शनिवार, जून 30, 2012

किन्तु एक रूप मुस्काता है गीतों में

कल की चर्चा के बाद हमको अपरोक्ष रूप से डांट पड़ी -हम बहुत मेहनत करते हैं। इसई चक्कर में हम आज फ़ुल आराम किये। वैसे कल अनूप सेठी की कविता देखे । जरा आप भी देखिये:
अबे! ओ!!कवि!!!
तू लिक्ख,
कागज को घोंच मत,
अच्छी कविता लिक्ख!
इसको ब्लॉगानुवाद रविरतलामी ने इस तरह किया:
अबे! ओ!! ब्लॉगर!!!
तू लिक्ख
कीबोर्ड को टकटका मत
अच्छे पोस्ट लिक्ख
चर्चा की भाषा में अगर कहें तो इसे कुछ यूं कहा जायेगा शायद:
अबे! ओ!!चर्चाकार!!!
तू चर्चिया
खाली लिंक में सटा
अच्छी चर्चा कर!

चर्चा करने बैठे तो अदाजी का सवाल भी सामने आकर खड़ा हो गया। वे कहती क्या हैं पूछती हैं:
ई बतावल जावे..चिटठा-चर्चा करे में आपहूँ कौनो पी.एच.डी. ऊ.एच.डी. कीये हैं का ???
अदाजी की अपनी अदा है बात कहने की। हां नहीं तो वाली अदाजी का कहने का मतलब है कि कुछ करना-धरना आता भी है चर्चा-उर्चा की खाली मेहनतै करते रहते हैं। :)
इसई बहाने हम पुराने दिन के किस्से याद करने लगे। कभी अदाजी अपनी खनकती आवाज में चर्चा करतीं थीं। कुछ के लिंक जो मिले वे आप भी देखिये/ सुनिये।

1.ब्लॉग समाचार ....ब्लागों की कहानी ...अदा की ज़ुबानी ....

2.ब्लॉग समाचार ...अदा की पसंद .....पाँच पोस्ट्स....(3)

3.ब्लॉग समाचार ....अदा की पसंद....पाँच ब्लॉग और कुछ कमेन्ट.....

4.ब्लॉग समाचार ......पोस्ट माला


जो लोग पाडकास्टिंग के झमेले जानते हैं ऊ लोग समझते हैं कि इसमें कित्ता मेहनत लगती है। लेकिन अदाजी ने काफ़ी दिन तक अपनी आवाज में चर्चा की और खूब पसंद की गयी उनकी चर्चा। तो हमको पी.एच.डी.देने का साजिश करेंगी अदाजी तो हम आपको आपके काम के हिसाब से डबल पी.एच.डी. थमा देंगे -हां नहीं तो कहकर।

इधर-उधर डोलते हुये आज पुरानी चर्चायें देख रहे थे तो सतीश पंचम एक पोस्ट में कुछ ज्यादा चमकते दिखे। सो उनको लिंक दुबारा थमा दिया। उन्होंने लौटती मेल से टिपिया दिया:
दो साल बाद इस चिट्ठाचर्चा को फिर से पढ़ना सुखद रहा। प्रियंकर जी की बात देखिये दो साल बाद भी एकदम टंच लग रही है।
उन्ही की बात कापी पेस्ट कर रहा हूं - हिंदी चिट्ठाकारी हिंदी समाज के पुराने कुएं में लगा नया रहट है. रहट की डोलचियों में पानी तो उसी समाज का है . उस बंद समाज की समस्याएं ही हिंदी चिट्ठाकारी की भी समस्याएं हैं. समाज बदलेगा,तभी चिट्ठाकारी का स्वरूप बदलेगा. तब हिंदी चिट्ठाकारी का पोखर इतना बड़ा महासागर होगा जिसे छोटे-मोटे दूषक तत्व प्रदूषित नहीं कर पाएंगे.
बड़ा बवाल है ये नास्टेल्जिया भी। हम कहां से कहां टहलन लगे:
आये थे करने चर्चा
लगे करने टाइम खर्चा

कल की चर्चा में अलीजी की प्रतिक्रिया थी
फेसबुक वाले छोड़ कर सभी लिंक देख पाये ! लिंक देखते हुए सहजै रहिबा तक भी पहुंचे , बेहतर कवितायें पर प्रतिक्रियायें ?

