मंगलवार, मई 04, 2010

हिंदी ब्लाग जगत का भविष्य बहुत शानदार है......

कल अदालत ने तमाम सुबूतों और गवाहों को मद्द-ए-नज़र रखते हुए कसाब को दोषी करार दे दिया. मतलब ये कि मुंबई पर जो हमला हुआ उसमें कसाब का भी हाथ था. दोषी करार देने के बाद जज साहब अब सज़ा सुनायेंगे. ये तो कसाब के मुकदमे की बात है. उसपर फैसला आ गया है.

उधर ब्लागिंग पर भी कल फैसला आ गया. पिछले ४-५ सालों से लोगों के मन में यह सवाल आवन-जावन कर रहा था कि; "हिंदी ब्लॉग जगत का भविष्य कैसा है?"

इस सवाल के जवाब के रूप में सतीश सक्सेना जी ने फैसला सुना दिया है. उन्होंने अपने फैसले में लिखा;

"...........................सारी विसंगतियों के बावजूद, हिंदी ब्लाग जगत का भविष्य बहुत शानदार है , जो बिना नाम कमाने की इच्छा लिए, समाज के लिए लिखेंगे, लोग उन्हें याद रखेंगे और वे अपने निशान छोड़ने में निश्चित रूप से कामयाब रहेंगे !"

आशा है कि कुछ दिनों के लिए ही सही इस शंका को अल्प-विराम मिलेगा कि हिंदी ब्लॉग जगत का भविष्य कैसा है.

लेकिन सक्सेना जी का यह फैसला तो राइडर के साथ आया. बिना नाम कमाने की इच्छा लिए लिखें तब जाकर लोग याद रखेंगे? जब नाम ही नहीं कमा सकेंगे तो याद कमाकर क्या मिलेगा? मैं तो कहता हूँ कि नाम नहीं कमाने का विचार न आये लेकिन टिप्पणी कमाई का विचार तो आना चाहिए.

ओह! टिप्पणी से याद आया कि टिप्पणियों ने कई वर्षों से एक विषय के रूप में हिंदी ब्लॉगर भाइयों और बहनों को बहुत प्रेरित किया है. इसी प्रेरणा को आगे बढाते हुए अदा जी टिप्पणी आरती लिख डाली. पढ़िए;

दर्शन तेरे होते ही, हर कष्ट निपट जाता
मईया हर कष्ट निपट जाता
सुख ही सुख मेरे ब्लॉग में....२
दूसरा कष्ट पाता
जय टिप्पणी माता ....

ब्लॉग माता तुम मेरी, तुम ही ब्लॉग परी
मईया तुम ही ब्लॉग परी
बड़े-बड़े ब्लाग्गर ...२
राह तकें तुम्हरी
जय टिप्पणी माता ....

मैं कन्या निर्बुद्धि, सूरत ठीक हमरी
मईया सूरत ठीक हमरी
लिखना-विखना न जानूँ....२
बस पाठक कृपा करी
जय टिप्पणी माता ...

बड़ी दूर तक नज़र डाली है अदा जी ने. पूरी आरती आप उनके ब्लॉग पर ही पढ़िए. एक प्रस्ताव पारित करके इस आरती को हिंदी ब्लॉग जगत की टिप्पणी आरती के रूप में रजिस्टर किया जा सकता है.


इसी टिप्पणी चिंतन को आगे बढ़ाते हुए अनूप शुक्ल जी ने किसी ब्लॉगर के टिप्पणी बक्से की झांकी टाइप पेश की. शीर्षक है, माडरेशन के इंतज़ार में टिप्पणियां. इस झांकी की एक झांकी देखिये;

"समय बिताने के लिये टिप्पणियों ने अंत्याक्षरी का विकल्प चुनने की बजाय बतकही का वरण किया और आपस में वह करने लगीं जिसे उर्दू शायर लोग गुफ़्तगू और दिलजले अफ़साना निगार चेमगोइयां कहते हैं। टिप्पणी बक्से में किसी भी सार्वजनिक स्थल की गरिमा के अनुरूप अंधेरा ही अंधेरा है! हाथ को हाथ तो छोड़िये टिप्पणी को टिप्पणी नहीं सुझा रही है।"

या फिर ये;

मामला गर फ़िरदौस बर रुये जमीनस्त जैसा न समझ लिया जाये इसलिये टिप्पणियां सांसारिक लोकाचार का पालन करते हुये बुराई-भलाई भी करती चल रही हैं। ज्यादा हम क्या कहें आप खुदै उनकी बातचीत सुन लीजिये:

कब खुलेगा ये बक्सा! जल्दी से माडरेट करे ये मुआ तो जरा खुली हवा में सांस लेने को मिले। यहां तो दम घुट गया खड़े-खड़े!

