Friday, January 28, 2011

नदी का साथ देता हूँ, समंदर रूठ जाता है

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नदी का साथ देता हूँ, समंदर रूठ जाता है

Monday, January 17, 2011

सारा पानी छू के होठों से गुलाबी कर गया

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सारा पानी छू के होठों से गुलाबी कर गया

Sunday, January 09, 2011

चिट्ठाचर्चा के सातवें साल की शुरुआत

चिट्ठाचर्चा के सातवें साल की शुरुआत हम नये प्लेटफ़ार्म से कर रहे हैं। चर्चा देखने के लिये क्लिक करिये इस पोस्ट पर:

चिट्ठाचर्चा के सातवें साल की शुरुआत- 


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Wednesday, January 05, 2011

सिर्फ सेहत के सहारे जिन्दगी कटती नहीं

नया वर्ष और ये नया दशक क्या शुरू हुआ, बैठे-बिठाये हमने ये नया रोग पाल लिया...चर्चा-रोग। हुआ यूँ कि हुआ कुछ भी नहीं था, कोई लक्षण भी नहीं नजर आये थे। हाँ, इतना जरूर है कि एक बचपन से किस्म-किस्म के रोगों को पालने का शौक जरूर अब तलक बरकरार है। कश्मीर की इस ठिठुराती सर्दी में मेरे ये तमाम रोग मुझे गर्म रखते हैं। कश्मीर का जिक्र छिड़ ही गया है तो मेरी तलाश बताती है कि हिंदी ब्लौग-जगत में मेरे अलावा कश्मीर के घाटी वाले इलाके से बस एक और ब्लौगर हैं- उस्मान और वो मेरा कश्मीर नाम से ब्लौग चलाते हैं। एक नजर डालिये उस ज़ानिब, कई पहलू देखने को मिलेंगे कश्मीर के। उनके किसी पुराने पोस्ट पर कभी एक बड़ी विनम्र-सी टिप्पणी भी की थी मैंने। इच्छा है कि एक बार मिलूँ उनसे। उस्मान की आखिरी पोस्ट पिछले साल 18 अक्टूबर की लिखी हुई है, जिसमें वो कहते हैं और बड़ा ही वाजिब कहते हैं:-

अधिकांश फौजियों की निगाह से कश्मीर का हर बाशिंदा आतंकवादी या आतंकियों को पनाह देने वाला है। आम कश्मीरी की नजर में हर फौजी जुल्म करने वाला है। घाटी छोड़ चुके कश्मीरी पंडितों के लिए कश्मीर का सच अलग है और कश्मीर के गाँवों में रहने वाले उन मासूमों के लिए अलग, जिनके लिए आतंकवादी भी उतने ही डरावने हैं जितने वर्दी वाले लोग।

उस्मान को पढ़िये और उन्हें और-और लिखने के लिये प्रोत्साहित कीजिये। उनकी कुछ बातों से भले ही मैं सहमत न होऊँ, लेकिन वक्त की दरकार है कि यहाँ कश्मीर की ये वर्तमान पीढ़ी पूरे मुल्क से परोक्ष तौर पर जुड़े।

दूसरी तरफ, इस कश्मीर-वादी के धवल-श्वेत रंग से परे इक नीले रंग के दो अलग-अलग कंट्रास्ट... एक नंदनी की कविता में तो दूजा किशोर की कहानी में...जहाँ शब्दों के कुछ बड़े ही हसीन चित्र बनाते हैं, वहीं दोनों पोस्ट के शीर्षक एक कविता जैसा कुछ। यूँ कि :-
रंग उड़े होर्डिंग पर
बैठा वो नीलकंठ
स्मृतियों का
नीला गाढ़ा रसायन रचता है


कहीं और बधाईयों की किंकर्तव्यविमूढ़ता में उलझा प्रशांत @ पीडी कुछ इस तरह से अपनी व्यथा को साझा करता है:-

मुझसे औपचारिकता निभाना किसी भी क्षण में बेहद दुष्कर कार्य रहा है, और उससे अच्छा खुद को एक अहंकारी व्यक्ति कहलाना अधिक आसान लगता है.. मजाक में कहूँ तो, "अगर मनुष्य एक सामजिक प्राणी है तो मुझमें शत-प्रतिशत मनुष्य वाला गुण शर्तिया तौर से नहीं है.."

