सोमवार, जनवरी 03, 2011

हम जहाँ हैं, वहीं से, आगे बढेंगे

माना नहीं नया साल आ ही गया। अब जब आ ही गया तो उसका स्वागत भी कर ही लिया जाये। आप सभी को नया साल मुबारक। आप सबने नये साल के कुछ न कुछ संकल्प लिये ही होंगे। शुभकामनायें इस बात के लिये आप उन संकल्पों में कुछ का साथ कुछ दिन तक तो कम से कम निबाह ही लें। इसई के साथ कार्टूनकुमार काजल जी का संकल्प भी देख लीजिये। अब बताओ भला बंदर टोपी पहनना भी कोई संकल्प होता है। लेकिन भाई ये कार्टूनिस्ट हैं जो न करायें।

देखिये नये साल का स्वागत अजित गुप्ता जी ने कैसे किया:
समय दौड़ रहा है। आज सूरज ने भी अपनी रजाई फेंक दी है। किरणों ने वातायन पर दस्‍तक दी है। हमने भी खिड़की के पर्दे हटा दिए हैं। दरवाजे भी खोल दिए हैं। सुबह की धूप कक्ष में प्रवेश कर चुकी है। फोन की घण्‍टी चहकने लगी है। नव वर्ष की शुभकामनाएं ली और दी जा रही हैं।

इस साल कई लोगों ने साल की शुभकामनाओं के बदले दशक की शुभकामनायें दी हैं। नया साल बेचारे का मन कसक रहा होगा कि उसका हिस्सा बकिया के नौ साल भी ले उड़े।

हम तो यही कहेंगे कि नया साल आपका झमाझम बीते। अगर कोई गम-वम तो उसे आप महेन्द्र मिश्र जी के उधर भेज दीजियेगा। उनको गम की थोक दरकार है। उन्होंने कहा भी है:
अपने गम देते मुझे कुछ सूकून तो मिले
कितने बदनसीब है जिन्हें गम नहीं मिले

उधर रिचा कहती हैं:
मुश्किल है जीना उम्मीद के बिना
थोड़े से सपने सजायें
थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ...


सतीश सक्सेना जी की ये वाली फोटो देखकर लगता है कि वे नये साल की तरह उदय हो रहे हैं। उन्होंने अपने ब्लॉग पर नये साल की शुभकामनायें मांगी हैं। लिखा है:
इस वर्ष तो यही समझ आया कि मूर्खों से ईश्वर रक्षा करे और चालबाजों से दूरी बनी रहे, हालाँकि पहचानने में बार बार गलती की है ..... :-(

दोस्तों से अनुरोध है कि सच्चे मन से, अगले वर्ष की शुभकामनायें दे जाना, हमारे ब्लॉग पर...बहुत जरूरत है !

मैं तो यही कामना करता हूं कि वे पहचानने में होने वाली गलती बार-बार करते रहें। इससे दो पोस्टें निकलती हैं कम से कम। एक पहचानने से पहले और एक पहचानने के बाद।

उधर देखिये नये साल का उत्सव मनाने के लिये दुर्योधन को क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े। बिना कैमरामैन की रिपोर्टिंग कर रहे हैंकलकत्ता से शिवकुमार मिश्र:
जयद्रथ भी बहुत खुश है. शाम से ही केश- सज्जा में लगा हुआ है. दर्पण के सामने से हट ही नहीं रहा है. कभी मुकुट को बाईं तरफ़ से देखता है तो कभी दाईं तरफ़ से. शाम से अब तक मोतियों की सत्रह मालाएं बदल चुका है. चार तो आफ्टरसेव ट्राई कर चुका है. उसे देखकर लग रहा है जैसे उसने आज ऐसा नहीं किया तो नया साल आने से मना कर देगा.


नाचगाने बोले तो नृत्य का भी इंतजाम है। देखिये:
कल उज़बेकिस्तान से पधारी दो नर्तकियों को लेकर आया. कह रहा था ये दोनों वहां की सबसे कुशल नर्तकियां हैं. पोल डांस में माहिर. उनकी फीस के बारे में पूछा तो पता चला कि बहुत पैसा मांगती हैं. कह रही थीं सारा पेमेंट टैक्स फ्री होना चाहिए. उनकी डिमांड सुनकर महाराज भरत की याद आ गई. एक समय था जब उज़बेकिस्तान भी महाराज भरत के राज्य का हिस्सा था. आज रहता तो इन नर्तकियों की हिम्मत नहीं होती इस तरह की डिमांड करने की. लेकिन अब कर भी क्या सकते हैं?

