गुरुवार, सितंबर 04, 2008

बिहार की बाढ़ और पुरुषों का सामूहिक मानसिक बलात्कार

कोसी का कहर
बिहार में बाढ़ की स्थिति लगातार खराब बनी है। रेयाज़ अपनी रिपोर्ट में बताते हैं:
  • 70 साल के बूढे जोगेंदर ने सामान तो मचान पर चढा दिया है, लेकिन गेहूं-मकई नहीं चढा़ पाये। अकेले हैं। दोनों बेटे बहुओं-बच्चों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाने गये हैं। खैनी ठोंकते हुए वे हंसते हैं, उदास हंसी, “यही तेजी रही तो कल तक सड़क पार कर जाएगा पानी।”
  • 65-70 साल की जिदंगी में पहली बार देखा है अपने घर में पानी भरते हुए। घर गया। अनाज गया। उनके खेत उन्हें खाने लायक अनाज दे देते हैं - गेहूं, धान, मकई। इस बार सब खत्म। खेत में खड़ी धान की फसल को बाढ लील गयी, घर में रखा अनाज पानी में डूब गया।
  • 12 साल का एक लड़का धीरे से आकर बैठ जाता है - मिथुन कुमार दास। कहता है “लिख लीजिए, मैं अकेले हूं यहां। मम्मी-पापा सहित सारे घरवाले गांव में हैं।”
  • हफ्ते भर से वीरपुर में फंसे लोग अब निकलने लगे हैं लेकिन उनमें से भी वही लोग निकल पा रहे हैं, जो नाव के लिए दो से छह हजार रुपये खर्च कर पाने में सक्षम हैं।
  • इस पर सुशांत झा अपना गुस्सानामा भेजते हैं।

    शास्त्रीजी
    शास्त्रीजी आजकल यौन-चर्चा कर रहे हैं। नर-नारी सबंधों पर ज्ञान बांट रहे हैं। हमने कल चर्चा करते हुये लिखा-नर-नारी समानता: शास्त्री जी के सौजन्य से! शास्त्रीजी बोले- गलत !! यह तो परमात्मा के सौजन्य से हुआ है!!! हमने इसका मतलब निकाला कि शास्त्रीजी यह बता रहे हैं कि नर-नारी समानता परमात्मा के सौजन्य से है। लेकिन आज जब सुजाता की पोस्ट पढी़ तो इसका अर्थ पता चला कि शायद शा्स्त्रीजी कहना चाह रहे थे- नर-नारी समानता (की बात) गलत (है)!! यह तो (असमानता) परमात्मा के सौजन्य से हुआ।


    सुजाता
    सुजाता की पोस्ट में शास्त्रीजी की जिन पोस्टों का जिक्र है उनको पढ़कर ताज्जुब होता है कि वे ऐसी शानदार धारणा रखते हैं-
    पुरुषों से अधिक स्त्रियां बलात्कार करती हैं, लेकिन वे मानसिक सतह पर करती हैं इस कारण बच जाती हैं. समाज में जहां भी देखें आज अधनंगी स्त्रियां दिखती हैं. पुरुष की वासना को भडका कर स्त्रियां जिस तरह से उनका मानसिक शोषण करती हैं वह पुरुषों का सामूहिक बलात्कार ही है. किसी जवान पुरुष से पूछ कर देखें. पुरुष को सजा हो जाती है, लेकिन किसी स्त्री को कभी इस मामले में सजा होते आपने देखा है क्या.
    हमें तो तरस आ रहा है शास्त्रीजी की हालत सोचकर। बेचारे पुरुष हैं। अब तक न जाने कितनी बार बलात्कार हो चुका होगा लेकिन बेचारे पुरुष होने के नाते कुछ कह नहीं पाये क्योंकि पता है किसी स्त्री को सजा तो मिलने से रही। लेकिन कविता जी इस बात से तिलमिला उठीं
    -कितने ही भोथरे तर्क गढ़कर आप पाप को पाप कहने की जद्दोजहद करते रहें पर पाप पाप ही रहेगा।
    पता नहीं शास्त्रीजी से कौन-कौन से पाठक ऐसे मासूम सवाल पूछते हैं। वे ब्लागर हैं या नानब्लागर! लेकिन शास्त्रीजी धन्य हैं जो ऐसे-ऐसे जबाब दे लेते हैं।

