शुक्रवार, जून 29, 2012

मेरे जीवन की आशा बन , थोड़ी देर और बैठो तुम !

कल की चर्चा में एक कविता का जिक्र और उस पर अदाजी और अनुराधाजी की टिप्पणियों का जिक्र था। इस बारे में हुई चर्चा के लिंक खोजते हुये शालिनी माथुर का लेख व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि पढ़ने को मिला। लेख पढ़कर आशुतोष कुमार की बात दोहराने का मन हुआ-यह लेख दूसरे दस काम छोड़कर पढ़ने वाला है।

इसी पोस्ट पर एक टिप्पणी क्षमाजी की है। उससे उनके ब्लॉग सहजै रहिबा पर पहुंचा। एक कविता के अंश देखिये:
बेटियां बगावत नहीं करती
क्योकि ....
इज्ज़त की गठरी
उनका साथ नहीं छोडती
आजन्म ....

वे नाज़ुक शरीर में
मजबूत कंधे छुपाये रखती हैं
बे-वक़्त
आये तूफान में भी
खड़ी रहती हैं--चट्टान सी

बेटियां बगावत नहीं करती
क्योकि
उसकी कीमत
अंततः उनसे ही वसूली जाती है
बेटियां बगावत भले न करें लेकिन अपने खिलाफ़ होने वाली हिंसा का विरोध तो अवश्य करें। अमेरिका मे रह रहीं सुधा ओम ढींगरा जी ने एक लेख में यह बात विस्तार से समझाई है। इसमें घरेलू जीवन में महिलाओं पर होने वाली हिंसा की पड़ताल की गयी है। अंत में लेखिका का आह्वान है:
क्या आप चाहती हैं कि आप के बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति पनपे | नहीं न.. तो उठिए..जागृति का पहला कदम उठाएँ...अपने ही घर में बहू या बेटी पर किसी मर्द का हाथ उठने से पहले उसके साथ खड़ी हो जाएँ और बचाएँ अपनी भावी पीढ़ी को ग़लत संस्कारों से,जो अनजाने ही बच्चों में पड़ जाते हैं .....
रश्मि रविजा ने भी अपने एक लेख में स्त्री-पुरुष भेदभाव दूर करने के लिये गलत चीज का विरोध करने के संस्कार देने का आह्वान किया:
तो आज जरूरत है..ऐसे ही माताओं-पिताओं की जो बचपन से ही अपनी लड़कियों का ऐसे पालन-पोषण करें कि वो अपनी आवाज़ पहचानें...'ना' कहना सीखें...विरोध करना जानें तब वे अपने ऊपर किए गए पहले जुल्म का विरोध कर पाएंगीं...और किसी को ये नसीहत देने का मौका नहीं देंगी कि 'पहली बार में ही किसी अत्याचार का विरोध करना चाहिए "
प्रो.अली अपने ब्लॉग उम्मतें में विभिन्न लोककथायें सुनाते हुये उसके बारे में विस्तार से लोककथा के समय और आज के परिप्रेक्ष्य में कथाओं की व्याख्या करते चलते हैं। कल उन्होंने सांसों से दालचीनी की खुश्बू बिखेरती नायिका के बारे में बताया तो आज योद्धा की प्रेयसी का आख्यान। इसके बारे में वे बताते हैं:
यह आख्यान मसाई कबीले के एक सुन्दर और बहादुर योद्धा का हृदय जीतने के यत्न में लगी आठ युवतियों से सम्बंधित है ! वे सभी उस युवक से विवाह की इच्छुक हैं और उसकी प्रशंसा में गीतों की रचना करके उसे आकर्षित करने का प्रयास करती हैं , किन्तु उनमें से सबसे छोटी युवती की कविता अत्यन्त हृदयस्पर्शी है , अतः वह इस बहुमूल्य प्रेमी का वरण करने में सफल हो जाती है ! उसके गीत में प्रेम की उद्घोषणा तथा एक चुनौती निहित है , उसने कहा...मैं जिस योद्धा से प्रेम करती हूं / जिसके लिये मैंने अपने पिता के पशु झुण्ड से मीठे दही और दूध की व्यवस्था की है और जिसके लिये मैंने अपने पिता के चर्बीयुक्त मेढ़े रख छोड़े हैं , कि वह उनकी बलि दे , उनका सेवन करे /
आगे उस योद्धा के घायल होने और फ़िर अपने परिश्रम और पराक्रम से उसे उस नायिका द्वारा उसे स्वस्थ करने और विजय प्राप्त करने का आख्यान है। जिसे अली जी कहते हैं- एक पराजित योद्धा की प्रेयसी का विजय अभिषेक ! यहां आठ युवतियों में से एक को चुनने का कारण युवती में सुन्दरता के साथ-साथ शौर्य का होना भी एक कारण रहा होगा। इस बात को गीतकार अंसार कंबरी अपने गीत में कहते हैं:
क्या नहीं कर सकूंगा तुम्हारे लिये
शर्त ये है कि तुम कुछ कहो तो सही।

