बुधवार, अगस्त 21, 2013

लड़कियाँ, अपने आप में एक मुक्कमिल जहाँ होती हैं


जईसा कि हम बताये थे कि अगडम-बगड़म बाबू के इशरार पर चर्चा करना शुरु किये थे -एक बार फ़िर दुबारा। शर्त यह थी कि ऊ भी अपना कुछ  बयान बाजी करेंगे। लिखेंगे। हम उसकी चर्चा करेंगे। लेकिन ऊ हमको दौड़ा के खुद आरामफ़र्मा हो गये रेफ़री की तरह। फ़िर हमने उलाहनियाया कि भाई ऐसे त न चलेगा। लिखना तो पड़ेगा कुछ न कुछ। फ़िर उन्होंने मारे ब्लॉग लिहाग के एक ठो पोस्ट लिख ही डाली-१५ अगस्त का तोड़ू-फोड़ू दिन !!!  

पोस्ट साथी  ब्लॉगरों से मिलन-जुलन वाली थी। फ़र्रूखाबाद की सोनल , अलीगढ़ की शिखा और उन्नाव/आजमगढ़ की आराधना और प्रेम कथा लिख्खाड़ अभिषेक के साथ बेचारे देवांशु। कहने को तो पंद्रह अगस्त का दिन झण्डा फ़हराने का होता है। लेकिन इन धाकड़ ब्लॉग लेखिकाओं के बहुमत की बलिहारी कि सबने मिलकर बेचारी देवांशु को ही झंडे जैसा फ़हरा दिया। क्या -क्या नहीं कराया? बेचारे से ट्रे उठवायी, नाश्ता लगवाया और करेला ऊपर से नीम  चढ़ा कि उसकी निजता का उल्लंघन करते हुये फ़ोटू भी सटा दी। यह सब तब हुआ जब देश आजादी के तराने गा रहा था। ब्लॉगिंग  जो न कराये। किस्सा आप तसल्ली से यहां पढ़ सकते हैं जिसके सबसे मार्मिक अंश देखिये:
DSC01458शिखाजी ने अपनी नयी किताब “मन के प्रतिबिम्ब" हम लोगो को गिफ्ट की | अभी पढ़ नहीं पाए हैं , उसके बारे में फिर कभी  | आजकल “ट्यूसडेज विध मोरी” पढने में टाइम निकला जा रहा है | ये किताब पिछली मुलाकात में अनु जी ने सजेस्ट की थी | पहली बार कोई किताब पढ़ रहे हैं जो हर पन्ने पर अपना समय मांग रही है  | बहुत बढ़िया किताब है   |
 
 कभी पन्द्रह अगस्त को  अंग्रेजों के लंदन वापस जाने की खुशी की में लड्डू बंटते थे। बताओ आज हाल यह हुआ कि लंदन पलट   ब्लॉगर ने कविताओं की किताब बांट दी।  अब ये भले पढ़ें न पढ़ें लेकिन सबको समीक्षा जरूर लिखनी पड़ेगी। समीक्षा मतलब तारीफ़। लेकिन देवांशु भी कम समझदार नहीं हैं। अगले ने बता दिया कि अभी वो अंग्रेजी की किताब पढ़ रहा है। उसको हर पन्ने की जगह हर लाइन को टाइम देना चाहिये। और जब कभी समीक्षा करनी भी पड़े कविताओं की तो रविरतलामी द्वारा सुझाये कविता मीटर पर करनी चाहिये। कोई टोक भी न पायेगा। कह दे साफ़्टवेयर कहिस है हम का करें। वैज्ञानिक समीक्षा है।

देश कहां जा रहा है।  किधर जा रहा है । अक्सर लोग पूछते हैं। हम भी पूछ चुके हैं एक बार। लेकिन जब यही सवाल सुखी होने की पड़ताल में जुटे प्रमोद जी पूछते हैं तो जबाब नहीं सूझता। लगता है कोई कड़क हेडमास्टर किसी रट्टेबाज से उसका कडक के उसका नाम भर पूछे तो हकबका के लड़का सॉरी बोलने लगे। देखिये :

