मंगलवार, अगस्त 29, 2006

आया ज़माना 'उत्पभोक्ता' का

हमने चिट्ठाचर्चा शुरू किया था चिट्ठों के बारे में चर्चा करने के लिये ।लेकिन यह बीच-बीच में थम जाता है। दो दिन लिखा नहीं तो समीर जी ने उकसाया कि इसे बंद न किया जाये। देबाशीष ने भी संतोष जाहिर किया कि हमने इसे दोबारा शुरू किया इसका मतलब है उनका भी मानना है कि इसे चलाते रहें।कुछ ऐसा ही मत प्रत्यक्षा जी का है। ग्राहकों की मर्जी सर्वोपरि मानते हुये फिर से इसे चालू किया जा रहा है।

बात ग्राहकी से ही । हिंदी ब्लागर ने प्रख्यात भविष्य वक्ता के माध्यम से आने वाले समय में सामाजिक संरचना के बारे में तमाम जानकारियाँ दीं। उत्पादक और उपभोक्ता गठबंधन से 'प्रोज्‍़यूमर' यानि कि 'उत्भोक्ता' के उदय की बात बताते हुये भविष्य के समाज के बारे में जानकारी देते हैं:-
"परिवार ख़त्म नहीं होगा, लेकिन पारिवारिक व्यवस्था के नए रूपों का उदय ज़रूर होगा. समलैंगिकों की शादी को स्वीकृति मिलती जा रही है. अकेली माताओं, अविवाहित युगलों, बिना बाल-बच्चे वाले विवाहित जोड़ों और कई-कई शादियाँ कर चुके माता-पिता हर समाज में देखे जा रहे हैं. एक साथी के साथ ज़िंदगी गुजारने का चलन भले ही ख़त्म नहीं हो, लेकिन एकाधिक साथियों के साथ संबंध को व्यापक स्वीकृति मिलने लगेगी."



कतरनें में डाकुओं के माल के बंटवारे के सिद्धान्त के बारे में बताया गया था। बाकी का पता नहीं लेकिन मुझे इस लेख को समझने में काफी कठिनाई हुई।अभी भी जितना समझ में आया उससे यही मतलब लगाया मैंने कि यह बात कुछ-कुछ उन टीवी प्रोग्रामों पर फिट बैठती है जिसमें हर हफ्ते एक प्रतियोगी बाहर कर दिया जाता है।आशीष जी कुछ बतायें इस बारे में।

निठल्ले भाई ने अनुवाद की समस्यासे के बारे में शुरू कीं तो विनय ने अनुवाद के कुछ नीति निर्देशक सुझावबताये। इस संबंध में किसी भाषा वैज्ञानिक का कहना है कि "किसी भी भाषा की क्षमता इस बात से भी जानी जाती है कि वह विदेशी भाषा के शब्दों को कितनी आसानी से अपने में पचा लेती है।"

निधि ने अपने लाला मल्लूमल की कहानी आगे सुनाते हुये उनकी सुधार कथा बताना जारी रखा:-
आजकल मैं सुधारा जा रहा हूँ। मेरे दिल और दिमाग को वह सुधारों के झाँवाँ से रगड़-रगड़ कर साफ़ कर रही है। जिस प्रकार अड़ियल टट्टू की पीठ पर कोड़े बरसते हैं उसी प्रकार मेरे सिर पर सुधारों के ओले बरस रहे हैं। उसे यह कौन समझाये कि बिगड़े दूध को मथने से मक्खन नहीं निकलता।


कभी आतंक का पर्याय मानी जाने वाली फूलन देवी की व्यथा-कथा सृजन शिल्पी की नजर से सुनने के साथ-साथ मायादेवी के विचार जानिये जीतेंदर चौधरी से।वैसे जीतेंदर ने अपनी व्यथा-कथा भी कही है। अपने सप्ताहांत के किस्सों का अपनी चिर-परिचित शैली में बखान किया है:-
...हम जित्ता हो सकता है करते है, बाकी को अगले हफ़्ते पर सरका कर, कम्पयूटर की तरफ़ टरक लेते है आप लोगों के ब्लॉग पढने के लिए और इमेल्स का जवाब देने के लिए बैठ जाते है। बस इतना होना होता है कि श्रीमती के दिमाग का पारा चढने लगता है और उनका ओजस्वी भाषण पूरे जोशो खरोश के साथ शुरु होता है, जिसमे कम्प्यूटर, ब्लॉग, टीवी, न्यूज चैनल, मिर्जा, स्वामी (किरकिट स्वामी), (और अब सैटेलाइट रेडियो भी शामिल) किसी को भी नही बख्शा जाता। सबको समान रुप से गरिआया जाता है। अब बताओ यार, आदमी छुट्टी के दिन इन सबके बिना कैसे रह सकता सकता है? एक घन्टे के भाषण प्रसारण के बाद, श्रीमती जी थक जाती है तो आराम के लिए शयनकक्ष का रुख करती है और हम? अबे हम कम्प्यूटर से हटे ही कहाँ थे?


यह लेख फिर से बताता है कि जीतेंदर जब भी अपना कोई लेख लिखते हैं तो बहाने से पुराने तमाम अपने तथा कुछ दोस्तों लेखों को परोस देते हैं।कहां तक बचेगा पाठक!

