मंगलवार, नवंबर 20, 2007

खेत खायें गदहा, बांधें जायें कूकुर!



पाण्डेयजी कल कार की बात किये थे। आज साइकिल पर उतर आये। यही हो रहा है अपने देश में। बात खेत की करेंगे अगले क्षण खलिहान में मिलेंगे। अनीताजी को कौनौ दोस्त नहीं मिला तो किताबों से बोलीं-मुझसे दोस्ती करोगी। लुच्चई करें
आलोक पुराणिक और डंके की चोट कहें भी लेकिन भाई लोग हमको बता देते हैं वही जो आलोक पुराणिक कहते हैं। इसे कहते हैं खेत खायें गदहा, बांधें जायें कूकुर!

कहां तक सुनायें यार! ये देखो आज की परसादी।

१. कहां से कसवाये हो जी! पांड़ेजी की दुकान से। ऊहां सब कसता है, फोटो सहित।
२. थर्टी परसेंट बनाम हंड्रेड परसेंट: जोड़ लेव दोनों मिलाकर एक सौ तीस हो गया।
३. ब्लॉग समाज के सदस्यों से अपील- सचिन को रास्ता दिखाये: इंडिया में मुफ़्त के रास्ते दिखाने वाले बहुत मिलते हैं।
४.
लाल झंडे का असली रंग
:...हे प्रभु जी, बचालो !!!!!
५.मधुमेह, विस्तृत रपट और नये अनुभव : मधुमेही होइये आइये फ़िर आपका इलाज करें।
६.कादम्बिनी में भड़ास :अभी तक बची है!
७.नैनीताल पहली बार :सन ८२ में याद अभी तक है।
८.तो :आप किताबों से दोस्ती करना चाहती हैं। करिये!
९. सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं.....:हर हंगामेबाज यही कहता है।
१०. ब्लाग पर त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाने वालों का आभार:लेकिन अब मैं उनको ठीक कर दूंगा।
११.उसे सामने लाओ ज़रा :इधर कबाड़खाने में।

आज की टिप्पणी:
1.बहुत बढ़िया है जी। आलोक पुराणिक का सिर्फ चश्मा नहीं, वो तो समूचे ही लुच्चे हैं जी।
सही पकड़ा है जी।
इसे रेगुलर क्यों नहीं करतेजी।
कम से कम साप्ताहिक तो कर ही दीजियेजी। आलोक पुराणिक

2.

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2 टिप्‍पणियां:

  1. अब का कहें जी.आज भोर में उठने में तनि देरी हुई गयी और हमार नाम ही नदारद हुई गवा इस पोस्टुवा से.हे हरि अब का करी.

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