अरे आता होगा यार! हड़बड़ी क्या है। कहीं गया होगा बॉस के पास पांव फ़िराने। आयेगा! करेगा! उसके सरदर्द में तुम काहे अपने विक्स वेपोरब मल रही हो!

नई यार वो बात नहीं! लेकिन बोर हो गये यहां अंधेरे में वेट करते-करते।

हमको न बताओ! यहां बोर हो गयी या वहां पोस्ट से सटने का मन कर रहा है! इंतजार सहन नहीं हो रहा। हमसे तो न छुपाओ।

अरी हट! सबको अपने जैसा समझती है। हम कोई ऐसे-वैसे बलॉगर की टिप्पणी नहीं हैं। हमारा मालिक जरा सा कहीं देख लेता है इधर-उधर की हरकत तो फ़ौरन टिप्पणी मिटा देता है। फ़िर भले ही वही टिप्पणी बोल्ड में दुबारा करे।

बड़ा मूडी है तेरा मालिक। सेन्सेक्स से याराना लगता है क्या उसका?
बहुत सारे पाठकों ने इस लेखन को क्रिएटिव करार दे डाला. काहे किया ऐसा, यह तो आप पोस्ट पढ़कर समझिये. ई रहा लिंकवा.


एक और टिप्पणी चिंतन पंडित डी के शर्मा 'वत्स' जी ने किया. बात ललित शर्मा और मिश्रा जी के टिप्पणियों के लेन-देन की है. पढ़िए;

"मिश्रा जी अपने हाथ में पकडी नोटबुक ललित शर्मा के आगे कर देते हैं। ये देखिए पिछले एक साल में हमने आपकी जिस जिस पोस्ट पर जब जब टिप्पणी की है, उन सबका हिसाब इसमें लिखा हुआ है। ये देखिए कुल 420 टिप्पणियाँ हमारे द्वारा की गई हैं, ओर ये इधर देखिए साल भर में हमारी पोस्टों पर आपने कुल कितनी टिप्पणियाँ की हैं, महज 136. अभी ले देकर आपकी तरफ हमारी 284 टिप्पणियाँ बकाया रहती हैं। लेकिन आप हैं कि लौटाने का नाम ही नहीं ले रहे। अभी कुछ दिनों से हमारी किसी भी पोस्ट पर आपकी कोई टिप्पणी नहीं आ रही...जब कि हमारी टिप्पणी रोजाना आपको पहुँच रही है। भाई ऎसा कैसे चलेगा?"


टेलीविजन पर कविता लिखकर मानस खत्री ने प्रथम पुरस्कार जीत लिया. उनकी इस कविता ने उन्हें फैजबाद जिले में बाल हास्य-कवि के नाम से मशहूर कर दिया है. आप कविता के अंश पढ़िए;

ये टी.वी. वाले भी क्या गज़ब ढाते हैं,

एक तरफ सभ्यता का पाठ पढ़ाते हैं,

तो दूसरी तरफ सास-बहु को खुद ही लड़वाते हैं.

‘एकता कपूर’ जी के सेरि़लों ने खोले हैं महिलाओं के नयन,

अब हर सास ‘तुलसी’ और ‘पार्वती’ जैसी बहुओं का ही करती है चयन.

टी.वी. पर अधिकतम कार्यक्रम महिलाओं के ही आते हैं,

एक अकेले ‘संजीव कपूर’ हैं,

पर लानत है वो भी, खाना बनाना सिखाते हैं.

टी.वी पर भी चढ़ा है, आधुनिकता का रंग,

नामुमकिन है टी.वी. देखना, घर-परिवार के संग.

सबके अपने-अपने हैं Views,

कोई देखता है कार्यक्रम, तो कोई News.

पूरी कविता आप यहाँ क्लिकिया कर पढ़ सकते हैं. क्लिकियाइये.