प्रबुद्ध की ये कविता मजेदार है। देखिये वे क्या कहते हैं:
मेरे क्यूबिकल से बस एक झलक मिलती थी
वो उन दिनों कमाल लगती थी
कनखियों से देखता था कभी
और गुज़रता था बेहद करीब से कभी
मैं शुक्रगुज़ार हूं दफ्तर के डिज़ायनर का
कॉरीडोर संकरे बनाए हैं काफी


आगे इसी तरह की और बातों पर शुक्रगुजार होते हुये आखिरी में देखिये मामला किस करवट बैठता है:
वो एक लम्हा जैसे वहीं रुक गया है
कि तभी,ऐसी सिचुएशन में, हिंदी फिल्मों की
मेरी सारी जमा पूंजी को कच्चा चबाते हुए
उसीके मुखारविंद से फूटा है
हिंगलिश गालियों का पूरा लॉट
एक भी गाली ऐसी नहीं
जिससे डक करके बच सको
उसी के शब्दों में--
&^^%%$%#%#@$#@@@%^$
U scoundrel! Can't u see properly?
सकपकाया हुआ उठा हूं मैं
और नीची नज़रों से भागा हूं बदहवास

बॉस की तरफ़ बढ़ते हुए
गरिया रहा हूं जी भर के
दफ़्तर के डिज़ायनर को
साला %*%&(^%%$^$^#@%^%@

लिफ्ट को कहीं और नहीं बना सकता था !


पिछले साल की सबसे बेहतरीन पोस्टों में एक अगर कही जाये तो पल्लवी त्रिवेदी की यह पोस्ट जरूर उसमें शामिल होगी। कुछ कल्पना और ज्यादा आपबीती है शायद यह पोस्ट! देखिये दादी मेरी जान...कितना सरप्राइज़ करती हो तुम के कुछ अंश:
  • गुस्से में उन्हें किसी का बोलना पसंद नहीं आता..यहाँ तक की रेडियो पे गाने बजते उनमे भी नुक्स निकालना शुरू कर देती! एक बार मैंने सुना किशोर कुमार को कह रही थीं " जब गाना नहीं आता तो काहे गाते हो जी " शाम होते होते दादी का गुस्सा छूमंतर हो जाता और झुर्री भरे गालों पर मुस्कान की रेखा खिंच जाती!

  • भाई ने दादी को जाने कैसे पटा रखा था! रोज़ शाम को छत पर वह पतंग उडाता और दादी मज़े से कुर्सी पर उसकी चरखी थामे बैठी रहती! घर में दादी के इस कार्य के बारे में किसी को पता नहीं था! एक दिन मम्मी छत पर पहुंची तब हँसते हुए उन्होंने पापा को छत पर ले जाकर दिखाया! बाद में भाई ने बताया...चरखी पकड़ने के बदले लास्ट में दादी पांच मिनिट पतंग उड़ाती थी और रोज़ एक पतंग कटवा देती थी!

  • रोज़ शाम को दादी मंदिर जाती थीं लेकिन पिछले एक हफ्ते से मंदिर की जगह वो प्रिया के घर जा रही थीं! सात दिन में उन्होंने प्रिया से मेल आई डी खोलकर मेल करना सीख लिया...सिर्फ मुझे सरप्राइज़ कार्ड भेजने के लिए! मुझे अपनी दादी पर बड़ा फक्र हो रहा था! किसी की दादी को कंप्यूटर नहीं आता था...सिवा मेरी लाडली दादी के!


