिंदगी से जुड़ गया...

मनोजकुमार ने अपने ब्लाग सफ़र के तीन माह में पोस्ट शतक पूरा किया। आज अपने ब्लाग् पर वह् कविता पेश की उन्होंने जो पहली पोस्ट के रूप में थी। देखिये विश्‍व विटप की डाली पर

विश्‍व विटप की डाली पर है,
मेरा वह प्यारा फूल कहां !
है सुख की शीतल छांव कहां,

चुभते पग-पग पर शूल यहां !!

imageजग में बस पीड़ा ही पीड़ा,
दुख ज्वाला में जलते तारे।
शशि के उर में करुण वेदना,

प्रिय चकोर हैं दूर हमारे !!
बड़ी विचित्र रचना इस जग की,
कांटों में खिलते फूल यहां !
है सुख की शीतल छांव कहां,
चुभते पग-पग पर शूल यहां !!

मनोज जी को बधाई और मंगलकामनायें।

नये चिट्ठे

image चिट्ठाजगत की सूचना के अनुसार पिछले 24 घंटे में 14 चिट्ठे जुड़े। डा.अमर कुमार अपनी खुद की साइट पर अपने पुराने ब्लाग ले जा रहे हैं इसीलिये नये चिट्ठाकार कहलाये। लाली जबलपुर से भोपाल जाकर लिखते हैं मन का विस्वास ही सफलता दिलाता है । राज(चित्र बायें) स्वाति से प्रेरित होकर लिखने लगे। इन्दौर पुलिस सड़क सुरक्षा सप्ताह-२०१० मना रही है। देवरिया की सुमन कहती हैं जीत गयी जिंदगी! (नीचे का चित्र सुमन का है) अनामिका नाम से लगता है स्त्री का ब्लॉग है लेकिन वहां 33 वर्ष के मूंछ वाले जवान का फोटो है। विनय कुमार कहते हैं पानी bachav । आमीन का मानना है कि स्टूडेंट नहीं लग रहे आमिर खान! नेपाल गुरु में तो लगता है वशीकरण मंत्र की बातें हैं। आत्माकवच में तेलांगना की वासना है। सपनों की शाम अभी सही लिखना सीखना रवि रायभर को।रामगोपालविश्वकर्मा ने अभी अपनी मित्रसूची जारी की है। विशाल की आस्थायें अधूरी हैं लेकिन् वेकहते हैं हाँ वो मुस्लमान है। डा.विजय मिश्र से जानिये क्या है अध्यात्मिक साम्यवाद!

1. कुछ तो है (http://kuchh.amarhindi.com) समाज चिट्ठाकार: डा. अमर कुमार
2. lali the journlist (http://shrilali78.blogspot.com/) चिट्ठाकार: lalit kumar lali
3. raj ki story (http://rajkistory.blogspot.com/)चिट्ठाकार: Raj
4. Indore Police News (http://indorepolice.blogspot.com/)चिट्ठाकार: Indore Police
5. SUN LO MERI BAAT (http://sunlomeribaat.blogspot.com/)चिट्ठाकार: SUN LO MERI BAAT
6. ANAMIKA (http://arora777j.blogspot.com/) चिट्ठाकार: ANAMIKA
7. indian feeling (http://vinay23.blogspot.com/) चिट्ठाकार: vinay kumar
8. दफ़ा-512 (http://dafaa512.blogspot.com/) चिट्ठाकार: आमीनimage
9. Nepal Guru (http://gurunepalbabu.blogspot.com/) चिट्ठाकार: gurunepalbabu
10. आत्मा कवच - आपकी आत्मा को जगाने के लिए एक ब्लॉग!!! (http://soulkawach.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Manpreet Makkar
11. सपनों की सांम (http://ravirajbhar.blogspot.com/) चिट्ठाकार: Ravi Rajbhar
12. Ramgopal Vishwakarma Bhopal (http://rgv786.blogspot.com/) चिट्ठाकार: Ramgopal Vishwakarma
13. Adhuri Ashayein (http://krantivishal.blogspot.com/)चिट्ठाकार: Vishal
14. Adhyatmik Samyavad (http://adhyatmiksamyavad.blogspot.com/)चिट्ठाकार: Dr. Vijay Mishra

