शुक्रवार, अगस्त 12, 2011
मंगलवार, अगस्त 09, 2011
शनिवार, जुलाई 02, 2011
यह सब कुछ मेरी आंखों के सामने हुआ
सन दो हजार तीन से शुरु हुई ब्लाग यात्रा अब आठ साल पुरानी होने को आई। शुरुआत में किसी-किसी अखबार में कभी कहीं ब्लाग का जिक्र हुआ तो चिट्ठाकार उचके-उचके घूमते थे ब्लाग जगत में। ये देखो अलाने अखबार में फ़लानी किताब में हम छपे हैं। नाम की स्पेलिंग गलत है, फ़ोटो थोड़ा धुंधला है लेकिन ये है हमारा ही लेख।
बीते आठ साल में चिट्ठाजगत का हाल और हुलिया बदला है। आज लगभग हर अखबार नियमित रूप से ब्लागिंग पर कुछ न कुछ सामग्री देता है। कुछ अखबार तो अपने परिशिष्ट का मसाला ब्लागों से ही सीधे-सीधे ले लेते हैं। माले मुफ़्त दिले बेरहम। हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान बीच के पन्ने में एक पतला सा कालम किसी ब्लाग से लेकर ठूंस देता है। कालम में जगह की सीमा है सो अक्सर ब्लाग सामग्री कलम कर दी जाती है। पिछले दिनों निशांत की पोस्ट 10 बातें जो हम जापानियों से सीख सकते हैं हिन्दुस्तान में छपी तो कट-छंट के लेकिन ब्लाग और ब्लागर का नाम गायब था। लगता है अखबारों ब्लाग से कालम उठाने वाले ब्लागर से भी ज्यादा हड़बड़ी में रहते हैं।
पैसा-वैसा जान दो भाई। अखबार वाले बताते भी नहीं कि आपका लेख छापे हैं। वहीं साभार कह दिये। छाप दिया- कृतार्थ किया! मस्त रहो। अब कोई कह सकता है कि हम ब्लागर कौन अमूल के दूध के धुले हैं। इधर-उधर से ले-देकर सामान साटते हैं। लेकिन हम कह सकते हैं कि हम तो हिन्दी की सेवा कर रहे हैं -विनम्रता पूर्वक । कौनौ घर थोड़ी भर रहे हैं अपना। लेकिन आप तो हमारे लेखन को छाप के पैसा कमा रहे हैं। हमको पत्रम-पुष्पम देने में आप संकोच क्यों करते हैं। कुछ तो भेजिये। कम से कम चाय-पानी का खर्चा तो निकले जो दोस्तों ने छपने की खुशी में पी ली हमसे जबरियन। आप समझ नहीं रहे हैं कि अगर आप हमको मानदेय नहीं देते तो हमारे करप्ट हो जाने की खतरा है। यह बात विनीत ने कही है विस्तार से। वे कहते हैं-लेखक को पैसे नहीं मिलेंगे, तो वो पक्का करप्ट हो जाएगा!
![[रचना , सजीव सारथी, अरूण आरोड़ा, राजेश रोशन, मैथिली, शैलेश भारतवासी, संजय बेंगाणी, काकेश, अमित गुप्ता एवं रंजना भाटिया]](http://i173.photobucket.com/albums/w76/bharatwasi001/DSC01687.jpg)
५ साल होगये पता भी नहीं चला , मै यहाँ खुश होने आयी थी , खुश करने नहीं और मै उस मकसद में कामयाब हूँ ।
रचना जी ने नारी ब्लाग के माध्यम से बीते पांच साल में हलचल मचा के धर दी। उनके अपने मुद्दे रहे। अपनी सोच रही। मूलत: नारी सम्मान के मुद्दों पर वे लिखती-टिपियाती-लड़ती-झगड़ती रहीं। इस मामले में उन्होंने अपनी समझ से बिना किसी से समझौता किये अपनी बात रखी। लोगों की शिकायत भी रहती रही कि उनको हर मुद्दे को नारी स्वाभिमान से जोड़ने की आदत है।
अपनी समझ के अनुसार अपनी बात कहने में रचना जी ने कभी किसी का लिहाज नहीं किया। न किसी दबाब में आईं। अपने ब्लाग से जुड़ी साथियों की बात का विरोध भी करने में भी उन्होंने कभी कोई संकोच नहीं किया। जिनके लिये कभी उन्होंने बहसें कीं ऐसा भी हुआ कि उन्हीं लोगों ने उनको अपने ब्लाग पर आने से बरज दिया। लेकिन वे इससे अप्रभावित रहीं।अपने अंदाज में लिखत-पढ़त करतीं रहीं। उनके तर्क कभी-कभी अटपटे भी लगते रहे और कभी यह भी लगता रहा कि वे बेफ़जूल हर मुद्दे की गाड़ी स्त्री-पुरुष वाली पार्किंग में ले जाकर खड़ी कर देती हैं।
अपने स्वभाव के चलते उनको हिन्दी ब्लाग जगत में बहुत विरोध भी झेलना पड़ा। तमाम लोगों ने उनके बारे में बहुत बेशर्म, बाहियात, अश्लील , दादा कोंडके की भाषा में फ़ूहड़ द्विअर्थी टिप्पणियां कीं। उनके खिलाफ़ अनामी नाम बाहियात पोस्टें लिखीं। लेकिन इससे रचनाजी बहुत दिन तक विचलित नहीं रहीं!