  • दादी ने मुझे बताया कि दादाजी हमेशा दादी का जन्मदिन पर उन्हें अपने हाथों से सजाते थे...बताते बताते दादी की आँखों में पानी तैर आया था! दादी एक बार फिर दादाजी के लिए तैयार हो रही थीं! और मैं उन्हें दादाजी की फेवरिट साडी पहना रही थी! सचमुच उस पर्पल कलर की साड़ी में दादी बहुत खूबसूरत लग रही थीं!मैंने उन्हें इस तरह पहली बार देखा था! लग रहा था दादी एक पूरा ज़माना पार करके कहीं बहुत पीछे लौट रही थीं! वो हर साल ये सफ़र तय करती थीं! इस बार में इस सफ़र में साथ थी!


  • किस्सागोई पल्लवी त्रिवेदी की अद्भुत है। उन्होंने जितनी भी पोस्टें लिखीं वे सब की सब बहुत अच्छी हैं सिवाय कुछ कविताओं के। कवितायें अपन को जमती नहीं। :)

    अरविन्द मिश्र जी ने देखिये कितनी अदाओं से एक नये शब्द म्यूज से परिचय कराया। इसके बाद आपबीती सुना दी:
    न अब मैं किसी का म्यूज रहा और न अब कोई मेरा .....आप चाहें तो इस अवसर पर वह फ़िल्मी गीत गा सकते हैं कोई हमदम न रहा .... मगर मेरा हठयोग तो देखिये फिर भी अपने टूटे फूटे सृजन कर्म के साथ आपके सम्मुख हूँ -अहर्निश रचना कर्म को उद्यत ..यह बेहयाई नहीं मित्र बल्कि एक जिजीविषा है .....जीवन की असली परिभाषा समझ लेने की एक छटपटाहट है ....एक अंतर्नाद है .


    बकिया और सब ठीक है लेकिन न अब मैं किसी का म्यूज रहा और न अब कोई मेरा पढ़कर यही दिलासा दिया जा सकता है कि सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है।

    कल एक मित्र जो पिछले दिनों ब्लॉगजगत से अलग रहे ने कोई हंगामेदार च मजेदार पोस्ट का लिंक मांगा। हमने कुछ लिंक दिये। उनमें से आखिरी लिंक यह था। इसमें किसी स्थापित ब्लॉगर ने फ़र्जी प्रोफ़ाइल बनाकर ब्लॉग बनाकर यह पोस्ट लिखी। इसके मुख्य अंश हैं:
    १) अरूप शुकुलबा को दिया गुरु घंटाल सम्मान ( प्राईमरी का एक स्लेट और चार लेमनचूस के साथ कानपुर की फैकटरी में बना चमड़े का प्रशस्ती पत्र )
    (२) खीश निपोर त्रिपाठिया को दिया टपक गिरधारी सम्मान ( अयोध्या में बना एक अंगौछा और चार लेमनचूस )
    (३)पञ्च मणि उर्फ़ पंचमवा को दिया बिन पेंदी का लोटा सम्मान ( मुरादाबाद का एक बिना पेंदी का लोटा और चार लेमनचूस )

    हालांकि वहां डिस्कलेमर लगा है -यह खालिश व्यंग्य है,किसी भी जीवित व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है,किन्तु किसी घटना या वास्तविक पात्र से मेल खा जाए तो महज इत्तेफाक समझें ! लेकिन यह साफ़ है कि महज इतेफ़ाक वाले नाम अरूप शुकुलबा, खीश निपोर त्रिपाठिया और पञ्च मणि उर्फ़ पंचमवा वास्तव में अनूप शुक्ल , अमरेन्द्र त्रिपाठी और सतीश पंचम हैं।

    यह कोई नयी बात नहीं कई लोग लिखते हैं ऐसा। हमने भी मजे लिये आनन्दित हुये यह पोस्ट बांचकर। मुश्किल नहीं है यह अनुमान लगाना कि किसने लिखी होगी यह पोस्ट!

    मजे की बात जो मुझे लगी वह यह कि अरविन्द मिश्र जी इस ब्लॉग के फ़ालोवर हैं। जब सबसे पहले देखा था तब वे पहले फ़ालोवर थे। अरविन्द मिश्र तो बहादुर और बेधड़क इंसान हैं। इशारे से भी उनको अगर कुछ कहा जाये तो खुलेआम हड़का दिया था अनूप शुक्ल को उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम और बोलती बंद हो गयी थी। मिश्र जी ने कहा था:
    अपनी औकात में रहो अनूप!