एक लाईना

  1. आधी जली बीड़ी: सुलगाओ फ़िर् से यार सुट्टा मारा जाये।
  2. कौन बताएगा पहली लाईन का अर्थ .......समर शेष है! : किसकी हिम्मत है जो बवाल-ए-शागिर्द मोल ले।
  3. क्या आप बिहारियों को भी अच्छा लग रहा है?: हम बिहार के न हैं तो का अच्छा भी न लगे?
  4. “कपड़े तो उतर गए ,अब मैडल भी छिनेगा!!” (चर्चा मंच): बड़ा जुलुम है जाड़े में।
  5. पुरुष जितना समय स्त्री के वस्त्रों, साज श्रृंगार व पहनावे पर सोचकर व्यर्थ करते हैं यदि अपने पहनावे व रखरखाव पर लगाएँ तो................घुघूती बासूती : को पोस्ट काहे को लिखनी पड़े?
  6. क्या कोई ब्राम्हण उफ अल्ला कह सकता है?: कह देगा तो कोई कुफ़्र हो जायेगा क्या?
  7. साहित्य एक तपस्या है, साधना है!!: साधनाजी अभी तक एक्टिव हैं वाह गजब हीरोइन हैं!!
  8. मुझे वही पोस्ट अधिक पसंद आता है जो कि आम पाठकों के लिये लिखी गई हो: अमरूद के मौसम में आम का किस्सा कह रहे हैं आप!
  9. महिला की माया!: एक साथ दस को निपटाया।
  10. जाने कैसा होगा – मेरा गाँव ~~: कविता क्या लिखना जाओ देख के आव।

और अंत में: आज की चर्चा में बस इतना ही। आपका दिन झकास बीते यही कामना है। मौज से रहे ,मस्ती करें।

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सोमवार, जनवरी 04, 2010

तीन बेवकूफ़ों के बहाने कुछ और बेवकूफ़ी की बातें

image आजकल आमिर खान की फ़िलिम थ्री इडियट् चर्चा में है। इस फ़िल्म के बारे में लोगों ने अलग-अलग मुद्दे को सामने रखते हुये पोस्टें लिखीं। जहां अभय तिवारी निर्देशक विधु विनोद् चोपड़ा को महीन चोट मारते हुये लेखक चेतन आनंद के साथ खड़े होते हैं वहीं रवीश कुमार इस फ़िलिम का लब्बो-लुआब पेश करते हुये इसे आमिर खान की ही फ़िल्म  तारे जमीं से कमतर फ़िलिम बताते हैं। विनीत कुमार की शिकायत इस फ़िलिम या लेखक के रोने-धोने से अलग है। उनको IB7 के एंकर शंकर चौधरी के उस अंदाज से शिकायत है जिस अंदाज में उन्होंने चेतन भगत की बेइज्जती खराब की। वे तो सीधे सीधे सवालै दाग देते हैं --क्‍या IBN 7 के एंकर संदीप चौधरी में भाषाई शऊर नहीं है? डा.अभिज्ञात का मानना है कि चेतन भगत को अपनी लड़ाई नैतिकता के आधार पर लड़ने के बजाय कोर्ट ले जाना चाहिये।

विनीत कुमार के लेख पर किन्ही अनामी पोल-खोल और विनीत् कुमार की ज्ञानवर्धक नोंक-झोंक् भी है। विनीत के इस लेख पर टीवी एंकर संदीप चौधरी के तीखे रवैये पर कार्टूनिस्ट काजल कुमार की महीन टिप्प्णी है:

कोई हैरानी नहीं हुई ये पढ़ कर. सभी चैनलों पर आज बस दो ही चीज़ें प्रचलित हैं - 1. पटापट तेज़ी से बोलना 2. बद्तमीज़ी से बोलना. नई पौध को लगता है कि यही है सफलता व महानता की कुंजी. लानत है.

अर्कजेश  तो किताब और फ़िलिम का तुलनात्मक अध्ययन भी कर दिये और कहते हैं कि किताब के मुकाबले फ़िलिम लचर है।

इस मामले में चेतन भगत का बयान उनके ब्लाग पर है।

इन लेखों के चुनिंदा अंश  यहां दिये जा रहे हैं। ऊपर का कार्टून  कीर्तीश भट्ट का है।