रचना जी के खजाने में ब्लाग जगत की तमाम घटनाओं के कच्चे चिट्ठों के सटीक पक्के लिंक मौजूद हैं। कब, किसने, उनके किसी मुद्दे या उनके या और किसी के खिलाफ़ क्या कहा था यह वे तड़ से पेश कर सकती हैं। कभी कोई ज्यादा शरीफ़ बनता दिखायी दिया टिपियाने में तो उसका भी कोई लिंक पेश कर सकती हैं कि आप का एक चेहरा यह भी था/है।
हमारे मौज-मजे वाले अंदाज की रचना जी अक्सर खिंचाईं करती रहीं। उनका कहना है कि ब्लागजगत के शुरुआती गैरजिम्मेदाराना रुख के लिये बहुत कुछ जिम्मेदारी हमारी है। अगर हम हा-हा, ही-ही नहीं करते रहते तो हिन्दी ब्लागिंग की शुरआत कुछ बेहतर होती। हम भी शुरुआत में रचना जी को खाली-मूली में जबरदस्ती लोहे की तरह सीरियस मानकर उनकी खिंचाई करते रहे। समय के साथ मुझे उनके मिजाज का अंदाज हुआ फ़िर मैंने उनकी खिंचाई बंद कर दी। हालांकि रचनाजी ने बाद में हमसे बल भर मौज ली। कभी अनूप शुक्ल की हिन्दी की योग्यता पूंछी, कभी ठग्गू के लड्डू के बहाने खींचा और मामाजी का जिक्र करते रहने के चलते।
तमाम बातों के अलावा जो एक शानदार च जानदार पहलू उनके व्यक्तित्व का लगता रहा वह यह कि वे बिना लाग लपेट के अपनी बात कहती रहीं। बहस करने के मामले में उनको महारत हासिल है। अपने ब्लाग से जुड़ी महिला साथियों को हमेशा मुद्दे की बात करने को प्रोत्साहित करतीं रहीं हमेशा। कुछ लोग तो उनके प्रोत्साहन से घबरा तक जाते रहे।
बहस-वहस जब चल रही हो तो रचना जी नहले पर दहला मारने के प्रयास से चूकने के चक्कर में कभी नहीं रहीं। अन्य लोगों के अलावा वैज्ञानिक चेतना संबंध अरविंद मिश्र जी और नारी चेतना की संवाहक रचना जी में गाहे-बगाहे बहस होती रही। उत्तर-प्रतिउत्तर भी। एक बार का वाकया मुझे याद आता है।
साल भर पहले अरविंद मिश्र जी ने अपनी एक मार्मिक पोस्ट में अपने साथ हुये अन्याय का विस्तार से वर्णन करते हुये बताया कि उनका नाम डार्विन के ऊपर छपी किताब से साजिशन हटवा दिया गया। अपनी पोस्ट में उन्होंने रचनाजी की पोस्ट जिक्र किया। रचनाजी के ब्लाग पर पोस्ट मजनून था :
साइंस का परचम लहराने वालो कि क़ाबलियत पता नहीं कहा चली गयी जब उनका नाम एक किताब पर से हटा कर किताब को छापा गया । किताब के लिये ग्रांट मिलाने कि शर्त यही थी कि उनका नाम हटा दिया जाये क्युकी उनके दुआरा प्रस्तुत तथ्यों को गलत माना गया । सो नाम हट गया हैं
मुगाम्बो खुश हुआ !!!!
कुल कुल दुर्गति हो रही हैं पर घमंड का आवरण पहन कर वो अपने को विज्ञानं का ज्ञाता बता रहे हैं और बताते रहेगे ।
सहज ही अरविंदजी के साथ हुये अन्याय से लोगों को उनके प्रति सहानुभूति हुई। सहानुभूति के प्रवाह में अरविंद जी का प्रकाशक पर कानूनी कार्यवाही करने का शुरुआती आक्रोश भी बह गया। अरविंद जी का गुस्सा बाढ़ के पानी की तरह होता है। आता है बह जाता है।
बाद में जब मैंने कुल कुल दुर्गति की खोज की तो पता चला कि दो दिन पहले ही अरविंद जी ने एक ब्लाग पर टिप्पणी की थी :
कुछ के तन मन दोनों ही अच्छे नहीं होते ..ये कुदरत से अपनी लड़ाई लड़ें !
और यही न तो तन की कद्र करते हैं और न मन की ….चलो देह पर तो बस नहीं
मगर मनवा तो सुधार लो ये मूढ़ !
