बुधवार, दिसंबर 24, 2008

बिंदी के तो हिलने का इंतजार और बोरियत

सुबह-सबेरे जब चर्चा के वास्ते बैठे तो सबसे पहले जो पोस्ट दिखी उसमें कुछ ऊब-चूभ की बातें की गयीं थीं। वर्तमान पीढ़ी और ऊब में ज्ञानी लेखक ने ये बताया ही नहीं कि वर्तमान पीढ़ी में किस उमर तक के लोग शामिल हैं? ज्ञानियों के साथ यही लफ़ड़ा होता है कि वे अपने पत्ते पूरे कभी नहीं खोलते। जो हो गया उसी के लिये कह देंगे कि देखो हमने पहले ही यह कहा- लांग,लांग बैक। अब जब इसमें उमर का कुछ हिसाबै-किताब नहीं तो कैसे समझा जाये कि किसकी ऊब की बात चल रही है?
ज्ञानदत्त पाण्डेय

वैसे अगर देश के हिसाब से देखा जाये जहां साठ साल लोग भी युवा नेता कहलाते हैं तो वे लोग भी आज की पीढ़ी में शामिल हो जायेंगे जिनको ’इनीशियल एडवांटेज’ नहीं मिला। अरे हां भाई हम शास्त्रीजी की बात कर रहे हैं जिनको बुद्धि तो खूब मिली लेकिन प्रारम्भिक लाभ नहीं मिला। अब कोई त यह भी कह रहा था कि बुद्धि दे दी भगवान ने तो और क्या ’इनीशियल एडवांटेज’ चाहिये,क्या वो बेचारा अपना घर लुटा दे। उसको सबको देखना है जी।

बहरहाल ज्ञानजी लिखते हैं-
वर्तमान पीढ़ी शायद जिस चीज से सबसे ज्यादा भयभीत है वह परमाणु बम, कैंसर या एड्स नहीं, ऊब है। जीवन में शोर, तेजी, सनसनी, मौज-मस्ती, हंगामा, उत्तेजना, हिंसा और थ्रिल चाहिये। आज ऊब कोई सह नहीं सकता।

पंकज उपाध्याय
इस बात से निशांक आदरपूर्वक असहमत हैं। और पंकज उपाध्याय तो बाकयदा एक ठो कविता भी लिख चुके हैं पहिले ही। इस कविता से पता चलता है कि आज की पीढ़ी कित्ती धैर्यवान है:
उसकी बिंदी के तो हिलने का
मैं इंतज़ार करता था, की कब वो
हल्का सा हिले और मैं बोलूँ
की "रुको! बिंदी ठीक करने दो"।


अब बताओ जिस पीढ़ी के नायक नायिका के बिंदी हिलने का इंतजार करते रह सकते हैं ताकि उसे ठीक कर सकें उस पर ऊबने और बोर होने का आरोप कैसे लगाया जा सकता है। वैसे विवेक सिंह देखिये क्या कहते हैं:

विवेक सिंह
दिन भर कोई काम न करना
आप ऊबने से मत डरना
काम करो तो करना धीमे
होता है बस सृजन इसीमें
सृजन तेज ना हो पाएगा
सारा कार्य व्यर्थ जाएगा
ऊब ऊब कर महान बनना
होकर बोर गर्व से तनना
अरे आज की पीढी जागो
आप ऊबने से मत भागो

ताऊ

कुछ लोग होते हैं जो दूसरे के दुख में मौज लेते हैं। एक तरफ़ ताऊ को मुर्गा बनाया गया और दूसरी तरफ़ अमित को मजा आ रहा है। मुर्गा से दुबारा ताऊ बनने पर लोगों ने ताऊ के मुंह में माईक घुसा के पूछा कि जब मुर्गा बने थे तो कैसा लग रहा था? क्या आप दुबारा मुर्गा बनना चाहेंगे? इसका श्रेय किसको देगें?