    ऐसा शेरदिल इंसान ऐसे ब्लॉग का फ़ालोवर बनता है जिसमें यह तक हिम्मत नहीं कि सीधे-सीधे नाम ले सके तो लगता है मिसिरजी कमजोर आदमी के फ़ालोवर बन गये। किंचित आश्चर्य हुआ। बस किंचित ही। ज्यादा नहीं। संतोषी व्यक्ति हैं। कम में संतोष कर लिया। बस यही लगा कि भगवान परशुराम ने कर्ण कोचिंग इंस्टीट्यूट ज्वाइन कर ली है। :)

    यह देखकर हरिशंकर परसाई जी का लिखा याद आ गया- वे शेर हैं लेकिन सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं। :)

    मेरी पसंद


    हम जहाँ हैं,
    वहीं से, आगे बढेंगे।

    हैं अगर यदि भीड़ में भी, हम खड़े तो,
    है यकीं कि, हम नहीं,
    पीछे हटेगे।

    देश के, बंजर समय के, बाँझपन में,
    या कि, अपनी लालसाओं के,
    अंधेरे सघन वन में,
    पंथ, खुद अपना चुनेंगे ।

    या , अगर हैं हम,
    परिस्थितियों की तलहटी में,
    तो ,
    वहीं से , बादलों कॆ रूप में , ऊपर उठेंगे।

    राजेश कुमार सिंह

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    24 टिप्‍पणियां:

    1. बढ़िया चर्चा.

      कई पोस्ट पढ़ चुका हूँ. सक्सेना ज़ी को नए वर्ष के लिए शुभकामनाएं उनकी पोस्ट पर दे चुका हूँ. एक बार फिर से यहाँ भी दे रहा हूँ.
      सम्मान वाली पोस्ट पर भी कमेन्ट दे चुका हूँ. दरअसल उस पोस्ट को व्यंग कहना अपने आप में सबसे बड़ा व्यंग है. पाण्डेय ज़ी
      से पहले भी कई लोग़ आये जो दो पोस्ट लिखकर लोगों को चमत्कृत कर देना चाहते थे. आज कहीं नज़र नहीं आते. जिन लोगों को
      उन्होंने सम्मान में लेमनचूस देने की बात कही है, उनके लेखन को वे देखें, शायद कुछ सीख पायेंगे. फालोवर बनना तो फैशन जैसा
      हो गया है. कई बार मुझे लगता है जैसे लोग़ जूता-मोजा पहिन के सड़क किनारे तैयार बैठे हैं. उधर कोई सड़क पर निकला और इधर ये
      फालोवर बने.

      बाकी चर्चा चकाचक है. मेरी भी पोस्ट शामिल है इसके लिए आपको धन्यवाद और मुझे बधाई.

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    2. मज़ेदार पोस्ट ,अच्छे लिंक्स
      सुबह सुबह की ताज़ी हवा जैसी पोस्ट
      हां ,कविता बहुत उत्साह्वर्धक और हौसला देने वाली है

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    3. बढिया-बढिया लिंक मिल गए, मौजा ही मौजा। आभार।

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    4. इसे कहते हैं 'मौजां-कला' के रनवे पर 'लुत्फांसा एयरलाइन' की मस्त लैंडिंग :)

      जहां तक सियारों के शादी में बैंड बजाने की बात है तो अपन पहले से समझ रहे हैं कि शेरदिल अरविंद जी सियारों के झुंड से घिरे हुए हैं। इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दशक शुभकामना पर मेरे द्वारा शुभकामना व्यक्त किये जाते ही एक बंदे ने कमेंट किया.....हें हे....अरविंद जी आप अंतत: सफल रहे।

      कम्बख्त को इतना भी नहीं पता था कि जो डिप्लोमेटिक पोस्ट ठोंकी गई थी तो उसी अंदाज में डिप्लोमेटिक शुभकामना भी परोसी गई थी।

      खैर, इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कौन कहां बझा है :)

      रही बात एक स्थापित ब्लॉगर द्वारा फर्जी प्रोफाइल बनाकर उलूल जूलूल पोस्ट लिखने की तो इस पर कवि निर्झर प्रतापगढ़ी ने कहा है कि -

      जेकर लंठऊ स्वभाव, ओकर जाये न प्रभाव,
      गदहा केतनौ नहवउब्या, ससुरा लोटबै तौ करी।

      चर्चा शानदार रही।

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    5. डॉ अरविन्द मिश्र पर लिखा पसंद आया अनूप भाई !

