शनिवार, जून 30, 2012

किन्तु एक रूप मुस्काता है गीतों में

कल की चर्चा के बाद हमको अपरोक्ष रूप से डांट पड़ी -हम बहुत मेहनत करते हैं। इसई चक्कर में हम आज फ़ुल आराम किये। वैसे कल अनूप सेठी की कविता देखे । जरा आप भी देखिये:
अबे! ओ!!कवि!!!
तू लिक्ख,
कागज को घोंच मत,
अच्छी कविता लिक्ख!
इसको ब्लॉगानुवाद रविरतलामी ने इस तरह किया:
अबे! ओ!! ब्लॉगर!!!
तू लिक्ख
कीबोर्ड को टकटका मत
अच्छे पोस्ट लिक्ख
चर्चा की भाषा में अगर कहें तो इसे कुछ यूं कहा जायेगा शायद:
अबे! ओ!!चर्चाकार!!!
तू चर्चिया
खाली लिंक में सटा
अच्छी चर्चा कर!

चर्चा करने बैठे तो अदाजी का सवाल भी सामने आकर खड़ा हो गया। वे कहती क्या हैं पूछती हैं:
ई बतावल जावे..चिटठा-चर्चा करे में आपहूँ कौनो पी.एच.डी. ऊ.एच.डी. कीये हैं का ???
अदाजी की अपनी अदा है बात कहने की। हां नहीं तो वाली अदाजी का कहने का मतलब है कि कुछ करना-धरना आता भी है चर्चा-उर्चा की खाली मेहनतै करते रहते हैं। :)
इसई बहाने हम पुराने दिन के किस्से याद करने लगे। कभी अदाजी अपनी खनकती आवाज में चर्चा करतीं थीं। कुछ के लिंक जो मिले वे आप भी देखिये/ सुनिये।

1.ब्लॉग समाचार ....ब्लागों की कहानी ...अदा की ज़ुबानी ....

2.ब्लॉग समाचार ...अदा की पसंद .....पाँच पोस्ट्स....(3)

3.ब्लॉग समाचार ....अदा की पसंद....पाँच ब्लॉग और कुछ कमेन्ट.....

4.ब्लॉग समाचार ......पोस्ट माला


जो लोग पाडकास्टिंग के झमेले जानते हैं ऊ लोग समझते हैं कि इसमें कित्ता मेहनत लगती है। लेकिन अदाजी ने काफ़ी दिन तक अपनी आवाज में चर्चा की और खूब पसंद की गयी उनकी चर्चा। तो हमको पी.एच.डी.देने का साजिश करेंगी अदाजी तो हम आपको आपके काम के हिसाब से डबल पी.एच.डी. थमा देंगे -हां नहीं तो कहकर।

इधर-उधर डोलते हुये आज पुरानी चर्चायें देख रहे थे तो सतीश पंचम एक पोस्ट में कुछ ज्यादा चमकते दिखे। सो उनको लिंक दुबारा थमा दिया। उन्होंने लौटती मेल से टिपिया दिया:
दो साल बाद इस चिट्ठाचर्चा को फिर से पढ़ना सुखद रहा। प्रियंकर जी की बात देखिये दो साल बाद भी एकदम टंच लग रही है।
उन्ही की बात कापी पेस्ट कर रहा हूं - हिंदी चिट्ठाकारी हिंदी समाज के पुराने कुएं में लगा नया रहट है. रहट की डोलचियों में पानी तो उसी समाज का है . उस बंद समाज की समस्याएं ही हिंदी चिट्ठाकारी की भी समस्याएं हैं. समाज बदलेगा,तभी चिट्ठाकारी का स्वरूप बदलेगा. तब हिंदी चिट्ठाकारी का पोखर इतना बड़ा महासागर होगा जिसे छोटे-मोटे दूषक तत्व प्रदूषित नहीं कर पाएंगे.
बड़ा बवाल है ये नास्टेल्जिया भी। हम कहां से कहां टहलन लगे:
आये थे करने चर्चा
लगे करने टाइम खर्चा

कल की चर्चा में अलीजी की प्रतिक्रिया थी
फेसबुक वाले छोड़ कर सभी लिंक देख पाये ! लिंक देखते हुए सहजै रहिबा तक भी पहुंचे , बेहतर कवितायें पर प्रतिक्रियायें ?

