सोमवार, सितंबर 13, 2010

सोमवार (१३.०९.२०१०) की चर्चा

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार सोमवार की चर्चा के साथ एक बार फिर हाज़िर हूं।

downloadसरोकार पर arun c roy ने लगा रखी है सीढियां!  ये बैसाखी नहीं है। यह वो माध्यम है जिस के द्वारा कवि कहता है

सीढ़ियों की पीठ पर
चढ़ कर
पहुँच जाते हैं लोग
कहाँ से कहाँ

गुलज़ार साहब फरमा गए हैं कि वहाँ तक सीढी नहीं रास्ते पहुँचते हैं...कई मोड़ों से गुजरकर!! यह कवि भी कुछ इसी तरह के भाव प्रस्तुत करते हुए कहता है,

धैर्य का
दूसरा नाम होती हैं
सीढियां
जो मंजिल तक तो
पहुचाती हैं
लेकिन
हिस्सा नहीं बन पाती
मंजिल तक पहुँचने की ख़ुशी का

अरुण जी बहुत सटीक बात रख दी है आपने सीढियो मे माध्यम से। आप एक समर्थ सर्जक हैं। आपके संकल्‍प और चयन की क्षमता से आपकी रचनाधर्मिता ओत-प्रोत है।

My Photoक्वचिदन्यतोअपि..........! पर Arvind Mishra जी ने एक बड़ा ही सामयिक प्रश्‍न खड़ा किया है। पूछते हैं ये क्या हुआ ? कब हुआ ?? जब हुआ तब हुआ ?? कुछ न पूछो! अपनी बात को रखते हुए कहते हैं, “कितने नए ब्लॉगर आये और टिप्पणी रूपी  प्रोत्साहन के अभाव में दम तोड़ गए -कोई मर्सिया भी नहीं हुआ!” ये एक बात हुई। दूसरी तरफ़ यह भी कहते हैं कि, “लोग या तो ब्लॉग पढना कम कर रहे हैं या फिर ईमानदारी से टिप्पणियाँ न देकर पक्षपात कर रहे हैं!”

अरविंद जी कि इन बातों पर ज़रा ग़ौर कीजिए,

“जीवन में कुछ संतुलन और उत्तरदायित्व बोध तो रखना ही होगा नहीं तो यह जीवन कितना निरर्थक ,निस्तेज सा ही नहीं हो जाएगा ...?”

अरविन्द जी की कुछ बातों से असहमति की गुंजाइश न के बराबर है, जैसे, “आपसे  कोई ब्लाग खुद को पूरा पढवा ले ..तब वह टिप्पणी डिजर्व कर जाता है!”

ब्लॉग विचार विमर्श के माध्यम हैं ,चर्चा परिचर्चा के फोरम हैं -यह ब्लागों  की मूल प्रकृति है -यदि हम इस मुक्त चिंतन प्रवाह और उसकी विचार सरणियों को बंद कर रहे हैं तो समझिये सरस्वती का अपमान सा कुछ कर रहे हैं - सिर धुन गिरा लाग पछताना जैसा ही ...!

अरविंद जी से सहमत होते हुए उनको उद्धृत करते हुए इसे मैं अपनी बात भी बताता हूं और आपसे भी जानना चाहता हूं कि आपके विचार क्या हैं, इस मामले में

“ब्लॉग पर लिखते जाना और टिप्पणी का आप्शन बंद कर देना किसी तानाशाही से कम नहीं है ..संवाद का गला घोटना है ...उस देश में जहाँ संवादों का एक भरा पूरा इतिहास पुराण रहा है ...गिनाऊ क्या ? परशुराम -लक्ष्मण संवाद ,अंगद -रावण संवाद ,हनुमान रावण संवाद ----संवादों पर पहरा मत लगाओ हे  मित्रों .....इतिहास को जानो पहचानो ......”

वेल, एक और संवाद मैं जोड़ देता हूं, चिठियाना-टिपियाना संवाद!

(इस पर पहरा क्यों???????)

 

My Photoबात को यहीं से आगे बढाते हुए उन्हें, जिनकी बातों ने अरविंद जी को पोस्ट लिखने को प्रेरित किया, एक शे’र पेश कर रहा हूँ।

कुछ अपने गिरेबां में भी झांक कर देखो
और अपनी गलतियों को तोलो कभी कभी

ये मेरे शे’र नहीं हैं, पर मेरे भी हैं। कुछ शे’र जब बहुत अच्छा लगते हैं तो सबके हो जाते हैं। अब देखिए ना Mahendra's Blog पर Mahendra Arya की पूरी ग़ज़ल अंतर की ग्रंथियों को खोलो कभी कभी! ही इतनी अच्छी है कि इसे अपनी ग़ज़ल कहने का दिल कर रहा है। ग़ज़ल पर आने के पहले उनकी बात पर आता हूं। कल किसी पोस्ट पर पढा था " मिच्छामी दुक्कड़म "! इसका अर्थ तब मुझे नहीं पता था। महेन्द्र जी इसका अर्थ बताते हुए कहते हैं,

“जैन समाज में एक बहुत अच्छी प्रथा है . वर्ष में एक दिन सभी एक दूसरे से मिल कर हाथ जोड़ कर कहते हैं - " मिच्छामी दुक्कड़म " . इस का अर्थ होता है की इस पूरे वर्ष में मेरे किसी भी कार्य या वचन से जाने या अनजाने रूप से आपका दिल दुख हो तो मुझे क्षमा करें . इसी भावना पर आधारित है मेरी ये नयी ग़जल .”