रचनाकार पर मुनव्वर राना की दो गजलें छपी हैं. देखिये;

जहां तक हो सका हमने तुम्हें परदा कराया है
मगर ऐ आंसुओं! तुमने बहुत रुसवा कराया है

चमक यूं ही नहीं आती है खुद्दारी के चेहरे पर
अना को हमने दो दो वक्त का फाका कराया है

*************************************

इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिये
आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिये

आप दरिया हैं तो फिर इस वक्त हम खतरे में हैं
आप कश्ती हैं तो हमको पार होना चाहिये

दोनों गजलें पढने के लिए यहाँ पर क्लिक कर दीजिये.


कुलवंत हैपी जी पिछले मंगलवार को लोगों की मुलाकात किसी ब्लॉगर हस्ती नहीं करवा सके. इस बात के लिए उनहोंने क्षमा मांगते हुए आज मुलाकात करवाई है यशवंत महेता 'फकीरा' जी से. रोचक मुलाकात है. आप पढ़िए.

आदित्य ने दो दिन पहले ही अपना दूसरा जन्मदिन मनाया. बैंकाक में. आज उसने अपने जन्मदिन की पार्टी के फोटोग्राफ्स लगाये हैं. आप देखिये. आदित्य को शुभकानाएं.

हिंदी फिल्मों में मानसिक रोग. इस शीर्षक से सुनील दीपक जी का लेख पढ़िए. बहुत बढ़िया पोस्ट है.

तो ये थी 'जामे कुटुम समाय' घराने की एक चर्चा.

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सोमवार, मई 03, 2010

...भ्रम टूटने के लिये अभिशप्त होते हैं

अपने देश में मा्ननीय न्यायाधीश महोदयो द्वारा समाज के प्रभावशाली वर्ग को फ़टकारते रहने का रिवाज है। उनकी समझाइश के दायरे में राजनेता, नौ्करशाह , मास्टर,पढ़वैया बच्चे वगैरह आते हैं। नये मनोनीत माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय ने समझाइश का दायरा बढ़ाकर न्यायधीशों को भी इसमें शामिल कर लिया है और कहा है-
नेताओं की नैतिकता पर टिप्पणी करने वाले न्यायाधीशों को नैतिक आचरण के मामले में खुद मजबूत होना चाहिए।

मुख्यन्यायाधीश महोदय ने बड़ी अच्छी बात कही है और शुरआत नैतिकता की नसीहत से की है। वैसे जब भी नैतिकता की बात चलती है मुझे रागदरबारी के गयादीन की बतायी नैतिकता की परिभाषा याद आती है:
लोग चुप रहे। फ़िर गयादीन ने कुछ हरकत दिखायी। उनकी निगाह एक कोने की ओर चली गयी। वहां लकड़ी की एक टूटी-फ़ूटी चौकी पड़ी थी। उसकी ओर उंगली उठाकर गयादीन ने कहां,"नैतिकता, समझ लो कि यही चौकी है। एक कोने में पड़ी है। सभा-सोसायटी के वक्त इस पर चादर बिछा दी जाती है। तब बड़ी बढ़िया दिखती है। इस पर चढ़कर लेक्चर फ़टकार दिया जाता है। यह उसी के लिए है।"

आपने हि्न्दी साहित्य का इतिहास पढ़ते समय कुछ काल पढ़े होंगे- वीरगाथा काल, भक्ति काल, रीतिकाल,आधुनिक काल! एक और काल के बारे में जानलीजिये रंगनाथ सिंह से! वह काल है समर्पण काल!!

अनिल रघुराज ज्ञान को धंधा बनाने की बात कहते हुये पहले तो जानकारी देते है:
देश को आगे बढ़ाने की जो भी बारीक नीतियां हैं, उन पर सोचने और उन्हें बनाने का काम वे करते हैं जो अंग्रेजी में ही सोचते हैं, अंग्रेजी में ही बोलते हैं। हम हिंदी वाले उनका अनुसरण करते हैं। हम उद्यमशीलता में किसी से कम नहीं। देश के किसी भी कोने में जाकर छोटा-मोटा धंधा शुरू कर देते हैं। लेकिन इन धंधों का वास्ता शारीरिक मेहनत से ज्यादा और बुद्धि से कम होता है। जो पढ़-लिख लेते हैं वे भागकर नौकरियों की शरण में चले जाते हैं और माहौल में ढलने की कोशिश में पूरे अंग्रेज बन जाते हैं।