अपने ब्लॉगजगत का यही किस्सा है। बहुत सारा अच्छा पढ़ने से रह जाता है। आज ऐसे ही घूमते हुये सीतापुर के अरुणमिसिर के ब्लॉग तीन पत्ती पर पहुंचे। ये कविता देखिये:
झोपड़ी में
दस लोग खड़े थे
पाँच ने सोंचा पाँच ही होते
तो बैठ सकते थे
दो ने सोंचा दो ही होते
तो लेट सकते थे

एक ने सोंचा केवल मैं ही होता
तो बाकी जगह
किराए पर उठा देता !
इस कविता की व्याख्या के लिये काम भर की समझ नहीं है लेकिन कविता जमी बहुत। यह भी लगा कि कैसी-कैसी तो इधर-उधर की तुकबंदियों में टिप्पणियों की झड़ी लगा देते हैं हम लोग। लेकिन यहां कोई आया नहीं। हमें लगता है ब्लॉगर भी एकदम मध्यमवर्गीय आदतों वाला होता है। जानी-पहचानी जगहों पर जाता है। टिपियाता है चला जाता है। अनजान जगहों पर जाने में सकुचाता है।
खैर छोड़िये अगली कविता देखिये मिसिरजी की:
अपने घर को घुमा कर मैंने
उसका रुख समंदर की ओर कर दिया है
वह पोखर जो कभी घर के सामने था
पिछवाड़े हो गया है !


लगभग भूला ही रहता हूँ उसे अब
लेकिन कभी जब यूँही बे-इरादा
पीछे की खिड़की खोलता हूँ
हुमक कर आ जाता है
आधा चेहरा छिपाये सिर्फ एक आँख से देखती
उस दलित लड़की-सा
जो अभी तक मेरे वादों को सच मानती है !


आगे की कविता आप मिसिरजी की पोस्ट में बांचिये। और कवितायें भी उनके ब्लॉग पर देखिये। कुछ कवि्तायें उनकी धूप के गांव में भी हैं।
कल चर्चा में सिद्धार्थ जोशी ने एक लाईना की फ़रमाइश की। एक लाईना या्नी वन लाइनर के बड़े रोचक अनुभव रहे हैं। शुरुआती दौर में लोगों ने इनको बहुत पसंद किया। फ़िर कुछ लोगों को खराब लगा। कुछ लोगों ने इसमें चर्चाकार की प्रत्युत्पन्न मति देखी जबकि कुछ को व्यंग्यकार की धूर्तता। हालांकि इसे पसंद करने वाले ज्यादा थे लेकिन फ़िर यह कम होता गया। अब जो्शी जी ज्योतिषी हैं लेकिन उन्होंने नहीं बताया कि एक लाईनाम में हमारे लिये धिक्कार योग हैं सराहना का जुगाड़। बहरहाल हम अनुराग कश्यप मोड में जाते हुये (जैसा पाठक चाहते हैं वैसी चर्चा की जाती है) चंद एक लाईना पेश कर रहे हैं। जिस किसी को बुरा लगे बता दे , उसकी पोस्ट का लिंक हटा दिया जायेगा।
  1. आज जाकर देख पाया राऊडी राठौर : लेकिन समीक्षा लिखे बिना तो मानेंगे नहीं

  2. अनुराग अपनी फिल्‍मों में कब तक बचाये रख पाएंगे गीत?: गीत भी क्या पता कहके बचा लें?

  3. ताकि एस पी सिंह के आगे बाकी पत्रकार भी छाती कूट सकें: और आकर स्यापा कर सकें कि हाय आज मैंने राखी सावंत,पूनम पांडे के चक्कर में ये नहीं किया वो छोड़ दिया।

  4. मेरे मरने के बाद मुझपर रोना ना कि मेरे संग्रह को समेटने के लिए: संग्रह समेटने के लिये मूवर्स एंड पैकर्स वाले हैं न!

