मंगलवार, सितंबर 02, 2008

बाढ़ में सब कुछ बहा जा रहा है

कोसी का कहर

पूरा बिहार बाढ़ की विभीषिका झेल रहा है। तमाम साथी बाढ़ की विभीषिका के बारे में लिख रहे हैं। नितीश राज लिखते हैं-
एक मां अपनी बगल में दो बच्चों को दबाए बाढ़ के उफनते पानी को चीरते हुए आगे बढ़ रही थी। साथ में कुछ और लोग भी थे। धीरे-धीरे सब चलते जा रहे थे किसी को पता नहीं था कि आखिर इस बाढ़ का अंत कहां है, पर बचने के लिए चलना तो जरूरी था। पानी का एक तेज बहाव उनकी तरफ आया। सबने संभलने की कोशिश की। मां ने भी अपने आप को बचाने के लिए एक पेड़ की टहनी को पकड़ लिया और उस बहाव से जूझने लगी। पर जिस हाथ से टहनी पकड़ी थी उसकी बगल में दबा बच्चा तो उस बहाव की भेंट चढ़ गया।

विनीत उत्पल का गांव डूब गया है। वे बतातें हैं:
आज शंकर भैया बता रहे थे कि राहत सामग्री नही के बराबर है।कई-कई दिनों के बाद नाव आती है. हेलिकाप्टर से गिराये जा रही राहत सामग्री पानी में जा रहा है. यहां किसी का कोई सुनने वाला नही है. जीवन का क्या होगा, पता नहीं|
पापा की सबसे बड़ी बहन यानी मेरी बूआ लापता है। बूढ़ी आंखें पता नही अपनों को देख पायी होगी या पायेगी मालूम नही.

अविनाश कहते हैं- ये कोसी नहीं करप्शन का कहर है।

बाढ में सब कुछ बहा जा रहा है, सामान, लोग-बाग,नाते-रिश्तेदार, हौसला। कोसी कुछ रहम करे।

मनीष यायावर ब्लागर हैं। घूमते रहते हैं, लिखते रहते हैं। कोलकता गये तो उसके बारे में रपट लिखी:
हमारी टैक्सी कलकत्ता से हावड़ा के सफर पर जा रही है । ड्राइवर के बातचीत के लहजे से हम सब जान चुके हैं कि ये बंदा अपने मुलुक का है । पूछा भाई किधर के हो ? छूटते ही जवाब मिला देवघर से । जैसे ही उसे पता चला कि हम सब राँची से आए हैं, झारखंड के बारे में अपना सारा ज्ञान वो धाराप्रवाह बोलता गया । थोड़ी देर बाद एक उदासी उसकी आवाज में तैर गई । पहले गाए भैंस हांकते थे साहब, अब कलकत्ता जैसे शहर में इस टैक्सी को हाँक रहे हैं।

ममताजी इलाहाबाद में अकेले-अकेले जलेबी खा रही हैं। कोई इलाहाबादी ब्लागर उनको टोंक भी नहीं रहा है।

राज भाटिया की हर पोस्ट आशा का संचार करती है। आज भी उन्होंने दीपक जलाये।

सुनिये: मुकेश के स्वर में रामचरित मानस का अंश

आज के नये चिट्ठे



ये मोबाइल है भाई

  1. भूतपूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब का कहना है- सपने वो नही होते जो आपकी नींद में आते है सपने तो वो होते है जो आपकी नींदे उड़ा देते है | सपनो के प्रति यही बेचैनी पंचलाइन है- Welcome in World of Dream से शुरू हुये ब्लाग की।

  2. चंडीगड़ के आशीष छह ब्लागों से संबद्ध हैं। आज धार्मिक बातें बना रहे हैं।

  3. नयी दिल्ली और पटना से संबंधित कुमार नरोत्तम दो ब्लाग चलाते हैं। अंतर्गाथा ब्लाग मार्च, २००८ से चला रहे हैं। अभी तक कुल जमा अठारह पोस्ट में से दस अगस्त माह में लिखीं गयीं। अपनी नवीनतम पोस्ट जो कि लिखी जुलाई में गयी थी लेकिन प्रकाशित अब हुयी वे बताते हैं- बिहार में नहीं मिली है रोजगार की गारंटी