      आप दोनों की स्वस्थ टांग खिंचाई बुरी नहीं लगती बल्कि दो ब्लॉग महारथियों द्वारा एक दूसरे पर व्यंग्यात्मक छींटाकशी मात्र मानता हूँ और इसमें वाकई आनंद का अनुभव होता है !

      भूतकाल के मधुर संस्मरण जो कडवे मीठे हो सकते हैं, जरूरी नहीं उन्हें हर समय साथ लेकर चला जाए इससे रास्ता देखते समय चश्मे पर धुंद आ जाती है ...भूल भी जाया करो गुरु ...

      बेनामियों की गालियों की क्या परवाह करना उनको अधिक स्थान न दिया करें तो अच्छा लगेगा ...मुझे लगता है ये भी कभी आपकी शरारत गुलेल से चोट खाए हैं :-),

      सो आपको पुरस्कार देने की भावना के पीछे कही न कहीं भूत काल में लगा घाव है मगर उनका तरीका गलत है ...खुले आम कहने का साहस तो होना ही चाहिए !

      हाँ अरविन्द भाई का बेनामी को फालो करने वाला चौंकाने वाला है...
      पुनर्विचार का अनुरोध अवश्य करूंगा !

      समीर लाल और साधना भाभी को इतनी प्यारी पुत्रवधू के लिए बधाई -सतीश सक्सेना

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    6. खूब रही... पर कहीं न कहीं फ़ुरसतिया इस्टाइल की कमी दिखी चर्चा में... नहीं?? ;)

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    7. आँख बंद करके तैरने को फ्लोट करना ही कहते हैं । जिनको ये आता हैं वो ही हिंदी ब्लोगिंग मे पार जायेगे । हास्य की परिभाषा आज तक नहीं समझी क्युकी जब भी हास्य का जवाब दिया वो लोगो को नकारात्मक लगा । ब्लैक ह्यूमर भी होता हैं लेकिन खेर आप अपवाद हो आप ने हास्य के जवाब मे एक बार छोड़ कर हर बार ब्लैक ह्यूमर को एक्सेप्ट किया हैं
      नया साल शुभ हो सब को

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    8. ठीक चर्चा ! मौजू लिंक थमाए गए हैं !

      @ सतीश पंचम जी , आपने निर्झर प्रतापगढ़ी की कविता रखी है , अवधी के बड़े अच्छे कवि हैं ये , क्या इनका कोई संग्रह है आपके पास ? हो तो चाहूँगा !

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    9. अमरेन्द्र जी,

      मेरे पास इनकी एक किताब थी..... बात खरे खर बोलन..... जो कहीं रखी तो घर में ही है लेकिन मिल नहीं रही। कोशिश करता हूँ फिर से ढूँढने की ।

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    10. हम जहाँ हैं,
      वहीं से, आगे बढेंगे।
      हैं अगर यदि भीड़ में भी, हम खड़े तो,
      है यकीं कि, हम नहीं पीछे हटेगे।

      -राजेश कुमार सिंह जी की कविता बहुत ही अच्छी और प्रभावी लगी.
      धन्यवाद.

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    11. @ सतीश पंचम जी ,
      अवश्य खोजिएगा देव , पुस्तक मिल जायेगी तो मेरा अहोभाग्य होगा !

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    12. वाह शुकुल बाबा, आज बड़ा मौज छाँटल बिया...
      कड़कड़उवा ठँड मा मदरसा बन्द वाले चेला चापड़न के खींच खींच लमलोट किहे रहा !
      रचना जी के साट्टीफिकेट के कउनो रजऊ काट सकेले ? अहोभाग्यम रचना बेन !


      @ अमरेन्द्र त्रिपाठी
      मुझसे दोस्ती करोगे ?