ताऊ ने पुरूष पत्रकारों की तरफ़ गुस्से से और महिला पत्रकारों की तरफ़ प्यार से देखते हुये जबाब दिये। भगवान किसी को मुर्गा न बनाये। हमें तो जब मुर्गा बने थे तो यही सोच रहे थे कि हम तो इधर मुर्गा बनें हैं उधर हमारे कमेंट कौन माडरेट करेगा? सोच तो यह भी रहे थे किसके ब्लाग पर टिपियाये नहीं जिसने साजिश करके मुझे मुर्गा बनवा दिया।

इसके बाद ताऊ ने नीरजजी के किस्से सुनाने शुरू कर दिये। ये बात तो नीरजजी और ताऊ दोनों पर लागू होती है:

नीरजजी
इतने बदनाम न हुए हम तो इस जमाने मे,
तुमको सदियां लग जायेंगी मुझे भुलाने में
न पीने का सलीका न पिलाने आ शऊर,
ऐसे ही लोग चले आये हैं मयखाने में

ये जो फ़ोटॊ लगी है बेकल उत्साही जी की और नीरजजी की उसको देखकर ध्यान आया कि कानपुर में हुये एक मुशायरे में बेकल उत्साहीजी को अध्यक्ष बनाया गया। नीरज जी कानपुर की तमाम यादें सुनाते हुये कविता पर कविता सुनाते चले जा रहे थे। इस पर बेकलजी किसी तुनुकमिजाज ब्लागर की तरह मंच से उठकर चले गये- बोले सुन लीजिये आप लोग जी भरकर अपने नीरज को।

शिवकुमार मिश्र

मुर्गे की बात से बताते चले कि कोई-कोई मुर्गा यह गलतफ़ैमिली पाल लेता है कि वो बोलेगा नहीं त सबेरा बोले त मार्निंगै नहीं होगा। ऐसे ही एक ठो मुर्गा निंदक जी हैं। ऊ कहते हैं 'हमरे बिरोध का वजह से से भारत में लोकतंत्र जिन्दा है.. अब ई अलग बात है कि हर बार उनसे बिरोध का सही समय तय करने में गड़बड़ी हो जाता है। उनको अपना ज्योतिषी बदल लेना चाहिये।

हमारी गजल की राह दिन ब दिन कठिनतर होती जा रही है। पनघट से भी कठिन। अब बताओ भैया अब कोई ये लिखेगा बहर- फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन त हम कुछ बूझ पायेंगे। लेकिन लिखा है मानसी ने और उसके ऊपर गजल भी कह डाली। अब जब डाल दी तो पढ़ भी लिए हम और जो बहुत अच्छा सा लगा वो आपको भी पढ़वाते हैं:
मानसी
तुमको दिल से भुला दिया हमने
कर के ये भी दिखा दिया हमने

काश तुमको कभी लगा होता
इश्क़ का क्या सिला दिया हमने

अब बताओ भैया आपको ई बात समझ में आती है कि कोई अपने प्रिय को भुला के दिखा दे। लेकिन अब किसको क्या कहा जाये?
सुरेश चिपलूनकरजी जब एकदम गरजते हुये से लिखते हैं- अमेरिका का मुँह तकती, गद्दारों से भरी पड़ी, पिलपिली महाशक्ति तो मेरे मन में (अरे मानस पटल समझ लो यार) उनकी पोस्ट के भाव के धुरउलट एक सीन सा उभरता है। अमेरिका चांद है और ये क्षेत्रीय महाशक्ति एक चकोर और गाना बज रहा है -चांद को क्या मालूम उसे चाहता है कोई चकोर। चकोर जब लिख रहा था तो यह भी लगा इसे कोई ब्लागर ऐसे भी लिख सकते हैं- चांद को किया मालुम की उस्से चहाता है कोई चौकोर।

टोबा टेकसिंह मंटो की बेहतरीन कहानियों में मानी जाता है। इसे पढिये सुबोध के ब्लाग पर।

और अंत में


जैसा कि बताया कि सुबह जब उठे तो नेट गायब था। सो जो काफ़ी देर तक कुछ लिख ही न पाये। जो अभी हड़बड़ी में लिख पाये सो पेश कर दिया।

आगे अभी कोई ठिकाना नहीं कि फ़िर एक बार ठेल दिया जाये कुछ।

वैसे भी आज की चर्चा का दिन कुश का है। सो यह चर्चा कुश की तरफ़ से है। :)

कल की चर्चा शिवकुमार मिश्र करेंगे। परसों मास्टर साहब मसिजीवी। इसके बाद शनिवार को हमारे आदि चिट्ठाकार आलोक कुमार। इसके बाद इतवार को फ़िर मिलेंगे आपको अनूप कुमार। लेकिन अभी क्या पता इसके पहिले ही मुलाकात हो जाये। ये वाला शेर तो आप बांच ही चुके होंगे न!