लोग कमा रहे हैं. तेल-साबुन लगा रहे हैं. गांव से छूट-छूटकर शहर आ रहे हैं. हैसियत बनती है तो गोल बना रहे हैं, वर्ना खाने की पुरानी आदत है लात खा रहे हैं. जो थेथर हैं जमे हुए हैं (ज़्यादा थेथर ही हैं, ज़िंदगी ने बना दिया है); हाथ में रोटी आने पर अब भी जिनकी चमकती है आंखें, ऐसे बकिया ग़लत गा‍ड़ि‍यों पर चढ़कर वापस गांव भी आ रहे हैं! गांव की धरती ‘सोना उगले, उगले हीरा-मोती’ की लीक पर उबल रही है. बहुत सारे गांववाले जल रहे हैं. ज़मीनों के भाव बढ़ रहे हैं. पूरी दुनिया का यही हाल है. लात खायी दुनिया के मूर्ख, ज़ाहिलों, गंवारों की ज़मीनें कौड़ि‍यों के मोल खरीदी जा रही हैं. देश सही जा रहा है.

ये कहानी सुनाई थी प्रमोद जी ने पांच साल पहले । इस बीच वो वाली बाजा कंपनी दिवालिया होकर फ़ूट ली जिसमें अपना आवाज चढ़ाये थे। कंपनी संग में आवाज भी ले गयी। लेकिन ये कोई कोयला मंत्रालय का फ़ाइल त नहीं है न जो गया त गया। प्रमोद जी ने फ़िर से अपना आवाज प्रदान किया और पूरा किस्सा फ़िर से उसई आवाज में सुनाया कि देश किधर जा रहा है। सुनिये तनि इहां।  सुनते हुये इसको बांचते भी रहियेगा त किस्सा अच्छे से समझ में आयेगा। देखिये सु्निये क्या हाल है हो रहा है देश का कि नहाने का पानी, नींद और सपना तक बाजार में उपलब्ध है:

सब स्‍वस्‍थ है. मेडिकल इंश्‍युरेंस हैज़ बीन टेकेन केयर ऑफ़. वी बाइ ऑल अवर बेदिंग वॉटर. यू हर्ड ऑफ़ दैट अमेज़िंग गुड शॉप व्‍हेयर दे सेल स्‍लीप? सम वन जस्‍ट मेंशन्‍ड दे आर गोइंग टू स्‍टार्ट सेलिंग शिट. आई अम गोइंग टू बाइ इट! बाइ इन माई सपना, बाइ इन माई स्‍लीप. बाइ बाइ बाइ. टिल आई डाय. ओह, सो मेसमैराइजिंग, आई कांट टेल हाऊ हाई आई फ्लाई. आई डोंट रिमेंबर व्‍हेन वॉज़ द लास्‍ट टाईम आई आस्‍क्‍ड व्‍हाई. व्‍हाई बॉदर, गेट वेस्‍टेड एंड ट्राई? देश सही जा रहा है. बच्‍चे ज़्यादा समझदार हो गए हैं, मां-बाप के यार हो गए हैं. लड़कियां भी धारदार हो गई हैं. सेक्‍स वॉज़ नेवर सो एक्‍साइटिंग बिफोर. व्‍हॉटेवर वॉज़ सो एक्‍साइटिंग अर्लियर, यू बगर, रिटार्डेड, बास्‍टर्ड? हंसते-हंसते आप मुझे गालियां दे सकते हैं, चलती रेल से ठेल कर गिरा सकते हैं, गिराने का कैसा दु:ख हुआ है उसपर फिर टीवी के लिए एक शो भी बना सकते हैं. हाथ-पैर पटकूं तो ताज्‍जुब कर सकते हैं, घर के अंदर बनायी अपने मंदिर में ओम जय जगदीश गा सकते हैं. आपके इरादे नेक़ हैं. आप दायें बायें कहीं भी दे सकते हैं हमें फेंक. सब सही होगा. क्‍योंकि देश सही जाता होगा..