ई जनम बार बार थोड़े ही आवेला -बड़े जतन मानुष तन पावा
सृष्टि की इस सुन्दरतम रचना (कोई दूसरा शब्द हो तो भैया रिप्लेस कर लो इस
पर कुछ लोग अपना कापी राईट समझ लिए हैं जबकि कुल कुल दुर्गति हो चुकी है
) को जो न सराहे उसके जीवन को धिक्कार है धिक्कार
दो दिन बाद ही रचनाजी उन्हीं की भाषा में उनको जबाब देकर हिसाब बराबर कर दिया। जैसे को तैसा जबाब देने की कोशिश करना रचना जी की सहज प्रवृत्ति है। खतरा ब्लागर हैं इस मामले में वे।
रचनाजी पिछले दिनों ब्लाग जगत के मठाधीशों की कालक्रम के अनुसार गणना की और अपने पसंद के ब्लाग बताये। कट्टर हिन्दूवादी रचना जी का पसंदीदा ब्लाग सुरेश चिपलूनकर का ब्लाग है। तेंदुलकर फ़ेवरिट खिलाड़ी।
न जाने कितने मुद्दों पर हमारे रचना जी से मतभेद हैं। लेकिन उनकी बहादुरी और जैसा महसूस करती हैं वैसा कहते रहने की हिम्मत और बेबाकी की मैं तारीफ़ करता हूं।
अपने ब्लागिंग के पांच साल होने की सूचना उन्होंने और लोगों के अलावा मुझे भी जलाने के लिये भेजी थी। लेकिन वे अपने मकसद में कामयाब न हुई। मैंने अपनी खुशी का इजहार करते हुये उनको बधाई दी और आगे के लिये शुभकामनायें भी। एक बार फ़िर से रचना जी को ब्लाग जगत में पांच साल पूरे करने की बधाई!
पांच साल पूरा होते ही रचनाजी ने नारी ब्लाग पर अपनी आखिरी पोस्ट की जानकारी दी। सहज ही लोगों ने इसके विपरीत अनुरोध किया और आगे भी लिखते रहने का अनुरोध किया। उन्मुक्तजी की सलाह सबसे उपयुक्त लगी मुझे:
मेरे विचार से यदि समय का अभाव हो तो कोई और सूत्रधार बन जाये पर विचारों को विश्राम देना ठीक नहीं। जब मन में कोई बात उठे तो अवश्य लिखें
ऐसे ही एक हफ़्ते पहले ज्ञानजी ने अपने दास्ताने टांगने का हल्का एलान सा किया लेकिन लोगों ने जोर से मना कर दिया तो फ़िर चालू हो गये।


बहुत दिन बाद कुश ने एक मजेदार पोस्ट लिखी -कहानी शीला, मुन्नी, रज़िया और शालू की पोस्ट को जयपुरिया डिस्काउंट (कुश और नीरज जी जयपुर निवासी हैं) देते हुये नीरज गोस्वामी जी ने लेखक को वंदनीय बताया और पोस्ट को कालजयी। डा.अनुराग आर्य को पोस्ट पढ़कर हरिशंकर परसाई जी की कहानी एक हसीना चार दीवाने याद आई। डा.अनुराग ने एक दीवाना गोल कर दिया और लड़की को हसीना बना दिया। परसाई जी कहानी का शीर्षक है: एक लड़की, पांच दीवाने।
कुश ने अपनी पोस्ट में शीला का जिक्र करते हुये बताया:

परसाई जी ने एक लड़की, पांच दीवाने में लड़की का जिक्र करते हुये बताया था:
लड़की छरहरी है। सुन्दरी है। और गरीब की लड़की है।
मोहल्ला ऐसा है कि लोग 12-13 साल की बच्ची को घूर-घूर कर जवान बना देते हैं। वह समझने लगती है कि कहां घूरा जा रहा है। वह उन अंगो पर ध्यान देने लगती है। नीचे कपड़ा रख लेती है। कटाक्ष का अभ्यास करने लगती है। पल्लू कब खसकाना और कैसे खसकाना -यह अभ्यास करने लगती है। घूरने से शरीर बढ़ता है।
परसाईजी की कहानी में लड़की सारे दीवानों को झांसा देते हुये अपनी पसंद के लड़के के साथ घर बसाती है। अपने घर में ही रहती है। कुश के यहां शीला, मुन्नी, रजिया और शालू मजबूरी में समझौता करते हुये खुश रहने का जतन करती हैं। घर से दूर। एक लड़की और चार लड़कियों पालने में अंतर स्वाभाविक है।
कल स्व. कन्हैयालाल नंदन जी वर्षगांठ थी। इस मौके पर लखनऊ के पत्रकार दयानंद पाण्डेयजी ने नंदन जी जुड़ी अपनी यादों को विस्तार से लिखा। वे लिखते हैं:

एक पत्रकार मित्र हैं जिन का कविता से कोई सरोकार दूर-दूर तक नहीं है, एक बार नंदन जी को सुनने के बाद बोले, ‘पद्य के नाम पर यह आदमी खड़ा-खड़ा गद्य पढ़ जाता है, पर फिर भी अच्छा लगता है.’ तो सचमुच जो लोग नंदन जी को नहीं भी पसंद करते थे वह भी उन का विरोध कम से कम खुल कर तो नहीं ही करते थे. वह फ़तेहपुर में जन्मे, कानपुर और इलाहाबाद में रह कर पढे़, मुंबई में पढ़ाए और धर्मयुग की नौकरी किए, फिर लंबा समय दिल्ली में रहे और वहीं से महाप्रयाण भी किया. पर सच यह है कि उन का दिल तो हरदम कानपुर में धड़कता था. हालां कि वह मानते थे कि दिल्ली उन के लिए बहुत भाग्यशाली रही. सब कुछ उन्हें दिल्ली में ही मिला. खास कर सुकून और सम्मान. ऐसा कुछ अपनी आत्मकथा में भी उन्हों ने लिखा है. पर बावजूद इस सब के दिल तो उन का कानपुर में ही धड़कता था. तिस में भी कानपुर का कलक्टरगंज. वह जब-तब उच्चारते ही रहते थे, ‘झाडे़ रहो कलक्टरगंज!’ या फिर, ‘कलेक्टरगंज जीत लिया.’