  4. विष्णु शर्मा को १२ अगस्त को अपनी मूर्खता का ज्ञान हुआ और उन्होंने ब्लाग शुरू किया। कल वे कल की चादर तान के बैठ गये, कहते हुये-कल की चादर बड़ी ही विशाल और चुम्बकीय है..जो भी डालो सब छुप जाता है और फ़िर बापस( वापस) भी आने की सम्भावना कहा (कहां) है ।

  5. लोकेश मार्च २००८ में शुरू करके पांचवी पोस्ट तक पहुंच गये। अब कहते हैं: गहराइयाँ बढ़तीं हैं साहिलों के बाद,
    नजदीकियां बढ़तीं हैं फासलों के बाद,
    उसूल-ऐ-रिश्ता राह है,
    मंजिल मिलती है दिलों के बाद

  6. मेरठ शहर की मनविन्दर भिंभर ने अपना नया ब्लाग अमृता प्रीतम को याद करते हुये शुरू किया।

  7. प्रवीन दिवेदी लखनऊ के हैं। कल हिंदी में पहली पोस्ट लिखी। उनका मासूम सवाल है- ब्रेकिंग न्यूज़, ताजा खबर... आखिर क्या है इनमें ब्रेकिंग और ताजा


एक लाइना



    मुखौटे

    दुनिया के बाजार में
    जहाँ कहीं भी जाओगे
    हर तरफ, हर किसी को
    मुखौटे में ही पाओगे ।
    यहाँ खुले आम मुखौटे बिकते हैं
    और इन्हीं को पहन कर
    सब कितने अच्छे लगते हैं

    विश्वास नहीं होता --?
    आओ मिलवाऊँ

    ये तुम्हारा पुत्र है
    नितान्त शरीफ,आग्याकारी
    मातृ-पितृ भक्त
    हो गये ना तृप्त ?
    लो मैने इसका
    मुखौटा उतार दिया
    अरे भागते क्यों हो--
    ये आँखें क्यों हैं लाल
    क्या दिख गया इनमें
    सुअर का बाल ?

    आओ मिलो -
    ये तुम्हारी पत्नी है
    लगती है ना अपनी ?
    प्यारी सी, भोली सी,
    पतिव्रता नारी है पर-
    मुखौटे के पीछे की छवि
    भी कभी निहारी है ?

    ये तुम्हारा मित्र है
    परम प्रिय
    गले लगाता है तो
    दिल बाग-बाग
    हो जाता है
    क्या तुम्हे पता है
    घर में सेंध वही लगाता है
    ये तो दोस्ती का मुखौटा है
    जो प्यार टपकाता है
    और दोस्तों को भरमाता है

    मुखौटे और भी हैं
    जो हम सब
    समय और आवश्यकता
    के अनुरूप पहन लेते हैं
    इनके बिना सूरत
    बहुत कुरूप सी लगती है

    मुखौटा तुमने भी पहना है
    और मैने भी
    सच तुम्हे भी पता है
    और मुझे भी


    फिर शिकायत व्यर्थ है
    जो है और जो हो रहा है
    उसके मात्र साक्षी बन जाओ
    मुखौटे में छिपी घृणा, ईर्ष्या
    को मत देखो
    बस---
    प्यारी मीठी- मीठी बातों का
    लुत्फ उठाओ ।
    शोभा महेन्द्रू


  1. बड़ा दर्द सहा है तुमने ऊफ : कोई ’पेन किलर’ क्यों नहीं ली?


  2. क्या श्री अभय तिवारी एक प्रो-मुस्लिम प्रोपेगेंडिस्ट हैं? : खाली शक्ल देखकर क्या कहें?