अपने ब्लॉगजगत का यही किस्सा है। बहुत सारा अच्छा पढ़ने से रह जाता है। आज ऐसे ही घूमते हुये सीतापुर के अरुणमिसिर के ब्लॉग तीन पत्ती पर पहुंचे। ये कविता देखिये:
झोपड़ी में
दस लोग खड़े थे
पाँच ने सोंचा पाँच ही होते
तो बैठ सकते थे
दो ने सोंचा दो ही होते
तो लेट सकते थे

एक ने सोंचा केवल मैं ही होता
तो बाकी जगह
किराए पर उठा देता !
इस कविता की व्याख्या के लिये काम भर की समझ नहीं है लेकिन कविता जमी बहुत। यह भी लगा कि कैसी-कैसी तो इधर-उधर की तुकबंदियों में टिप्पणियों की झड़ी लगा देते हैं हम लोग। लेकिन यहां कोई आया नहीं। हमें लगता है ब्लॉगर भी एकदम मध्यमवर्गीय आदतों वाला होता है। जानी-पहचानी जगहों पर जाता है। टिपियाता है चला जाता है। अनजान जगहों पर जाने में सकुचाता है।
खैर छोड़िये अगली कविता देखिये मिसिरजी की:
अपने घर को घुमा कर मैंने
उसका रुख समंदर की ओर कर दिया है
वह पोखर जो कभी घर के सामने था
पिछवाड़े हो गया है !


लगभग भूला ही रहता हूँ उसे अब
लेकिन कभी जब यूँही बे-इरादा
पीछे की खिड़की खोलता हूँ
हुमक कर आ जाता है
आधा चेहरा छिपाये सिर्फ एक आँख से देखती
उस दलित लड़की-सा
जो अभी तक मेरे वादों को सच मानती है !


आगे की कविता आप मिसिरजी की पोस्ट में बांचिये। और कवितायें भी उनके ब्लॉग पर देखिये। कुछ कवि्तायें उनकी धूप के गांव में भी हैं।
कल चर्चा में सिद्धार्थ जोशी ने एक लाईना की फ़रमाइश की। एक लाईना या्नी वन लाइनर के बड़े रोचक अनुभव रहे हैं। शुरुआती दौर में लोगों ने इनको बहुत पसंद किया। फ़िर कुछ लोगों को खराब लगा। कुछ लोगों ने इसमें चर्चाकार की प्रत्युत्पन्न मति देखी जबकि कुछ को व्यंग्यकार की धूर्तता। हालांकि इसे पसंद करने वाले ज्यादा थे लेकिन फ़िर यह कम होता गया। अब जो्शी जी ज्योतिषी हैं लेकिन उन्होंने नहीं बताया कि एक लाईनाम में हमारे लिये धिक्कार योग हैं सराहना का जुगाड़। बहरहाल हम अनुराग कश्यप मोड में जाते हुये (जैसा पाठक चाहते हैं वैसी चर्चा की जाती है) चंद एक लाईना पेश कर रहे हैं। जिस किसी को बुरा लगे बता दे , उसकी पोस्ट का लिंक हटा दिया जायेगा।
  1. आज जाकर देख पाया राऊडी राठौर : लेकिन समीक्षा लिखे बिना तो मानेंगे नहीं

  2. अनुराग अपनी फिल्‍मों में कब तक बचाये रख पाएंगे गीत?: गीत भी क्या पता कहके बचा लें?

  3. ताकि एस पी सिंह के आगे बाकी पत्रकार भी छाती कूट सकें: और आकर स्यापा कर सकें कि हाय आज मैंने राखी सावंत,पूनम पांडे के चक्कर में ये नहीं किया वो छोड़ दिया।

  4. मेरे मरने के बाद मुझपर रोना ना कि मेरे संग्रह को समेटने के लिए: संग्रह समेटने के लिये मूवर्स एंड पैकर्स वाले हैं न!

  5. कसाब बिरयानी ही खायेगा : पनीर उसको पसंद नहीं।

  6. इमेज बड़ी चीज़ है, मुंह ढंक के सोईए : इत्ती गर्मी में इमेज को भी पसीना आ जायेगा ढंकने से

  7. सफ़ेद घर....कुछ बातें....कुछ यादें : हांक लेन दो चार साल हो गये

  8. चन्द्रमा की हेयर-पिन: भोलेनाथ की जटाओं में

  9. प्यास औंधे मुंह पड़ी है घाट पर: बांच रहे इसे चित्त लेटे हुये हम खाट पर

  10. तुम जो नहीं होती, तो फिर ...? : मैं भी कहाँ मैं ही होता!

  11. बारिश में भीगते गर्मी के बिम्ब: बतासा की तरह गल गये।

मेरी पसंद

बहुत बार चाहा , में शूलों का दर्द कहूं
किन्तु एक रूप उतर आता है गीतों में.