...तो कहीं और, दिल्ली की सर्दी से ब्रेक लेकर उत्तरांचल की पहाड़ियों पर विचरता अपना कुमाऊँनी भूल्ला दर्पण अपने सेलेक्टिव लव के जरिये प्रेम पर{और प्रेमिका पर} पर अनुभव बाँटता हुआ एकदम से अपनी उम्र से बड़ा नजर आने लगता है:-

...प्रेम वास्तविकता के धरातल पे होना पसंद नहीं करता. वो किसी परी कथा सा होना पसंद करता है. विरोधाभासों से परिपूर्ण. वास्तव में प्रेम की उम्र रोमांच की उम्र होती है. 'यूथ' . हाँ यदि प्रेम बुढ़ापे में हुआ करे तो थोड़ी रेशनल हो.

पोस्ट लिखे जाने तक ये दार्शनिक भूल्ला उधर उन पहाड़ियों पर ही विचर रहा था...और इधर चीन से अपना विचरन संपन्न करके नीरज जी बड़ी प्यारी-सी ग़ज़ल सुनाते हैं। दो शेर चुरा लाया हूँ यहाँ:-

बाजुओं पर यकीन है जिनको
दूर उनसे कहां किनारे हैं
दिन अकेले ही काट लो ‘नीरज’
रात में चाँद है सितारे हैं


उधर एक ओर विरह-वेदना में अकेले दिन काटते प्रवीण पाण्डेय अपनी श्रीमति जी के समय-पूर्वागमन से मायके जाने के सूख को जब नया आयाम देते हैं अपनी अद्‍भुत लेखनी के जरिये तो वहीं दूसरी ओर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी उसी पोस्ट पर अपनी टिप्पणी में छुट्टी के विकट नतीजे पर एक बेमिसाल छंद से उसी आयाम को नयी ऊँचाईयाँ देते हैं।

लखनऊ की सर्दी में कंपकापाती सड़कों पर बिना गियर बदले पचास की स्पीड से ड्राइव करते हुये अपने ब्लौग-जगत के कथित आलसी महोदय की ये आत्ममुग्ध प्रोफाइल कम-से-कम आपसब की एक दृष्टि का फेरा तो माँगती ही है कि उनकी बकबक में भी नायाब बातें होती हैं:-

पास बैठो कि मेरी बकबक में नायाब बातें होती हैं
तफसील पूछोगे तो कह दूँगा,मुझे कुछ नहीं पता


...और हरबार की तरह मनीष जी की वार्षिक संगीतमाला अपनी उल्टी गिनती के साथ शुरू हो चुकी है 25वें पायदान वाले गीत के साथ। हर वर्ष की शुरूआत में ये एक खास आकर्षण रहता फिल्म-संगीत पसंद करने वाले ब्लौगरों के लिये। वहाँ मनीष जी के ब्लौग पर भले ही अमीन सायनी की आवाज लापता हो, लेकिन लुत्फ़ वही अपने पुराने जमाने वाले बिनाका गीतमाला का ही मिलता है और संग में गीत-विशेष से जुड़ी कुछ अंदरूनी जानकारियाँ भी। आप भी शामिल हों इस मस्त श्रृंखला में मनीष जी के साथ।

...फिलहाल इतना ही। हाँ, इस नये साल की शुरूआत पर एक सदी से सुसुप्तावस्था में पड़े कुछ ब्लौगरों को झिंझोड़ कर जगाना चाहता हूँ। जागोsssss ! मीनाक्षी !! अपूर्व !!! लवली !!!! आभा !!!!! और ताहम !!!!! आपसब को भी कुछ सोये हुये ब्लौगरों की खबर हो तो मुझे बतायें। तमाम संकलकों को तो पहले हमसब ने तरह-तरह के इल्ज़ाम लगा कर इतना दुत्कारा और अब उनकी रहस्यमयी गुमशुदगी पर झुंझलाये फिर रहे हैं। मैं तो फिलहाल अपने व्यक्तिगत ब्लौग-रोल से ही काम चला रहा हूँ।

विदा! आपसब को नये साल की खूब-खूब सारी शुभकामनायें...! कोशिश करूँगा कि अपने इस नये-नवेले रोग के साथ नियमित रहूँ इस मंच पर कि इन दिनों फुरसतों से खासी यारी हो रखी है अपनी। चलते-चलते ये फ़िराक गोरखपुरी साब का एक विख्यात शेर:-

