रविवार, नवंबर 20, 2005

कालीचरण कविता करने लगे

कुछ दिन से चर्चा ठहरी रही। इस बीच और लोग जुडे़ चिट्ठाकारी जगत से। मूलत: बिहार की रहने वाली जयाझा आई.आई.एम लखनऊ से एम बी ए करते हुये हिंदी में अपनी पसंदीदा कविताओं तथा गज़लों को अपने ब्लाग पर पोस्ट करती हैं। आशा है कि जल्द ही वे अपना लिखा भी पोस्ट करेंगी।इसके पहले लाल्टू जी ,जो मेरे ख्याल से चर्चित कथाकार हैं हिंदी के,ने भी अपने विचारोत्तेजक लेख लिखने लिखने शुरु किये।रमन कौल ने लाल्टूजी के बारे में लिखा है। अपने सुनीलजी तो दिन ब दिन दनादन लिख रहे हैं। वे कुछ छिपाते नहीं ।बताया कि कितने भुलक्कड़ प्रेमी हैं।कमबख्ती(?) से भी वे मुंह नहीं छिपाते। खिंचाई अब फुरसतिया का एकाधिकार नहीं रही। फुरसतिया की खिंचाई को नहला मानते हुये प्रत्यक्षा ने दहला मारा है। मानसी ने सहयोग किया है। अभी तो वो मजा नहीं आया है आगे देखते हैं क्या होगा। पर यह अच्छी बात है कि प्रत्यक्षा,मानसी,सारिका ने कविता के साथ साथ अब गद्य भी लिखना शुरु किया है जो कि उनकी कविताओं से कम बेहतर नहीं हैं। सारिका की बचपन की यादें इसका प्रमाण हैं। जब ये 'मचिकग' कविता से लेख पर आ रहे हैं तब भोला उल्टी गंगा बहा रहे हैं वे कविताईपर उतर आये हैं। उनका जीवन चलायमान हो गया है।

मिर्चीसेठ का मन एक बार फिर बेचैन होकर जहाज के पक्षी में तब्दील हो गया है।
टिप्पणी भी खतरनाक हो सकती हैं यह बता रहे हैं नितिनबागला। फुरसतिया जानकारी दे रहें तेज चैनलों की।

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Posted by अनूप शुक्ला to gupt at 11/20/2005 07:22:00 AM

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