कितनी अच्छी प्रथा है। आज मैं भी आप सबों से कहता हूं, " मिच्छामी दुक्कड़म "   पर एक हम हैं, कि साल भर सबका दिल दुखाने का सुख लूटते रहते हैं। और ऐसे में सबसे आह्वान है महेन्द्र जी के स्वर में,

मन को उलट पलट के टटोलो कभी कभी
अंतर की ग्रंथियों को खोलो कभी कभी
कुछ घाव छोटे छोटे नासूर बन न जाये
मरहम लगाके प्यार की धो लो कभी कभी

महेन्द्र जी उम्दा शब्द चयन, बिलकुल पानी की धार की तरह बह रही है आपकी ग़ज़ल!

बातों पे खाक डालो जो चुभ गयी थी दिल में
कुछ जायका बदल के बोलो कभी कभी

पर यहां तो कई हैं जो कहते कि अब तुम हमसे न बोलो अभी-अभी।

महेन्द्र जी का एक शे’र

मन भर ही जाए जो गर अंतर की वेदना से
कहीं बैठ कर अकेले रो लो कभी कभी

महेन्द्र जी आपकी ये ग़ज़ल सादगी के अंदाज में ताना मारती है.......  और साथ ही कभी अनुरोध और विनती भी करती है तो कभी सांत्‍वना के स्‍वर भी। आप की इस ग़ज़ल में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं। अच्छी ग़ज़ल, जो दिल के साथ-साथ दिमाग़ में भी जगह बनाती है।

My Photo१४ सितंबर हमारे देश में हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर को समर्पित एक पोस्ट हृदय पुष्प पर राकेश कौशिक प्रस्तुत कर रहे हैं बिंदी!

स्वर-व्यंजन ही नहीं मात्र यह भारत माँ की बिंदी है।
तोड़ी कितनी बार बिखेरी फिर भी अब तक जिंदी है।।
मातृभूमि नीचे कर आँखें पीट रही है अपना मांथा।
लगता है हो गई बाबरी देख-देख अपनों की भाषा।
हिमगिर भी गंभीर हो गया चिंतित है कुछ बोल न पाता।
देख रहा टकटकी लगाए खंडित होती अपनी आशा।
गुमसुम सरिता का जल कहता मुझको भी अब मौन सुहाता।
निज भाषा  को मान नही तो कैसे गाऊं कल-कल गाथा।

वाकई लाजवाब!!!! पूरा इतिहास याद दिला दिया अपने तो! शब्दों का चयन और भाषा सब कुछ बहुत अच्छा लगा और सर्वोपरि तो देश भक्ति और भाषा भक्ति की भावना!!

मेरा फोटोउच्चारण पर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 700 वे पुष्प समर्पित करते हुए कहते हैं “700 वाँ पुष्प” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)!

“भारत माँ के मधुर रक्त को,
कौन राक्षस चाट रहा?”

आज देश में उथल-पुथल क्यों,
क्यों हैं भारतवासी आरत?
कहाँ खो गया रामराज्य,
और गाँधी के सपनों का भारत?
आओ मिलकर आज विचारें,
कैसी यह मजबूरी है?
शान्ति वाटिका के सुमनों के,
उर में कैसी दूरी है?
क्यों भारत में बन्धु-बन्धु के,
लहू का आज बना प्यासा?
कहाँ खो गयी कर्णधार की,
मधु रस में भीगी भाषा?

कविता विचारोतेजक और आंतरिक करूणा से भरी है और हृदय फलक पर गहरी छाप छोड़ती है।

मेरा फोटोये अद्भुत है। अनोखा है। जो रचना रवीन्द्र पर रचना दीक्षित प्रस्तुत कर रही हैं। शीर्षक मिलन बिल्कुल सटीक है, क्योंकि इस ऐंग्लो-हिन्दी कविता में हिन्दी और अंग्रेज़ी का बहुत सुंदर मिलन प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

ढूंढा तुझे बहुत, ऑंखें हुई न चार

बुझ गये मन के दीप,

मन मंदिर भी हुआ char..

क्या क्या विघ्न पार करके

अब पहुंची हूँ तेरे par .........

मेरे मन की डोर आ लगी है

आज तेरे door .....से

मिल गया है संकेत मुझे

कुछ मेरी ओर से कुछ तेरी ore....से

आप एक समर्थ सर्जक हैं। सुंदर प्रयोग.. भाषा की सीमा से परे जाकर अच्छी कविता!