पढ़ सको तो मेरे मन की भाषा पढो़
मौन रहने से अच्छा है झुंझला पढ़ो
मैं भी दशरथ सा वरदान दूंगा मगर
युद्ध में कैकेयी से रहो तो सही।
एक प्रेयसी भी चाहती है कि उसका साथी बहादुर हो। शायरा नसीम निकहत कहती हैं:
मिलना है तो आ जीत ले मैदान में हमको
हम अपने कबीले से बगावत नहीं करते

तूफान से लड़ने का सलीका है जरूरी
हम डूबने वालों की हिमायत नहीं करते।
शौर्य के इस सिलसिले के बीच अमित श्रीवास्तव का फ़ेसबुक पर सवाल दिखा:
महिलायें व्यंग लेखन कम करती हैं , क्यों ? किसी महिला व्यंगकार का नाम बताएं | ब्लागिंग में भी महिलाओं द्वारा 'हास्य-व्यंग' पर कम लिखा जाता है | कोई विशेष कारण ??
इस पर उनकी भतीजी शिल्पी श्रीवास्तव जबाब लिखा:
I think they are generally too sarcastic for men to understand their sense of humour :)
व्यंग्य को लोग बड़ी उठापटक विधा के रूप में देखते हैं। लोगों पर व्यक्तिगत प्रहार और उपहास को भी व्यंग्य के खाते में जमाकरके इससे बिदकते हैं। परसाईजी ने कहते हैं:
यद्यपि मैं व्यंग्य विनोद लिखता हूँ, पर वास्तव में मैं बहुत दु:खी आदमी हूँ, दुःखी होकर लिखता हूँ। मैं इसलिए दुःखी हूँ कि देखो मेरे समाज का क्या हाल हो रहा है, ये सब दुःख मेरे भीतर हैं, करुणा मेरे भीतर है….। मैं बहुत संवेदनशील आदमी हूँ। इस कारण करुणा की अंतर्धारा मेरे व्यंग्य के भीतर रहती ही है। जैसे मैं विकट से विकट ट्रेजडी को व्यंग्य और विनोद के द्वारा उड़ा देता हूँ, उसी प्रकार करुणा के कारणों को भी मैं व्यंग्य की चोट से मारता हूँ या उन पर विनोद करता हूँ।
अब अगर मैं यह कहूं कि महिलायें व्यंग्य लेखन कम करती हैं क्योंकि वे कम दुखी होती हैं तो यह कैसा बयान होगा? व्यंग्य, हास्य या एक हास्यास्पद बयान। ब्लॉगिंग और फ़ेसबुक के समय में हर संवेदनशील इंसान का कवि छलकता रहता है। कविता पंक्तियां:
एक लाइन से इधर से आये
एक लाइन उधर से आये
कालजयी कविता रच जाये

