बुधवार, जनवरी 05, 2011

सिर्फ सेहत के सहारे जिन्दगी कटती नहीं

नया वर्ष और ये नया दशक क्या शुरू हुआ, बैठे-बिठाये हमने ये नया रोग पाल लिया...चर्चा-रोग। हुआ यूँ कि हुआ कुछ भी नहीं था, कोई लक्षण भी नहीं नजर आये थे। हाँ, इतना जरूर है कि एक बचपन से किस्म-किस्म के रोगों को पालने का शौक जरूर अब तलक बरकरार है। कश्मीर की इस ठिठुराती सर्दी में मेरे ये तमाम रोग मुझे गर्म रखते हैं। कश्मीर का जिक्र छिड़ ही गया है तो मेरी तलाश बताती है कि हिंदी ब्लौग-जगत में मेरे अलावा कश्मीर के घाटी वाले इलाके से बस एक और ब्लौगर हैं- उस्मान और वो मेरा कश्मीर नाम से ब्लौग चलाते हैं। एक नजर डालिये उस ज़ानिब, कई पहलू देखने को मिलेंगे कश्मीर के। उनके किसी पुराने पोस्ट पर कभी एक बड़ी विनम्र-सी टिप्पणी भी की थी मैंने। इच्छा है कि एक बार मिलूँ उनसे। उस्मान की आखिरी पोस्ट पिछले साल 18 अक्टूबर की लिखी हुई है, जिसमें वो कहते हैं और बड़ा ही वाजिब कहते हैं:-

अधिकांश फौजियों की निगाह से कश्मीर का हर बाशिंदा आतंकवादी या आतंकियों को पनाह देने वाला है। आम कश्मीरी की नजर में हर फौजी जुल्म करने वाला है। घाटी छोड़ चुके कश्मीरी पंडितों के लिए कश्मीर का सच अलग है और कश्मीर के गाँवों में रहने वाले उन मासूमों के लिए अलग, जिनके लिए आतंकवादी भी उतने ही डरावने हैं जितने वर्दी वाले लोग।

उस्मान को पढ़िये और उन्हें और-और लिखने के लिये प्रोत्साहित कीजिये। उनकी कुछ बातों से भले ही मैं सहमत न होऊँ, लेकिन वक्त की दरकार है कि यहाँ कश्मीर की ये वर्तमान पीढ़ी पूरे मुल्क से परोक्ष तौर पर जुड़े।

दूसरी तरफ, इस कश्मीर-वादी के धवल-श्वेत रंग से परे इक नीले रंग के दो अलग-अलग कंट्रास्ट... एक नंदनी की कविता में तो दूजा किशोर की कहानी में...जहाँ शब्दों के कुछ बड़े ही हसीन चित्र बनाते हैं, वहीं दोनों पोस्ट के शीर्षक एक कविता जैसा कुछ। यूँ कि :-
रंग उड़े होर्डिंग पर
बैठा वो नीलकंठ
स्मृतियों का
नीला गाढ़ा रसायन रचता है


कहीं और बधाईयों की किंकर्तव्यविमूढ़ता में उलझा प्रशांत @ पीडी कुछ इस तरह से अपनी व्यथा को साझा करता है:-

मुझसे औपचारिकता निभाना किसी भी क्षण में बेहद दुष्कर कार्य रहा है, और उससे अच्छा खुद को एक अहंकारी व्यक्ति कहलाना अधिक आसान लगता है.. मजाक में कहूँ तो, "अगर मनुष्य एक सामजिक प्राणी है तो मुझमें शत-प्रतिशत मनुष्य वाला गुण शर्तिया तौर से नहीं है.."

...तो कहीं और, दिल्ली की सर्दी से ब्रेक लेकर उत्तरांचल की पहाड़ियों पर विचरता अपना कुमाऊँनी भूल्ला दर्पण अपने सेलेक्टिव लव के जरिये प्रेम पर{और प्रेमिका पर} पर अनुभव बाँटता हुआ एकदम से अपनी उम्र से बड़ा नजर आने लगता है:-

...प्रेम वास्तविकता के धरातल पे होना पसंद नहीं करता. वो किसी परी कथा सा होना पसंद करता है. विरोधाभासों से परिपूर्ण. वास्तव में प्रेम की उम्र रोमांच की उम्र होती है. 'यूथ' . हाँ यदि प्रेम बुढ़ापे में हुआ करे तो थोड़ी रेशनल हो.