देश का बात करते हुये फ़िर देश की तरफ़ लौटना पड़ेगा जी। आज रक्षाबंधन है। सो कई लोगों ने इस मौके वाली पोस्टें सटाई हैं। अमित यादों के पिटारे से राखियां  लाये हैं:
उस समय राखियाँ स्पंज वाली और बहुत बड़े बड़े फूल वाली होती थीं । उन पर सुनहरे रंग के प्लास्टिक के विभिन्न डिजायन वाले आकृतियाँ लगी होती थीं और राखी के अगले दिन हम लोग उसे हाथ में बांधे बांधे स्कूल जाया करते थे । कुछ बच्चों के हाथों में कलाई से लेकर ऊपर बांह तक राखियाँ बंधी होती थीं । मै सोचता था कितनी बहने हैं इसके और मेरी एक भी नहीं । बाद में पता चला ,वो बच्चे खुद ही इतनी सारी  राखियाँ अपने हाथों में बाँध लेते थे । उस समय राखियों की गिनती से समृद्धता का एहसास होता था ।











रश्मि रविजा ने भाई-बहन के निश्छल स्नेह के कुछ अनमोल पल संजोये हैं। संजय दत्त का किस्सा पढिये:
एक प्रोग्राम में उनकी बहन प्रिया बता रही थीं. संजय दत्त सबसे बड़े थे,इसलिए दोनों बहनों को हमेशा इंतज़ार रहता कि राखी पर क्या मिलेगा,वे अपनी फरमाईशें भी रखा करतीं.पर जब संजय दत्त जेल में थे,उनके पास राखी पर देने के लिए कुछ भी नहीं था. उन्हें  जेल में कारपेंटरी और बागबानी  कर दो दो रुपये के कुछ कूपन मिले थे. उन्होंने वही कूपन , बहनों को दिए. जिसे प्रिया ने संभाल कर रखा था और उस प्रोग्राम में दिखाया. सबकी आँखें गीली हो आई थीं.
सतीश सक्सेना 19 अगस्त से ही भावुक हो लिये और  रक्षा बंधन के दिन पर, घर के दरवाजे बैठ कर गुनगुनाने लगे:
पहले घर के,  हर कोने  में ,
एक गुडिया खेला करती थी
चूड़ी, पायल, कंगन, झुमका 
को संग खिलाया करती थी
जबसे गुड्डे संग विदा हुई , हम  ठगे हुए से बैठे हैं  !
कौवे की बोली सुननें को, हम  कान  लगाये बैठे हैं !

पहले इस नंदन कानन में
एक राजकुमारी रहती थी
घर राजमहल सा लगता था
हर रोज दिवाली होती थी !
तेरे जाने के साथ साथ ,चिड़ियों ने भी आना  छोड़ा !
                                    चुग्गा पानी को लिए हुए , उम्मीद  लगाए बैठे    हैं !

सतीश जी जिस छंद में अपने गीतों की रचना करते हैं यह तो वे ही जानते होंगे या फ़िर सुधी साहित्यकार। अगर कोई हमसे कहे तो हम कहेंगे कि ये पारिवारिक छंद है। पारिवारिक छंद इसलिये कि इसमें चार छोटी लाइनें होती हैं दो बड़ी लाइने। चार छोटी लाइनें मतलब मियां, बीबी, दो बच्चे। दो बड़ी लाइनें मतलब मियां-बीबी के मां-बाप। अपनापे और भाईचारे का मजबूत सीमेंट  भावुकता के साफ़ पानी में घोलकर सतीश जी चकाचक पारिवारिक छंद में रचनायें रचते रहते हैं। 