  3. सैकुलर भैस और संघी गाय : के साथ पंगेबाज का गठबंधन


  4. मेरे जिस्म मेरी रूह को अच्छा कर दे : बहुत दिन से कष्ट में हैं रूह! देखा नहीं जाता!


  5. पाकिस्तान में सोरेन : गये हैं मुख्यमंत्री बनने! झारखंड साथ ले गये हैं।


  6. अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग :लगातार जारी है।


  7. महायान बाइक और काली को पेप्सी का भोग : वे पी रहे हैं सर उठा के।


  8. तरह तरह के बिच्छू :तरह तरह के डंक।


  9. सुबह,-"सुबह" उदास सी रेखाजी के साथ रहोगे तो शाम भी ऐसेइच होगी।


  10. वोही तो मेरा गीत है : ज्यदा करोगे तो गाने लगेंगे।


  11. बड़े-बड़े सपने :पर हल चला दिया।


  12. मत जाओ चांद पर : कोई फ़ायदा नहीं जाने का! न पानी न बिजली एकदम अपने शहर जैसा है।


  13. ये कोसी का नहीं, करप्‍शन का कहर है: तय करो किस ओर हो तुम!


  14. चैनलों की भ्रामक खबर से बंदा खुश हुआ : असलियत जान के मुंह लटक गया।


  15. उन्हें अभी नींद से मत उठाओ : वो राहत कोष की गोली खा के सोये हैं।


  16. व्यापार में अवरोध अनुबंध शून्य हैं : और शून्य में सब कुछ समाया है ये तो आपको पता ही है।


  17. निर्माण : कोशिश बढ़िया, निर्माण अधूरा- अबरार अहमद


  18. आखिर हम भी एक दिन बेइमान हो गए : इसी बहाने कुछ अपने कद्रदान हो गए।


  19. क्या दूं : उधार, जुदाई, करार और इस मुये चांद के सिवा जो हो दे दीजिये।


  20. चिंतन दीपक : में अपने हिस्से का तेल डालते रहें।


  21. सवाल : कि आखिर मेरी उलझन क्या है?


  22. चाटुकारिता में पत्रकारों को मात दे दी नेताओं ने : पत्रकारों ने मात का उत्सव मनाया नेताऒं के साथ


  23. औंधे आ गिरी चित्र पहेली : अरे देखो मुंह तो नहीं फ़ूटा!


  24. आदमी की पीर गूंगी ही सही गाती तो है.. : सुनाई पड़ रहा है न!



  25. नया महीना, पहली तारीख़ और आमद नए कबाड़ी की: क्या भाव पड़ा ये कबाड़ी!


  26. इलाहाबाद यात्रा की यादें (२) सुबह-सुबह जलेबी खाना :): अकेले-अकेले !


  27. ...... मॉं की याद आती है, पर माँ नहीं आती!: उनके पास ‘’तीन बहुरानि‍याँ’’जो हैं!


  28. यात्रा की यात्रा :घबराइए मत, डीजल भराया जा रहा है। सफर अब शुरू होने वाला है।


  29. जीवन उनका धन्य...! : जिनकी पोस्ट पर एक भी टीप मिली।


  30. फ़ोर्ब्स पत्रिका में आम-मजदूर महिलायें क्यों जगह नहीं पाती: ये अन्दर की बात है!


  31. एन डी टी वी और अजीब उलझन : .टाटा ये......टाटा वो....टाटा फलाना.....टाटा ढेकाना.।


  32. चौराहे पे, धरती माँ के गिर्द, एक नंगा बच्चा लेटा है... : हम उसी पर ये पोस्ट लिख रहे हैं।


  33. सपनों का मर जाना सामाजिक हर्ष का विषय है :मरे हुए सपनों वाले ग्रेजुएट बनते हैं अच्छे क्लर्क, अच्छे नागरिक।