    सुजाता की सजग पोस्ट काबिले तारीफ़ है। लेकिन अभी हम न करेंगे तारीफ़!! हम अभी चिट्ठाचर्चा कर रहे हैं। बिजी हैं जी। लेकिन अगर हम शास्त्री जी के लिये कहना चाहें- हे ईश्वर! इन्हें क्षमा करना, ये ज्ञानी पुरुष हैं इन्हें पता नहीं ये क्या कह रह हैं तो क्या गलत होगा? आप बता दो तब ही हम उनके लिये ऐसा कहेंगे! अपने मन से नहीं कहेंगे हम जब तक सबकी राय न होगी। वैसे परमजीत बाली कहते हैं- मन नंगा तो हर नारी से पंगा

    राधिका
    रा्धिका टीवी धारावाहिकों में नारी पात्रों के प्रस्तुतिकरण के अन्दाज पर अपना नजरिया बताती हैं:
    कुछ घरो में सास -बहू के अत्याचारों वाली घटनाये हो रही हैं ,पर यह समाज का एकतरफा दर्शन हैं ,कई घरो में उनमे भी स्नेहिल सम्बन्ध हैं । कितनी ही लड़कियाँ आज भी भारतीय समाज का आदर्श कहलाने के काबिल हैं ।पर इन धारावाहिकों में जो दिखाया जा रहा हैं ,वह बहुत ही ग़लत ,विकृत मानसिकता का परिचायक हैं ,इन धारावाहिकों का भरपूर विरोध करने के बजाय कई नारिया बडे प्रेम से इन्हे देख रही हैं .यह जानते हुए भी की इन धारावाहिकों के माध्यम से स्त्री पुरुषों के ह्रदय में बसते विश्वास ,प्रेम ,आदर,दया जैसे भावो को धीमे- धीमे मारा जा रहा हैं ।
    देश भर में गणेश चतुर्थी का त्यौहार मनाया जा रहा है। तमाम साथियों इस पर पोस्ट भी लिखी है। इस मौके पर पारूल की आवाज में सुनिये -गाइये गणपति जगवंदन!

    आज के नये चिट्ठे

    चिट्ठाजगत की सूचना के अनुसा्र सात नये चिट्ठे जुड़े।
    हफ़्ता
    1. परीक्षित ने ब्लाग लिखनाजून में शुरू किया। कुल जमा पूंजी छह पोस्ट। सितम्बर की शुरुआत में बात शाम की करते हैं।
    2. दरभंगा, बिहार के अवधेश झा ने अगस्त में ब्लाग लिखना शुरू किया। अब तक कुल पांच पोस्ट लिख चुके हैं। सितम्बर में सितम को बुलाने का आवाहन कर रहे हैं- आ भी जाओ सजन सावन में
    3. समीर यादव जबलपुर में उप पुलिस अधीक्षक हैं। अपने कर्त्तव्य के माध्यम से सेवा में रुचि है। वर्तमान में वर्तमान में उल्लेखनीय किताबों के वाचन प्रक्रिया से ही विलग हैं। अपना ब्लाग सखी शुरु कर रहे हैं।
    4. अंकिता मेडिकल की छात्रा हैं। तमाम किताबें पसंदीदा लिस्ट में शामिल हैं। ब्लाग है- जिंदगी मेरे घर आना अगस्त से शुरू करके अब तक कुल ११ पोस्ट लिख चुकी हैं।
    5. मीडिया से जुड़े अंशुप्रज्ञ मिश्र ने अपने ब्लाग की शुरुआत ठेठ कनपुरिया अंदाज में की-मेरी बातों को हलके में लेने की गुस्ताखी मत कीजियेगा हुजुर हमने आसमानों को सीने में दफ़न कर रखा है।
    6. दि्ल्ली के बिपिन तिवारी धनात्मक सोच वाले, आत्मविश्वासी , जागरूक इंसान हैं। गीता और विंग्स आफ़ फ़ायर पसंदीदा किताबें हैं। बिहार की बाढ़ से लोगों को बचाने का आवाहन करते हैं।
    7. बिलासपुर छत्तीसगढ़ के उमेश कुमार एक सान्ध्य दैनिक और एक समाचार एजेंसी के लिये कलम चला रहे हैं तथा जीविका के लिये खेतो मे हल चलाने से परहेज नही है। ब्लाग अल्पमत है।
    8. उपरोक्त सभी ब्लागों की हौसला आफ़जाई करने के लिये शोभाजी की टिप्पणी मौजूद थी। सभी ब्लागर साथियों का स्वागत है, अभिनंदन है।
    ऊपर वाला हफ़्ता का्र्टून अभिषेक के सौजन्य से।