  5. कसाब बिरयानी ही खायेगा : पनीर उसको पसंद नहीं।

  6. इमेज बड़ी चीज़ है, मुंह ढंक के सोईए : इत्ती गर्मी में इमेज को भी पसीना आ जायेगा ढंकने से

  7. सफ़ेद घर....कुछ बातें....कुछ यादें : हांक लेन दो चार साल हो गये

  8. चन्द्रमा की हेयर-पिन: भोलेनाथ की जटाओं में

  9. प्यास औंधे मुंह पड़ी है घाट पर: बांच रहे इसे चित्त लेटे हुये हम खाट पर

  10. तुम जो नहीं होती, तो फिर ...? : मैं भी कहाँ मैं ही होता!

  11. बारिश में भीगते गर्मी के बिम्ब: बतासा की तरह गल गये।

मेरी पसंद

बहुत बार चाहा , में शूलों का दर्द कहूं
किन्तु एक रूप उतर आता है गीतों में.

जब भी मैं आया हूँ फूलों के मधुबन में ,
शूलों से भी मैंने रूककर बातें की हैं .,
फूलों ने अगर दिए मकरंदित स्वप्न मधुर ,
शूलों ने भी मुझको दुःख की रातें दी हैं.

बहुत बार चाहा दुःख सहकर भी मौन रहूँ ,
वरवस एक रूप गुनगुनाता है गीतों में,

मेरे मन पर यदि है जादू मुस्कानों का ,
आँसू की भाषा भी जानी पहचानी है ,
एक अगर राधा है ब्रज के मनमोहन की ,
दूजी तो घायल यह मीरा देवानी है.

बहुत बार चाहा है आँसू के साथ बहूँ ,
किन्तु एक रूप मुस्काता है गीतों में.

कृष्णाधार मिश्र, शाहजहांपुर

और अंत में

आज के लिये फ़िलहाल इतना ही। बाकी फ़िर कभी। नीचे का चित्र सुनील दीपक जी के ब्लॉग छायाचित्रकार से।

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40 टिप्‍पणियां:

  1. धीरेन्द्र पाण्डेयजून 30, 2012 11:10 pm

    अपने घर को घुमा कर मैंने
    उसका रुख समंदर की ओर कर दिया है
    वह पोखर जो कभी घर के सामने था
    पिछवाड़े हो गया है !


    लगभग भूला ही रहता हूँ उसे अब
    लेकिन कभी जब यूँही बे-इरादा
    पीछे की खिड़की खोलता हूँ
    हुमक कर आ जाता है
    आधा चेहरा छिपाये सिर्फ एक आँख से देखती
    उस दलित लड़की-सा
    जो अभी तक मेरे वादों को सच मानती है !


    गजब की कविता है अद्भुत

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  2. आज की चर्चा बहुतै अच्छी लगी.खासकर अदाजी का चर्चा बांचना पहली बार सुने.उनका लिखना तो गज़ब है ही बोलना जादुई है.अब व्यस्तता के चलते वो इस तरह तो सक्रिय नहीं हैं,फिर भी काम भर का लिख और टिपिया लेती हैं !

    ...अरुण मिसिर जी की कविता कम शब्दों में अधिक बोलती है.

    ...आपकी चर्चा आज लिंक लगाकर लंबी हो गई है.

    ...खुरपेंच करने की पी.एच.डी. आप को हम दे ही चुके हैं इसलिए दूसरे टाइप वाली डिग्री हम जैसों के लिए छोड़ दीजिए !

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  3. वास्ते टिप्पणीकार अनूप सेठी की कविता ,
    कविता से प्रेरणा तो मिली पर खुद को ज़लील करने का ख्याल दिल से निकाल दिया !

    वास्ते एक लाइना ,
    'पंच' सभी अच्छे हैं पर 4, 6, 8, 9,11 ज्यादा पसंद आये !

