मंगलवार, फ़रवरी 28, 2006

कुछ चिट्ठे लाया हूँ

नोश फरमाइये गाज़ियाबाद के प्रदीप की प्रस्तुति जलेबी बर्गर, भाषा खिचड़ी है पर प्रदीप से उम्मीद है कि वे हिन्दी ब्लॉग में पूर्णतः अंग्रेज़ी पोस्ट करने से बाज़ आयेंगे। साथ ही सुनें लखनउ की पूनम मिश्र के फलसफ़े, विषय व्यक्तिगत हैं और हिज्जे कुछ गड़बड़ पर चिट्ठा है पठनीय।

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2 टिप्‍पणियां:

  1. भाई आपका ये चिट्ठा छ्पाई वाले नारद के लिए संपादकी का काम कर सकता है। अभी तक मैंने उसमें कुछ चिट्ठाकारी के बारे में लिखना शुरू नहीं किया ताकि आम लोग समझ सकें कि ये आखिर हिन्दी में छ्पा हुआ पुष्ठ है क्या, किस लिए है, किनके लिए है आदि। अगर आप थोड़ा विस्तार से चिट्ठों के बारे में लिखे तो बहुत अच्छा होगा। धन्यवाद।

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  2. देबाशीषजी,
    आपने मेरा चिट्ठा देखा और उसपर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की इसके लिये आपको धन्यवाद.हिन्दी मे चिट्ठा लिखने का यह मेरा पहला प्रयास है .कई हिन्दी भाषियो की तरह हिन्दी मे लिखना कई सालो से छूट गया है.पर चिट्ठा लिखने मे काफी आनन्द आया और आपकी टिप्पणी से प्रोत्साहन मिला.पुनः धन्यवाद.
    पूनम

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