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने जिंदगी की किस गली में शाम हो जाये।


लेकिन यार अभी त सुबह ही हुई है। अभी से शाम के लिये क्या रोना? आप मस्त रहिये, व्यस्त भी। खुश रहने से कोई रोके त बताइयेगा। हम देखेंगे।

चिट्ठाजगत ने चिट्ठे सम्बंधित कार्टून ब्लाग शुरू किया है। शुरुआत डॉ अनुराग की शंका, फ़ुरसतिया का समाधान से करके आज ज्ञान जी की बेचैनी, विष्णु बैरागी जी का जवाब पेश किया है। यह कार्टून कल की ज्ञानजी की पोस्ट पर आधारित है। कार्टून देखा जाये:
चिट्ठे सम्बंधित कार्टून

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22 टिप्‍पणियां:

  1. गजब हो गया . ज्ञान जी से ऐसी आशा नहीं थी कि वे विष्णु जी से ऐसी आशा करेंगे . सोचे होंगे ये तो बैरागी हैं . बैरागियों की फीड पर नज़र डालेंगे तो ऊबने से प्रेम तो होना ही है :)

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  2. इतने बदनाम न हुए हम तो इस जमाने मे,
    तुमको सदियां लग जायेंगी मुझे भुलाने में
    न पीने का सलीका न पिलाने आ शऊर,
    ऐसे ही लोग चले आये हैं मयखाने में
    " वाह वाह बहुत सार्थक चर्चा , और हाँ वो बिंदी हिली क्या ??????"
    Regards

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  3. इतने बदनाम न हुए हम तो इस जमाने मे,
    तुमको सदियां लग जायेंगी मुझे भुलाने में
    न पीने का सलीका न पिलाने आ शऊर,
    ऐसे ही लोग चले आये हैं मयखाने में

    " वाह वाह बहुत सार्थक चर्चा , और हाँ वो बिंदी हिली क्या ??????"
    Regards

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  4. क्या बात है, आज सुबह ही नीरज जी को किसी बात पर याद कर रहा था !
    अपने भी कुछ संस्मरण हैं उनसे जुड़े...अब तो पोस्ट लिखनी ही पड़ेगी, ताज़ा हवा पर ....फ़िलहाल नीरज जी कहते हैं

    अब न वो दर्द, न वो दिल, न वो दीवाने हैं
    अब न वो साज, न वो सोज, न वो गाने हैं
    साकी! अब भी यहां तू किसके लिए बैठा है
    अब न वो जाम, न वो मय, न वो पैमाने हैं

    उमदा चर्चा....मज़ा आया
    अब और का कही..का बच्चे के जान लैबो का य़

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  5. बेहद नॉन ऊबाऊ चिठ्ठाचर्चा!
    बहुत सुन्दर।

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  6. मज़ा आ गया चर्चा पढ़ कर.....और हाँ मैं भी सीमा जी की तरह जानना चाहता हूँ की बिंदी हिली की नही?

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  7. साहब ऊब की इसी इन्तेहा में कोई शायर कह बैठा था-

    जाने कितनी देर लगेगी अभी, बंद खिड़की उन्हें खोलते-खोलते,
    सुबह से शाम होने को आई है अब इस गली में हमें डोलते-डोलते


    अजब-गज़ब है ये ऊब महिमा. अपने कुश जी ने भी बहती गंगा में हाथ धो लिया.