    वास्ते सहजै रहिबा पर प्रतिक्रियायें ,
    वहां तो टिप्पणियों के चिल्लर व्यापारी भी नहीं दिखे !

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  4. आज दूकान में काफी नया माल सजाया है , पढ़ने से अधिक समझने में समय लगेगा :(
    आभार आपका !

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  5. तीन पत्ती की कविता अपने आप में एक स्टेटमेंट है . बेहतरीन .
    आपका चर्चा का अंदाज़ अद्भुत और निराला है .

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  6. अच्छा लगा, यह वाली चर्चा पढ़कर

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  7. कई नए लिंक दिखाई दिये ... चर्चा अच्छी रही ..

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  8. @ सतीश जी,
    हो सकता है आपने यह टिप्पणी बिना सोचे समझे,बेध्यानी में कर दी हो...लेकिन आप जैसा प्रज्ञं, लेखक, कवि थोड़ा सा सोच कर लिखे तो अच्छा लगता..
    कम से कम आपसे ऐसी टिप्पणी की मुझे अपेक्षा नहीं थी..आशा है मेरा आशय आप समझ रहे होंगे..
    'अदा'

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    1. अदा जी
      हिंदी ब्लॉग जगत में सब कुछ संभव हैं वैसे तो सतीश अपनी बात कह चुके हैं मार्क करने की बात हैं उनका ये कहना "ठीक से पढ़ा भी नहीं " लेकिन इस प्रकार के शब्दों का चयन हिंदी ब्लॉग जगत में बहुत आम हैं . और स्वीकार्य भी हैं
      दो लिंक दे रही हूँ २००९ के देखिये किस प्रकार से वाह वाही मिलती हैं रही हैं विगत में लोगो को इस प्रकार के शब्दों के चयन पर . इस लिये यहाँ कुछ भी किसी को अटपटा लगता ही नहीं हैं http://doordrishti.blogspot.in/2009/10/blog-post_10.html
      http://www.bspabla.com/?p=91
      अभी दो दिन पहले नारी ब्लॉग की कैंसर सम्बंधित पोस्ट पर इसी प्रकार से "हरजाई " शब्द का प्रयोग अजय अपने कमेन्ट में कर चुके हैं . http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2012/06/blog-post_27.html?showComment=1340809691965#c7236333913261967176आपत्ति करती तो कहा जाता में नकारात्मक नज़रिया रखती और हूँ और गलत बातो को उठाती हूँ
      सतीश के कमेन्ट पर मै कल ही आपत्ति करने वाली थी पर नहीं की महज इसलिये क्युकी देखना चाहती थी की किसी और को भी हिंदी / शब्दों के चयन पर ध्यान देने की जरुरत भी लगती हैं की नहीं .

      हटाएं
  9. @ अदा जी ,
    ( अपने ऊपर अविश्वास का जवाब देना बेहद कष्टकारक होता है, आपके प्रति सम्मान वश आपका जवाब देना आवश्यक मान ही जवाब दे रहा हूँ )

    @ आशा है मेरा आशय आप समझ रहे होंगे..

    आपकी यह आशा मेरे प्रति आपका संदेह ही नहीं बल्कि मेरे प्रति अविश्वास का भी परिचायक है, इसका मुझे बेहद दुख है और कारण जानने की इच्छा रहेगी !

    खैर, पहले मेरी ऊपरी पंक्ति का मतलब मैं बता रहा हूँ ..

    @ आज दूकान में काफी नया माल सजाया है , पढ़ने से अधिक समझने में समय लगेगा :(
    आभार आपका !

    यह जवाब केवल अनूप शुक्ल को है कि अधिकतर लिंक नए हैं और मुझ अज्ञानी को समझने में समय लगेगा !आपके बारे में तो सोंचना तो छोडिये शायद आज व्यस्तता के कारण, ध्यान से पढ़ भी नहीं सका कि अनूप भाई ने लिखा क्या है !