image थ्री इडियट्स मौजूदा सिस्टम से निकलने और घूम फिर कर वहीं पहुंच जाने की एक सामान्य फिल्म है। जिस तरह से तारे ज़मीन पर मज़ूबती से हमारे मानस पर चोट करती है और एक मकसद में बदल जाती है,उस तरह से थ्री इडियट्स नहीं कर पाती है। चंद दोस्तों की कहानियों के ज़रिये गढ़े गए भावुकता के क्षण सामूहिक बनते तो हैं लेकिन दर्शकों को बांधने के लिए,न कि सोचने के लिए मजबूर करने के लिए। फिल्मों के तमाम भावुक क्षण खुद ही अपने बंधनों से आजाद हो जाते हैं। जो सहपाठी आत्महत्या करता है उसका प्लॉट किसी मकसद में नहीं बदल पाता। दफनाने के साथ उसकी कहानी खतम हो जाती है। कहानी कालेज में तीन मसखरों की हो जाती है जो इस सिस्टम को उल्लू बनाने का रास्ता निकालने में माहिर हैं। ऐसे माहिर और प्रतिभाशाली बदमाश हर कालेज में मिल जाते हैं।
सिस्टम के थ्री इटियॉटिक बागी रवीश कुमार
   
image फ़िल्मी दुनिया में लेखक सबसे निरीह जानवर रहा है। सबसे पहले डाका उसके पैसों और नाम पर ही पड़ता है। यहाँ हर निर्देशक को अपने नाम के पहले 'रिटेन एन्ड डाइरेक्टेड बाइ' देखने का शौक़ है। इस दुनिया ने तो बड़े-बड़े फ़िल्मों, बड़ी-बड़ी किताबों पर डाके डाले और किसी को कोई आभार तक नहीं दिया, छोटे-मोटे लेखक तो रोज़ ही मारे जाते हैं। चोपड़ा जी ने कम से कम किताब के अधिकार खरीदे, पैसे भी दिये, और भले आख़िर में, पर नाम दे तो दिया। चेतन भगत को उन के पैर छू कर धन्यवाद देना चाहिये, उन्होने धन्यवाद नहीं दिया इसीलिए चोपड़ा जी को क्रोध आ गया, नहीं तो वो देवता आदमी हैं।



चेतन भगत शुड बी थैंकफ़ुल अभय तिवारी
image सवाल ये कि क्या तटस्थ होने या ऑडिएंस को दिखलाने के लिए भाषाई स्तर पर अपने को ख़त्म कर लेना ज़रूरी है? ऐसा लोगों को वाजिब सम्मान देते हुए नहीं किया जा सकता क्या? ये ज़रूरी है कि एंकर हर शो में ये साबित करे कि वो एंकर है और उससे बात करनेवाले जो भी लोग हैं, उनसे नीचे की कतार में खड़े हैं। देखा-देखी में पूरी की पूरी पीढ़ी तटस्थ होने का मतलब भाषाई स्तर पर लोगों की उतार देना समझा करेगी। लोगों को सम्मान देने और भाषाई स्तर पर सभ्य होने का हुनर क्यों खत्म कर रहे हैं हमारे एंकर, जरा सोचिए।

क्‍या IBN 7 के एंकर संदीप चौधरी में भाषाई शऊर नहीं है? विनीत कुमार
   

image फिलहाल चेतन भगत की जो लड़ाई है उसका नैतिकता से ताल्लुक नहीं है बल्कि मामला व्यावसायिक लाभ में हिस्सेदारी का है। अच्छा होगा कि भगत इसे कानूनी तौर पर हल करें। ढिंढोरा पीटकर तो वे अपनी भद्द ही पिटायेंगे वरना फिल्म के नाम के तीन में एक वे स्वयं साबित होंगे बाकी दो विधु विनोद चोपड़ा और राजकुमार हिरानी तो हैं ही।

3 इडियट्सः चेतन भगत और दो अन्य

डा.अभिज्ञात
image चेतन भगत को फिल्‍म के क्रेडिट हिस्‍से में वाजिब श्रेय मिला या नहीं यह तो फाइव प्‍वाइंट समवन देखने वाला और किताब पढने वाला मनुष्‍य समझ ही जायेगा । इसमें कोई आईआईटी बुद्धि या पटकथा लेखन के कौशल की कतई आवश्‍यकता नहीं है । और यह भी कि सबको पहले से ही पता था कि यह फिल्‍म चेतन भगत के उपन्‍यास पर बन रही है । जिनको पता नहीं था अब पता हो गया है ।
अंत में यदि पूछा जाय कि फिल्‍म देखने और उपन्‍यास पढने में ज्‍यादा मजेदार क्‍या है तो बेहिचक मैं यह कहूंगा कि फाइव प्‍वाइंट समवन के मुकाबले 3 इडियट्स बहुत कमजोर है । वजह : फिल्‍म हमें सिर्फ मनोरंजन देती है जबकि उपन्‍यास मनोरंजन से आगे भी कुछ देता है ।

