बुधवार, अगस्त 30, 2006

सुबह-सुबह की हवा सुहानी

मानसी ने दूसरे देशों में रहने वाले भारतीयों के बारे में लिखना शुरू किया था। उनके लिखने के बाद काफी लेख प्रवासी लोगों के बारे में लिखे गये। अपने लेख को आगे बढ़ाते हुये मानसी ने कुछ और बातें आज लिखी हैं। पठनीय लेख पर अनूप भार्गव की टिप्पणियाँ भी कम पठनीय नहीं हैं। कुछ उदाहरण नीचे दिये हैं:-

  • किसी खाली स्थान पर नयी बस्ती बनाना आसान होता है। सैकड़ों वर्ष पुरानें मोहल्ले की जगह नई बस्ती बनाना मुश्किल।

  • हज़ारों वर्षों से चली आ रही परम्पराओं और आदतों को बदलनें में समय लगता है। मनुष्य की स्वाभाविक प्रव्रत्ति हमेशा से 'परिवर्तन' के खिलाफ़ रही है।

  • भ्रष्टाचार का सीधा सम्बन्ध पेट की भूख और 'मूल ज़रूरतों' की पूर्ति से रहा है।

  • व्यवस्था से समझौता कर के अपनें लिये 'राह निकाल लेना' हमेशा सरल विकल्प रहा है, व्यवस्था को बदलनें की कोशिश की क्षमता हर किसी में नहीं होती।

  • यदि आप में पूरी व्यवस्था को चुनौती दे कर उसे बदलनें की क्षमता और ऊर्जा न भी हो तो भी उस के एक छोटे से भाग को बदलनें का प्रयास कम सराहनीय नहीं है । असुविधा तो होती है लेकिन एक अज़ब सा आत्मसंतोष भी मिलता है।


  • वैसे कोई कितना अनिवासी भारतीय है परखने के लिये अतुल ने बहुत पहले लिटमस टेस्ट अतुल ने बहुत पहले बताये थे। पहले ये लेख हाल आफ फेम में थे। आज इसे खोजने में काफी मसक्कत करनी पड़ी।

    मेलोडी गीतों के बारे में बताते हुये मनीष ने तमाम मनभावन गीतों की जानकारी दी है अपने ब्लाग -'एक शाम तेरे नाम' में। जिन गीतों के बारे में बताया उनमे से दो गीतों के अंश हैं:-
    1.झील एक आदत है, तुझमें ही तो रहती है
    और नदी शरारत है तेरे संग बहती है
    उतार गम के मोजे जमीं को गुनगुनाने दे
    कंकरों को तलवों में गुदगुदी मचाने दे

    2. रतिया अंधियारी रतिया
    रात हमारी तो, चाँद की सहेली है
    कितने दिनों के बाद, आई वो अकेली है
    चुप्पी की बिरहा है, झींगुर का बाजे साथ

    अगर आप महाविस्फोट तथा डाप्लर के सिद्दान्त के बारे में जानना चाहते हैं तो विज्ञान विश्व पढ़िये।

    बहुत से चिट्ठाकार साथी अपना सफर ब्लागस्पाट, वर्डप्रेस या दूसरी जगहों से शुरू करते हैं। बाद में वे अपनी खुद की साइट बनाना चाहते हैं। जीतेंद्र चौधरी ने अपने लेख में सरल भाषा में बताया है कि कैसे वर्डप्रेस से अपने सर्वर तक जाया जाये।

    संजय बेंगाणीं जुगाड़ी लिंक का मजा लेते रहे लेकिन तारीफ करने से चूकते रहे। आज वे एक साथ वाह-वाह करते पाये गये।

    जिन लोगों को इनाम मिला वही लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हों यह दुखदायी है।रचना बजाज अपनी व्यथा कथा बताते हुये बताती हैं।

    दिल में सच लिये हुये खबरिया ने आजतक के बाद अब एनडीटीवी की खबर ली है तथा तमाम नामचीन पत्रकारों की असलियत बताई है।उनकी व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी बातों को बताया है। अन्य लोगों के अलावा खबरिया का उत्साह बढ़ाते हुये रमेश सिंह परिहार, गया, बिहार ने लिखा है:-