    आशा है आप संतुष्ट हो गयी होंगी !
    सादर

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    1. सतीश जी,
      मुझे मालूम है आप ऐसी कोई भी ओछी हरकत करने की हिम्मत नहीं करेंगे...लेकिन आपको बताना ज़रूरी था..
      आईंदा आप ख़याल रखेंगे कहीं भी कुछ भी लिखने से पहले पढ़ लिया करेंगे...
      इस टिप्पणी ने ये और भी साफ़ ज़ाहिर कर दिया कि बिना पढ़े टिप्पणी करना खतरनाक भी हो सकता है...

      हटाएं
    2. हिम्मत aarae galt shabd sahii shabd जुर्रत

      हटाएं
    3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

      हटाएं
  10. सवाल सेलेबिलिटी का है -पूरी दुनिया में एक आन्दोलन है जो आम जन तक जो भी पहुंचाया जाना है उसकी सेलेबिलिटी की बात करता हैं -कैसे उसे आकर्षक बनाया जाय ,लुभावना बनाया जाय -सामग्री चित्ताकर्षक हो तो लोग उसके लिए उतावले हो जायं-
    यही मनोवृत्ति अब बौद्धिक कारोबार में भी लक्षित है -यहाँ भी पोस्ट, आलेख,चर्चा को सेलेबिल बनाए की कवायद हैं .
    यहाँ दुकानदार हैं चिट्ठा चर्चाकार और चिट्ठा सामग्री है माल .....यह किसी भी दुकानदार के लिए एक मुक़द्दस मैटेरियल है -
    कभी कभी हम खुद के दिमाग की व्यापकता को सीमित कर दूसरों पर आक्षेप लगाते हैं -नज़रिए नज़रिए का फर्क है बस!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. क्यों नहीं...
      मामला सेलेबिल्टी का ही है....लेकिन हम सेलेबल नहीं है...कोई ऐसा करने की न तो हिम्मत करे न ही हिमाकत करे..
      जो ख़ुद को सेल करना चाहते हो..वो ख़ुशी से ख़ुद को सेल पर लगायें...लेकिन हम जैसी महिलाओं के बारे में ऐसा सोचने की भी गुस्ताखी न करें तो उनके स्वास्थ्य के लिए अच्छा रहेगा...वरना हम उनकी माँ-बहनों को भी सेल पर लगा सकते हैं..उम्मीद है बात समझ में आ गई होगी...
      यहाँ भाषा की गरिमा और दूसरों के प्रति इज्जत का पूरा ख़याल रखना ही होगा...अभिव्यक्ति की आज़ादी है..किसी के प्रतिष्ठा से खेलने की नहीं..
      मुझसे कोई भी ये उम्मीद न रखे कि मैं ये फ़ालतू बातें झेल जाऊँगी...

      हटाएं
    2. एक बात और तथाकथित व्यापक मानसिकता रखने वाले अपनी व्यापक मानसिकता अपने घर में रख कर आएँ...अपनी मानसिक व्यापकता अपने घर पर आजमायें यहाँ नहीं...कम से कम मेरे साथ तो हरगिज़ नहीं...मैंने ऐसी कोई छूट नहीं दे रखी है किसी को भी..

      हटाएं
    3. रना हम उनकी माँ-बहनों को भी सेल पर लगा सकते हैं.
      ismae unki kyaa galti haen

      jaraa dubara sochae
      माँ-बहनों ki jagah kuchh aur sale par lagaa saktii haen kyaa

      हटाएं
    4. Galti unki nahi hai...
      aapne Co-lateral Damage ka naam to suna hi hoga..?

      हटाएं
    5. par aap khud kehtii haen kisi purush ki galti kae liyae uski maa behan kyun sajaa paaye

      ham to aapke fan haen aap ki har baat yaad rakhtae haen

      हटाएं
    6. benaami ji,
      aapki baaton se bilkul sahmat hun..
      purush ko apni pratishtha apni striyon mein hi nazar aati hai..agar unko doosri striyon ko pratishtha karna sikhaani hai to..yahi kadam uthaya jaa sakta hai..tabhi unko doosri mahilaaon ko pratishtha dena aata hai..varna unko apni pratishtha ki kahan utni fikr hoti hai..
      mujhe afsos hai ki main ye sab kah rahi hun...
      But
      They must have the taste of their own medicine.