पोस्ट लिखे जाने तक ये दार्शनिक भूल्ला उधर उन पहाड़ियों पर ही विचर रहा था...और इधर चीन से अपना विचरन संपन्न करके नीरज जी बड़ी प्यारी-सी ग़ज़ल सुनाते हैं। दो शेर चुरा लाया हूँ यहाँ:-

बाजुओं पर यकीन है जिनको
दूर उनसे कहां किनारे हैं
दिन अकेले ही काट लो ‘नीरज’
रात में चाँद है सितारे हैं


उधर एक ओर विरह-वेदना में अकेले दिन काटते प्रवीण पाण्डेय अपनी श्रीमति जी के समय-पूर्वागमन से मायके जाने के सूख को जब नया आयाम देते हैं अपनी अद्‍भुत लेखनी के जरिये तो वहीं दूसरी ओर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी उसी पोस्ट पर अपनी टिप्पणी में छुट्टी के विकट नतीजे पर एक बेमिसाल छंद से उसी आयाम को नयी ऊँचाईयाँ देते हैं।

लखनऊ की सर्दी में कंपकापाती सड़कों पर बिना गियर बदले पचास की स्पीड से ड्राइव करते हुये अपने ब्लौग-जगत के कथित आलसी महोदय की ये आत्ममुग्ध प्रोफाइल कम-से-कम आपसब की एक दृष्टि का फेरा तो माँगती ही है कि उनकी बकबक में भी नायाब बातें होती हैं:-

पास बैठो कि मेरी बकबक में नायाब बातें होती हैं
तफसील पूछोगे तो कह दूँगा,मुझे कुछ नहीं पता


...और हरबार की तरह मनीष जी की वार्षिक संगीतमाला अपनी उल्टी गिनती के साथ शुरू हो चुकी है 25वें पायदान वाले गीत के साथ। हर वर्ष की शुरूआत में ये एक खास आकर्षण रहता फिल्म-संगीत पसंद करने वाले ब्लौगरों के लिये। वहाँ मनीष जी के ब्लौग पर भले ही अमीन सायनी की आवाज लापता हो, लेकिन लुत्फ़ वही अपने पुराने जमाने वाले बिनाका गीतमाला का ही मिलता है और संग में गीत-विशेष से जुड़ी कुछ अंदरूनी जानकारियाँ भी। आप भी शामिल हों इस मस्त श्रृंखला में मनीष जी के साथ।

...फिलहाल इतना ही। हाँ, इस नये साल की शुरूआत पर एक सदी से सुसुप्तावस्था में पड़े कुछ ब्लौगरों को झिंझोड़ कर जगाना चाहता हूँ। जागोsssss ! मीनाक्षी !! अपूर्व !!! लवली !!!! आभा !!!!! और ताहम !!!!! आपसब को भी कुछ सोये हुये ब्लौगरों की खबर हो तो मुझे बतायें। तमाम संकलकों को तो पहले हमसब ने तरह-तरह के इल्ज़ाम लगा कर इतना दुत्कारा और अब उनकी रहस्यमयी गुमशुदगी पर झुंझलाये फिर रहे हैं। मैं तो फिलहाल अपने व्यक्तिगत ब्लौग-रोल से ही काम चला रहा हूँ।

विदा! आपसब को नये साल की खूब-खूब सारी शुभकामनायें...! कोशिश करूँगा कि अपने इस नये-नवेले रोग के साथ नियमित रहूँ इस मंच पर कि इन दिनों फुरसतों से खासी यारी हो रखी है अपनी। चलते-चलते ये फ़िराक गोरखपुरी साब का एक विख्यात शेर:-

पाल ले इक रोग नादां जिन्दगी के वास्ते
सिर्फ सेहत के सहारे जिन्दगी कटती नहीं

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39 टिप्‍पणियां:

  1. गौतम राजरिशी को यहाँ देख कर अच्छा लगा ! अब लगता है कुछ नयापन मिलेगा ...हार्दिक शुभकामनायें

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  2. जय हो! सुन्दर आगाज!
    जिन ब्लॉग का जिक्र किया आपने उससे आपकी पसंद का अंदाज मिलता है। बहुत खूब!

    इसी बहाने यह भी पता चला कि जनाब के ब्लॉग के नामकरण के पीछे फ़िराक साहब हैं।

    बहुत अच्छा लगा इस चर्चा को देखकर!