मतलब साफ़ है धंधे के लिये अभी तक सोचने का काम अंग्रेजी जानने वाले करते हैं। आगे भी सुनिये कि अनिल भाई क्या कहते हैं:
ऐसे में हमारे मानस में एक रीतापन बनता चला जा रहा है। हम पिछलग्गू बने रहने को अभिशप्त हो गए हैं। हम एक के आगे लगकर उसको दस, सौ और लाख तक बना देते हैं, लेकिन खुद हमारी स्थिति जीरो की, शून्य की बनी रहती है।

आगे वो उदाहरण देते हैं देखिये :
दूसरी तरफ, अंग्रेजी में हो ये रहा है कि जरा-सी उपयोगी सूचनाओं का लेकर कोई कंपनी खडा कर देता है। साल भर के अंदर तीन-चार करोड़ कमाने लगता है। हम हैं कि ठेला-खोंमचा ही लगाते रह जाते हैं।


इसके बाद अनिल रघुराज ने काम की बात कही
मैंने भी हिंदी में अर्थकाम इसी मकसद से शुरू किया है कि 42 करोड़ से ज्यादा आबादी वाला हमारा हिंदी समाज अपने आर्थिक व वित्तीय फैसले खुद ले सके। वह वित्तीय रूप से इतना साक्षर हो जाए कि उसे जबरदस्ती किसी गुरू घंटाल की जरूरत न पड़े। लेकिन मुश्किल यही है कि यह अभी तक कल्याण का काम ही बना हुआ है, धंधा नहीं बन पाया है। और, धंधा नहीं बन पाया तो इसे जारी रखना मुश्किल हो जाएगा। कोशिश जारी है और भरोसा भी है कि अर्थकाम एक न एक दिन करोड़ों हिंदी भाषाभाषी लोगों की जरूरत पूरा करने लगेगा और समाज भी खुलेहाथ इसे स्वीकार करेगा। बस, आपसे गुजारिश यही है कि इसे कानोंकान औरों तक पहुंचाते जाएं। बाकी तो हम संभाल ही लेंगे।

यह लेख बांचा पता नहीं कित्ते लोगों ने है लेकिन प्रतिक्रिया अभी तक एक भी नहीं आई है। आप करियेगा!
इसई क्रम में बताते चलें कि हमसे कुछ लोगों ने पूछा था कि हिन्दिनी मे शादी.काम के विज्ञापन के कित्ते पैसे मिलते हैं! हमें पता ही नहीं था। कल ई-स्वामी ने बताया कि महीने भर में इत्ते पैसे आ गये कि आराम से एक छोटी-मोटी ब्लॉगर मीट में दस-पन्द्रह लोगों की एक बार की चाय का जुगाड़ हो सकता है। लेकिन आगे के लिये वो भी नहीं! निकाल दिये शादी.काम के वि्ज्ञापन!


लेकिन शादी.काम ही थोड़ी है सब कुछ भाई! अपने जी.के.अवधियाजी ने भी मैट्रिमॉनी कम कम्युनिटी साइट बनाई है और सबका सहयोग मांगा है। आप यह मैट्रिमोनी साइट बंधन देखिये और अवधियाजी का सहयोग करिये।

दो दिन पहले मई दिवस था। मई दिवस के नाम एक नारा तय है-दुनिया के मजदूरों एक हो! काजल कुमार इसी नारे की आड़ में अपनी पीड़ा कह रहे हैं इस कार्टून में! काजल कुमार का यह कार्टून तो घरेलू टाइप का है। शोषक और शोषित की छवि उनकी पुरानी-सुरानी टाइप की है। शोषक आजकल इत्ते साफ़ पता चलने वाले नहीं होते न ही इत्ते विषम अनुपात वाले। आजकल के शोषक इत्ते स्मार्ट,क्यूट टाइप के होते हैं कि लोगों को शोषण करवाने में ही मजा आता है। ऊपर देखिये अनिल रघुराज की पोस्ट!