  34. महोदय अ का शाश्वत लेखन : सही है यहां हर कोई अपनी ढपली बजा सकता है।








मेरी पसन्द



नींद आंखों में बुलाता कौन है
ख्वाब से इनको सजाता कौन है

भूलना तो चाहता हूँ मैं उसे
याद उसकी पर दिलाता कौन है

ये पता चलता नहीं है इश्क में
कौन देता और पाता कौन है

गुल बिछाता हूँ मैं उसकी राह में
खार नफरत के उगाता कौन है

है किसे फुर्सत बता इस दौर में
रूठ जाने पर मनाता कौन है

मोल अपने आंसुओं का जानिए
मोतियों को यूँ लुटाता कौन है

शाम से ही आ रही हैं हिचकियाँ
नाम मेरा गुनगुनाता कौन है

राग अपने और अपनी ढफलियां
पीठ दूजी थपथपाता कौन है

हम किसे आवाज दें "नीरज" बता
देख के बदहाल आता कौन है

नीरज गोस्वामी

... और अंत में


कल सिद्धार्थ त्रिपाठी का उलाहना था-
मुझे अपना संकोच त्याग कर ये कहना है कि आपकी चिठ्ठा चर्चा में अगर मेरे प्रयास की चर्चा छूट जाती है तो मन मायूस हो जाता है। मैं जब भी कुछ लिखने की कोशिश करता हूँ तो चाहता हूँ कि पिछली पोस्ट से बेहतर बात हो सके। अब अगर आप जैसे बड़े भाई का आशीर्वाद नहीं मिलता है , यानि आपका ध्यान उस ओर नहीं जाता है तो कदाचित् उपेक्षित होने का भाव सिर उठाने लगता है


सिद्धार्थ का उलाहना जायज है। बाढ़ की विभीषिका पर उन्होंने जो लिखा वो अद्भुत है। उनके संवेदनशील मन का परिचायक है:
रघुबर काका बतलाते हैं, अबतक यह बाढ़ नही देखी।
सत्तर वर्षों की उमर गयी, ऐसी मझधार नहीं देखी॥
कल टी.वी. वाले आये थे, सोचा पाएंगे खाने को।
बस पूछ्ताछ कर चले गए,मन तरस गया कुछ पाने को॥


ऐसी रचनाओं का जब कायदे से उल्लेख नहीं होता तो ऐसा लगना स्वाभाविक है। लेकिन हम कोशिश करते हैं कि उल्लेख करने योग्य है वह छूटे न। आगे भी प्रयास रहेगा।

घोस्ट बस्टर ने अभय तिवारी के लेख को घटिया बताया है। अब वे उनकी विवेचना करेंगे। निष्कर्ष निकाल लेने के बाद विवेचना करने में आसानी रहती है।

फ़िलहाल इतना ही। बकिया फ़िर।

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सोमवार, सितंबर 01, 2008

नये नवेले चिट्ठाकार

कल की चर्चा में दो जिक्र छूट गये। रवि रतलामी रचनाकार पर चार्ली चैपलिन की आत्मकथा पोस्ट कर रहे हैं। इस आत्मकथा का हिन्दी अनुवाद कथाकर सूरजप्रकाश जी ने किया है। रविरतलामी धन्य हैं जो इत्ती मेहनत से रचनाकार पर तमाम ख्यात-ज्ञान-अज्ञात रचनाकारों की कृतियां उपलब्ध करा रहे हैं।
दीपक भारतदीप मेरे ख्याल से सबसे ज्यादा लिखने वाले हिंदी ब्लागर हैं। सात चिट्ठे। नियमित लेखन। उनके लेख की चर्चा अक्सर छूट जाती है। ब्लागिंग में मेरी समझ में एक ब्लाग रहे या ऐसे नाम रहें जो अलग से लगें वे ध्यान रहते हैं। दीपक जी जो सात चिट्ठे लिखते हैं उनमें से चार के नाम एक से लगते हैं। यह हमारी अपनी व्यथा है। जो कि रहीम दास के अनुसार मन में ही रखनी चाहिये।