3 ईडियट्स बनाम फाइव प्‍वाइंट समवन
अर्कजेश
image हाल ही में प्रदर्शित फिल्म '3 इडियट्स' की कहानी को लेकर विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। लेखक चेतन भगत का कहना है कि यह फिल्म उनकी किताब 'फाइव प्वाइंट समवन' की कॉपी है, जबकि फिल्मकार विधु विनोद चोपड़ा इससे पूरी तरह सहमत नहीं है। भगत ने अपने ब्लॉग पर पूरे मामले पर विस्तार से लिखा है।

चेतन भगत कह रहे हैं 'पढ़ो तब बोलो..'
गिरीन्द्र नाथ झा
image साल के शुरु में आपने भी कुछ संकल्प लिये होंगे। पूरे हों या न हों संक्ल्प किये तो जा ही सकते हैं। गौतम राजरिशी के संकल्प देखिये। शायद आपको भी कुछ संकल्प लेने का मन करे।

- हमब्लौगरों{जैसे हमसाया, हमसफर} को सप्ताह में बस एक पोस्ट लिखने के लिये तैयार करवाना है या गुगल वालों को कुछ ऐसी बंदिश लगाने का निवेदन करना है कि हर ब्लौग पर सात दिन से पहले कोई नयी पोस्ट लग ही न पाये।
- बेवजह यत्र-तत्र-सर्वत्र टिप्पणी देने में कोताही बरतना है अब से और हर दूसरी रचनाओं पर कोई झूठी वाह-वाही नहीं देनी है।
- डा० अनुराग , गिरिजेश राव और हिमांशु की पुरानी पोस्टों के लिये वक्त निकालना है।
- अनुनाद, सबद, वैतागवाड़ी, जिद्दी धुन, आलोचक की सब पोस्टों को शुरु से पढ़ना है।
- किशोर चौधरी, नीरा, संजय व्यास, राहुल और कुश को प्रेरित करना है कि तनिक जल्दी-जल्दी आया करें। अरे हाँ, अपूर्व और रुपम को भी!
- ब्लौग पे इधर-उधर ग़ज़लों और कविताओं के संग हो रहे अत्याचार{emotional or otherwise} को बर्दाश्त नहीं करना है। विशेष कर ग़ज़लों के संग।
- जैसा कि गुरुजी कहते हैं व्यर्थ के ब्लौग-विवादों में अपनी ऊर्जा और अपने बेशकीमति समय को नष्ट नहीं करना है।
- अपने ब्लौग के साइड-बार में अभी तक पढ़े गये कुछ ब्लौगरों द्वारा लिखे गये पसंदीदा पोस्टों का लिंक रखना है।

image अविनाश वाचस्पतिजी ने अपना नाम पुरस्कार सूची से अलग करने का आग्रह करते हुये लिखा है 

मैं अपनी संपूर्ण विनम्रता के साथ हाथ जोड़कर निवेदन कर रहा हूं कि मेरा नाम को किसी ऐसे सम्‍मान में शामिल होने के लिए न जोड़ा जाये तो बेहतर है। इसे मेरा घमंड भी न समझा जाए क्‍योंकि यह मेरा घमंड है भी नहीं। मैं तो बिना किसी पुरस्‍कार और सम्‍मान की अपेक्षा किए बिना हिन्‍दी और हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के विकास के लिए जीवनपर्यंत सक्रिय रहना चाहूंगा और ऐसी किसी भी प्रतियोगिता से दूर ही भला हूं।

 