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  8. अगर बेसब्र होना भर इस पीढ़ी का होना सिद्ध करता हो तो हम भी पूछेंगे कि काहे बिंदी के हिलने पर हलकान हुए जा रहे हो।

    और हॉं सलाह दी जाए कि फेविकोल ब्रांड बिंदी लगाना बंद करें...हलकी गोंद वाली लगाएं बचुआ की ऑंखें पथराई जा रही हैं।

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  9. फ़ुरसतियाजी, लाजवाब फ़ुरसतियाये हैं आज तो ! हमको विचार आ रहा है कि आज के दिन को "ऊब-दिवस" घोषित कर दिया जाये ! तो कैसा रहे ? :)

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  10. ज्ञानी लोगों ने ऊब से उबरने का आह्वान किया पर क्या करें कि आजकल पुस्तक और पुस्तकालय उबकाई की चीज़े बन गई हैं। युवा पीढी तो बिंदी की टल्ली का इंतेज़ार कर रही है और इनिशियल अडवान्टेज लेने की ताक में बैठी है।
    >ताऊजी मुर्गा बने न बने, आज की पीढी को चिंता नहीं है क्योंकि उन्हें तो अण्डे बिना मुर्गे की सहायता से जो मिल रहे हैं।
    > अब नीरज जी और वेकल जी को एक साथ बिठाएंगे तो वही बात हुई ना - एक म्यान में दो तलवार:)
    >मिश्राजी के मित्र ठीक ही कहते हैं कि उनके विरोध के कारण लोकतंत्र जिंदा है- यकीन न हो तो अंतुले जी से पूछ लो!
    >मानसीजी की गज़ल पढकर लगा कि यदि प्रेमी ‘तैलातुन चुपडातुन तेलुन’ करता तो कोई कारण नहीं कि प्रेमिका फिसल जाती:-)

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  11. बिंदी ने धोखा दे दिया. हिली नहीं. खैर, ऐसे समय में धैर्य रखने की ज़रूरत है. आज नहीं तो कल हिलेगी. बस देखते रहना है. इनिशीयली न भी हिले...एडवांटेज न भी मिले तो कोई बात नहीं. देखते रहना है. ऊबना नहीं है.... ऊब गए तो डूब गए.

    चिट्ठाचर्चा शानदार है. मेरी पोस्ट को शामिल करने के लिए आपको साधुवाद....:-)

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  12. बहुत ही अच्छी चर्चा रही और मगर अंत में दिए फीड वाले कार्टून का पलडा सब से भारी है.

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  13. मैं लगातार निगाह रखे हुए हैं, बिंदी जैसे ही हिलती है आप सबको सूचित करूंगा......

    हा हा!! अच्छी ली है आपने हमारी। :) सहस्त्र धन्यवाद मेरे चिट्ठे को आपकी चर्चा में शामिल करने के लिए। कभी समय मिले तो कुछ माल पुराना भी है, वो भी देख लें। हां! अवश्य, जब आप बोर न हो रहे हों।

    पढ़ कर बहुत आनंद आया, कोटि कोटि धन्यवाद्।

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  14. बिंदी???????? आजकल की पीढ़ी के पास इतना समय है की वो बिंदी लगाए.. ???

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  15. मुझे तो लग रहा है कि, ऊब की पराकाष्ठा पर
    ले जाती यह अनूठी चिट्ठाचर्चा मुझे चिट्ठा और चर्चा दोनों से ऊबने
    का इनीशियल एडवांटेज़ दे रही है ! भाई अनूप शुक्ल जी सचमुच बधाई के पात्र हैं !

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  16. बहुत खूब! चर्चा पढ कर आनंद आया, लेकिन टिप्पणी का "इनीशियल एडवांटेज" मित्रों को मिले इस कारण चर्चा पढने के लिये आधी रात तक रुका रहा.

    सस्नेह -- शास्त्री

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  17. गज़ल की कठिन पनघट के चर्चे ने ठहाका लगाने पर विवश कर दिया...शुक्रिया अनूप जी इतनी प्रचूर मात्रा में हँसी देने का

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  18. चर्चा के बारे में तो हम चुप ही रहेंगे मगर आपका कार्टून तो वाकई छा गया!

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