जब भी मैं आया हूँ फूलों के मधुबन में ,
शूलों से भी मैंने रूककर बातें की हैं .,
फूलों ने अगर दिए मकरंदित स्वप्न मधुर ,
शूलों ने भी मुझको दुःख की रातें दी हैं.

बहुत बार चाहा दुःख सहकर भी मौन रहूँ ,
वरवस एक रूप गुनगुनाता है गीतों में,

मेरे मन पर यदि है जादू मुस्कानों का ,
आँसू की भाषा भी जानी पहचानी है ,
एक अगर राधा है ब्रज के मनमोहन की ,
दूजी तो घायल यह मीरा देवानी है.

बहुत बार चाहा है आँसू के साथ बहूँ ,
किन्तु एक रूप मुस्काता है गीतों में.

कृष्णाधार मिश्र, शाहजहांपुर

और अंत में

आज के लिये फ़िलहाल इतना ही। बाकी फ़िर कभी। नीचे का चित्र सुनील दीपक जी के ब्लॉग छायाचित्रकार से।

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शुक्रवार, जून 29, 2012

मेरे जीवन की आशा बन , थोड़ी देर और बैठो तुम !

कल की चर्चा में एक कविता का जिक्र और उस पर अदाजी और अनुराधाजी की टिप्पणियों का जिक्र था। इस बारे में हुई चर्चा के लिंक खोजते हुये शालिनी माथुर का लेख व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि पढ़ने को मिला। लेख पढ़कर आशुतोष कुमार की बात दोहराने का मन हुआ-यह लेख दूसरे दस काम छोड़कर पढ़ने वाला है।

इसी पोस्ट पर एक टिप्पणी क्षमाजी की है। उससे उनके ब्लॉग सहजै रहिबा पर पहुंचा। एक कविता के अंश देखिये:
बेटियां बगावत नहीं करती
क्योकि ....
इज्ज़त की गठरी
उनका साथ नहीं छोडती
आजन्म ....

वे नाज़ुक शरीर में
मजबूत कंधे छुपाये रखती हैं
बे-वक़्त
आये तूफान में भी
खड़ी रहती हैं--चट्टान सी

बेटियां बगावत नहीं करती
क्योकि
उसकी कीमत
अंततः उनसे ही वसूली जाती है
बेटियां बगावत भले न करें लेकिन अपने खिलाफ़ होने वाली हिंसा का विरोध तो अवश्य करें। अमेरिका मे रह रहीं सुधा ओम ढींगरा जी ने एक लेख में यह बात विस्तार से समझाई है। इसमें घरेलू जीवन में महिलाओं पर होने वाली हिंसा की पड़ताल की गयी है। अंत में लेखिका का आह्वान है:
क्या आप चाहती हैं कि आप के बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति पनपे | नहीं न.. तो उठिए..जागृति का पहला कदम उठाएँ...अपने ही घर में बहू या बेटी पर किसी मर्द का हाथ उठने से पहले उसके साथ खड़ी हो जाएँ और बचाएँ अपनी भावी पीढ़ी को ग़लत संस्कारों से,जो अनजाने ही बच्चों में पड़ जाते हैं .....
रश्मि रविजा ने भी अपने एक लेख में स्त्री-पुरुष भेदभाव दूर करने के लिये गलत चीज का विरोध करने के संस्कार देने का आह्वान किया:
तो आज जरूरत है..ऐसे ही माताओं-पिताओं की जो बचपन से ही अपनी लड़कियों का ऐसे पालन-पोषण करें कि वो अपनी आवाज़ पहचानें...'ना' कहना सीखें...विरोध करना जानें तब वे अपने ऊपर किए गए पहले जुल्म का विरोध कर पाएंगीं...और किसी को ये नसीहत देने का मौका नहीं देंगी कि 'पहली बार में ही किसी अत्याचार का विरोध करना चाहिए "
प्रो.अली अपने ब्लॉग उम्मतें में विभिन्न लोककथायें सुनाते हुये उसके बारे में विस्तार से लोककथा के समय और आज के परिप्रेक्ष्य में कथाओं की व्याख्या करते चलते हैं। कल उन्होंने सांसों से दालचीनी की खुश्बू बिखेरती नायिका के बारे में बताया तो आज योद्धा की प्रेयसी का आख्यान। इसके बारे में वे बताते हैं:
यह आख्यान मसाई कबीले के एक सुन्दर और बहादुर योद्धा का हृदय जीतने के यत्न में लगी आठ युवतियों से सम्बंधित है ! वे सभी उस युवक से विवाह की इच्छुक हैं और उसकी प्रशंसा में गीतों की रचना करके उसे आकर्षित करने का प्रयास करती हैं , किन्तु उनमें से सबसे छोटी युवती की कविता अत्यन्त हृदयस्पर्शी है , अतः वह इस बहुमूल्य प्रेमी का वरण करने में सफल हो जाती है ! उसके गीत में प्रेम की उद्घोषणा तथा एक चुनौती निहित है , उसने कहा...मैं जिस योद्धा से प्रेम करती हूं / जिसके लिये मैंने अपने पिता के पशु झुण्ड से मीठे दही और दूध की व्यवस्था की है और जिसके लिये मैंने अपने पिता के चर्बीयुक्त मेढ़े रख छोड़े हैं , कि वह उनकी बलि दे , उनका सेवन करे /
आगे उस योद्धा के घायल होने और फ़िर अपने परिश्रम और पराक्रम से उसे उस नायिका द्वारा उसे स्वस्थ करने और विजय प्राप्त करने का आख्यान है। जिसे अली जी कहते हैं- एक पराजित योद्धा की प्रेयसी का विजय अभिषेक ! यहां आठ युवतियों में से एक को चुनने का कारण युवती में सुन्दरता के साथ-साथ शौर्य का होना भी एक कारण रहा होगा। इस बात को गीतकार अंसार कंबरी अपने गीत में कहते हैं:
क्या नहीं कर सकूंगा तुम्हारे लिये
शर्त ये है कि तुम कुछ कहो तो सही।