    हिंदी ब्लोगिंग के स्वयम्भू दरोगा बनने की अनधिकृत चेष्टा करते कुछ अनूपों और अतुलों के मुंह पर करारे तमाचे लगाते रहिये। लिखिये, और लिखिये। ब्लोगिंग किसी के बाप की बपौती या खाला का घर नही। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन् करने वाले इन तथाकथित बुजुर्ग ब्लोगरों को गुमान है कि वे जो करें या कहें ब्रह्मवाक्य है, खुद लिखते हैं “हम तो जबरिया लिखिबे, हमार कोई का करिहे”,और आपको रोकते हैं। और ई-स्वामी पहले खुद अश्लील भाषा लिखना बंद करें, फिर “लेंगे” वाली भाषा पर एतराज करें। “पर उपदेश कुशल बहुतेरे”।


    अपने मन की बात कहते हुये प्रेमलता जीलिखतीहैं:-
    चाँदनी रात हरेक को प्रभावित करती है। योगी एकाग्रता की कोशिश करता है, जोगी प्रभु पाने की इच्छा! और मौजी मौज लेता है तो रोगी नींद। किसी को ये नैसर्गिक छटाएँ बहका देती हैं तो किसी को रुला देती हैं। किसी की वाह! निकलती है तो किसी की आह! कोई डरता है तो कोई मरता! किसी की रात कटती नहीं तो किसी की बढ़ती नहीं।

    राकेश खंडेलवाल फिर अपना गीत कलश छलकाते हुये लिखते हैं:-
    इतिहासों की अमर कथायें
    फिर जिससे जीवंत हो गईं
    जिससे जुड़ती हुई कहानी
    मधुर प्रणय का छंद हो गई
    वशीकरण के महाकाव्य के
    प्रथम सर्ग का शब्द प्रथम यह
    जीवन की क्षणभंगुरता में
    केवल एक यही है अक्षय

    अगर आपने लिनक्स पर कुछ कामधाम किया है तो अपने बारे में यहाँ जानकारी दे दें। संभव है कि आप कुछ पुरस्कार पा जायें। यह सूचना दी है रवि रतलामी ने जिन्होंने खुद काफी काम किया है लिनक्स पर। रवि रतलामी ने मर्फी के नियमों की श्रंखला में इस बार गृहणियों के बारे में जानकारी दी है। वे बताते हैं:-
    जब आप अपनी किसी महत्वपूर्ण सहेली के फोन काल का इंतजार करते बैठी होती हैं, तो पता चलता है कि आपके कार्डलेस फ़ोन की बैटरी पूरी तरह डिसचार्ज हो गई है या लैंडलाइन फ़ोन के केबल में खराबी आ गई है या मोबाइल फ़ोन की बैटरी को आपका नन्हा उस पर गेम खेलकर खत्म कर चुका है.

    उपप्रमेय 1: यदि फोन काल किसी टेलिमार्केटिंग कंपनी से आया होता है तो आपका बंद फ़ोन अचानक बढ़िया काम करने लगता है.


    इस कड़ी में निधि भी अपनी तरफ से जोड़ते हुये कहती हैं:-
    किसी दिन, फुर्सत के समय जब आप चेहरे पर काला-पीला सा कोई फ़ेस-पैक लगा के बैठी ही होती हैं, उसी समय कोई कुरियर, डाक या अनापेक्षित आगंतुक ज़रूर आता है।

    उपप्रमेय: यदि पैक सूखने की कगा़र पर है और आप अपना मुँह खोलने में असमर्थ हैं तो फ़ोन का आना भी स्वाभाविक है।


    सागर चन्द नाहर ने पूछा है कि ब्लागर पर भी कोई मर्फी के नियम हैं क्या ? जब तक रवि रतलामी जवाब दें तब तक आप फुरसतिया के ब्लाग,ब्लागर,ब्लागिंग पर लिखे सूत्रों से काम चलायें।