अच्छा अब जब कार्टून की बात चली तो देखते चलिये इरफ़ान का भी कार्टून! उनका शीर्षकै है कार्टून केवल हंसाते ही नहीं,...ऐसे भी होते हैं!! यह अपने सुरक्षा बलों के साधन संपन्नता की कहानी है। एक के पास हथियार नही था दूसरे की बुलेट प्रूफ़ जैकेट धोखा दे गई! घपला-घोटाला बड़ी खराब चीजें होती हैं। असल में आधी-अधूरी चीजें हमेशा खतरनाक होती हैं। अब जैसे बुलेट-प्रूफ़ जैकेट की बात करिये। इसमें जो घोटाले हुये होंगे उसमें हो सकते है खरीद में पैसा इधर-उधर हुआ हो! हो सकता है बनवाई में पैसा इधर-उधर हआ हो! लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि जब खरीद में पैसा इधर-उधर हो गया तो क्वालिटी में काहे मारा-पीटी हो! लेकिन भैया एक बार जब मामला शुरू होता है तो सब महाजनो येन गत: स: पन्था का अनुसरण करते हैं। आखिर परम्परा भी तो कोई चीज होती है। क्या पता बुलेट प्रूफ़ जैकेट का जांच करने वाली मशीन भी गड़बड़ हो!

ब्लॉगिंग आत्मस्वीकार के तमाम मौके मुहैया कराती है। मनोज कुमार बेचैन आत्मा की पोस्ट पर देखिये कहने लगे-
अचानक इस बात का एहसास हुआ कि ब्लाग में संवेदना बिखेरते-बिखेरते खुद कितना संवेदनहीन हो चुका हूँ !

उधर ज्ञानजी भी कल आत्मसाक्षात्कार कर लिये
वैसे भी यह देख रहा हूं कि इण्टरनेट पर निर्भरता से व्यक्तित्व एक पक्षीय होता जाता है। आपके बुकमार्क या फीडरीडर से वह गायब होने लगता है जो आपकी विचारधारा से मेल नहीं खाता। आप बहुत ज्यादा वही होने लगते हैं जो आप हैं।
ज्ञानजी की इस पोस्ट पर गिरिजेश राव का नजर नहीं पड़ी शायद वर्ना वे कहते ज्ञानजी टेलीवीजन नहीं टेलीविजन!

लेकिन कल तो गिरिजेश राव खतना मतलब शिशु का परिच्छेदन के बारे में जानकारी दे रहे थे और द्विवेदी जी की पोस्ट पर कह रहे थे-मेरी कविता के इशारे को स्पष्ट करने के लिए धन्यवाद। अब इस पोस्ट को देखिये कि उनकी कविता किधर है! वैसे द्विवेदीजी ने कह के धर दिया है-
हम जानते हैं कि भ्रम हमेशा नहीं बने रहते, दुनिया के सभी भ्रम एक दिन टूटे हैं। यह भ्रम भी एक दिन टूटेगा।


अब बताओ अगर इसी समय हमें कहने का मन करे कि भ्रम टूटने के लिये अभिशप्त होते हैं तो क्या करें! कह दे?

परसाई जी ने यौवन क्या है बताते हुये लिखा था-
यौवन नवीन भाव, नवीन विचार ग्रहण करने की तात्परता का नाम है; यौवन साहस, उत्साह, निर्भयता और खतरे-भरी जिन्दगी का नाम हैं,; यौवन लीक से बच निकलने की इच्छा का नाम है।
इस नजरिये से देखा जाये तो ज्ञानजी युवा ब्लॉगर कहलायेंगे। नित नये प्रयोग करने का उत्साह ५४ साल की उम्र में भी धक्काड़े से जारी है। उनका उत्साह केवल तकनीकी क्षेत्र में ही नहीं वरन अन्य क्षेत्रों में भी दर्शनीय है। अब तो वे टिप्पणियों में मौज भी लेने लगे हैं और की-बोर्ड के फ़जल से बहुत कम समय में अच्छा-खासा मजाक करने लगे हैं। अब कल ही देखिये उन्होंने कित्ता मौजियल कमेंट कर डाला इस इज्जतवाली पोस्ट पर:
लाला पांड़े की बहुत इज्जत करते हैं। पांड़े सुकुल की करते है। सुकुल मिसिर की। मिसिर दुबे की। दूबे झा की।
इज्जत से गन्न्हा गया है ब्लॉगजगत!


