गुरुवार, मई 22, 2008

फ़ूला गुब्बारा, लड़ियाती बकरी और गुब्बारे में चुभा पिन

वो क्या है जी कि दुनिया बड़ी जालिम है। किसी का सुख देखा नहीं जाता।

बोधिसत्व भैया खुले मन से डंके की चोट पर कह दिये-
यहाँ किसी साहित्यकार ब्लॉगर का नाम लेकर मैं किसी का दिल नहीं दुखाना चाहता लेकिन जितना तीन ब्लॉगर यानी फुरसतिया, उड़नतश्तरी और शिव कुमार मिश्र का ब्लॉग पढ़ा जाता है उतने ही पाठक संख्या में सारे साहित्यिक ब्लॉगर सिमट जाते हैं....
पढ़ते ही मन खुश हो गया और दिल जो था बाग-बाग हो गया।

लेकिन जैसे ही दिल बाग-बाग हुआ तैसे ही लगा कि भाई लोग हमारी खुशी का गुब्बारा देर तक सलामत नहीं रहने देंगे। सुई चुभो देंगे। इसीलिये हमने टिपियाया भी-
बड़ा लफ़ड़े वाली बात कह दी। :)

अपनी बात पर जोर देने के लिये दो बार टिपियाया।

हम बार-बार उचक-उचक के इस पोस्ट को देखते भी रहे कि और कौन समर्थन करता है इस बात का। जहां ज्ञानजी की टिप्पणी देखी
अच्छी बहस है। और सत्य भी।
बाकी "पटखनी खाने वाले" तो शब्द का व्यंजन बना रहे हैं।
ब्लॉग शब्द की पाकशाला नहीं, शब्द की लिंकशाला है - मेखला या नेटवर्क!
हमें लगा कि अब तो प्रमोदजी पटकनी खाये मुंबई में पड़े हैं, धूल झाड़कर खड़े होंगे और धूल चटाने वाला काम करेंगे। उन्होंने हमारे विश्वास की रक्षा की और अपनी बकरी -वकरी लेकर चढाई कर दी। दनादन गोला बरसाते हुये कहते भये-
ज़रा सा वक़्त निकले तो ये कर लें वो कर लें के मोहक अरमानों का मुरझाना हो जा रहा है, टाइम का निकलना नहीं हो पा रहा. वह लोग धन्‍य हैं जो नौकरियां कर रहे हैं. ऊपर से हंसने का टाइम भी निकाल ले रहे हैं. फिर वह लोग तो और ज़्यादा धन्‍य हैं जो न केवल हंसते हुए नौकरियां कर रहे हैं, बल्कि हंसते-हंसते पोस्‍ट भी ठेल देने का निकाल ले रहे हैं. टाइम. उसके बावजूद भी हंस ले रहे हैं? बहुत बार तो हास्‍यास्‍पद पोस्‍ट ठेलकर भी बेहूदगी के हौज में पानी उलीचते हें-हें कर ले जा रहे हैं. और टिप्‍पणियों पर टिप्‍पणी करने का भी टाइम निकाल ले रहे हैं!


अपनी बात खतम करते-करते प्रमोदजी गंभीर से हो गये और तउवा गये भाई। कहने लगे-
उसकी हिंसा, उसका बाज़ार और अपनी हार नहीं दिखती. चार बेचारे ब्‍लॉगरों की एक छोटी दुनिया और उस दुनिया में अपनी अभिव्‍यक्तियों की अकुलाहट के प्रति ज़रा विनम्रता दीख जाये वह तो नहीं ही होता, अपना दंभी चिरकुट दुर्व्‍यवहार भी नहीं दिखता?


प्रमोदजी की बात का उन्हीं की भाषा में त्वरित जबाब भानी ही दे सकती है। भानी ने लिखा-
कररररररकलललववसकररलरलरररररपरहपपरपरहवरपरपवपवमपमवपल लनलल वपप पपप भूरकुसाएगें हाँ हाँ. हाँहाँ....


बोधिसत्व तो ऐसा सिटपिटा गये कि अपने को आत्मसाक्षात्कार सा हो गया उनको। उनको उजबकबोध हो गया-
लड़ि‍यायी बकरी और लड़ियाये बकरे साहित्य के साथ ब्लॉग को भी चरते जा रहे हैं....आज कोई भी कवि और लेखक बन जाए सहज संभाव्य है...मेरे जैसा उजबक आज हिंदी का कवि है...इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा...