  1. ब्लॉग जगत में छाया 3 इडियट्स विवाद :बड़ा स्वाभाविक सीन लग रहा हैimage
  2. हिन्दी भाषा को समृद्ध करने की अपील हो, तो टिप्पणी देने के मामले में पैमाना रखें जनाब: पैमाना रखा जायेगा एकाध पैमाने के बाद ठंड भरे इस मौसम से 5 जनवरी के बाद ही थोडी राहत मिल पाएगी !!:  तब तक ब्लाग जगत की गर्मी से काम चलायें
  3. जरा ये कविता भी पढ़ कर देखें!!!: अच्छा पढियेगा बाद में पहले टिपिया दीजिये।
  4. गत वर्ष की शुभकामनायें ---देखिये कितनी काम आई ---: अरे साल निकाल दिया भाई
  5. क्‍या IBN 7 के एंकर संदीप चौधरी में भाषाई शऊर नहीं है?: भाषाई शऊर से एंकरिंग प्रभावित होती है भाई!
  6. टांक लेने दे उसे मोहब्बत के पैरहन पर इश्क़ का बटन ......!!: बाद में तो उखड़ ही जाना है उसे।
  7. ट्रेन हादसों का जिम्मेदार कौन ??: कह नहीं सकते, ज्ञान जी के ब्लाग पर कमेंट बन्द हैं।
  8. “टिप्पणी के द्वार ही बन्द कर दिए!” (चर्चा मंच): पोस्ट् के फ़ाटक खोलने के लिये।
  9. सुबह चांदनी मिली: रोशनी के गले में बांहें डालकर चल दी।image
  10. पत्नी मायके से नहीं लौटती, क्या मैं तलाक ले सकता हूँ?: हां ले लो अगर किसी और मिल जाये वैसे मिलेगा नहीं आसानी से।
  11. शादी के नाम पर खरीदी-बेची जाती लड़कियां ??:और हमारे पहरुए आँखों पर पट्टी बांध कर पड़े हुए हैं
  12. यह है "आज की नारी", आप कौन से जमाने में रहते हैं जनाब ?. . . . . . . . . . . . . . . .प्रवीण शाह।: हम रहे चाहे जिस जमाने  में लेकिन नारी को प्राचीन काल से निकलने नहीं देंगे।
  13. खलनायक जब हंसता है और भयावह लगता है: और उसी समय मुआ टीवी वाला उसकी फोटो खैंच लेता है।
  14. देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल:बरसों बीते देखते, इसका ऐसा हाल...
  15. चिठियाना-टिपियाना संवाद: शुरु हुये हैं अभी तो चलेंगे!
  16. इलाहाबाद में अमरूद के लिए तरसने का मजा… !?!: ये मजा है भैये कि सजा?
  17. कार्पोरेट कल्चर से समृद्धि लाने का पाखंड: चालू  आहे।

 

और अंत में:कल ज्ञानजी ने ब्लाग जगत के बारे में अपनी बात कहते हुये लिखा

 ऐसे में हिन्दी ब्लॉगरी को बढ़ावा देने का श्री समीरलाल का अभियानात्मक प्रवचन मुझे पसन्द नहीं आया। यह रेटोरिक (rhetoric) बहुत चलता है हिन्दी जगत में।

पता नहीं ज्ञानजी को यह प्रवचन पसन्द क्यों नहीं आया। समीरलाल जी ऐसा तो बहुत दिनों से करते आ रहे हैं। वे हिन्दी के सच्चे सेवक हैं और हिन्दी की सेवा का कोई मौका गंवाते नहीं। चिट्ठाचर्चा में भी नये चिट्ठों की सूचना वाली मेल में उनकी तरफ़ से अनुरोध रहता है

“आप हिंदी में लिखते हैं। अच्छा लगता है। मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं, इस निवेदन के साथ कि नए लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें - यही हिंदी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है। एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।
शुभकामनाएँ! - समीर लाल  (उड़न तश्तरी)

समीरलालजी अपने इसी सेवा भाव के चलते  उस स्थिति को प्राप्त हो गये हैं जिसके लिये कहा जाता है वे व्यक्ति नहीं संस्था हैं।

मजे की बात यह रही कि ज्ञानजी ने समीरलाल जी के जिस् प्रवचन के प्रति नापसन्दगी व्यक्त की उसके आगे के अध्याय समीरजी उनको मेल से टिका गये जिसे ज्ञानजी ने अपनी पोस्ट पर स्थापित कर दिया।

चिट्ठाचर्चा को गाड़ देने की बात ज्ञानजी ने कही उसके संबंध में एक पोस्ट ध्यान आई मुझे। इस पर टिपियाते हुये रविरतलामी जी ने मुझसे आग्रह किया था:

imageफुरसतिया से एक करबद्ध प्रार्थना है. काहे को वे अपनी ऊर्जा चिट्ठा चर्चा में वेस्ट करते हैं. उसके बदले वे नित्य इसी तरह की धुँआधार पोस्ट लिखा करें.

इसके बाद की टिप्पणियां पोस्ट् में देख सकते हैं। आज रविरतलाजी चिट्ठाचर्चा के नियमित चर्चाकार हैं।तो क्या ज्ञानजी का चिट्ठाचर्चा बंद करने का आग्रह यह संकेत है कि निकट भविष्य में वे चिट्ठाचर्चा करते पाये जायेंगे?

फ़िलहाल इतना ही। आपका यह हफ़्ता मजे में बीते} दिन शुभ हो। आप मुस्कराते रहें, खिलखिलाते रहें।

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