वाले अंदाज में प्रस्फ़ुटित होती रहती हैं। ऐसे कविता उर्वर माहौल में वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ऐसे कवि हैं जो कि कविता में ’कम’ के पक्षधर हैं। नरश सक्सेनाजी से हुई बातचीत आप यहां पढ़ सकते हैं। उससे पूछा गया एक सवाल और उसका जबाब देखिये:
आप इतनी कम कविताएं क्यों लिखते हैं?
देखिए, मेरे लिए कविता कोई आसान चीज नहीं है, लेकिन जो आसानी से कविताएं लिख लेते हैं, मुझे उनसे ईर्ष्या भी नहीं है, क्योंकि वैसी कविताओं में मेरी रुचि नहीं है। यदि वे सब कविताएं जो लगातार आने वाले काव्य संग्रहों में छप रही है, सचमुच कविताएं हैं तो निश्चित रूप से कम लिखना मेरी अक्षमता है। कभी-कभी एक कविता को पूरा करने में मुझे कई महीने या साल भी लग जाते हैं। चंबल एक नदी का नाम... एक ऐसी ही कविता है जो मैं कई महीनों से लिख रहा हूं, लेकिन अब तक अधूरी है। कविता की प्रारंभिक पंक्तियां या उसे जुड़ा कोई आइडिया एक फ्लैश में आ जाता है, लेकिन उसे पूर्णता देने वाली पंक्तियां कई बार महीनों बाद सूझती हैं। ऐसी कविताएं अधूरी कविताएं होती हैं जो अपने पूरे होने की जद्दोजहद में पड़ी रहती हैं।
इस बीच सतीश पंचम के सफ़ेदघर ने सौ पोस्ट पर साल के हिसाब से चार सौ पोस्ट का आंकड़ा छुआ। कुछ बातें कुछ यादें बांटते हुये उन्होंने लिखा! अब लिखा तो बहुत कुछ है लेकिन ये सलाह भी दी है देखिये:
ब्लॉगिंग में उतनी ही विनम्रता रखें, उतनी ही दर्शायें जितने की आवश्यकता हो। ज्यादा विनम्र होने पर लोग कान पकड़कर इस्तेमाल भी कर लेंगे और बाद में केवल हें हें करके खींस निपोरने के सिवा और कुछ न कर पायेंगे। इस बारे में मैंने पहले भी एकाध जगह लिखा है कि हम अपने जीवन में चाहें तो निन्यानबे फीसद विनम्र रहें लेकिन एक पर्सेट का दंभ जरूर रखें क्योंकि यही एक परसेंट का दंभ आपके बाकी निन्यानबे फीसदी विनम्रता की दशा और दिशा निर्धारित करता है। इसी दंभ के चलते जिसे जहां जैसा लगे मन की कहा जा सकता है, जिसे टरकाना हो टरकाया जा सकता है और जिसे डांटना हो बेखटके वहां डांटा जा सकता है लेकिन यह डंटैती भी तभी फबती है जब बंदा / बंदी अपने दम खम पर ब्लॉगिंग करता हो न कि हीही फीफी और नेटवर्किंग फेकवर्किंग के चलते। यहां मैं उन "सदा-सर्वदा उखड़ै हैं" टाईप ब्लॉगरों की बात नहीं कर रहा, ऐसे ब्लॉगर बंदे-बंदीयों के उखड़ने-पखड़ने की लोग अब वैसे भी परवाह नहीं करते। यह एक तरह से अच्छा संकेत है कि लोग किसी की निजी खुंदक, मतिमूढ़ता, धौंस आदि को ज्यादा तवज्जो नहीं देते। जिसे जैसा मन आये लिखता है, पढ़ता है। ऐसे में क्या दबना-दुबना।
अब ये सलाह मिल गयी फ़िर क्या। करिये धांस के ब्लॉगिंग! जो होगा देखा जायेगा।

मेरी पसंद

मेरे जीवन की आशा बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !

सब आते जाते रहते हैं ,
भव नदिया में सब बहते हैं,
जीवन में अपनी पीड़ा को-
सब रोते हैं,सब कहते हैं!

मेरे गीतों की भाषा बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !

इतनी भीड़ कहाँ होती है ,
अपना दोष नहीं धोती है,
चलते फिरतों की आंखें भी-
नम होती हैं औ रोती हैं !!

मेरी प्यासी अभिलाषा बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !

होता कौन यहाँ अपना है ,
अपनापन केवल सपना है ,
नींद नहीं जाने क्यों आती?
किस आशा में फिर जगना है?

मेरे प्राणों की श्वांसें बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !!

ओमप्रकाश’अडिग’,शाहजहांपुर

और अंत में

फ़िलहाल इतना ही। बाकी फ़िर कभी। तब तक मौज से रहिये। ऊपर का कार्टून इरफ़ान का बनाया हुआ है। नीचे फ़ोटो सतीश पंचम के ब्लॉग से :

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15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर चर्चा अनूप जी .. आचे लिंक्स भी प्राप्त हुए.
    धन्यवाद.


    बधाई स्वीकार करे और आपका आभार !
    कृपया मेरे ब्लोग्स पर आपका स्वागत है . आईये और अपनी बहुमूल्य राय से हमें अनुग्रहित करे.

    कविताओ के मन से

    कहानियो के मन से

    बस यूँ ही

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  2. मिलना है तो आ जीत ले मैदान में हमको
    हम अपने कबीले से बगावत नहीं करते

    बढ़िया अंदाज़ ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. फेसबुक वाले छोड़ कर सभी लिंक देख पाये ! लिंक देखते हुए सहजै रहिबा तक भी पहुंचे , बेहतर कवितायें पर प्रतिक्रियायें ?

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  4. सुधा ओम धींगरा जी ने कमाल का लिखा है..
    लेखनी में एक तबके को बदलने की शक्ति दिखाई सी...
    बधाई स्वीकारें..

    आभार..
    गूंज झाझरिया
    lekhikagunj.blogspot.com

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  5. करिए धाँस के ब्लॉग्गिंग :)

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  6. बेहद मेहनत करते हेँ आप ...शुक्रिया प्रतिक्रियाओं पर अंदाजे बयान खूब है ...

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  7. वाकई बहुत मेहनत और धैर्य का काम है जी, इतना कुछ सहेजना। चिट्ठाचर्चा के पुराने दिनों वाला एहसास पुन: जीवंत हो उठा है :)

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  8. बाप रे..! बहुत मेहनत करते हैं। हम तो उसी एक लेख में उलझ कर रह गये।

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  9. अनुप जी बहुत ही अच्‍छी चर्चा है, शालिनी माथुर का आलेख भी आपके कारण ही पढ़ने को मिला। आभार।

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  10. upar ka charcha thora thora upar se nikla.....lekin niche aate aate 'bamchak' ho gaya.....sachhi me bahute mihnat aur dhairya ka kam hai chitha charcha......bahut kuch naya mil raha indino.......

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  11. अनूप जी,
    आज एक ठो बात कहेंगे हम, वईसे तो हम, कौनो बहुते गियानी-धेयानी नहीं हूँ, घींच-तीर के मेट्रिक फेल हूँ.. , तइयो में 'चर्चा' शब्द का जोन भी शाब्दिक अर्थ, हमरे भेजे में हमरी टीचर ने भेजा था, ईहाँ पर सुपट वही देखने को मिलता है...बुझाता है, हर दिन ब्लॉग-जगत का दस-पंद्रह किलोमीटर आप घूमिये आते हैं...तभे तो दू-चार किलोमीटर का चर्चा कर पाते हैं..!!
    ईहाँ आज ई भी पढ़ने को मिला कि महिलाएं व्यंग-वाण बहुत कम छोड़तीं हैं, तो बात ई है कि हम तो छोड़ देवें, झेले वाला चाहि...
    वैसे ई बतावल जावे..चिटठा-चर्चा करे में आपहूँ कौनो पी.एच.डी. ऊ.एच.डी. कीये हैं का ???

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  12. आप महान हैं | इतना बवाल कैसे समेटते हैं |

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