लेकिन प्रत्यक्षाजी को इसमें भी चुहल सूझी और वे कहने लगीं-
आपके पोस्ट को पढ़ कर इच्छा बलवती हो रही है कि कुछ चिरकुटई हम भी कर दें ।
और उन्होंने जो कहा वो कर दिखाया। अरे भाई क्या जरूरत थी इत्ती सीधी बात कहने की कि वह सुई की तरह हमारे खुशी के गुब्बारे की हवा निकाल दे। तमाम लोगों ने जिनमें ज्ञानजी और प्रियंकरजी भी शामिल हैं इधर भी हां-हां कह दिया। ऐसे होता है कहीं जी? बताइये भला।

शिवकुमारजी तो ई सब देखकर ऐसा गड़बड़ा गये कि बेचारे कविता करने लगे। उनकी कवितायी देखकर ऐसा लगा कि ब्लाग-कुंये में भांग पड़ गयी और जिसे देखो वही कविता करने लगा। हालत ऐसी हो गयी जैसे भरे सब्जी बाजार में शिवजी ने अपना वाहन दौड़ा दिया हो और सारे ठेलों से कविता-सब्जी उलट-पुलट कर ब्लाग सड़क पर बिखर रही हो। इस कविता-भांग के नशे ने ज्ञानजी जैसे प्रबुद्ध आत्मा तक पर अपना असर डाला और वे अपनी एच.टी.एम.एल. -फ़च.टी.एम.एल. छोड़छाड़ कर बोले तो बिसरा कर कवितामल्ल बन गये।

ये जो अपने प्रियंकरजी कोलकत्ता वाले हैं आज अपने मोहल्ले वाले प्रिय अविनाश से बेहद अपनेपन से पूछते पाये गये
अविनाश तुम सनक गए हो क्या ? या चौबीसों घंटे गरम तवे पर बैठे रहते हो ?


अविनाश भी हाजिर जबाब हैं सो उतने ही प्रेम से पलट-जबाब दिया
प्रियंकरजी, ये आपकी मेरे बारे में कोई नयी धारणा तो है नहीं। आप अपनी बनायी हुई धारणा को बार-बार कह कर क्‍यों इत्‍मीनान होना चाहते हैं। मैं कोई साहित्‍यकार नहीं हूं - न कवियों-चिंतकों की जमात में मुझे जगह पानी है। आपलोग रहिए साहित्‍यकार-कवि-चिंतक - मैं तो वही लिखूंगा, करूंगा, जो मेरे चित्त को भाएगा। किसी से अपने मिज़ाज का सर्टिफिकेट लेने की ज़रूरत नहीं।


सही बात है। जो तमाम लोगों को खुद तरह-तरह के सर्टिफ़िकेट बांटता रहता हो उसको भला किसी के आगे किसी सर्टिफ़िकेट के लिये क्योंकर हाथ फ़ैलाना पड़ेगा? हां अलबत्ता प्रियंकर की बात सोचता हूं तो यह लगता है कि उनको यह शायद भरोसा ही नहीं है कि वे अपने ब्लाग पर कुछ लिखेंगे तो लोग पढ़ेंगे। वे बहस और नोक-झोंक को मित्रता का आवश्यक तत्व मानते हैं सो इसे भी , नोक और सिर्फ़ नोक को भी , नोक-झोंक मानकर फ़िर कोई धांसू सी प्रतिक्रिया पेश करेंगे।


एकदम ताजा मतलब टटकी उपमा अभी-अभी दिमाग में बिना मे आई कम इन कहे घुस गयी। वह यह कि प्रियंकरजी के मोहल्ले में लेख और प्रतिक्रियायें देखकर ऐसा लगता है जैसे गले में कालर माइक लगा होने के बावजूद अपनी बात कहने के लिये कोई आदतन कोने में रखे माइक की तरफ़ लपके। :) प्रिय प्रियंकर जी को हम उनके इस व्यवहार के लिये टोंक इसलिये रहे हैं क्योंकि हम उनको अभागा नहीं देखना चाहते। ( वह व्यक्ति बड़ा अभागा होता है जिसे कोई टोंकने वाला नहीं होता है।)

बकिया वे खुदै समझदार हैं। अरे कोई बात कहनी है तो अपने ब्लाग पर लिखिये जी। हम भी कुछ फ़ड़कती हुयी से टिप्पणी करें। कुछ नोक-झोंक करें। ई का कि देख रहे हैं टुकुर-टुकुर कि कोई आपके लिखे को साजिस बता रहा है, कोई मोटी बुद्धि कोई कुछ-कोई कुछ! कितना झेलवाओगी जी ई नोक-झोंक के नाम पर। :)


बस अब बहुत हो गयी ब्लागगिरी अब बंदा कुछ एकलाइना पेश करेगा। ये अगड़म-बगडम आलोक पुराणिक की खास पेशकश पर पेश किया जा रहा है।

1. देश बिक रहा है देश के भीतर: और आप बाहर खड़े दाम पता कर रहे हो?