ज्ञानजी सच में बहुत मजेदार कमेंट करते हैं। खाली-पीली टिप्पणियां नहीं करते! पोस्ट में वैल्यू एडीशन भी करके डाल देते हैं।

आज के ब्लॉगर



पंकज उपध्याय को मैं काफ़ी दिन से पढ़ रहा था। छोटी-छोटी कविताओं और छोटे-छोटे लेखों के माध्यम से। पहले रोज के रोज पढ़ते थे। लेकिन बढ़ते बढ़ते ब्लॉगों के साथ सबको रोज पढ़ना संभव नहीं हो पाता। इसलिये मैंने अब अपने पसंदीदा ब्लॉगरों को शुरू से आखिर तक पढ़ने का तरीका अपनाया है। दो हफ़्ते पहले इतवार को मनोज मिश्र को पढ़ा। इस बार पंकज की सारी पोस्टें शुरू से आखिरी तक पढ़ीं। बहुत मजेदार रहा उनको पढ़ना। उनकी पहली पोस्ट की इन लाइनों ने मुझे उनका मुरीद बनाया
वो मुझे कहती थी की "पंकज! ये लहरें हमारी बातें सुनाने के लिए आती हैं न?"
"नही! ये सारे जहाँ से खूबसूरत इन पैरों में लिपटने आती हैं और इस ज़न्नत में मिल जाती हैं।"
वो मुझे धक्का देकर गिरा देती और खिलखिलाते हुए कहती
"धत! बेवकूफ"


पंकज को शायद पहली बार मैंने दिसम्बर 2008 में पढ़ा था और उनका जिक्र करते हुये लिखा था:इस कविता से पता चलता है कि आज की पीढ़ी कित्ती धैर्यवान है:
उसकी बिंदी के तो हिलने का
मैं इंतज़ार करता था, की कब वो
हल्का सा हिले और मैं बोलूँ
की "रुको! बिंदी ठीक करने दो"।

पंकज की पोस्टें पढ़ते हुये मैंने देखा कि इस बात का जिक्र उन्होंने अपनी एक पोस्ट में किया था। लेकिन इस बार जब मैंने यही कविता पढ़ी तो मुझे ये पंक्तियां सबसे अच्छी लगीं:
वो कितना रोयी थी, जब
मैंने उसे अपनी पहली कविता
सुनाई थी, बोलती थी "तुम मुझसे
कितना प्यार करते हो, बेवकूफ!!"
और मैं सिर्फ़ उसके
आँसू गिनता रहा था।


लेकिन आप इस सब से झांसे में मत आइये। अपनी मर्जी से पंकज उपाध्याय को पढिये और देखिये कितने शेड्स हैं इस युवा, मूडी, संवेदनशील खुद को लेटलतीफ़ मानने वाले ब्लॉगर के। पूजा , मनीषा, रंजना (रंजू) इनके शुरुआती प्रशंसकों में थे। बाद में वीनस केसरी की सलाह की चपेट में आकर गजल स्कूल में दाखिल हो गये और लिखने भी लगे। हाल फ़िलहाल ये डा.अनुराग के इत्ते प्रशंसक हो गये कि उनकी पोस्ट का शीर्षक ही अपने यहां सटा लिया। ख्वाहिशें इनकी ऐसी है कि हर ख्वाहिश पर दम निकलने की बात शायद ऐसी ही ख्वाहिशों को देखकर निकली होगी।

बहरहाल हमारी महीनों की एक ख्वाहिश थी वो कल पूरी कर ली मैंने! कल सौ के करीब पोस्टें पढ़ लीं पंकज की और सबमें टिपियाये भी -ताकि सनद रहे।

और सागर की टिप्पणी में की जिस बात का जिक्र है वह शायद यह है:
और समुद्र की हर लहर मुझसे बीयर की एक घूँट मांगने आती थी… मै एक बूँद दे देता था और वो चली जाती थी जाकर वो बाकी लहरो को बताती थी और फ़िर सब एक एक करके मेरे पास आती थी।

आप भी पढिये कभी पंकज उपाध्याय को। अच्छा लगेगा- आपको , पंकज को और हमको भी।

और अंत में


फ़िलहाल इतना ही। आपका सप्ताह मजेदार बीते। शुभकामनायें! नीचे देखिये विवेक रस्तोगी के ब्लॉग पोस्ट से ये चित्र:

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