      निर्झर जी का पूरा कवित्त यह है
      कुकुर केतनौ कंठी बाँधे, दोना चटबै तौ करी।
      कीरा केतनौ फन सिकोरे, लेकिन कटबै तौ करी।।
      जेकर लंठऊ स्वभाव, ओकर जाये न प्रभाव,
      गदहा केतनौ नहवउब्या, ससुरा लोटबै तौ करी।

      आपके घनघोर आग्रह पर उनकी एक दूसरी रचना ’ देख तमासा ’ से पेश कर रहा हूँ


      आवा गोबिंदे भैंस चराई।
      बिना कमाही भये उठल्‍लू, अपनिव मेहरि लगै पराई।।
      आवा गोबिंदे भैंस चराई।
      हमहूँ जौ अफसर होइ जाइत, बइठ मजे मा नोट कमाइत।
      लरिका-परिका मौज उड़उतें, बीवी कै नक्‍सा होतै हाई।।
      आवा गोबिंदे भैंस चराई।...
      प्राइमरी मा मुंशी होइत, जानौ गंगा मा जौ बोइत।
      सेंत-मेंत मा मिलतै पइसा, घरहीं बइठित घुम-घुमाई।।
      आवा गोबिंदे भैंस चराई।
      कोर्ट कचेहरी मा होई जाइत, मनचाही खूब लूट मचाइत।
      बड़े-बड़े सब घेरे रहतेन, चला बाबू जी चाय पियाई ।।
      आवा गोबिंदे भैंस चराई।
      अफसर भा जब गोबर गनेस, तौ जेकर लाठी ओकर भैंस।
      सीधे कैं मुँह चाटै कुत्ता, केकरे-केकरे तेल लगाई ।।
      आवा गोबिंदे भैंस चराई।...
      नेता अफसर सब पिछुवइहैं, सीधे पै केउ ध्‍यान न देइहैं।
      मन बोलत बा अगले हफ्ता, फूलन जैसा गैंग बनाई ।।
      आवा गोबिंदे भैंस चराई।
      कमवइया जौ घर मा आवैं, देवता जइसे पूजा पावैं।
      बर्धा एस हम पेरी तब पै, कुकुर एस दुरियावा जाई ।।
      आवा गोबिंदे भैंस चराई।
      क्रीम पाउडर कहाँ से ल्‍याई, केकर पइसा चली चोराई।
      राजै दुलहिन एही बिना, गोबड़ौरा एस मुँह लेइ फुलाई ।।
      आवा गोबिंदे भैंस चराई।
      क्‍लर्की कै हम दीन परिच्‍छा, इंटरव्‍यू कै रही प्रतिच्‍छा।
      पता चला की काम करत बा, उहाँ बड़े बाबू कै भाई ।।
      आवा गोबिंदे भैंस चराई।
      सुना परोसी हँसि के बोला, लिया चला अब आलू निकोला।
      कहत रहे कुछ काम न होये, जब तक जेबा न गरमाई ।।
      आवा गोबिंदे भैंस चराई।
      सकबै लरिका मजा उड़ावैं, नौ से बारा पिक्‍चर धावैं।
      एक्‍कै लरिका हमरौ लेकिन, करजौ काढ़े फीस न पाई ।।
      आवा गोबिंदे भैंस चराई।
      बड़े नन्‍हइयैं होइगैं शादी, ‘निर्झर’ जीवन कै बरबादी।
      बीस बरिस मा दुइ-दुइ लरिका, राम दि‌हेन फिर नंबर लाई ।।
      आवा गोबिंदे भैंस चराई।

      उत्तर देंहटाएं
    13. @अनूप जी ,मैंने उसे फर्जी जाना होता तो बिलकुल फालो नहीं करता --थोडा कनेक्शन स्लो है कल ही अन फालो का प्रयास करेगें!कृपया इसे लेकर ज्यादा कल्पनाशील मत होईये -मैं कसूरवार नहीं हूँ ! और मैंने इंगित पोस्ट पर कोई कमेन्ट भी नहीं किया -और फालो करना मेरा रैंडम होता है !