      हटाएं
    7. Aur haan samay, parishthi, aur sandarbh ke saath-saath vichaar badalte hain. Shayad ise hi ANUBHAV kahte hain...ham har din seekhte hain, main bhi seekh rahi hun...

      हटाएं
  11. सतीश जी की पहले वाली टीप मैं देख चुका था और मुझे इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा था.हाँ,इस तरह का वाक्य अगर कोई हल्का आदमी करता तो शायद मन में खटकता भी पर सतीशजी ऐसी अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं करते हैं.
    अदाजी ने इसे अलग तरीके से ले लिया इसलिए वो ऐसा कह गईं.उम्मीद है कि सतीश जी के ज़वाब के बाद यह ग़लतफ़हमी पैदा हुई.दोनों सम्मानित लोग हैं और हम चाहते हैं कि आपसी प्रेमभाव बना रहे.
    सादर !

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. हाँ,इस तरह का वाक्य अगर कोई हल्का आदमी करता

      ब्लॉग जगत में सब भारी आदमी हैं हल्का कौन कौन हैं और आप किस तबके के हैं ??? फिर वही शब्दों का चयन

      हटाएं
    2. Trivedi ji,

      I starah ke vakyon ka proyog Sirf Halka' aadmi hi karta hai..
      jo insaan halka nahi hai wo kar hi nahi sakta, chaahe kuch bhi ho jaaye...

      हटाएं
  12. @उम्मीद है कि सतीश जी के ज़वाब के बाद यह ग़लतफ़हमी पैदा हुई

    उम्मीद है कि सतीश जी के ज़वाब के बाद यह ग़लतफ़हमी ख़त्म हो जाएगी !

    उत्तर देंहटाएं
  13. अदाजी,
    बहुत अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि जिस बात को सतीशजी के वक्तव्य के बाद खत्म समझना चाहिए था उसके बाद मैंने व्यक्तिगत अपील भी की थी पर लगातार कई भड़काऊ और आपत्तिजनक बातें कही जा रही हैं.आपको और सबको पता है कि ये बेनामी कौन है.सबसे ज़्यादा पाक-साफ़ तो यही हैं.स्वयं भेष बदल-बदलकर बिना लाग-लपेट के आग लगाने में माहिर हैं.ऐसे बेनामी कायर होते हैं,उनसे आप इस मुद्दे पर चुटकी ले रही हैं.

    मिश्रजी ने सेलेबिलटी की प्रवृत्ति पर कुछ कहा था,पर आपने निहायत आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया है,जबकि स्वयं के लिए ऐसे शब्दों से राहत मांग रही हैं.
    इस मुद्दे को आपने उठाया था,उत्तर मिलने के बाद भी आप शांत न होकर जिस तरह से कई वार्तालाप हुए हैं ,उनसे आपकी गंभीर और व्यापक सोच को धक्का लगा है.
    आखिर एक बार भी ठंडे दिमाग से सोचा होता कि सतीश जी 'उस' अर्थ में उन शब्दों को खुले-आम कैसे प्रयुक्त कर सकते हैं.फिर भी,यदि उनने सफाई दे दी थी तो बात खत्म कर दी जाती.अब ऐसे आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग आप जानबूझकर कर रही हैं,तो क्या आप क्षम्य हैं इस कृत्य के लिए ?
    जब हम आप इस अंतरजाल का हिस्सा हैं तो ऐसा छुईमुईपन नहीं चलता है.अगर किसी बात से आपकी भावनाएं आहत हुई हैं तो इसका विरोध निश्चित रूप से होना चाहिए.यहाँ यह भी बहुत ध्यान देने की ज़रूरत है कि ऐसा किसकी तरफ से किया गया है और उसकी आपके प्रति क्या मंशा है?
    हमारी समझ में सतीश जी ने हमेशा विवादों को निपटाने का प्रयास किया है,इस बात को और उनकी पृष्ठभूमि को भी आपको समझना चाहिए था.इस बात को और तूल देकर आपने अच्छा नहीं किया है.
    हो सकता है कि अब आप हमसे भी खफ़ा हो जाएं पर सच में,इस मुद्दे को इस स्थिति में देखकर कष्ट हुआ इसलिए कह दिया.