    गांगुली-चैपेल विवाद की झांकी दुर्गा पूजा तक में नजर आने लगी है। यह जानकारी दे रहे हैं शेखचिल्ली।

    राष्ट्रीय ध्वज के लिये सानिया मिर्जा तथा मोहम्मद कैफ की सजगता तथा सम्मान के बारे में सागर सिंह नाहर उनको
    शाबासी देते हैं।

    भारत की गरीबी के उपहास पूर्ण प्रदर्शन पर अपना आक्रोश जाहिर करते हुये पंकज बेंगानीलिखते हैं:-
    इत्ता गुस्सा आया हुज़ुर कि पुछो मत। पर क्या करें, अपने लोग ही बेच रहे हैं गोरों को क्या दोष दें। और मुखमंतरी का कहते हैं ये भी सुनो। बोले हमें कुछ ना पता है।


    फ़ुरसतिया ने मुक्तिबोध पर लिखे हरिशंकर परसाई के संस्मरणों से पाठकों को रूबरू कराया। परसाईजी ने मुक्तिबोध के बारे में बताते हुये लिखा था:-
    मुक्तिबोध भयंकर तनाव में जीते थे। आर्थिक कष्ट उन्हें असीम थे। उन जैसे रचनाकार का तनाव साधारण से बहुत अधिक होगा भी। वे सन्त्रास में जीते थे। आजकल सन्त्रास का दावा बहुत किया जा रहा है। मगर मुक्तिबोध का एक-चौथाई तनाव भी कोई झेलता ,तो उनसे आधी उम्र में मर जाता।


    अनुराग श्रीवास्तव ने नया चिट्ठा प्रारम्भ किया है। उनका स्वागत ,शुभकामनायें।

    पुनश्च: खबरिया ने दिल में सच रखते हुये अपनी बात कहनी जारी रखी। लेकिन रमेश चंद परिहार की जबान पर ताला दिया तथा उनकी टिप्पणी हटा दी। मेरा यह मानना है कि सच ,चाहे जितना कटु क्यों न हो,को इस तरह दबाया नहीं जाना चाहिये। अनुरोध है कि खबरिया को फिर से पढ़ लिया जाये। जो टिप्पणी मिटा दी गयी है वह ऊपर ही दी गयी है।इसी क्रम में खबरिया ने अपने पाठकों से कुछ भी आग्रह किये हैं।

    मेरी पसंद

    यह कविता प्रियंकर के चिट्ठेअनहद नाद से ली गयी।

    सुबह-सुबह की हवा सुहानी
    और शाम की धूप
    आंखों को जो शीतल कर दे
    सुंदर है वह रूप।

    वर्षा अच्छी रिमझिम-रिमझिम
    ज्यों प्रिय का संदेश
    देश वही अच्छा जो लगता
    नहीं कभी परदेश।


    -राजकिशोर

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    3 टिप्‍पणियां:

    1. बढिया लगा पढ़ कर. अब यह न होता, तो हम तो परिहार जी की टिप्प्णी पढ़ने से वंचित रह जाते. कब आई और कब चली गई, पता ही नही लगा.

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    2. माननीय खबरिया जी के लिये सँदेश

      चिठ्ठा चर्चा के सौजन्य से पता चला कि किन्ही परिहार ने हमें तमाचे भेजे दे कोरियर से जो आपने हम तक पहुँचने के पहले ही जब्त कर लिये ।