पाल ले इक रोग नादां जिन्दगी के वास्ते
सिर्फ सेहत के सहारे जिन्दगी कटती नहीं

Monday, January 03, 2011

हम जहाँ हैं, वहीं से, आगे बढेंगे

माना नहीं नया साल आ ही गया। अब जब आ ही गया तो उसका स्वागत भी कर ही लिया जाये। आप सभी को नया साल मुबारक। आप सबने नये साल के कुछ न कुछ संकल्प लिये ही होंगे। शुभकामनायें इस बात के लिये आप उन संकल्पों में कुछ का साथ कुछ दिन तक तो कम से कम निबाह ही लें। इसई के साथ कार्टूनकुमार काजल जी का संकल्प भी देख लीजिये। अब बताओ भला बंदर टोपी पहनना भी कोई संकल्प होता है। लेकिन भाई ये कार्टूनिस्ट हैं जो न करायें।

देखिये नये साल का स्वागत अजित गुप्ता जी ने कैसे किया:
समय दौड़ रहा है। आज सूरज ने भी अपनी रजाई फेंक दी है। किरणों ने वातायन पर दस्‍तक दी है। हमने भी खिड़की के पर्दे हटा दिए हैं। दरवाजे भी खोल दिए हैं। सुबह की धूप कक्ष में प्रवेश कर चुकी है। फोन की घण्‍टी चहकने लगी है। नव वर्ष की शुभकामनाएं ली और दी जा रही हैं।

इस साल कई लोगों ने साल की शुभकामनाओं के बदले दशक की शुभकामनायें दी हैं। नया साल बेचारे का मन कसक रहा होगा कि उसका हिस्सा बकिया के नौ साल भी ले उड़े।

हम तो यही कहेंगे कि नया साल आपका झमाझम बीते। अगर कोई गम-वम तो उसे आप महेन्द्र मिश्र जी के उधर भेज दीजियेगा। उनको गम की थोक दरकार है। उन्होंने कहा भी है:
अपने गम देते मुझे कुछ सूकून तो मिले
कितने बदनसीब है जिन्हें गम नहीं मिले

उधर रिचा कहती हैं:
मुश्किल है जीना उम्मीद के बिना
थोड़े से सपने सजायें
थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ...


सतीश सक्सेना जी की ये वाली फोटो देखकर लगता है कि वे नये साल की तरह उदय हो रहे हैं। उन्होंने अपने ब्लॉग पर नये साल की शुभकामनायें मांगी हैं। लिखा है:
इस वर्ष तो यही समझ आया कि मूर्खों से ईश्वर रक्षा करे और चालबाजों से दूरी बनी रहे, हालाँकि पहचानने में बार बार गलती की है ..... :-(

दोस्तों से अनुरोध है कि सच्चे मन से, अगले वर्ष की शुभकामनायें दे जाना, हमारे ब्लॉग पर...बहुत जरूरत है !

मैं तो यही कामना करता हूं कि वे पहचानने में होने वाली गलती बार-बार करते रहें। इससे दो पोस्टें निकलती हैं कम से कम। एक पहचानने से पहले और एक पहचानने के बाद।

उधर देखिये नये साल का उत्सव मनाने के लिये दुर्योधन को क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े। बिना कैमरामैन की रिपोर्टिंग कर रहे हैंकलकत्ता से शिवकुमार मिश्र:
जयद्रथ भी बहुत खुश है. शाम से ही केश- सज्जा में लगा हुआ है. दर्पण के सामने से हट ही नहीं रहा है. कभी मुकुट को बाईं तरफ़ से देखता है तो कभी दाईं तरफ़ से. शाम से अब तक मोतियों की सत्रह मालाएं बदल चुका है. चार तो आफ्टरसेव ट्राई कर चुका है. उसे देखकर लग रहा है जैसे उसने आज ऐसा नहीं किया तो नया साल आने से मना कर देगा.


नाचगाने बोले तो नृत्य का भी इंतजाम है। देखिये:
कल उज़बेकिस्तान से पधारी दो नर्तकियों को लेकर आया. कह रहा था ये दोनों वहां की सबसे कुशल नर्तकियां हैं. पोल डांस में माहिर. उनकी फीस के बारे में पूछा तो पता चला कि बहुत पैसा मांगती हैं. कह रही थीं सारा पेमेंट टैक्स फ्री होना चाहिए. उनकी डिमांड सुनकर महाराज भरत की याद आ गई. एक समय था जब उज़बेकिस्तान भी महाराज भरत के राज्य का हिस्सा था. आज रहता तो इन नर्तकियों की हिम्मत नहीं होती इस तरह की डिमांड करने की. लेकिन अब कर भी क्या सकते हैं?