पढ़ सको तो मेरे मन की भाषा पढो़
मौन रहने से अच्छा है झुंझला पढ़ो
मैं भी दशरथ सा वरदान दूंगा मगर
युद्ध में कैकेयी से रहो तो सही।
एक प्रेयसी भी चाहती है कि उसका साथी बहादुर हो। शायरा नसीम निकहत कहती हैं:
मिलना है तो आ जीत ले मैदान में हमको
हम अपने कबीले से बगावत नहीं करते

तूफान से लड़ने का सलीका है जरूरी
हम डूबने वालों की हिमायत नहीं करते।
शौर्य के इस सिलसिले के बीच अमित श्रीवास्तव का फ़ेसबुक पर सवाल दिखा:
महिलायें व्यंग लेखन कम करती हैं , क्यों ? किसी महिला व्यंगकार का नाम बताएं | ब्लागिंग में भी महिलाओं द्वारा 'हास्य-व्यंग' पर कम लिखा जाता है | कोई विशेष कारण ??
इस पर उनकी भतीजी शिल्पी श्रीवास्तव जबाब लिखा:
I think they are generally too sarcastic for men to understand their sense of humour :)
व्यंग्य को लोग बड़ी उठापटक विधा के रूप में देखते हैं। लोगों पर व्यक्तिगत प्रहार और उपहास को भी व्यंग्य के खाते में जमाकरके इससे बिदकते हैं। परसाईजी ने कहते हैं:
यद्यपि मैं व्यंग्य विनोद लिखता हूँ, पर वास्तव में मैं बहुत दु:खी आदमी हूँ, दुःखी होकर लिखता हूँ। मैं इसलिए दुःखी हूँ कि देखो मेरे समाज का क्या हाल हो रहा है, ये सब दुःख मेरे भीतर हैं, करुणा मेरे भीतर है….। मैं बहुत संवेदनशील आदमी हूँ। इस कारण करुणा की अंतर्धारा मेरे व्यंग्य के भीतर रहती ही है। जैसे मैं विकट से विकट ट्रेजडी को व्यंग्य और विनोद के द्वारा उड़ा देता हूँ, उसी प्रकार करुणा के कारणों को भी मैं व्यंग्य की चोट से मारता हूँ या उन पर विनोद करता हूँ।
अब अगर मैं यह कहूं कि महिलायें व्यंग्य लेखन कम करती हैं क्योंकि वे कम दुखी होती हैं तो यह कैसा बयान होगा? व्यंग्य, हास्य या एक हास्यास्पद बयान। ब्लॉगिंग और फ़ेसबुक के समय में हर संवेदनशील इंसान का कवि छलकता रहता है। कविता पंक्तियां:
एक लाइन से इधर से आये
एक लाइन उधर से आये
कालजयी कविता रच जाये