कल ही हमारे साथी प्रियंकर पालीवाल जी का जन्मदिन था। उनको जन्मदिन की बधाई!
मेरी पसंद
यह सब कुछ मेरी आंखों के सामने हुआ!
आसमान टूटा!
उस पर टंके हुये
ख्वाबों के सलमे-सितारे
बिखरे!
देखते-देखते दूब के रंगो का रंग
पीला पड़ गया!
फ़ूलों का गुच्छा
सूखकर खरखराया!
और यह सब कुछ मैं ही था
यह मैं
बहुत देर बाद जान पाया।
डा.कन्हैयालाल नंदन
और अंत में
काफ़ी दिन बाद आज चर्चा करने का मनऔर मौका बना! इसके पहले भी कई बार शुरुआत की लेकिन पोस्टें ड्राफ़्ट मोड में ही आकर रह गयीं। आज भी चर्चा शुरू सुबह की थी। लिंक लगाते-खोजते देर हो गयी सो बात शाम पर टल गयी। इस बीच कुछ बेहतरीन पोस्टें पढ़ीं। उनका जिक्र फ़िर कभी।
ब्लाग जगत में संकलकों की कमी के चलते पोस्टों का पता चलना मुश्किल हुआ है लेकिन यह तय है कि अच्छा लिखने वालो लोग बढ़ रहे हैं।
फ़िलहाल इतना ही। बाकी फ़िर कभी!
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बुधवार, अप्रैल 20, 2011
शुक्रवार, अप्रैल 08, 2011
गुरुवार, अप्रैल 07, 2011
मंगलवार, फ़रवरी 08, 2011
इसको हैरां कर दिया, उसको परिशां कर दिया
इसको हैरां कर दिया, उसको परिशां कर दिया
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मंगलवार, फ़रवरी 01, 2011
सोमवार, जनवरी 31, 2011
शनिवार, जनवरी 29, 2011
समय पृथ्वी बन जाता है… एक चर्चा विज्ञान विषयक चिठ्ठो की !
चर्चाकार हैं आशीष श्रीवास्तव!
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शुक्रवार, जनवरी 28, 2011
नदी का साथ देता हूँ, समंदर रूठ जाता है
नदी का साथ देता हूँ, समंदर रूठ जाता है
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रविवार, जनवरी 23, 2011
शनिवार, जनवरी 22, 2011
गुरुवार, जनवरी 20, 2011
बुधवार, जनवरी 19, 2011
सोमवार, जनवरी 17, 2011
सारा पानी छू के होठों से गुलाबी कर गया
सारा पानी छू के होठों से गुलाबी कर गया
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बुधवार, जनवरी 12, 2011
ख्यालो के तबादलों के बीच कम्प्यूटरी हस्तक्षेप ....... जारी है !!!!!
ख्यालो के तबादलों के बीच कम्प्यूटरी हस्तक्षेप ....... जारी है !!!!!