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    1. ,आपने सही समझा ! अब मैं कोई ऐसा वैसा ब्लॉगर या लेखक नहीं रहा. मैं इत्ता पढ़ा जाता हूँ कि मेरा दमघुटने लगा है.मेरी कोई भी रचना अब मेरे निजी पेटेंट के दायरे में है और मैंने यहसोच रखा है कि मेरे लिखे हुए को केवल मेरे चम्पू ही पढ़ें और मेरी वाह-वाह करें.

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    2. मुझे आपसे खफा होने का कोई मतलब नहीं बनता..आपका कोई लेना देना नहीं है...
      सतीश जी ने जो कहा वो मुझे समझ में आ गया..
      परन्तु सेलेबिल्टी के नाम पर इस तरह के शब्दों के प्रयोग को जायज़ ठहराने पर घोर आपत्ति उठा रही हूँ...आपको ग़लतफ़हमी है कि मैं कोई राहत माँग रही हूँ...मैं तो सिर्फ़ आगाह कर रही हूँ , अगर आईंदा किसी ने भी इस तरह के शब्द का प्रयोग किया तो कड़े शब्दों में आगाह कर रही हूँ..और एक बात, बात लोगों को तभी समझ में आती है जब उनके अपनों पर बन आती है...जब दूसरों कि पत्नी, बहन, माँ, बीवी के लिए 'माल' जैसे शब्द कहने में लोगों को कोई मुश्किल नहीं लगती तो अपने घरों कि स्त्रियों के बारे में भी सुनने में कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए...
      और मैं अपनी बात पर कायम हूँ...

      हटाएं
  14. सेलेबिलिटी की बात केवल ब्लॉग पोस्ट के लिए थी ,व्यक्ति के लिए नहीं
    मगर इसे छिछले स्तर पर लाकर माँ बहनों का आह्वान किया गया जो खेदजनक है! बेचारी वही सबका बोझ उठाने को बनी हैं !
    लोग इतने आत्मकेंद्रित क्यों हो जाते हैं कि उन्हें हर वक्त यही लगता है कि सारी कायनात
    बस उनके पीछे है ...
    अब ट्राय की रानी हेलेन हों ,मेरिलिन मोनरो हों ,मधुशाला हों तो बात समझ में भी आती हैं .

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. जब अपने घर पर बात आती है तो ऐसा लगना स्वाभाविक है...कभी दूसरों के बारे में भी सोचा कीजिये...
      बात यहाँ आत्मकेंद्रित होने की नहीं थी...बात यहाँ भाषा की थी...
      चर्चा में व्यक्तियों की भी बात कही जा रही है...और यहाँ हम व्यक्ति हैं, अपनी गरिमा और प्रतिष्ठा लिए हुए...कोई 'माल' नहीं हैं...
      बेशक हम ,मेरिलिन मोनरो, हेलेन ना सही...लेकिन प्रतिष्ठा में उनसे कम भी नहीं हैं...आप कहना क्या चाहते हैं, हम मेरिलिन मोनरो, हेलेन नहीं हैं तो प्रतिष्ठा पाने का अधिकार ही नहीं रखते हैं हम ?

      हटाएं
    2. अगर आप सिर्फ़ मेरिलिन मोनरो, हेलेन को ही प्रतिष्ठा के योग्य मानते हैं, दूसरे आपकी नज़र में इस योग्य नहीं हैं...तो यहाँ क्या कर रहे हैं आप ??
      ये है छिछलेपन की बात जो आप कह रहे हैं...

      हटाएं
    3. शुक्र है, हम मेरिलिन मोनरो, हेलेन नहीं वरना आप जैसे आगे-पीछे घूमते और हम अपनी किस्मत को रोते...