वंदे मातरम ब्लाग देश के बारे में धनात्मक जानकारी देने वाला अच्छा ब्लाग है। वंदे मातरम में कल जो सवाल पूछा गया था उसका हल बताया गया। कम लोग जानते थे प्रफुल्ल चंद्र राय के बारे में लेकिन विजय ने सही हल बताया।


जगदीश भाटिया अपने घर को देश से जोड़ते हुये वंदेमातरम विवाद पर अपनी बात कहते हैं वहीं रत्नाजी आरक्षण समस्या पर अपने कुछ अनूठे सुझाव देती हैं।

छुट्टी पुराण में नया अध्याय जोड़ते हुये भोपाली काली भाई लिखते हैं:-

शाम को मै बनता हुँ घसियारा माली. मेरी पत्नी के हिसाब से यह काम मेरी कँजुसी को डिफाइन करता है. महीने के १२० डालर बचाने के लिऍ में हर शनिवार ४ से ५ तक घास काटता हुँ और बागड़ की कटाई करता हुँ. मित्रों के टपकने का अकसर यही समय होता है जिसके कारण मेरी पत्नी अकसर दुखी पाई जाती हैं की क्योँ माली टाईप ईमेज दिखाते हो.


विकीपिडिया के बारे में कई महत्वपूर्ण लेख लिख चुके उन्मुक्तजी कुछ और छुटपुट जानकारी देते हैं।

फुरसतिया ने खबरिया तथा शेखचिल्ली के बारे में लिखते हुये कुछ लिखा। उस पर राहुलजी ने ऐसा हड़काया है अंग्रेजी में कि उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। हिंदी के ब्लाग पर वैसे भी अंग्रेजी में हड़काने का बहुत असर होता है। सिट्टी-पिट्टी गुम होने का जवाब तो सहमकर या अकड़कर दिया जा सकता है लेकिन किसी के दुख को कम नहीं किया जा सकता है। छायाजी उस पोस्ट से बहुत आहत हुये हैं तथा अपना क्षोभ भी व्यक्त किया है।उधर जीतेंद्र को इस बारे में सबकुछ पता है लेकिन गोपनीयता के कानून से बंधे हैं।
लिखते-लिखते समीरजी भी अपनी अवकाश कथा बताने लगे। इसे पढ़िये उड़नतश्तरी पर:-
आजकल डाक मे फालतू विज्ञापन वाली डाक कितनी आने लग गई हैं. सोचा, कचरे का डब्बा यहीं लाकर रख लेता हूँ, उसी मे बेकार डाक फेंकता जाऊँगा, नही तो फिर कचरा बीनने का एक काम और बढ़ जायेगा. कचरे का डिब्बा उठाने पीछे वाले कमरे मे गया, तो डब्बा पूरा भरा मिला. ये लो, अब इसे बाहर कचरे मे डाल कर आयें, तब काम आगे बढ़े. अब कचरा फेंकने जा ही रहा हूँ, तो वहीं सामने तो डाक का डिब्बा है, उसमे बिलों के भुगतान के चेक भी डालता आऊँ, कहाँ फिर चक्कर लगाऊँगा. तो फिर पहले चेक बना लेता हूँ. चेक बुक खोली तो उसमे बस एक ही चेक बचा है. नई चेक बुक निकालनी पडेगी. कहां है...कहां है, अरे हां, याद आया, वो मेरी पढ़ने वाली टेबल की दराज मे रखी है. चेक बुक लेने पहुँचा तो देखो तो जरा, ना जाने कल रात शरबत पीने के बाद बोतल यहीं टेबल पर छोड दी.अभी ठोकर लग कर गिर जाये तो सब जरुरी कागज पत्तर खराब हो जायें. इसे फ्रिज मे रख देता हूँ, नही तो खराब और हो जायेगा.

मेरी पसंद
रवि रतलामीजी ने रचनाकार में प्रख्यात शायर कैफी आज़मी की कुछ गजलें पोस्ट कीं। उनमें से एक यहाँ प्रस्तुत है:-

हाथ आकर लगा गया कोई
मेरा छप्पर उठा गया कोई

लग गया इक मशीन में मैं
शहर में ले के आ गया कोई

मैं खड़ा था के पीठ पर मेरी
इश्तिहार इक लगा गया कोई

यह सदी धूप को तरसती है
जैसे सूरज को खा गया कोई

ऐसी मंहगाई है के चेहरा भी
बेच के अपना खा गया कोई

अब बोह अरमान हैं न वो सपने
सब कबूतर उड़ा गया कोई

वोह गए जब से ऐसा लगता है
छोटा मोटा खुदा गया कोई

मेरा बचपन भी साथ ले आया
गांव से जब भी आ गया कोई


-कैफी आज़मी

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3 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे चिठ्ठे की कड़ी जोड़ने का धन्यवाद। मुझे अंदाज है कि मेरे लेख समझने में लोगो को कठिनाई हो सकती है पर मैं अभी लिखना सीख रहा हूँ तो धीरे-धीरे भाषा सुधारूँगा। विषयवस्तु का भी फर्क है, अभी चिठ्ठा जगत की नब्ज जाँच रहा हूँ।

    लेख के बारे मे: लेख एक तार्किक खेल और उसके हल को बताता हुआ ये मनन करने का प्रयास था कि किस तरह कभी सर्वश्रेष्ठ तार्किक दिशा भी मानव व्यवहार के कारण अतार्किक प्रतीत होती है। ऐसी दृष्टि में तर्क और अतर्क की परिभाष स्पष्ट की बजाय घुली मिली हो जाती है।

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  2. सबसे पहले तो बहुते बहुत आभार कि आपने हमारे निवेदन का सम्मान करते हुये इस श्रृंखला को जारी रखा. मन भाव विभोर हुआ जाता है.
    बहुत बढ़ियां विश्लेषण है. मजा आ गया.
    धन्यवाद.

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