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रविवार, जनवरी 09, 2011
चिट्ठाचर्चा के सातवें साल की शुरुआत
चिट्ठाचर्चा के सातवें साल की शुरुआत
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चिट्ठाचर्चा के सातवें साल की शुरुआत
कुछ अंग्रेजी ब्लागरों के हिंदी विरोधी रवैये की प्रतिक्रिया स्वरूप शुरु की गयी चर्चा इतने दिन का सफ़र तय करेगी यह उस समय सोचा भी नहीं गया था।
यहां चिट्ठाचर्चा की कुछ पोस्टों के लिंक दिये है
1. आइये स्वागत है आपका :यह पोस्ट चर्चा की पहली पोस्ट है। कुछ दिन बाद न जाने कैसे चिट्ठाचर्चा हैक हो गया था। उसकी पुरानी पोस्टें मय कमेंट्स गायब हो गयीं थी। फ़िर देबाशीष इसे खोज-खाज के लाये। आप देखिये किन-किन ब्लॉगस की चर्चा की कल्पनायें थीं।
2. अस्सी नब्बे पूरे सौ: 8 सितम्बर , 2005 को हिन्दी के सौ ब्लॉग पूरे होने की उत्फ़ुल्ल सूचना। टिप्पणी कुल जमा तीन।
3. मराठी चिट्ठों का नायाब ख़जाना :देबू की इस जानकारी पर जीतेन्द्र की प्रतिक्रिया थी- अमां यार! झकास, क्या इमेज लगायी है यार!, शानदार है, लगता है बाबूराव ब्लागर कलम लेकर लिखने को हाजिर है. आपने ये ग्राफ़िक्स बनाया है, या (मेरी तरह) कंही से छुआया है?
4. यूजनेट के माध्यम से विचार-विमर्श :इस पोस्ट में आपस में विचार-विमर्श के लिये संभावनाओं पर विचार हुआ। देबाशीष के द्वारा।
5. पहला असमिया चिट्ठा? :की जानकारी दी देबाशीष ने। 29 सितम्बर 2005 को।
6. जुम्मे पर पेश है खिचड़ी !: पेश की अतुल अरोरा ने अपनी पहली चर्चा में। अतुल हर बार नये अंदाज में चर्चा करते रहे। मजेदार। रोचक।
7.सिर मुडाते ही ओले पड़े… समीरलाल को जब उन्होंने पहली चर्चा की। टिप्पणी मिलीं आठ! समीरलाल की चर्चा में उनका हस्य बोध खुलकर खिलता था। इसीलिये हमने उनके बारे में उस समय लिखते हुये उनको हास्यव्यंग्य का किंग कहा था। मुंडलिया उनका मुख्य हथियार रहा चर्चा का। उनकी देखा-देखी एक मुंडलिया हमने भी लिखी थी देखिये :
भोर भयी इतवार की, हम रहे बिस्तर पर अंगड़ाय,
सूरज आया गेट पर, हम उसको भी दिये भगाय,
उसको दिये भगाय कि अभी तो धांस के सोना है,
रात जगे हैं देर तक, उसका हिसाब भी होना है,
अभी पधारकर आप जी, मत करिये मुझको बोर,
जब हम जागेंगे नींद से, तभी होयेगी अपनी तो भोर।
चिट्ठा चर्चा कीजिये, मुझे मिला आदेश
फ़ुरसतियाजी ने किया जारी अध्यादेश
जारी अध्यादेश, कुण्डली लें समीर से
और सजायें काव्य-सुधा रस भरी खीर से
लगे हर्द फिटकरी न होवे कुछ भी खर्चा
लेकिन करें सिर्फ़ कविता में चिट्ठा चर्चा
अइयो अम चेन्नई से आशीष आज चिठठा चर्चा कर रहा है जे। अमारा हिन्दी वोतना अच्छा नई है जे। वो तो अम अमना मेल देख रहा था जे , फुरसतिया जे अमको बोला कि तुम काल का चिठ्ठा चर्चा करना। अम अब बचके किदर जाता। एक बार पहले बी उनने अमको पकड़ा था जे,अम उस दिन बाम्बे बाग गया था। इस बार अमारे पास कोई चान्स नई था जे और अम ये चिठ्ठा चार्चा कर रहा है जे।
क्यों करते हैं आप लोग इस तरह की चर्चा.. मुझे समझ नहीं आया आज तक.. सामान्य भाषा में की गई चर्चा भी बेमतलब ही लगती थी.. इस फूहड़ मद्रासी में इस का स्तर शक्ति कपूर के हास्य जैसा हो गया है.. आप सब लोग धुरन्धर लोग हैं.. मैं नया हूँ..हो सकता है आपकी परिपाटियों और परम्पराओं से अपरिचित हूँ.. लेकिन जिस तरह से मेरे गम्भीर लेख का भद्दा मजाक यहां बनाया गया वो आप सब को पढ़ने में बड़ा मज़ा आया .. ये जानकर थोड़ी हैरत हुई ..
- ग्रेट! ओपनिंग इतने धुआंधार अन्दाज में। बहुत मेहनत और बहुत समग्रता से देखा है आपने आज की पोस्टॊं को! कविता जी मेरी जानकारी में सबसे जिम्मेदार चर्चाकार थीं। कोई चर्चा उन्होंने टालू अंदाज में नहीं की। अक्सर छह से सात घंटे कम से कम लगाकर चर्चा करतीं थीं कविता जी!