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    14. अमर जी,

      शुक्रिया इस कवित्त को पूरा करने के लिये।

      दरअसल निर्झर प्रतापगढ़ी जी की और भी कुछ कविताएं मेरे पास इमेज फार्म में करीब छह साल पहले से सुरक्षित हैं, तब जबकि मैं अपने भोजपुरी प्रेम के चलते भोजपुरीदुनिया डॉट कॉम नाम की साईट चलाया करता था। कुछ समय की कमी और कुछ डोमेन नेम के बारे में एक फालतू विवाद से क्षुब्ध होकर मैने साइट बंद कर अपने काम पर ध्यान देना तय किया और तब से यह भोजपुरीदुनिया डॉट काम साइट बंद ही है। संभवत: अब यह डोमेन किसी औऱ ने खरीद लिया है।

      उसके बाद से बैकअप डिस्क को फिर से न तो मैंने ओपन किया और न ही कभी फिर पढ़ा। इसी दौरान उनकी किताब भी कहीं खो खवा गई।

      अब लगता है फिर से डिस्क ओपन कर देखना पड़ेगा कि कुछ है भी या चूंटी माटा खा गये :)

      और हां, मेरे द्वारा निर्झर प्रतापगढ़ी जी से संपर्क करने की कथा भी बड़ी रोचक है। ट्रेन में ही उनकी किताब दस रूपये में ली थी। किताब के पीछे सिर्फ इतना लिखा था कि प्रतापगढ़ के कलेक्ट्रेट में कार्यरत हैं । मुंबई से प्रतापगढ़ कलेक्ट्रेट में फोन घुमाया और पूरा नंबर मय पता सहित मिल गया। एक वह भी नशा था कि भोजपुरी के लिये कुछ किया गया था।

      लेकिन समय और बढ़ती जिम्मेदारीयों के चलते सब धीरे धीरे छूट जाता है। और अब तो हम अपनी हिंदी ही सम्हाल ले जांय सो ही बहुत है। लेकिन कोफ्त तब होती है जब अलुए ठलुए लोग हिंदी सेवा के नाम पर उपदेश देने लगते हैं। मानों ऐसे लोग न कहेंगे तो हिंदी सेवा होगी ही नहीं।

      लगता है निर्झर जी के बारे में बताते हुए कुछ ज्यादा ही टिप्पणी से भटक गया हूँ। शेष फिर कभी :)

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    15. hmmmmm... चर्चा तो बढिया है. और पल्लवी की पोस्ट तो सचमुच बहुत शानदार है. "फ़र्ज़ी-ब्लॉग" भी देख आये. भैया, सेलिब्रिटी ब्लॉगर हैं आप, लोग आप के खिलाफ़ बातें बनाने, अफ़वाहें फैलाने में रुचि लेते हैं :):):) राजेश जी की कविता बहुत सुन्दर है.

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    16. ` चार तो आफ्टरसेव ट्राई कर चुका है'

      AXE ट्राई किया क्या ? :)

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    17. @ डॉ अरविन्द मिश्र ,
      मुझे तो आप पर भरोसा है ....आपका आभार !

      @ अनूप भाई ,

      गलत बात कोई भी, कहीं भी कर रहा हो अगर हम सब उसे बढ़ावा न दें और हाथ जोड़ कर मनाने का प्रयास कर लें तो लेखन पाठन का कितना आनद आये ?

      एक से एक बेहतरीन लेखक यहाँ मौजूद है मगर कहीं लेखकों के गाल फूले हैं और कही अच्छे पाठक गायब हैं ! बौद्धिकता से व्यक्तिगत रंजिशों का सफ़र हम सबको कहीं न कहीं खराब तो लगता ही होगा मगर कुछ समय में अपनी बारी आते ही सब दार्शनिकता और विद्वता गायब हो जाती हैं :-(

      दे तेरे की और ले तेरे की ...हम सब लोग अंतत अपनी औकात बताने में माहिर हैं !

      अनूप भाई की चुप्पी भी कई बार रहस्यमय हो जाती है और अखरती है ...

      मौज के साथ साथ कभी गैरों की तारीफ भी कर दिया करो गुरु !

      शुभकामनाएं !

      उत्तर देंहटाएं
    18. अहोभाग्यम रचना बेन ???!!!!!!!

      dr amar are you trying to ban me !!!!!!!!!!!!!!!!!!!