आखर कलश पर नरेन्द्र व्यास प्रस्तुत कर रहे हैं नासिरा शर्मा की कहानी- हथेली में पोखर!

यहाँ से वहाँ तक मकानों के जंगल फैले हुए थे। जो घने सायेदार पुराने दरख्त थे, वे कॉलोनी के नक्शे ने पहले ही काटकर खत्म कर दिए थे। हल्की धूप के बादल घरों को घेरे रहते, जिसमें रेत और सीमेंट के कण मिले होते। बाजार दूर था। मजदूरों की जरूरत के मुताबिक जो चाय की झुग्गी ओर इकलौता ढाबा वजूद में आया था, उसका अब कोई निशान बाकी नहीं रह गया था। लोगों ने बसना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे सारे घर बस गए थे। चहल-पहल ने माहौल बदल दिया था। मिलना-मिलाना भी शुरू हो गया और कुछ दूरअंदेश लोगों ने मिलकर एक कमेटी भी बना ली थी, ताकि बाकी बची सहूलियतों की प्राप्ति में आसानी हो।

आकाश में मूसलाधार बारिश हो रही थी, जो पोखर में गिरकर बताशे फोड रही थी। घर के कच्चे आँगन में चुसनी आम से भरी बालटी के सामने काजल व केसर आम चूस रहे थे। घर भरा है। माँ-पिताजी, चाचा-चाची, दादा-दादी और उसकी दोनो बहनें...अतीत और वर्तमान गड्डमड्ड हो चुका था। वह एक साथ बच्चा और मर्द दोनों की शक्ल में नजर आ रहा था। गाँव का वह घर कभी शहर जैसा लगता और शहर का घर कभी गाँव जैसा। सुख की अनुभूति से कैलाश के रोम-रोम में आराम की कैफियत भरदी थी। उसके हाथों में फैलाव अब दोनों छोरों को छू रहे थे।

इस कहानी पर राजेश जी का कहना है नासिरा जी ने बहुत सहजता से पानी की गहराती समस्‍या और गांव और शहर के बीच फैलती खाई की तरफ इशारा कर दिया है। वे कहानी के अंत में हमें ऐसे मोड़ पर छोड़ देती हैं कि हमें खुद तय करना है कि आखिर कैलाश ने निर्णय क्‍या किया होगा। जब हम तय करेंगे तो उसमें हमारा सोच भी होगा ही। कहानी की सफलता इसमें ही है।

मेरा फोटो''कौन कहता है कि आसमाँ में छेद हो नहीं सकता..'' ये कहना है मसि-कागद पर दीपक 'मशाल' का। कहते हैं आदमी की तरह चलता कुत्ता और तुम्हें मेरी याद भी नहीं आती.. हुँह..----------------->>>दीपक मशाल। इस शीर्षक से आपको तो पता चल ही गया ही होगा कि इस पोस्ट में दो बाते हैं। एक है आदमी की तरह चलता कुत्ता है। ये ५ मिनट ४२ सेकेंड का विडिओ है। आप ज़रूर देखें, बांध कर रख देता है यह। कुदरत का अद्भुत करिश्मा।

और दूसरा है एक कविता।

उस याद की बिल्लौरी आँखें

हो जातीं उदास

और मुझे आता कुछ तरस सा

उसके हाल पर, बेचारगी पर

तब ताज़ी हवा के नाम पर खोल देता मैं खिड़कियाँ

खोल देता दरवाज़े सारे

इस पोस्ट पर वीणा जी कहती हैं बहुत सुंदर कविता है और वीडियो भी। हिम्मत नहीं हारने वालों की ही जीत होती है...!!

मेरा फोटोपरिकल्पना पर रवीन्द्र प्रभात बता रहें हैं प्रेम तकलीफ है .....पर आदमी बनने के लिए जरुरी है तकलीफ से गुजरना ....! कहते हैं

शुरू की जानी चाहिए मृत्यु से
जीवन की बात
समझना चाहिए
ज़िंदगी को एक छोटा सा सफ़र
बगैर भ्रम को पाले हुए जीना हो तो.....

आखिरी मुलाक़ात के साथ दे गयी थी मुझे
भावनाओं की पोटली में बांधकर , कि-
" बाबू !
प्रेम तकलीफ है .....पर आदमी बनने के लिए
जरुरी है तकलीफ से गुजरना ....!"