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  3. सुसुप्तावस्था -=सुषुप्तावस्था -गिरिजेश जी ने कुछ दिनों के लिए यह काम मुझे ठेके पर दिया है -आप लोगों के अनुमोदन से ही पगार मिलनी है!
    आपका नया वर्ष बहुत शुभ हो!
    शीत ऋतु में काहें जगा रहे हैं बसंत आने दीजिये -यह मैदानी शीत निष्क्रियता है साब ,पड़े रहने दीजिये कोनो अतरों में काहें बे वक्त रणभेरी बजा रहे हैं -यह बार्डर या युद्ध का मैदान नहीं ...यहाँ चुनौती देने पर भी बाँकुरे नहीं निकलेगें ..बसंत में आईयेगा और ऐसा आह्वान करियेगा -निश्चित ही सार्थक परिणाम आयेगें !
    शीत ऋतु की शर्वरी है हिंस्र पशुओं से भरी ..आप तो कवि ह्रदय हैं!

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  4. अरे वाह गौतम ,तुम तो बेटा छुपे रुस्तम निकले
    चर्चा करना कोई आसान काम नहीं लेकिन इस अलग सी चर्चा में बहुत मज़ा आया
    बधाई हो ,इसी तरह बढ़िया लिखते रहो!
    बहुत ख़ूब !

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  5. गौतम को यहाँ देखना सुखद है। खूबसूरत फूल चुने हैं इस चर्चा के लिए। आखिर गजलकार हो न!

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  6. अच्छी चर्चा.दी हुई कुछ पोस्ट पढ़ चुके हैं ,बहुत अच्छा चयन.
    संकलकों के बिना हम भी अपने ब्लॉग रोल से काम चला रहे हैं.

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  7. संकलको की कमी खल रही है... पर चर्चा से काम चल रहा hai

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  8. .
    .
    .
    प्रिय कर्नल,

    अच्छा लगा आपका यह अंदाज भी...
    संकलक हीन इस दौर में पाठकों की सुविधा के लिये आपके ब्लॉगरोल का लिंक भी अपने ब्लॉग पर टांग दिया है... ऐतराज तो नहीं ?


    ...

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  9. डॉ अरविन्द मिश्र जी ,
    गुरु गिरिजेश राव आपसे प्रसन्न होंगे ! नौकरी पक्की समझिये ...
    चिटठा चर्चा पर आपको देख अच्छा लगता है गुरु ! सच्ची ....
    :-))

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  10. @मेजर ....
    जान मेरी .....यहाँ देखकर ख़ुशी हुई....

    "अहले-सियासत का इन दिनों कुदरत मे दख़ल देखिए
    फ़सादो के मौसम को भी अब हर साल आना है"
    -

    एक ओर नामालूम शायर

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  11. @गौतम जी..आपने याद किया..अच्छा लगा...

    जल्दी ही ...संभवतः इस महीने ही..संचिका में हलचल दिखेगी..वादा :-)

    आपको यहाँ देख कर खुश हूँ.

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  12. ...और हाँ ..आपको और सबको इस साल की हार्दिक शुभकामनायें ...

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  13. गौतम भाई ,

    जय हिंद !

    आप भले ही कर्नल बन जाओ हम तो मेजर ही कहते रहेंगे ... ख़ास कर जब यह पता चल गया है कि आपको यही पसंद है !

    इस नए रोग को पालने पर आप को हार्दिक शुभकामनाएं ! बाकी तो हमारी बात हो ही चुकी है !

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  14. स्वागत है .
    अच्छी लगी यह चर्चा और सभी लिंक भी अच्छे हैं .
    यहाँ से एक नए ब्लॉग का पता मालूम हुआ.
    आभार.

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  15. रोचक चर्चा, नये ब्लॉगों से सामना।

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  16. चिट्ठाचर्चा को एक नयी ऊँचाई......
    कोई नया ब्लोगर पहली बार चिट्ठाचर्चा पर आये और इसे पढ़े तो उसे भी यह चर्चा उतना ही प्रभावित करेगी जितना पुराने लोगों को...

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  17. जब ब्लॉग रोल पे चिटठा चर्चा की अपडेट देखी तो फिराक साहब के शेर के मिसरे "सिर्फ सेहत के सहारे...." को पा के, आप की याद आ गयी लगा कहीं आप तो नहीं..............और जब देखा तो आप ही हैं.
    वैसे ये रोग बहुत खूबसूरत लिया है, आप की कलम जब चलती है तो लफ्ज़ एक नए अंदाज़ में निखर आते हैं. समां ऐसा बंधता है कि बस नज़र हटने का नाम नहीं लेती और ज्यादा से ज्यादा आप को पढने की जिद करती है.

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  18. वाह वाह बेहतरीन आगाज़ ..नायाब अंदाज़..ढेरों शुभकामनायें नूतन वर्ष की .