      हटाएं
  15. मुझे जो कहना था मैंने कह दिया है...आईंदा अगर मैंने ऐसे घटिया शब्दों का इस्तेमाल ऐसे वरिष्ठ ब्लोगरों द्वारा देखा तो...मैं व्यक्तिगत रूप से इसे जहाँ तक ले जाना होगा लेकर जाऊँगी..

    उत्तर देंहटाएं
  16. चर्चा हमेशा की तरह मस्त मौला है...कमेंट्स में गहमागहमी देखकर मन में ये लाइन आ गयी (सभी से माफ़ी सहित)
    ओ टिपैया!!!,
    तू टीप,
    लड़ झगड़ मत,
    बढ़िया कमेन्ट कर !!! :) :) :)

    उत्तर देंहटाएं
  17. कल यह चर्चा कानपुर में करके ट्रेन में बैठ लिये जबलपुर के लिये। शुरु की सात टिप्पणियां कानपुर में देखी थीं। आज जब जबलपुर पहुंचे तब पता चला कि टिप्पणी-प्रतिटिप्पणी हो गया मामला।

    सबसे पहले मैं सतीश जी के प्रति अफ़सोस व्यक्त करता हूं। उनकी जैसी मंशा नहीं थी वैसा उनके कमेंट को समझकर अदाजी ने टिप्पणी की। उनका स्पष्टीकरण स्पैम में बना रहा। इस बीच दूसरे लोग टिपियाते रहे। सतीश जी के बारे में यही कहेंगे उनकी स्थिति ऐसी हुई:
    मैं जो कभी नहीं था
    वह भी दुनिया ने पढ़ डाला।


    जब एक बार टिप्पणियां शुरु हुईं तो आप देख ही सकते हैं क्या-क्या कह गये लोग। इसके बाद जब मामला और व्यक्तिगत होता गया तो मैंने फ़िर माडरेशन लगा दिया चर्चा पर।

    डा.अरविंद मिश्र की टिप्पणी हमने प्रकाशित नहीं की काहे से कि वो कुछ और ज्यादा व्यक्ति हो गयी थी।

    एक बार फ़िर प्रियंकर जी की बात (चर्चा में कही) दोहराने लायक लग रही है:
    हिंदी चिट्ठाकारी हिंदी समाज के पुराने कुएं में लगा नया रहट है. रहट की डोलचियों में पानी तो उसी समाज का है . उस बंद समाज की समस्याएं ही हिंदी चिट्ठाकारी की भी समस्याएं हैं. समाज बदलेगा,तभी चिट्ठाकारी का स्वरूप बदलेगा. तब हिंदी चिट्ठाकारी का पोखर इतना बड़ा महासागर होगा जिसे छोटे-मोटे दूषक तत्व प्रदूषित नहीं कर पाएंगे.

    उत्तर देंहटाएं
  18. Who are the polluting agents here? It is an irrelevant comment here.

    उत्तर देंहटाएं
  19. AAYE DIN CHARCHA EVAM CHARCHAKAR PAR BAHAS???? KOI KHAS RAN-NITI HAI KYA???

    HAMARA 'KHAS' MANCH HAI YE......SO KAH DIYA....

    EK 'PATHAK'


    PRANAM.

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  20. ओह। मैं लौटकर आ रहा हूं, लेकिन यह पोस्‍ट रह गई। बहुत दिन बाद ब्‍लॉगिंग में लौटा हूं, सो कुछ महत्‍वपूर्ण चूक भी रहा हूं। अनूपजी आपने मेरी बात का मान रखा। और मान ही क्‍या रखा शानदार एक लाइना चर्चा की। फिर से पुराने दिन याद हो आए।



    बीच की टिप्‍पणियों की बात छोड़ दें तो यह एक शानदार चर्चा रही। मेरा मानना है कि एक लाइना में जितने लिंक मिल जाते हैं, लगभग उतने ही पूरी पोस्‍ट में होते हैं। ऐसे में मेरे जैसे पाठक को उतने ही लेख में डबल फायदा मिल गया। :)


    आभार... एक लाइना जारी रखने का आग्रह जारी... :)

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