यह चकित करती प्रेम कविता है। यह प्रेम ठेठ जमीनी अंदाज में हैं भावावेग से भरी कविता। बहुत सारी दिक्‍कतों के बीच यह प्रेम ही है जो रोशनी बनकर उम्‍मीद की राह बनाता है।

My Photoभाषा,शिक्षा और रोज़गार पर शिक्षामित्र कहते हैं हिन्दी का पाया आज भी मजबूत! कहते हैं अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार के बहाने राजभाषा हिन्दी को उखाड़ने की तमाम कोशिशों के बावजूद हिन्दी आज भी समाज में पूरी मजबूती के साथ ख़ड़ी है। स्कूलों की शुरुआती प़ढ़ाई से लेकर उच्चतम स्तर की व्यावसायिक प़ढ़ाई तक में अंग्रेजी का बोलबाला बनाए रखने के सारे हथकंडे भी जनभाषा हिन्दी को नहीं डिगा सके हैं। आज भी हिन्दी देश की सबसे ब़ड़ी संपर्क भाषा है।

ये तथ्य "नईदुनिया" द्वारा हिन्दी दिवस के मौके पर कराए गए विशेष सर्वे में सामने आए हैं। राजधानी दिल्ली सहित हिन्दी भाषी आठ राज्यों में किए गए इस सर्वे के नतीजे बताते हैं कि सिर्फ ३४ प्रतिशत लोग ही मानते हैं कि हिन्दी की हैसियत कम हो रही है। यह भी राय सामने आई कि हिन्दी दिवस या हिन्दी पखवाड़ा जैसे आयोजन हिन्दी के प्रचार प्रसार में मददगार साबित होते हैं।

बहुत अच्छा आलेख है यह। हर वर्ष हिंदी दिवस के अवसर पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करके सरकारी विभा़ग अपने को भाषा और संचार की मुख्य धारा से जोड़ता है। सरकारी संस्थाओं का ज्यों-ज्यों आम जनता से संपर्क बढ़ता जाएगा त्यों-त्यों उन पर हिंदी का दबाव भी बढ़ता जाएगा। जैसे-जैसे आम जनता की पहुंच प्रशासन के गलियारों में बनती जाएगी हिंदी के लिए अपने आप जगह बनती जाएगी। हिंदी क्षेत्र पर अगर बाजार का दबाव है तो बाजार पर भी हिंदी की जबर्दस्त दबाव है। आज बाजार हिंदी की अनदेखी कर ही नहीं सकता।

अनूप जी ने एक जगह कहा था अपनी पोस्ट अगर लगे कि चर्चा में शामिल किया जाए तो उसकी भी चर्चा करनी चाहिए। इस सप्ताह हमने दो पोस्टें डाली है।

(१) मनोज पर फ़ुरसत में … अमृता प्रीतम जी की आत्मकथा “अक्षरों के साये”

(२) राजभाषा हिन्दी पर साहित्यकार - दुष्यंत कुमार

 

बस। अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे।

 

चलते-चलते आप सबों से कहता हूं, " मिच्छामी दुक्कड़म "! 

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36 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया रही मनोज कुमार जी की सोमवारी चिट्ठा चर्चा!
    --
    उच्चारण को सम्मिलित करने के लिए आभार!

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  2. विश्लेषण के साथ अच्छी चर्चा ,आभार

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  3. मनोज जी इस विषय को आपने यहाँ भी उठा कर एक सार्थक बहस का अनुमोदन किया है -आभारी हूँ!

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  4. कलरफ़ुल बोले तो रंगबिरंगी चर्चा।

    शास्त्रीजी ने भारतमां के मधुर रक्त की बात लिखी। रक्त मधुर है यह कैसे पता चल जाता है कवि को!

    अपनी पोस्ट का जिक्र करके भला काम किया।

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  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

    राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश कि शीघ्र उन्नत्ति के लिए आवश्यक है।

    एक वचन लेना ही होगा!, राजभाषा हिन्दी पर संगीता स्वारूप की प्रस्तुति, पधारें

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  8. A Few Words About the Sin of Plagiarism
    by Harvey Bluedorn. Copyright 1997. All rights reserved.
    Plagiarism, noun. [from plagiary.] The act of purloining another man’s literary works, or introducing passages from another man’s writings and putting them off as one’s own; literary theft.
    Plagiary, noun. [L. Plagium, a kidnapping...] 1. A thief in literature; one that purloins another’s writings and offers them to the public as his own. 2. The crime of literary theft.
    Plagiary, adjective. Stealing men; kidnapping. 2. Practicing literary theft.
    Webster’s An American Dictionary of the English Language, 1828.
    plagiarist "a literary or artistic thief"
    plagiarize ... "To steal or purloin and use as one’s own (the ideas, words, artistic productions, etc., of another); to use without due credit the ideas, expressions, or productions of (another)."
    purloin ... "to take away for one’s self; hence, to steal; filch"
    Webster’s New International Dictionary of the English Language, 1925.
    plagiarize ... "1. To steal and use (the ideas or writings of another) as one’s own. 2. To appropriate passages or ideas from (another) to use as one’s own."
    Reader’s Digest Illustrated Encyclopedic Dictionary, 1987.
    At times we become so familiar with another’s work that we unwaringly imitate it. Sometimes we cannot so much as recall the source of our ideas. Though it would be good, for numerous reasons, if we could mentally catalogue all of our sources, we nevertheless cannot.

    cont

    उत्तर देंहटाएं
  9. Many thoughts become so repeated that they becomes general knowledge and their source can never be traced. Often enough others give us a "free thought" — or so we consider it, and we feel no obligation to credit its source. We often hear things with no source cited, and we therefore presume — correctly or incorrectly — that it is general knowledge. Largely because the verbal citing of sources interrupts the oral communication, we do not feel as much obligation to cite our sources orally as we do in writing. And, at rare moments, the same thought may occur independently to more than one person. Because of such variables in our ways of communicating, nobody in their right mind begrudges an occasional "borrowed thought" which fails to fully acknowledge its source.