टीवी पर आकर समीर जी फूले नहीं समाते ।सिर्फ़ बमों से नहीं मरे कुछ मेट्रो ने भी मारे ।
पाठक भी पढ पोस्ट अधूरी टिप्पणियाँ बरसाते ॥
व्यंग्य वाण क्यों सहें अकेले गृहमन्त्री बेचारे ॥
सुख दुख के दो रंग आज रंजना सिंह दिखलाएं ।
नयन नीर हर्षित मन दोनों ही अच्छी कविताएं ॥
पुसादकर जी समझ न पाए भेद न्यूज चैनल का ।
टीवी पर भी पढा जा रहा सिर्फ सामना कल का ॥
हिन्दू भाई जरा ध्यान दें लेख पढें यह पूरा ।
आज तरुण ने अनूप शुक्ला को शंका से घूरा ॥
एक झूठ को सदी के सबसे आसान सच में बदलने की कोशिश करती हैं
सिगरेट पीती हुई लड़कियाँ …
उंगलियों में हल्के से फंसाकर
धुँएं की एक सहमी लकीर बनाना चाहती हैं
ताकि वे बेबस किस्म की अपनी खूबसूरती को भाप बना कर उड़ा सकें
अपूर्व का कहना है गौतम की चर्चा पर:चिट्ठा-चर्चा ने रोग पाल ही लिया..और क्या खूबसूरत रोग पाला है..कि जैसे सर्दी की गुनगुनी धूप खिली हो..किसी दोशीजा के आरिज़ पर..अब यह सूरज मसरूफ़ियत के बादलों की पीछे न छुपा रहे हो बात बने
..फिर अपना हाल तो बकौल शाद सा’ब
दिले-मुज़्तर से पूछ ऐ रौनके-बज़्म
मै खुद आया नही लाया गया हूँ
चर्चा कुछ हमहू करें, छोड़ा नहीं यह काज
छोड़ा नहीं यह काज कि अब आराम करेंगे
टिप्पणी बाजी जैसा अब, कुछ काम करेंगे
कहत समीर कविराय, हरदम ऐसे बचना
टिप्पणी करते जायें, बाकी लिखेगी रचना.
चिट्ठाचर्चा के चर्चाकार
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
उन्मुक्त जी को चिट्ठाचर्चा के लिए निमंत्रित किया जाए व उन्हें भी दल में शामिल किया जाए. उनकी निगाह भी हिंदी चिट्ठों पर बारीकी से रहती है. उनका भी अंदाजेबयां निराला व उद्धरणयोग्य होगा ऐसा मेरा विश्वास है.
आज इस के इतिहास में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। सभी लिंकों को तसल्ली से पढ़ता हूँ।
बहरहाल नये रंगरूप पर हम रीझ रहे हैं। ढेरों बधाइयाँ और एक फ्लाइंग किस मेरे बेटे सत्यार्थ की ओर से भी।
बेटे सत्यार्थ को दो ठो पुच्ची और खूब सारा आशीष!
सात साल!!! एक लम्बा अंतराल होता है …..इस दौरान उसी उर्जा के साथ काम करना निसंदेह प्रशंसनीय है….इश्वर आपकी सेन्स ऑफ़ ह्यूमर को इसी उर्जा के साथ बनाये रखे
सेंस आफ़ ह्यूमर कहां जाये ससुरा भाग के। इंनबिल्ट है वो तो हमारे साथ!
is platform ne bahut kuch diya hai.. na jaane kitne to logon se milwaya hai jo ab bahut achhe dost hain aur bahut kuch likhne/padhne/sochne ko bhi diya..
satven saal mein ye naya kalaver pasand aaya.. chitthacharcha youn hi din dooni raat chaugni tarakki kare, yahi kaamna hai..
Amen!!
पंकज उपाध्याय तो बाकयदा एक ठो कविता भी लिख चुके हैं पहिले ही। इस कविता से पता चलता है कि आज की पीढ़ी कित्ती धैर्यवान है:
उसकी बिंदी के तो हिलने का
मैं इंतज़ार करता था, की कब वो
हल्का सा हिले और मैं बोलूँ
की “रुको! बिंदी ठीक करने दो”।
तुम्हारी सारी पोस्टें उसके बाद एक साथ पढ़ीं थी। अद्भुत अनुभव रहा वह भी।
aur kabhi aapko khule manch par apni sau posts jhelne ke liye dhanyawaad bhi nahi kah paya.. kai posts par tippaniyon ka khaata aap khol gaye. shukriya is saare samman ke liye..
chitthacharcha ko youn bada hota dekh ek achha anubhav hota hai. shayad yahi ek wajah thi jisne hamein blogjagat ki pichli kaafi peedhiyan virasat mein di kyunki iske alawa hamare paas itna pracheen manch koi aur nahin tha aur ye sochkar ghanghor aascharya hota hai ki kitne to log ise kitne to samay se bakhoobi chalate rahe. roz naye naye judte bloggers ko is baat ka khayal rakhna chahiye ki yahan hamse pahle bhi kai log the, wo jinhone hamari neenv rakhi thi, wo jo saare sammanon se pare hain.. sach mein bada achha laga.. fir se dheron badhiyan..
B’day party honi chahiye. nahi?