प्रबुद्ध की ये कविता मजेदार है। देखिये वे क्या कहते हैं:
मेरे क्यूबिकल से बस एक झलक मिलती थी
वो उन दिनों कमाल लगती थी
कनखियों से देखता था कभी
और गुज़रता था बेहद करीब से कभी
मैं शुक्रगुज़ार हूं दफ्तर के डिज़ायनर का
कॉरीडोर संकरे बनाए हैं काफी


आगे इसी तरह की और बातों पर शुक्रगुजार होते हुये आखिरी में देखिये मामला किस करवट बैठता है:
वो एक लम्हा जैसे वहीं रुक गया है
कि तभी,ऐसी सिचुएशन में, हिंदी फिल्मों की
मेरी सारी जमा पूंजी को कच्चा चबाते हुए
उसीके मुखारविंद से फूटा है
हिंगलिश गालियों का पूरा लॉट
एक भी गाली ऐसी नहीं
जिससे डक करके बच सको
उसी के शब्दों में--
&^^%%$%#%#@$#@@@%^$
U scoundrel! Can't u see properly?
सकपकाया हुआ उठा हूं मैं
और नीची नज़रों से भागा हूं बदहवास

बॉस की तरफ़ बढ़ते हुए
गरिया रहा हूं जी भर के
दफ़्तर के डिज़ायनर को
साला %*%&(^%%$^$^#@%^%@

लिफ्ट को कहीं और नहीं बना सकता था !


पिछले साल की सबसे बेहतरीन पोस्टों में एक अगर कही जाये तो पल्लवी त्रिवेदी की यह पोस्ट जरूर उसमें शामिल होगी। कुछ कल्पना और ज्यादा आपबीती है शायद यह पोस्ट! देखिये दादी मेरी जान...कितना सरप्राइज़ करती हो तुम के कुछ अंश:
  • गुस्से में उन्हें किसी का बोलना पसंद नहीं आता..यहाँ तक की रेडियो पे गाने बजते उनमे भी नुक्स निकालना शुरू कर देती! एक बार मैंने सुना किशोर कुमार को कह रही थीं " जब गाना नहीं आता तो काहे गाते हो जी " शाम होते होते दादी का गुस्सा छूमंतर हो जाता और झुर्री भरे गालों पर मुस्कान की रेखा खिंच जाती!

  • भाई ने दादी को जाने कैसे पटा रखा था! रोज़ शाम को छत पर वह पतंग उडाता और दादी मज़े से कुर्सी पर उसकी चरखी थामे बैठी रहती! घर में दादी के इस कार्य के बारे में किसी को पता नहीं था! एक दिन मम्मी छत पर पहुंची तब हँसते हुए उन्होंने पापा को छत पर ले जाकर दिखाया! बाद में भाई ने बताया...चरखी पकड़ने के बदले लास्ट में दादी पांच मिनिट पतंग उड़ाती थी और रोज़ एक पतंग कटवा देती थी!

  • रोज़ शाम को दादी मंदिर जाती थीं लेकिन पिछले एक हफ्ते से मंदिर की जगह वो प्रिया के घर जा रही थीं! सात दिन में उन्होंने प्रिया से मेल आई डी खोलकर मेल करना सीख लिया...सिर्फ मुझे सरप्राइज़ कार्ड भेजने के लिए! मुझे अपनी दादी पर बड़ा फक्र हो रहा था! किसी की दादी को कंप्यूटर नहीं आता था...सिवा मेरी लाडली दादी के!


  • दादी ने मुझे बताया कि दादाजी हमेशा दादी का जन्मदिन पर उन्हें अपने हाथों से सजाते थे...बताते बताते दादी की आँखों में पानी तैर आया था! दादी एक बार फिर दादाजी के लिए तैयार हो रही थीं! और मैं उन्हें दादाजी की फेवरिट साडी पहना रही थी! सचमुच उस पर्पल कलर की साड़ी में दादी बहुत खूबसूरत लग रही थीं!मैंने उन्हें इस तरह पहली बार देखा था! लग रहा था दादी एक पूरा ज़माना पार करके कहीं बहुत पीछे लौट रही थीं! वो हर साल ये सफ़र तय करती थीं! इस बार में इस सफ़र में साथ थी!


  • किस्सागोई पल्लवी त्रिवेदी की अद्भुत है। उन्होंने जितनी भी पोस्टें लिखीं वे सब की सब बहुत अच्छी हैं सिवाय कुछ कविताओं के। कवितायें अपन को जमती नहीं। :)

    अरविन्द मिश्र जी ने देखिये कितनी अदाओं से एक नये शब्द म्यूज से परिचय कराया। इसके बाद आपबीती सुना दी:
    न अब मैं किसी का म्यूज रहा और न अब कोई मेरा .....आप चाहें तो इस अवसर पर वह फ़िल्मी गीत गा सकते हैं कोई हमदम न रहा .... मगर मेरा हठयोग तो देखिये फिर भी अपने टूटे फूटे सृजन कर्म के साथ आपके सम्मुख हूँ -अहर्निश रचना कर्म को उद्यत ..यह बेहयाई नहीं मित्र बल्कि एक जिजीविषा है .....जीवन की असली परिभाषा समझ लेने की एक छटपटाहट है ....एक अंतर्नाद है .