    But "borrowed thoughts" can be simply, clearly and easily distinguished from the wholesale appropriation of another’s ideas without paying them their credit due. "Borrowed thoughts" are rare and scattered in a single work, never of any length, and scarcely ever verbatim. Plagiarism is often repeated in a single work, comes in blocks which follow the outline of the source, and imitates the manner of expression — sometimes using the very words — of the source.

    Most of us learned to dabble in plagiarism while writing "reports" in the government grade school. But we never became polished in the practice, and upon conversion we gave up the practice altogether. An honest conscience cannot borrow upon another’s labors and extend him no credit.

    cont

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  10. बहुत सार्थक चर्चा ...अच्छे लिंक्स देने का आभार

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  11. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  12. रचना सिंह जी की टिप्पणी जो न जाने कैसे मिट गयी:

    A Few Words About the Sin of Plagiarism
    by Harvey Bluedorn. Copyright 1997. All rights reserved.
    Plagiarism, noun. [from plagiary.] The act of purloining another man’s literary works, or introducing passages from another man’s writings and putting them off as one’s own; literary theft.
    Plagiary, noun. [L. Plagium, a kidnapping...] 1. A thief in literature; one that purloins another’s writings and offers them to the public as his own. 2. The crime of literary theft.
    Plagiary, adjective. Stealing men; kidnapping. 2. Practicing literary theft.
    Webster’s An American Dictionary of the English Language, 1828.
    plagiarist "a literary or artistic thief"
    plagiarize ... "To steal or purloin and use as one’s own (the ideas, words, artistic productions, etc., of another); to use without due credit the ideas, expressions, or productions of (another)."
    purloin ... "to take away for one’s self; hence, to steal; filch"
    Webster’s New International Dictionary of the English Language, 1925.
    plagiarize ... "1. To steal and use (the ideas or writings of another) as one’s own. 2. To appropriate passages or ideas from (another) to use as one’s own."
    Reader’s Digest Illustrated Encyclopedic Dictionary, 1987.
    At times we become so familiar with another’s work that we unwaringly imitate it. Sometimes we cannot so much as recall the source of our ideas. Though it would be good, for numerous reasons, if we could mentally catalogue all of our sources, we nevertheless cannot.

    cont

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  13. रचना सिंह जी की टिप्पणी जो न जाने कैसे मिट गयी:

    Many thoughts become so repeated that they becomes general knowledge and their source can never be traced. Often enough others give us a "free thought" — or so we consider it, and we feel no obligation to credit its source. We often hear things with no source cited, and we therefore presume — correctly or incorrectly — that it is general knowledge. Largely because the verbal citing of sources interrupts the oral communication, we do not feel as much obligation to cite our sources orally as we do in writing. And, at rare moments, the same thought may occur independently to more than one person. Because of such variables in our ways of communicating, nobody in their right mind begrudges an occasional "borrowed thought" which fails to fully acknowledge its source.

    But "borrowed thoughts" can be simply, clearly and easily distinguished from the wholesale appropriation of another’s ideas without paying them their credit due. "Borrowed thoughts" are rare and scattered in a single work, never of any length, and scarcely ever verbatim. Plagiarism is often repeated in a single work, comes in blocks which follow the outline of the source, and imitates the manner of expression — sometimes using the very words — of the source.

    Most of us learned to dabble in plagiarism while writing "reports" in the government grade school. But we never became polished in the practice, and upon conversion we gave up the practice altogether. An honest conscience cannot borrow upon another’s labors and extend him no credit.

    cont

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  14. रचना सिंह जी की दो टिप्पणियां पता नहीं कैसे मिट गयीं थीं। मेरे मेल बॉक्स में भी ये मौजूद थीं इसलिये इनको फ़िर से प्रकाशित कर दिया। उनकी या किसी अन्य की टिप्पणियां प्रतिबंधित करने की न कोई मंशा है न कोई सवाल।

    रचना जी को हुई असुविधा के लिये खेद है।

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  15. हमेशा की तरह संतुलित और सार्थक चर्चा………………नये लिंक्स मिले ……………और एक नया दृष्टिकोण्…………………आभार्।

    उत्तर देंहटाएं
  16. एक टिप्पणी थी टिप्पणि के ऊपर। जब पढा था, तब त्वरित प्रतिक्रिया देना उचित नहीं समझा। सोचा वह आवेश में होगा। कुछ सोच कर दुंगा। जब पुनः आया तो वह टिप्पणी नहीं है। तो मेरी प्रतिक्रिया भी नहीं है।
    हां, टिप्पणी मांगना कटोरे लेकर भीख मांगना तो नहीं ही है, यह तो अभिव्यक्ति की बात है। आप करें तो भला न करें तो भी।
    अब कहने को कुछ रह नहीं गया, सिवाय एक महापुरुष की टिप्पणी उद्धृत करने के,

    उत्तर देंहटाएं
  17. इसी बार मैने एक पोस्ट लिखी है COMMENTS करेंगे आप? आपकी चर्चा में लगभग वही विषय शामिल देखकर अच्छा लगा..लगा सही जगह जा रही हूं मै..