वाले अंदाज में प्रस्फ़ुटित होती रहती हैं। ऐसे कविता उर्वर माहौल में वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ऐसे कवि हैं जो कि कविता में ’कम’ के पक्षधर हैं। नरश सक्सेनाजी से हुई बातचीत आप यहां पढ़ सकते हैं। उससे पूछा गया एक सवाल और उसका जबाब देखिये:
आप इतनी कम कविताएं क्यों लिखते हैं?
देखिए, मेरे लिए कविता कोई आसान चीज नहीं है, लेकिन जो आसानी से कविताएं लिख लेते हैं, मुझे उनसे ईर्ष्या भी नहीं है, क्योंकि वैसी कविताओं में मेरी रुचि नहीं है। यदि वे सब कविताएं जो लगातार आने वाले काव्य संग्रहों में छप रही है, सचमुच कविताएं हैं तो निश्चित रूप से कम लिखना मेरी अक्षमता है। कभी-कभी एक कविता को पूरा करने में मुझे कई महीने या साल भी लग जाते हैं। चंबल एक नदी का नाम... एक ऐसी ही कविता है जो मैं कई महीनों से लिख रहा हूं, लेकिन अब तक अधूरी है। कविता की प्रारंभिक पंक्तियां या उसे जुड़ा कोई आइडिया एक फ्लैश में आ जाता है, लेकिन उसे पूर्णता देने वाली पंक्तियां कई बार महीनों बाद सूझती हैं। ऐसी कविताएं अधूरी कविताएं होती हैं जो अपने पूरे होने की जद्दोजहद में पड़ी रहती हैं।
इस बीच सतीश पंचम के सफ़ेदघर ने सौ पोस्ट पर साल के हिसाब से चार सौ पोस्ट का आंकड़ा छुआ। कुछ बातें कुछ यादें बांटते हुये उन्होंने लिखा! अब लिखा तो बहुत कुछ है लेकिन ये सलाह भी दी है देखिये:
ब्लॉगिंग में उतनी ही विनम्रता रखें, उतनी ही दर्शायें जितने की आवश्यकता हो। ज्यादा विनम्र होने पर लोग कान पकड़कर इस्तेमाल भी कर लेंगे और बाद में केवल हें हें करके खींस निपोरने के सिवा और कुछ न कर पायेंगे। इस बारे में मैंने पहले भी एकाध जगह लिखा है कि हम अपने जीवन में चाहें तो निन्यानबे फीसद विनम्र रहें लेकिन एक पर्सेट का दंभ जरूर रखें क्योंकि यही एक परसेंट का दंभ आपके बाकी निन्यानबे फीसदी विनम्रता की दशा और दिशा निर्धारित करता है। इसी दंभ के चलते जिसे जहां जैसा लगे मन की कहा जा सकता है, जिसे टरकाना हो टरकाया जा सकता है और जिसे डांटना हो बेखटके वहां डांटा जा सकता है लेकिन यह डंटैती भी तभी फबती है जब बंदा / बंदी अपने दम खम पर ब्लॉगिंग करता हो न कि हीही फीफी और नेटवर्किंग फेकवर्किंग के चलते। यहां मैं उन "सदा-सर्वदा उखड़ै हैं" टाईप ब्लॉगरों की बात नहीं कर रहा, ऐसे ब्लॉगर बंदे-बंदीयों के उखड़ने-पखड़ने की लोग अब वैसे भी परवाह नहीं करते। यह एक तरह से अच्छा संकेत है कि लोग किसी की निजी खुंदक, मतिमूढ़ता, धौंस आदि को ज्यादा तवज्जो नहीं देते। जिसे जैसा मन आये लिखता है, पढ़ता है। ऐसे में क्या दबना-दुबना।
अब ये सलाह मिल गयी फ़िर क्या। करिये धांस के ब्लॉगिंग! जो होगा देखा जायेगा।

मेरी पसंद

मेरे जीवन की आशा बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !

सब आते जाते रहते हैं ,
भव नदिया में सब बहते हैं,
जीवन में अपनी पीड़ा को-
सब रोते हैं,सब कहते हैं!

मेरे गीतों की भाषा बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !

इतनी भीड़ कहाँ होती है ,
अपना दोष नहीं धोती है,
चलते फिरतों की आंखें भी-
नम होती हैं औ रोती हैं !!

मेरी प्यासी अभिलाषा बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !

होता कौन यहाँ अपना है ,
अपनापन केवल सपना है ,
नींद नहीं जाने क्यों आती?
किस आशा में फिर जगना है?

मेरे प्राणों की श्वांसें बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !!

ओमप्रकाश’अडिग’,शाहजहांपुर

और अंत में

फ़िलहाल इतना ही। बाकी फ़िर कभी। तब तक मौज से रहिये। ऊपर का कार्टून इरफ़ान का बनाया हुआ है। नीचे फ़ोटो सतीश पंचम के ब्लॉग से :

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