2.न्याय जब पर्यटन करता ह : तो जजों को सूचना के अधिकार से बाहर रख देता है।

3.साँसों की माला पे सिमरूँ मैं पी का नाम : कृपया व्यवधान न पैदा करें।

4.अपनी असली पहचान खोते जाते : और फूल कर कुप्पा हो जाते हैं।

5.हमारे शहर में ३० हजार मनोरोगी! : आप गिनने वालों में हैं या गिनती में। खुलासा करें।

6.टिप्पणी करने वालों का उत्साह बढ़ाए : वर्ना वे नियमित ब्लागर बन जायेंगे।

7. डर-डर के मरो: हम तो पढ़ते ही मर गये। अब डर रहे हैं कहीं यह सच तो नहीं।

8. हॉलीवुड जाएगा मुन्नाभाई": उसको जेल मत भेजो। वहा जाना ज्यादा कड़ी सजा है।

9.थोड़ा HTML तो जानना होगा ब्लॉगिंग के लिए : ताकि फ़ुरसतिया को साइकिल के हैंडल पर बैठा के झुला सकें दिन भर!

10. आलू आन मिलो : तेरे वियोग में बोरा आंसू बहा रहा है।

11.रो रही है वो अहिल्या, राम आएंगे कहां से...? : सब तरफ़ तो भावनाऒं और आत्मोद्गार का जाम लगा है।

12.शीर्षक दो :वर्ना हम अगली पोस्ट लिख देंगे।

13. बाजार रेट से ज्यादा देंगें: जल्दी करो वर्ना कबाड़ के भाव भी न जाओगे।

14. निश्चय :ही परेशानियों की जड़ है।

15.हिन्दी ही हिन्दुस्तान को जोड सकती है!! :फ़ेवीकोल के मजबूत जोड़ की तरह।

16.तुलसी अगर आज तुम होते.... : तो शिवकुमार मिसिर की इस पोस्ट पर टिपिया रहे होते।

17.पुलिसिया हेलीकाप्टर : का उ़ड़नश्तरी द्वारा अपहरण।


18.आओ मिलकर कीचड़ उछालें : मजा आयेगा।

19.कथा फैमिली कोर्ट तक पहुँचने के पहले की : कोर्ट से निकल के दिखाये तो जाने ये कथा।

20.नंगी आंखों से नहीं दिखेगी यह सचाई : आंखो में मोहल्ले का सुरमा लगाना पड़ेगा जी।


21. हर तीसरा पुरूष घरेलू हिंसा का शिकार: बाकी दो बेचारों का क्या हाल है?

22. धमाका,आतंकवाद और सरकार: के संयोजक हैं काकेश!

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14 टिप्‍पणियां:

  1. कोई बात नहीं। आराम से करिये।स इंतजार कल्लेंगे।

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  2. कोई बात नहीं। आराम से करिये।स इंतजार कल्लेंगे।

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  3. हम क्या कहें, आप कह रहें तो सुन रहे हैं बस.
    आपका कालर माईक तो दिख ही नहीं रहा. हां, भौंपू सुन्दर लगाये हो.

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  4. महा दर्शन-सब एक जगह! आभार. :)

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  5. हम तो धमाका और आतंकवाद तलाशते रहे मिला ही नहीं. खैर जो मिला वह भी धमाकेदार ही था.

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  6. चिट्ठाचर्चा!! क्या बात है!

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  7. शानदार है, चिट्ठाचर्चा!

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  8. आपका क्या कहना है?
    कहना क्या है जी, बकरियों के अगले रेवड़ की प्रतीक्षा के सिवा कर भी क्या सकते हैं, हम दोयम दर्जे के मनई।

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  9. इतने ब्लोग्स पढ़ने का वक्त कैसे निकाल लेते हैं? वन लाइनर्स आर टू गुड अब ये मत कहिएयेगा थ्री गुड क्युं नहीं?
    यहां तो गुब्बारे ही गुब्बारे हैं कोई कितने पिन मार लेगा।

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  10. बहुत अच्छा लग रहा है..अखाड़े के इर्द गिर्द लोगबाग इकट्ठा होने लगे है .....आप भी मज़ा लीजिये हम तो ले ही रहे है...अच्छा लिखा है आपने।

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  11. "हिन्दी ही हिन्दुस्तान को जोड सकती है!! :फ़ेवीकोल के मजबूत जोड़ की तरह।"

    यही तो परेशानी है. हर कोई फेविकोल से वे चीजें जोडना चाहता है जो अन्य तरीके से जुडती है!!!

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  12. बहुत अच्छी जानकारी दे रहें हैं आप. जारी रखियेगा.

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