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  18. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  19. MICHHAMI DUKKARAM......HAM BHI AAP KO KAH DETE HAI

    ACHHI CHARCHA ..... ACHHE LINKS ......

    ABHAR.

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  20. "“कितने नए ब्लॉगर आये और टिप्पणी रूपी प्रोत्साहन के अभाव में दम तोड़ गए -कोई मर्सिया भी नहीं हुआ!”
    और उनका क्या मिश्रजी जो टिप्पणी पा कर स्वर्गवास हो गए बिना सीढी के :)
    मिच्छामी दुक्कड़म॥

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  21. सम्पूर्ण चर्चा..बहुत अच्छी.

    उत्तर देंहटाएं
  22. मिच्छामी दुक्कड़म ....
    हमेशा की तरह सार्थक चर्चा ... सुंदर लिंक ...

    उत्तर देंहटाएं
  23. आधे से अधिक लिंक पढ़ डाले हैं...कुछ पढने को बाकी हैं,पर आपके पाठ चयन ने इतना मुग्ध किया कि लगा आभार दिए बिना आगे बढ़ना सही न होगा...

    बहुत बहुत आभार इस सार्थक सुन्दर चर्चा के लिए....

    चिट्ठा चर्चा और चर्चा मंच जैसे ये ब्लॉग/मंच, बोग्वानी की कमी के दुःख को कम करने में बड़े सहायक रहे हैं...
    इन सभी मंचों का मन से आभार !!!

    उत्तर देंहटाएं

  24. क्षमिंचंडि.... क्षमा करें, मुझे आज विलम्ब हुआ, पर इतनी सुघड़ चर्चा कि मन प्रसन्न हुआ । मैं पिछड़ गया, सो मन खिन्न है !
    डॉक्टर अरविन्द मिश्र की पोस्ट पर मेरा यह कहना है कि मॉडरेशन के ज़माने में टिप्पणियों का पूर्ण निषेध तकनीकी रूप से ज़ायज़ है । क्योंकि, चयनात्मक परिसँवाद ( सेलेक्टिव इन्टर-एक्शन ) कूप-मँडुकीय बुद्धिजीवी शगल मात्र है, जहाँ कहीं खतरे का आभास हुआ.. पानी में छलाँग मार कर दुबक गये ! इस बिन्दु पर हमारे विचारशील चर्चाकार इस कथन का कि, " ब्लॉग ! विचार विमर्श के माध्यम हैं ,चर्चा परिचर्चा के फोरम हैं - का क्या स्थान है ?
    महेन्द्र आर्य और उनकी कविता से साक्षात्कार मेरी अज की उपलब्धि है, इन्हें सहेज लेता हूँ ।
    आज ही एक केस से दो चार होना पड़ा, महाशय अपने जब अपने अतिशय भोजन प्रेम को हिंगोली से न ख़ारिज़ कर पाये.. तो मेरे यहाँ पौन घँटे तक अपनी तकलीफ़ को लेकर बलवा काटे रहे.. काश कि यह चर्चा मैंनें पढ़ ली होती, तो उन्हें यह कह तो सकता कि " बाबू ! प्रेम तकलीफ है .....पर आदमी बनने के लिए जरुरी है तकलीफ से गुजरना ....! " इससे पहले कि मेरी चुटकी पर कोई बात बिगड़े, मैं यह निवेदित करना चाहूँगा कि रवीन्द्र प्रभात जी " शुरू की जानी चाहिए मृत्यु से जीवन की बात / समझना चाहिए / ज़िंदगी को एक छोटा सा सफ़र / बगैर भ्रम को पाले हुए जीना हो तो..... " जैसी लाइनों से अधिकाँश पाठको को अपने साथ बहा ले जायें, पर अपने इस दर्शन में असहमति की सँभावनायें छोड़ते हैं । जिजीविषा ही तो मानव की ऊर्ज़ा है, सो वह इस भ्रम को क्योंकर तोड़े ?
    आदरणीय रचना जी, मैं "......An honest conscience cannot borrow upon another’s labors and extend him no credit " के बाद वाले cont.. के पूर्ण होने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ । हिन्दी दिवस पर आपका पर्यवेक्षण महत्वपूर्ण हो सकता है, बशर्ते कि आप इसे पूरा पढ़वायें ।
    मेरा रात का भोजन जिसे किसी सरकारी षड़यन्त्र के तहत डिनर कहा जाता है, प्रतीक्षा कर रहा है, और मेरी पत्नी ऊब कर कह रही हैं, " अब उठो भी डॉक्टर टिपणिस ! " सो, चलता हूँ ।
    मुझे कितनी बार " मिच्छामी दुक्कड़म " कहने से क्षमिंचंडि.... मिलेगी ?