सतीश जी इत्ते अच्छे गीतकार हैं। एक  ठो किताब भी आ गयी उनकी। लेकिन अभी तक उन्होंने अपना कोई उपनाम बोले तो तखल्लुस नहीं रखा। अगर रखा होगा भी तो अपन को पता नहीं। बिना तखल्लस के शायर बिना घपले की सरकारी योजना सरीखा लगता है। सो सतीश जी को  भी तखल्लुस रख ही लेना चाहिये। हमने आज ही फ़ेसबुक में देखा कि वे मूलत: बदायूं के रहने वाले हैं।  अगर वे ठीक समझें तो शकील बदायूंनी की तर्ज पर अपना गीतकार के लिये नाम सतीश बदायूंनी रख सकते हैं।


 मनीष कुमार को  इंडीब्लॉगर इनाम से नवाजा गया। उनको बधाई। देश नामा के लिये खुशदीप को भी इनाम मिला उनको भी बधाई। खुशदीप से किसी ने पूछा कि क्या करोगे इनाम का तो उन्होंने जो बताया वो आप यहां देख सकते हैं। खैर यह तो हरेक का  अधिकार है कि वह मनचाही हरकत करे। लेकिन हमारी याद में  खशदीप सबसे ज्यादा सक्रिय ब्लॉगर रहे हैं। तीस दिन में तीस पोस्ट। वह कारनामा भी कभी दिखाते रहें।

My Photoमनीष कुमार 2006 से नियमित ब्लॉगिंग करने वाले लोगों में हैं। फ़िल्मों, गीतों, किताबों के अलावा सैर-सपाटे माने कि यायावरी के किस्से नियमित लिखते रहे। वार्षिक संगीतमालायें आयोजित करते रहे। बिना किसी विवाद लफ़ड़े के सात साल नियमित ब्लॉगिंग करते रहना अपने आप में एक उपल्ब्धि है। मनीष ने कुछ दिन चिट्ठाचर्चा भी है और संगीत से जुड़ी पोस्टों की चर्चा की है। उनकी  द्वारा की गयी चर्चायें  देखिये:
 मनीष को हर तरह से इंडीब्लॉगर पुरस्कार पाने के सुपात्र हैं। उनके ब्लॉग एक शाम मेरे नाम को इंडीब्लॉगर द्वारा सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग के पुरस्कार से नवाजा गया इसके लिये उनको बधाई।


ये इनाम हिन्दी को क्षेत्रीय भाषा का ब्लॉग मान के दिया गया। इस पर मिसिरजी ने आह्वान किया कि  विरोध स्वरूप लोगों को इनाम ठुकरा देने चाहिये। इसपर खुशदीप का कहना है कि मिला क्या जो ठुकरा दें। अब इतनी अकल तो इनाम देने वालों को होनी चाहिये कि हिन्दी क्षेत्रीय भाषा नहीं है। राजभाषा है। लेकिन दक्षिण भारतीय लोगों द्वारा चलाया /दिया जाने वाला इनाम अगर उन्होंने हिन्दी को क्षेत्रीय भाषा कहकर दिया तो उनको समझाना /बताना चाहिये था तब जब नामांकन चल रहा था। अब घोषणा के बाद यह आह्वान कि लोग इनाम ठुकरा दें  यह कुछ जमी नहीं बात। विरोध करके अगली बार के सुधरवा लें मामला वह अलग बात।

मेरी पसंद

लड़कियाँ,
तितली सी होती है
जहाँ रहती है रंग भरती हैं
चाहे चौराहे हो या गलियाँ
फ़ुदकती रहती हैं आंगन में
धमाचौकड़ी करती चिडियों सी

लड़कियाँ,
टुईयाँ सी होती है
दिन भर बस बोलती रहती हैं
पतंग सी होती हैं
जब तक डोर से बंधी होती हैं
डोलती रहती हैं इधर उधर
फ़िर उतर आती हैं हौले से

लड़कियाँ,
खुश्बू की तरह होती हैं
जहाँ रहती हैं महकती रहती है
उधार की तरह होती हैं
जब तक रह्ती हैं घर भरा लगता है
वरना खाली ज़ेब सा

लड़्कियाँ,
सुबह के ख्वाब सी होती हैं
जी चाहता हैं आँखों में बसी रहे
हरदम और लुभाती रहे
मुस्कुराहट सी होती हैं
सजी रह्ती हैं होठों पर