    बकिया और सब ठीक है लेकिन न अब मैं किसी का म्यूज रहा और न अब कोई मेरा पढ़कर यही दिलासा दिया जा सकता है कि सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है।

    कल एक मित्र जो पिछले दिनों ब्लॉगजगत से अलग रहे ने कोई हंगामेदार च मजेदार पोस्ट का लिंक मांगा। हमने कुछ लिंक दिये। उनमें से आखिरी लिंक यह था। इसमें किसी स्थापित ब्लॉगर ने फ़र्जी प्रोफ़ाइल बनाकर ब्लॉग बनाकर यह पोस्ट लिखी। इसके मुख्य अंश हैं:
    १) अरूप शुकुलबा को दिया गुरु घंटाल सम्मान ( प्राईमरी का एक स्लेट और चार लेमनचूस के साथ कानपुर की फैकटरी में बना चमड़े का प्रशस्ती पत्र )
    (२) खीश निपोर त्रिपाठिया को दिया टपक गिरधारी सम्मान ( अयोध्या में बना एक अंगौछा और चार लेमनचूस )
    (३)पञ्च मणि उर्फ़ पंचमवा को दिया बिन पेंदी का लोटा सम्मान ( मुरादाबाद का एक बिना पेंदी का लोटा और चार लेमनचूस )

    हालांकि वहां डिस्कलेमर लगा है -यह खालिश व्यंग्य है,किसी भी जीवित व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है,किन्तु किसी घटना या वास्तविक पात्र से मेल खा जाए तो महज इत्तेफाक समझें ! लेकिन यह साफ़ है कि महज इतेफ़ाक वाले नाम अरूप शुकुलबा, खीश निपोर त्रिपाठिया और पञ्च मणि उर्फ़ पंचमवा वास्तव में अनूप शुक्ल , अमरेन्द्र त्रिपाठी और सतीश पंचम हैं।

    यह कोई नयी बात नहीं कई लोग लिखते हैं ऐसा। हमने भी मजे लिये आनन्दित हुये यह पोस्ट बांचकर। मुश्किल नहीं है यह अनुमान लगाना कि किसने लिखी होगी यह पोस्ट!

    मजे की बात जो मुझे लगी वह यह कि अरविन्द मिश्र जी इस ब्लॉग के फ़ालोवर हैं। जब सबसे पहले देखा था तब वे पहले फ़ालोवर थे। अरविन्द मिश्र तो बहादुर और बेधड़क इंसान हैं। इशारे से भी उनको अगर कुछ कहा जाये तो खुलेआम हड़का दिया था अनूप शुक्ल को उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम और बोलती बंद हो गयी थी। मिश्र जी ने कहा था:
    अपनी औकात में रहो अनूप!

    ऐसा शेरदिल इंसान ऐसे ब्लॉग का फ़ालोवर बनता है जिसमें यह तक हिम्मत नहीं कि सीधे-सीधे नाम ले सके तो लगता है मिसिरजी कमजोर आदमी के फ़ालोवर बन गये। किंचित आश्चर्य हुआ। बस किंचित ही। ज्यादा नहीं। संतोषी व्यक्ति हैं। कम में संतोष कर लिया। बस यही लगा कि भगवान परशुराम ने कर्ण कोचिंग इंस्टीट्यूट ज्वाइन कर ली है। :)

    यह देखकर हरिशंकर परसाई जी का लिखा याद आ गया- वे शेर हैं लेकिन सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं। :)

    मेरी पसंद


    हम जहाँ हैं,
    वहीं से, आगे बढेंगे।

    हैं अगर यदि भीड़ में भी, हम खड़े तो,
    है यकीं कि, हम नहीं,
    पीछे हटेगे।

    देश के, बंजर समय के, बाँझपन में,
    या कि, अपनी लालसाओं के,
    अंधेरे सघन वन में,
    पंथ, खुद अपना चुनेंगे ।

    या , अगर हैं हम,
    परिस्थितियों की तलहटी में,
    तो ,
    वहीं से , बादलों कॆ रूप में , ऊपर उठेंगे।

    राजेश कुमार सिंह
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