    उत्तर देंहटाएं

  25. भूल सुधार :
    उन्होंने सही शब्द डॉ. टिप्पणवीस बोला था, क्या इतना बुरा हूँ मैं ?

    उत्तर देंहटाएं

  26. मेरी पिछली टिप्पणी कहाँ गई, हो... दुबारा से दूँ ?
    क्षमिंचंडि.... क्षमा करें, मुझे आज विलम्ब हुआ, पर इतनी सुघड़ चर्चा कि मन प्रसन्न हुआ । मैं पिछड़ गया, सो मन खिन्न है !
    डॉक्टर अरविन्द मिश्र की पोस्ट पर मेरा यह कहना है कि मॉडरेशन के ज़माने में टिप्पणियों का पूर्ण निषेध तकनीकी रूप से ज़ायज़ है । क्योंकि, चयनात्मक परिसँवाद ( सेलेक्टिव इन्टर-एक्शन ) कूप-मँडुकीय बुद्धिजीवी शगल मात्र है, जहाँ कहीं खतरे का आभास हुआ.. पानी में छलाँग मार कर दुबक गये ! इस बिन्दु पर हमारे विचारशील चर्चाकार इस कथन का कि, " ब्लॉग ! विचार विमर्श के माध्यम हैं ,चर्चा परिचर्चा के फोरम हैं - का क्या स्थान है ?
    महेन्द्र आर्य और उनकी कविता से साक्षात्कार मेरी अज की उपलब्धि है, इन्हें सहेज लेता हूँ ।
    आज ही एक केस से दो चार होना पड़ा, महाशय अपने जब अपने अतिशय भोजन प्रेम को हिंगोली से न ख़ारिज़ कर पाये.. तो मेरे यहाँ पौन घँटे तक अपनी तकलीफ़ को लेकर बलवा काटे रहे.. काश कि यह चर्चा मैंनें पढ़ ली होती, तो उन्हें यह कह तो सकता कि " बाबू ! प्रेम तकलीफ है .....पर आदमी बनने के लिए जरुरी है तकलीफ से गुजरना ....! " इससे पहले कि मेरी चुटकी पर कोई बात बिगड़े, मैं यह निवेदित करना चाहूँगा कि रवीन्द्र प्रभात जी " शुरू की जानी चाहिए मृत्यु से जीवन की बात / समझना चाहिए / ज़िंदगी को एक छोटा सा सफ़र / बगैर भ्रम को पाले हुए जीना हो तो..... " जैसी लाइनों से अधिकाँश पाठको को अपने साथ बहा ले जायें, पर अपने इस दर्शन में असहमति की सँभावनायें छोड़ते हैं । जिजीविषा ही तो मानव की ऊर्ज़ा है, सो वह इस भ्रम को क्योंकर तोड़े ?
    आदरणीय रचना जी, मैं "......An honest conscience cannot borrow upon another’s labors and extend him no credit " के बाद वाले cont.. के पूर्ण होने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ । हिन्दी दिवस पर आपका पर्यवेक्षण महत्वपूर्ण हो सकता है, बशर्ते कि आप इसे पूरा पढ़वायें ।
    मेरा रात का भोजन जिसे किसी सरकारी षड़यन्त्र के तहत डिनर कहा जाता है, प्रतीक्षा कर रहा है, और मेरी पत्नी ऊब कर कह रही हैं, " अब उठो भी डॉक्टर टिपणिस ! " सो, चलता हूँ ।
    मुझे कितनी बार " मिच्छामी दुक्कड़म " कहने से क्षमिंचंडि.... मिलेगी ?

    भूल सुधार : उन्होंने सही शब्द डॉ. टिप्पणवीस बोला था, क्या इतना बुरा हूँ मैं ?

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  27. IIII

    मेरी पिछली टिप्पणी कहाँ गई, हो... दुबारा से दूँ ?
    वहू गायब ? पिरेत लागा भवा हय का, ई ल्यौ तिबारा !