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  19. `पाल ले इक रोग नादां जिन्दगी के वास्ते'

    चिठाचर्चा का नया रोग लगा लेने के बाद यही गाते फिरेंगे-
    इक रोग नया ले बैठे, क्या जाने कब आराम आए :)

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  20. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (6/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  21. चर्चा शानदार रही, एकदम मस्त।

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  22. आज तो हमने भी चर्चा कर डाली महाराज और आपकी चर्चा को भी वहीं उठा ले गए ..मेजर साहब को सैल्यूट ..मेरे नए ठिकाने पर पहुंचिए न
    मेरा नया ठिकाना

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  23. ज़िन्दे रह कर्नल ! बड़ी सधी हुई चर्चा की है ।
    सबसे चँगी बात तो यह लगी कि सोने वालों को तैनें याद रखा, उनको हाँक लगा दी, बाकी मुझ पे छोड़ दे ।
    चर्चा इतनी सटीक है कि, पढ़ने वालों पर सीधे चोट करती है । हम भी घायल हुये, इस मीठे दर्द का मलहम लेकर ज़ल्द लौटना ।

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  24. चिट्ठा-चर्चा ने रोग पाल ही लिया..और क्या खूबसूरत रोग पाला है..कि जैसे सर्दी की गुनगुनी धूप खिली हो..किसी दोशीजा के आरिज़ पर..अब यह सूरज मसरूफ़ियत के बादलों की पीछे न छुपा रहे हो बात बने :-)
    ..फिर अपना हाल तो बकौल शाद सा’ब
    दिले-मुज़्तर से पूछ ऐ रौनके-बज़्म
    मै खुद आया नही लाया गया हूँ

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  25. अनुभव बाँटता हुआ एकदम से अपनी उम्र से बड़ा नजर आने लगता है. :D
    Age: 29 years and still counting. :(

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  26. स्वागत....!

    हुज़ूर, गज़ब किया आपने, आपकी चर्चा के चर्चे हैं....!!

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  27. @डा० अनुराग
    इस "जान मेरी" पे सदके जाऊँ! ये शेर कहाँ से निकाला है...गज़ब का है। शुक्रिया इस शेर को साझा करने के लिये। इधर कुछ भ्रमित बुद्धियों को लगने लगा था कि हमारा और आपका मनभेद हो गया....हा! हा! can you imagine that?

    @डा० अमर साब को सलाम, आपके मेल की प्रतिक्षा में था। सबकी अपनी-अपनी सोच है, सर। हम ठीक हों, सच्चे हों...तो फिर क्या फिक्र?अपना ख्याल रखिये।

    @प्रवीण शाह सर, आपसे कैसा एतराज? आपका हक़ है हम पर...

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  28. @अरविंद जी, नवाजिश करम शुक्रिया मेहरबानी। राव साब को हमजैसे कितने ही मिस कर रहे हैं। जारी रखें ये कारोबार, हम सब का भला होता है।

    @अनूप जी, सतीश जी, द्विवेदी जी, रचना जी, इस्मत जी, शिवम भाई, झाजी...मेरे पहले प्रयास की हौसलाअफ़जाई का शुक्रिया!

    @apoorv n ankit...thanx buddies!

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  29. बस ख़ुशी की बात इतनी है की आप चर्चा से जुड़े और चर्चा की, बांकी चर्चा में कोई दम नहीं है क्योंकि हमारा तो जिक्र ही नहीं है सो आप जानते हैं कि जहाँ हमारे बारे में नहीं लिखा/तारीफ किया जाता हम उधर पलट कर भी नहीं देखते.. हुंह !

    एक लाइन निकालूँगा की उस्मान को लिखना चाहिए...
    आपके पास रायफल तो होगा ही, तानिये जरा अपूर्व के कनपटी पर, तभिये वो कुछ लिखेंगे... कुछ लोगों को डरना पड़ता है, खुशामद बहुत कर ली साहब की.

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  30. मैं भी वैसे ही खिंचा चला आया था. सामुदायिक कार्य अक्सर प्रसंशा नहीं पाते हैं. हर किसी को कोई न कोई शिकायत रहती ही है. लेकिन यहाँ नियमित रूप से अच्छा काम करते रहने का भाव बना रहता है. आपके आने से बेहद खुश हूँ अभी कुछ और नाम भी है मेरे मस्तिष्क में सम्भव है कि अनूप जी के मन में पहले से होंगे... तो मुझे और नए चर्चाकारों का इंतज़ार है. आपके आने का बहुत आभार.

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  31. सर्दी के इस मौसम में ड्यूटी के साथ चिट्ठा चर्चा के लिए वक़्त निकाल पाना बड़े कठिन कामों को अंजाम दिया है आपने।

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