लहसुन प्याज के साथ
पोस्ट टिप्पणी का साथ
ब्लॉग चर्चा का साथ
साथ यह ऊंगलियों का है
हमें तो मजबूत अंगूठा मिला है
pranam
ghar bhi tayar kar liye ….. aur bachhe ke ghar
ka tala laga hai uska bhi kuch kiya jaye bhaijee
pranam.
pranam.
सभी चिठ्ठाकार पूरी मेहनत व समर्पण से चर्चा करते हैं…
(हालांकि कुछ ऐसे चर्चाकार भी हैं जो “अतिरिक्त समर्पण” दिखाते हुए महिलाओं के चिठ्ठों को अधिक प्रमुखता देते हैं… he he he he he)
कल से दरवाज़े पे खड़े हैं, ऐसा मुरीद भी है कोई? कब से गुलदस्ता हाथ में लिये खड़े हैं.
बहुत शानदार सालगिरही चर्चा है. बड़ी मशक्कत हुई होगी इसे तैयार करते हुए. तमाम व्यस्तताओं के बीच इतनी लगन से चर्चा करना….hats off है जी. चर्चा का यह मंच साल दर साल हमें अच्छे लिंक्स उपलब्ध कराता रहे,[और हमारी पोस्टों की चर्चा करता रहे
अरे!!!! सतीश भाईसाहब कहां गये? खड़े तो मेरे साथ ही थे
सतीश भाई साहब बस आते ही होंगे अभी टिपियाने।
गूगल क्रोम पर यह टेम्पलेट बिल्कुल ठीक दिख रहा। कोई शिकायत नहीं
सात साल पूरे करने की बधाईयाँ एवम ढेर सारी शुभकामनाएं।
आपका अनुज
जीतू चौधरी
इनते वर्षों में कई एग्रीगेटर विरोध के चलते बैठ गए मगर चिट्ठाचर्चा जारी रही.
अनुप शुक्ल पीछे न हो तो चिट्ठा-चर्चा सात साल तक निरंतर नहीं रह पाती. हमारी घणी घणी बधाई स्वीकारें. चिट्ठा चर्चा से जुड़ा हुआ होना भी एक सम्मान की बात हो गया है.
तमाम शुभकामनाएं.
बहुत बधाई!!!
सफारी: चकाचक
फायरफोक्स : अब ठीक है, जावास्क्रिप्ट समस्या भी चली गयी
क्रोम : अब ठीक है
लगता है अबा चिट्ठाकारी से संन्यास वापिस लेना पढेगा ! हम जल्दी ही वापिस आयेंगे !
भई मज़ा आया.. साँस रोके 38 मिलट बईठे रहे.. धीरे धीरे मचल ओ दिले बेकरार वाले अँदाज़ में !
खुला.. गेट-अप शेट-अप की बातें बाद में.. पायदान दर पायदान इतनी विहँगम चर्चा की भला कौन अनदेखी कर सकता है ?
आज जाना कि आप पक्के फुरसतिया हो, कितना समय दिया होगा, कितनी नोट्स बनायी होगी, सिलसिलेवार सजाया होगा,
फिर यहाँ परोसा होगा । अपना भाव बढ़ाने को अब यह न कहना कि यह तो बिना किसी विशेष प्रयास के यूँ ही बन गयी ।
आज की यह चर्चा पृष्ठाँकित कर ली है, चभला चभला कर एक के बाद एक पोस्ट की जुगाली करेंगे । तब तक आप टिप्पणी बक्सवे में अँत्याक्षरी खेलो । एक बार पुनः चर्चाकार टीम को बधाई , समीर भाई को मनाईये, मेरे दिवँगत होने से पहले ज्ञान जी से एक चर्चा करवाय देते, तो आत्मा पुलकित हो जाती । मुला विवेक सिंह पर टूल्टिप डालो तो अनूप शुक्ल चमकते हैं, यहू ठीक लेकिन लवली गोस्वामी पर भी आप ही नाम आता है.. जे गड़बड़ जी, इसको टीक करो जी !
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येल्लो कल्लो इनसे बात… जबरजस्ती की तोहमत !
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ई ज़ुलुम बात हम कब कहा ?
आने वाले वर्षों के लिये शुभकामनाएं
इतने सारे लिंक्स देखकर मज़ा आ गया कई दिन की पढ़ाई का इंतेज़ाम हो गया
बहुत उम्दा चर्चा और रिपोर्ट है
जिस दिन चिट्ठाचर्चा का पर्चा नहीं दिखता, उस रोज़ लगता कि ब्लाग देखने की प्यास मिटी नहीं। इसलिए प्रार्थना है कि इस ‘अफ़ीम’ से पाठकों को वंचित न रखें:)। बहुत बहुत शुभकामनाएं॥
———
पति को वश में करने का उपाय।
मासिक धर्म और उससे जुड़ी अवधारणाएं।
अनुपम चर्चा बाँचकर, मुँह से निकला वाह ।।
फ़िर से अब आ जाओ जी चर्चा करो विवेक।
एक साथ इतना न माल ठेल दिए हैं कि लगता है सनीचरे एतबार को पूरा होगा..