      उत्तर देंहटाएं
    19. charcha hai aapki....chakachak....

      pichle charcha ne kafi-se bhi-kafi waq liya.....
      'i think smash-hit post' jitni tathyatmak mudde
      moujoon the .. ke wahan kooch bhi likh dena post
      ko kharab kar sakta tha ... himmat nahi pari ...
      aur banchata raha links by links....

      ... aur haan aapne jo budhhiman ke liye isara kafi ke tarz pe arz kiye 'o' nihayat hi jaroori
      tha nahi to emi hi samvadhinta ki sambhavna badhti chali jati....tab jab ke farzi ke arzi
      ....ka jo hasra hua...samne hai....likin apne
      sammohit pathak ka khayal rakhte hue bare bhaiji
      ne jo spastikaran de dale .... o kum-se-kum hamare jaison ke akalpniya hai.......

      pranam.

      उत्तर देंहटाएं
    20. सुकुल जी और मिसिर जी की नोंक-झोंक खत्म हो जाये तो नमक जैसा कुछ कम हो जायेगा इस ब्लौग से... :-)

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    21. दुर्लभ सतसंगति।
      ...अनूप भाई, व्यंगकार जहाँ भी लिखता है चमत्कार पैदा करता है। लिख रहा हो कोई पोस्ट या कर रहा हो किसी पोस्ट पर चर्चा...उसको पढ़कर खाना पड़ता है गुड़, चाहिए होती है पानी...जैसे खा लिया हो ढेर सारा मर्चा।
      ...भाई अमरेंद्र, पंचम जी तथा डा0 अमर को निर्झर जी की कविता पढ़ाने के लिए आभार । कभी पढ़ा था..भूल चुका था।
      ...सतीश जी का कमेंट पढ़ा यहाँ भी, वहाँ भी, आप गलत नहीं मिलते कहीं भी।
      ...अरंविद जी ने अनफालो करने से वहाँ जाकर मना कर दिया...यह बात हजम नहीं हुई ।

      अपनी मंदमति।
      दुर्लभ सतसंगति।

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    22. बढ़िया चर्चा.शुभकामनाएं !!!!

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    23. नव वर्ष की आप सब को भी ढेर सारी शुभकामनाएं…चर्चा खूब चटपटी रही अब तक चटकारे ले रहे हैं। जितनी चर्चा अच्छी लगी उतनी ही टिप्पणियाँ बड़िया लगीं। हम तो पहली बार भोजपुरी कविता पढ रहे हैं। सतीश जी और डा अमर का शुक्रिया। सबसे ज्यादा हर्ष तो हुआ डा अमर जी की टिप्पणी देख कर, इसका मतलब है कि उनका स्वास्थय पहले से अच्छा है।

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    24. '' @ अमरेन्द्र त्रिपाठी
      मुझसे दोस्ती करोगे ?

      निर्झर जी का पूरा कवित्त यह है
      कुकुर केतनौ कंठी बाँधे, दोना चटबै तौ करी। ................''
      ---------------------------------------------------------------------
      यह मेरे लिए आश्चर्यजनक था , आप जिस अनुपात में मुझसे नफ़रत करते थे , आप इस तरह कुछ लिखेंगे यह सहज अनुमेय न था , इसलिए मैं तुरंत किसी भी प्रतिक्रया पर न आया .

      डॉक. साहेब , मत-विभेद आपसे रहा है , पूर्वाग्रह होंगे , तदनुसार तिक्त प्रतिक्रियाएं भी , इनसे इनकार नहीं करूंगा , पर आपकी ब्लॉग-जगत में सकारात्मक उपस्थिति को मैंने उपेक्षित कभी भी नहीं किया . इन सबके उपरान्त भी एक सम्मान रहा आपके प्रति !

      --------------------------------------------------------
      निर्झर जी का संग्रह अगर आपके पास है तो सहेज के रखिये , मैं पुस्तकों के लिए पागल सा हो जाता हूँ , ऊपर से देशभाषा-मातृभाषा अवधी की पुस्तक ! , आपके पास अन्य भी उपयोगी चीजें हों , तो इस दास की संदिग्ध (?) पात्रता को देखते हुए भी देने का कष्ट करेंगे , ऐसी सहज उम्मीद आपसे रखता हूँ !

      ~ सद्भावेन
      अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

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