कनपुरिये अगर काम लगा देते हैं तो इलाहाबादी काम थमा देते हैं। पाण्डेयजी आज बोले-
रविवार को कई नये ब्लॉग देखे। बहुत अच्छी शुरुआत कर रहे हैं नये चिठेरे। तकनीक और कण्टेण्ट दोनो बहुत अच्छे हैं। डेढ़ साल पहले जब मैने ठेलना प्रारम्भ किया था, तब से कहीं बेहतर एण्ट्री कर रहे हैं नये बन्धु।
चिठ्ठा-चर्चा तो जमती है; एक "नव-चिठ्ठा चर्चा" जैसा ब्लॉग भी होना चाहिये नये प्रयासों के लिये एक्स्क्लूसिव।
अनूप सुकुल का एक क्लोन चाहिये इस महत्वपूर्ण कार्य के लिये!


अब अनूप शुक्ल के क्लोन तो न जाने कब मिलें सो हम आज की चर्चा नये साथियों से शुरू कर रहे हैं।

नये साथी


  • धीरू सिंह, झुमका गिरा रे वाले शहर बरेली से हैं। अमेरिका के दोहरेपन को उजागर करते हैं कि उसने पुरुष श्रेष्ठ मानसिकता के चलते हिलेरी क्लिंटन को राष्ट्रपति का उम्मीदवार नहीं चुना।


  • ब्लाग और ब्लागर दोनों का नाम है- दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है। बिहार की बाढ़ की पोल खोलते हैं।


  • पूर्णिमा बनारस की हैं। देवनागरी और रोमन दोनों में पोस्ट लिखी। विवेक सिंह कहते हैं- बहुत बकवास लिखा है आपने। डा.अमर कुमार कहते हैं- ख़्याल बुरे नहीं हैं,पर सही हिज़्ज़े का भी ध्यान रखा होता,तो बात ही कुछ और बनती, शुक्रिया !

  • प्रमोद हिंदी के चिराग जला रहे हैं। शुरुआत निरालाजी के परिचय से की।


  • झारखंडी मनीश सिंह को झारखंड का दर्द बांटने वाला कोई नहीं दिखता।


  • एम.आई.जाहिर अपने इजहार-ए-एहसास की परेशानी बताते हैं- किसी दूसरे के बारे में लिखना या तारीफ़ करना हो तो अच्छा लगता है। लेकिन बात जब अपने बारे में लिखने की हो तो संकोच होता है। क्योंकि आत्म प्रवंचना करना ठीक मालूम नही होता। फिर भी अब जब ब्लॉग की यही परम्परा है तो यही सही

  • विरोध का मुद्दा ही विरोध वाला है- रामसेतु।

  • नारद मुनि मुद्दे राजनीतिक मुद्दों की बातें करते हैं। अगस्त में ३५ लिख चुके हैं। ये नये ब्लागर तो नहीं लगते जी।


  • प्रियांशु , कई श्रेणियों में लिखते हैं। आज की पोस्ट में कहर बरप रहा है आतंकवाद पर।

  • चमोली उत्तराखंडी अक्षतविचार का नाम क्या है पता नहीं लेकिन हौसले की बात करते हैं-

  • मनीश कुमार आई.आई.टी. खड़गपुर में गणित के चौथे वर्ष के छात्र हैं। पहली पोस्ट फ़रवरी में लिखी थी। दूसरी अगस्त में। कश्मीर और भारतवर्ष पर


  • एक लाइना



    फ़िर कभी।

    मेरी पसंद



    खिड़की बड़ी करो बेशक !
    आकाश बड़ा कुछ अधिक दिखेगा
    खान-पान-सम्मान मिले
    विश्वास बड़ा कुछ अधिक दिखेगा
    लेकिन मन के सूनेपन को
    सुनने का जब वक़्त नहीं है
    कैसे मानूँ जीने का
    एहसास बड़ा कुछ अधिक दिखेगा !
    चन्द्र कुमार जैन

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