      खैर मैं कुछ स्पष्टीकरण देना आवश्यक समझूँगा।
      १. अनाम रहकर लिखना मैं गलत नही समझता। अगर ऐसा होता तो ईस्वामी, सृजनशिल्पी, सुर, रीडर्स कैफे और कई अन्य श्रेष्ठ लेखकों के ब्लाग पर विरोध दर्ज कर दिया होता। ब्लागिंग निजी विचारों को सार्वजनिक करने का माध्यम है, इसे अनाम रहकर करें या नाम से, कोई फर्क नही पड़ता।
      २. “सबसे पहले हम मीडिया की लेंगे” एक टाइपोग्राफिक गलती थी, मान लिया बात खत्म, पर इसे किया १७ अगस्त को और माना ३० अगस्त को। पूरे १३ दिन बाद!
      ३. इस टाइपोग्राफिक गलती से पहले आपने लिखा कि "जब हमने आजतक की ख़बर ली थी तो दर्द किन्ही औरों को उठा था। हम जब नेताओं को गालियां देते हैं तो सभी तारीफ़ करते हैं। लेकिन जब लोकतंत्र के डगमगाते चौथे स्तंभ पर उंगलियां उठाते हैं तो आलोचना क्यों की जाती है?" यह वाक्य दुबारा , तिबारा पढ़ लीजीये। नेता, अभिनेता और वे सभी हस्तियाँ जिनकी सार्वजनिक छवि है, उनके एक एक कदम पर मीडीया और जनता की नजर होती है। इन्हें जनता अपना नायक बनाती है, सर आँखो पर बिठाती है तो इनसे भी मर्यादापूर्ण आचरण की अपेक्षा होती है। वैसा न करने पर इनकी थुक्काफजीहत लाजिमी है। हाँ वह आलोचना भी मर्यादा के अँदर हो तो ठीक वरना पीतपत्रकारिता बन जाती है।
      ४. आपके ब्लाग का दावा है कि आप लोग पत्रकार है, मीडिया में रहकर, मीडिया के भ्रष्टाचार की पोल खोलना चाहते हैं। कुछ उदाहरण देता हूँ काल्पनिक हैं, गौर करियेः
      मान लीजिये, आजकल ओंकारा और कभी अलविदा न .. के विरोध का स्टंट मीडिया दिखा रहा है, जनता पक गई है, जानती है यह सब दिखावा है, आप जिस संस्थान में काम करते हैं वह अपनी व्यवसायिक प्रतिबद्धताओं के चलते एकपक्षीय समाचार देता है, आप लोग ब्लाग के जरिये वह खुलासा नही कर सकते क्या?
      मान लीजिये, आरक्षण पर धुँआधार बहस छिड़ी है पर जिस तरह का सच , जैसी उत्कृष्ट समीक्षा सृजनशिल्पी ने लिखी वैसा लिखने के लिये शायद समाजशास्त्र , राजनीतिशास्त्र का अध्ययन जरूरी होता है। यह विषय बीए , एमए में होते हैं और समाज , राजनीति की खबर लेने रखने वाले पत्रकार यह सब पढ़े होते हैं ऐसा मेरा भ्रम है। तो क्या आप की टीम में किसी ने यह सब नही पढ़ रखा ?
      जब देश का पूरा का पूरा भ्रष्ट मीडिया जैसा कि आप दावा करते हैं, राकी साँवत के चुबँन शास्त्र, बाला साहेब की कुर्सी और राहुल महाजन के हनीमून के ठिकाने का पता करने में जुटा है तो आप ऐसा क्यों किया जा रहा हैं और क्या दिखाना चाहिये उस पर रोशनी नही डाल सकते?

      दरअसल पूरे विवाद कि जड़ में मेरा भ्रम , मेरी अपेक्षा शामिल थी, जब मैने आपका यह दावा देखा कि आप लोग पत्रकार हैं तो मुझे लगा कि अब हमें वह पढ़ने को मिलेगा जो आम मीडिया राजनैतिक, व्यवसायिक प्रतिबद्धताओं के चलते दिखाना नही चाहता। पर आप लोगो का उद्देश्य था "to bring the dirty laundry of various publicly known journalist, out in public". आपको लगता है कि इससे मीडिया में व्याप्त भ्रष्टाचार मिटेगा तो आपको शतः शतः शुभकामनाऐं। मैनें खामखाँ कुछ ज्यादा की उम्मीद लगाकर आप लोगो की आलोचना की और अनजानें में अनूप शुक्ला और ईस्वामी की फजीहत करवायी।

      मैं इस प्रकरण के लिये अनूप शुक्ला और ईस्वामी से क्षमायाचक हूँ ।

      उत्तर देंहटाएं

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