आप का अथक परिश्रम और कमिटमेंट बेमिसाल है और हम ब्लोगरों के मन में श्रद्धा जगाता है। चिठ्ठाचर्चा को और आप को बधाई
अचानक से इतना नयापन कैसे ? सबकुछ चकाचक है !! शुभकामनाएं !
अब तक अपनी खैर कैसे मना पा रहा हूँ ….मैं तो सोच कर ही प्रसन्न हूँ | जैसा सबने कहा इस मौके पर यह कहना ही पडेगा कि आप ना होते ….तो यकीनन यह सात साल इत्ती पोस्टत्पादक ना हो पाती ?
एक सुझाव : टेक्स्ट कलर थोडा से और डार्क किया जाए ….खास कर हम जैसे चश्मा-धारिओं के लिए !
अनूप जी के जवाब तो अब तक यहीं पड़े रहेंगे ……टिप्पणीकर्ताओं को तो मालूम ही नहीं चलेगा !
सात साल किसी भी विचारधारा का आगे सतत बहना लोगों को अपने से जोड़ते हुये ही अपने आप में एक बड़ी बात है आजकल शादियाँ, सरकार, सम्बंध कुछ भी नही टिकता और न ही टिकाऊ होने की ग्यारंटी कोई देता है।
यात्रा जारी रहे……….
शुभकामनायें
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
आ रह्ह्ह्हा हूँ …..
बड़ी मुश्किल में दरवाजे खुले …पाबला जी की मदद लिया करो ! कब का खुल गया होता ….
दुबारा पुनर्जीवन लगता है ! उम्मीद करता हूँ बिना किसी पर ऊँगली उठाये चिटठा चर्चा प्यार और परस्पर सम्मान देता बांटता आगे बढेगा !
” गैरों ” को भी सम्मान कब देते हो इसका इंतज़ार रहेगा , वे भी बहुत अच्छे हैं एक बार गले तो लगाओ !!
भूले -भटके उन अपनों के ,
कैसे दरवाजे , खुलवाएं ?
जिन लोगों ने जाने कब से ,
मन में रंजिश पाल रखी है
इस होली पर क्यों न सुलगते दिल के ये अंगार बुझा दें !
कदम बढा कर दिल से बोलें, आओ तुमको गले लगा लें !
बरसों मन में गुस्सा बोई
इर्ष्या ने ,फैलाये बाजू ,
रोते गाते , हम दोनों ने
घर बबूल के वृक्ष उगाये
इस होली पर क्यों न साथियो आओ रंग गुलाल लगा लें !
भूलें उन कडवी बातों को , आओ हम घर -बार सजा लें !
आओ तुमको गले लगा लें – सतीश सक्सेना
दरवाजे खुलने के लिये पहले घर-मकान बनने जरूरी होते हैं। उसके लिये किसी का सहयोग नहीं चाहिये होता है। न किसी प्रायोजक का इंतजार!
जब हमने चर्चा की शुरुआत की थी सात साल पहले तब ब्लॉग बनाने के सिवा कोई तकनीकी जानकारी नहीं थी। सात साल में भी कुछ खास नहीं सीखे नया। लेकिन ब्लॉग चल रहा है और इंशाअल्लाह चलता भी रहेगा। इस सबके लिये हुनर से ज्यादा जुनून काम करता है। हमेशा। और वह काम भर का है अपन में।
मस्त रहिये। देखते रहिये। बिन्दास!
बहुत खुशी होती है चिट्ठाचर्चा की इस प्रगति पर। हमारी तरफ से ढेरों शुभकामनायें।
यह काम बहुत पहले हो जाना चाहिये था, देबु दादा ने काफी पहले यह सुझाव दिया भी था और हम सब ने उसका समर्थन किया था। यदि पहले ही यह कर लिया जाता तो .com या .in जैसा आसान पता होता।
इतने सालों तक उसी जीवट उर्जा से चर्चा करना हिम्मत का काम है. सारे चर्चाकार बधाई के पात्र हैं. हर साल कुछ नए लोगों के जुड़ने से चिट्ठाचर्चा को नया रंग मिलता है. डॉक्टर अनुराग और अब गौतम जी…और अनूप जी की चर्चा तो सदाबहार होती है.
कुछ वक्त पहले तक चिट्ठाचर्चा पर नियमित आना था…खबर लेने के लिए…कहाँ क्या चल रहा है एकदम एक जगह चकाचक खबर मिल जाती थी. इधर फिर से सब कुछ झकास चल रहा है…फिर से नियमित हो रही हूँ. इस मंच से बहुत से लोगों को जाना है…एक बार फिर ढेर सारी बधाई नए वेबपेज के लिए.
यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहे और बेहतरीन पोस्टें हमें ऐसे ही पढ़ने को मिलती रहें…
ईश्वर आपकी ऊर्जा और संक्रमण प्रवृत्ति को बनाए रखे और हर साल कई नए चर्चाकार इस मंच से जुड़ते रहें