    क्षमिंचंडि.... क्षमा करें, मुझे आज विलम्ब हुआ, पर इतनी सुघड़ चर्चा कि मन प्रसन्न हुआ । मैं पिछड़ गया, सो मन खिन्न है !
    डॉक्टर अरविन्द मिश्र की पोस्ट पर मेरा यह कहना है कि मॉडरेशन के ज़माने में टिप्पणियों का पूर्ण निषेध तकनीकी रूप से ज़ायज़ है । क्योंकि, चयनात्मक परिसँवाद ( सेलेक्टिव इन्टर-एक्शन ) कूप-मँडुकीय बुद्धिजीवी शगल मात्र है, जहाँ कहीं खतरे का आभास हुआ.. पानी में छलाँग मार कर दुबक गये ! इस बिन्दु पर हमारे विचारशील चर्चाकार इस कथन का कि, " ब्लॉग ! विचार विमर्श के माध्यम हैं ,चर्चा परिचर्चा के फोरम हैं - का क्या स्थान है ?
    महेन्द्र आर्य और उनकी कविता से साक्षात्कार मेरी अज की उपलब्धि है, इन्हें सहेज लेता हूँ ।
    आज ही एक केस से दो चार होना पड़ा, महाशय अपने जब अपने अतिशय भोजन प्रेम को हिंगोली से न ख़ारिज़ कर पाये.. तो मेरे यहाँ पौन घँटे तक अपनी तकलीफ़ को लेकर बलवा काटे रहे.. काश कि यह चर्चा मैंनें पढ़ ली होती, तो उन्हें यह कह तो सकता कि " बाबू ! प्रेम तकलीफ है .....पर आदमी बनने के लिए जरुरी है तकलीफ से गुजरना ....! " इससे पहले कि मेरी चुटकी पर कोई बात बिगड़े, मैं यह निवेदित करना चाहूँगा कि रवीन्द्र प्रभात जी " शुरू की जानी चाहिए मृत्यु से जीवन की बात / समझना चाहिए / ज़िंदगी को एक छोटा सा सफ़र / बगैर भ्रम को पाले हुए जीना हो तो..... " जैसी लाइनों से अधिकाँश पाठको को अपने साथ बहा ले जायें, पर अपने इस दर्शन में असहमति की सँभावनायें छोड़ते हैं । जिजीविषा ही तो मानव की ऊर्ज़ा है, सो वह इस भ्रम को क्योंकर तोड़े ?
    आदरणीय रचना जी, मैं "......An honest conscience cannot borrow upon another’s labors and extend him no credit " के बाद वाले cont.. के पूर्ण होने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ । हिन्दी दिवस पर आपका पर्यवेक्षण महत्वपूर्ण हो सकता है, बशर्ते कि आप इसे पूरा पढ़वायें ।
    मेरा रात का भोजन जिसे किसी सरकारी षड़यन्त्र के तहत डिनर कहा जाता है, प्रतीक्षा कर रहा है, और मेरी पत्नी ऊब कर कह रही हैं, " अब उठो भी डॉक्टर टिपणिस ! " सो, चलता हूँ ।
    मुझे कितनी बार " मिच्छामी दुक्कड़म " कहने से क्षमिंचंडि.... मिलेगी ?


    भूल सुधार : उन्होंने सही शब्द डॉ. टिप्पणवीस बोला था, क्या इतना बुरा हूँ मैं ?

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  28. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ....

    भाषा का सवाल सत्ता के साथ बदलता है.अंग्रेज़ी के साथ सत्ता की मौजूदगी हमेशा से रही है. उसे सुनाई ही अंग्रेज़ी पड़ती है और सत्ता चलाने के लिए उसे ज़रुरत भी अंग्रेज़ी की ही पड़ती है,
    हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं

    एक बार इसे जरुर पढ़े, आपको पसंद आएगा :-
    (प्यारी सीता, मैं यहाँ खुश हूँ, आशा है तू भी ठीक होगी .....)
    http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_14.html

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  29. डा. अमर कुमार जी मेरे ब्लोगिंग के प्रारंभिक दिनों के साथी हैं, उनके ब्लॉग पर मुझे जाना ,पढ़ना और लिखना अच्छा लगता था ....यह भी हमारे लिए सुखद है कि मेरी रचनाएँ उन्हें काफी भाती थी ! मुझे आज भी याद है कि लखनऊ पर लिखी मेरी एक ग़ज़ल को उन्होंने कई जगहों पर उद्धृत करते हुए पोस्ट किया था, किन्तु कतिपय कारणवश उन्होंने उस ब्लॉग को अन्यत्र स्थानांतरित कर दिया और उनके साथ मिलकर लिखने का मेरा क्रम अनियमित हो गया ! आभार, डाक्टर साहब, आज आपने मेरी कविता को टिप्पणी के माध्यम से पुन: उद्धृत कर पुरानी स्मृतियों को ताज़ा कर दिया है !

    वैसे मैंने यह चर्चा देर से पढ़ी, इसलिए प्रतिक्रया विलंब से दे रहा हूँ ! धन्यवाद मनोज जी, एक और यथार्थपरक, सुन्दर और सारगर्भित चर्चा के लिए ...!

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  30. नासिरा शर्मा जी की कहानी की जानकारी के लिए विशेष आभार। अन्य लिंक भी महत्वपूर्ण हैं।

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  31. चर्चा के साथ टिप्पणी का प्रयोग नया और अच्छा लगा.. मसि-कागद को भी गिनने के लिए आभार सर..

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