लड़कियाँ
आँसूओं की तरह होती हैं
बसी रहती हैं पलकों में
जरा सा कुछ हुआ नही की छलक पड़ती हैं
सड़कों पर दौड़ती जिन्दगी होती हैं
वो शायद घर से बाहर नही निकले तो
बेरंगी हो जाये हैं दुनियाँ
या रंग ही गुम हो जाये
लड़कियाँ,
अपने आप में
एक मुक्कमिल जहाँ होती हैं
-----------------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी

और अंत में

आज के लिये बस इत्ता ही। आप सबको रक्षा बंधन मुबारक हो।
चलते-चलते दो ठो कार्टून देखते चलिये। एक काजल कुमार का और दूसरा राजेश दुबे का।

 



 

 

 

 



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11 टिप्‍पणियां:

  1. लगता है इंडीब्लॉगर ने मुझे ये इनाम सिर्फ मेरी ‘शरारत’ के लिए दिया है...वजह बताई पॉलिटिकल न्यूज़ की कैटेगरी (अंग्रेजी, हिंदी समेत कुछ और भाषाएं भी शामिल) में जूरी की ओर से करार दिया गया विजेता...दरअसल उन्होंने मुझे राणा प्रताप और उनके घोड़े चेतक पर 30 पन्नों का निबंध लिखने के लिए दिया था...मैंने पहले पेज पर लिखा...महाराणा प्रताप अपने चेतक पर सवार हो कर अपने ज्ञंतव्य के लिए रवाना हुए...आखिरी पेज पर लिखा..और इस तरह महाराणा प्रताप अपने ज्ञंतव्य तक पहुच गए...बीच के 28 पन्नों पर मैंने लिखा...और चेतक पवन वेग से दौड़ने लगा...दुगुड़-दुग.. दुगुड़-दुग.. दुगुड़-दुग...................दुगुड़-दुग...

    इस तरह इंडीब्लॉगर ने मेरी निरंतरता की महत्ता को पहचाना...

    इंडीब्लॉगर सिर्फ खाली-पीली बैज का ही इनाम दे रहा है...वैसे मैं इंडीब्लॉगर को सुझाव देने जा रहा हूं कि अगले साल इनाम वितरण के लिए ढाका में समारोह आयोजित करे...जो भी अपने खर्चे पर वहां जाने के लिए तैयार हो जाए, उसे इनाम थमा दे...

    जय हिंद...

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    1. पर ढाके को तो पासपोर्ट-बीज़़ा लगूगा :-(

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    2. चर्चा के लि‍ए भी इशारों की ज़रूरत होने लगी ! हयं !

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  2. आप भी दीगर करेजावाले चर्चाकार हुए, पंडिजी.

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  3. निदा फ़ाज़ली साहब कहे : "कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता" , और तिवारी जी कह दिए : "लड़कियाँ अपने आप में एक मुक्कमिल जहाँ होती हैं" | इसैई लिए हम जैसे लोग अभी तक "बिनु नारी दुखारे" वाले मोड में हैं :) |

    चर्चा पर आपकी क्लास एक दम परमानेंट टाइप है , फॉर्म चली जाती है उ बात त अलग है :) :)

    अब आप फार्म जाने मत दीजिये, चकाचक जारी रखिये :)

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  4. बेहतरीन चर्चा किये गुरु देव

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  5. एक मुख्तर सी बात क्यूँ कि बात ’लडकियों’ की चली है।
    http://www.sachmein.blogspot.in/2010/12/%E0%A4%B2%E0%A4%A1%E0%A4%95%E0%A4%AF-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%AE.html

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  6. एक नुक्ता-ए-नज़र ये भी है, आपकी नज़र,
    http://www.sachmein.blogspot.in/2010/12/%E0%A4%B2%E0%A4%A1%E0%A4%95%E0%A4%AF-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%AE.html

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  7. उपनाम है एक ठो महाराज ..
    कट्टा कानपुरी असली वाले
    :)

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