    एक लाइना

    1. संतौ नदिया ज्ञान की, बहे तुम्हारे द्वार : एक नदी के नखरे झेले नहीं झिल रहे हैं आप एक और बहा दिये।


    2. तेरे हाथ में जब मेरा हाथ हो: तो उसमें मोबाइल,पर्स,अंगूंठी जैसी कोई चीज नहीं होनी चाहिये अलगाव। केवल हाथ चाहिये।


    3. मुहब्बत जो कराए, सो कम है : देर रात टेलीफोन का तार जुड़वाये, क्या गम है!


    4. आओ बहनो , पहनो बुर्खा : अरे कहने दो उनको, जियो सर उठा के।


    5. इश्क एक जहर का प्याला है : एकाध घूंट पीने में कोई हर्जा नहीं। मुफ़्त है।


    6. कश्मीर पर क्या यह हिन्दुत्व का डंका है! बुद्धिजीवियों की बातें सरलता से समझना आसान नहीं होता!


    7. कृपया कोई जानकार मेरी मदद करिए ! जानकार यहां कौन है जी सब तो ब्लागर हैं।


    8. हिन्दी ब्लाग और पुरुष मानसिकता ने चिट्ठी पत्री करा डाली


    9. तराबी की प्रार्थना और मेरी अनभिज्ञता : के गठबंधन से इस पोस्ट की सरकार बनी।


    10. अमीरों की मर्मांतक पीड़ा! : भगत लोगों से कविता लिखवा रही है।


    11. ये कैसी औरतें? : पता नहीं भाई!शास्त्रीजी तो बताते हैं ये पु्रुषों के साथ सामूहिक मानसिक बलात्कार करती हैं।


    12. बाढ़ भ्रष्टाचार और नेता की उच्चस्तरीय बैठक बिहार में जारी


    13. अंधे को बनाया चौकीदार: अरे कुछ बनाया तो है यार!


    14. अनिश्चित काल के लिये निठल्ला चिंतन बंद : अभी न जाओ छोड़कर कि टीप अभी करी नहीं


    15. जी लो जिंदगी फ़िर एक बार : हां कोई पैसा तो पड़ना है इसमें। फ़्री गि्फ़्ट आफ़र है।


    16. उडान : हौसले के साथ है जी अकेले नहीं


    17. वनिशा, ईशा और पिया.. भारत की असली तस्वीर कहाँ है.


    18. सुनिये मोहन वीणा : सुन रहे हैं!


    19. क्यों हम भूलते जा रहे हैं कि हम सब एक हैं: वर्चुअल मेमोरी कम हो गयी है जी। माइक्रोसाफ़्ट बढ़ा ही नहीं रहा।


    20. जी हम भी कविता करते हैं : काहे को अपना और हमारा टाइम वेस्ट करते हैं जी!


    21. एक चिट्ठी से सरकारी गलियारे में हलचल : चिट्ठी इधर-उधर करो जी!


    22. एक शायर का बड़बोला पन- गालिब और मीर मुझसे जलते: और हमसे मांग के बर्नाल लगाते


    23. खुली छोड़ देते हैं : तब भी ये तबेले से बंधीं रहती हैं।

    मेरी पसन्द


    इसे देखो
    अक्षरों के बीच
    घिरे हुए आदमी को पढ़ो
    क्या तुमने सुना
    कि यह लोहे की आवाज है
    या मिट्टी में गिरे खून का रंग

    लोहे का स्वाद
    लोहार से मत पूछो
    घोड़े से पूछो
    जिसके मुंह में लगाम है।
    धू्मिल

    ... और अंत में

    कल रात देखा कि तीन चार घंटों के अंतराल में १५० पोस्टें हो गयीं। लिख्खाड़ बढ़ रहे हैं। नारद एक पेज पर एक सौ पचास पोस्ट दिखा दे्ता है। गूगल के नये ब्राउजर का उपयोग किया। मजा आया। शहीद चंद्रशेखर की मां का निधन हो गया। उनकी चि्ट्ठी एक बहादुर मां की चिट्ठी है। रवि रतलामी सुना है अब रवि भोपाली हो गये। सूरमा ने खुद नहीं बताया, हमारे आदमियों से पता चला। चार्ली चै्प्लिन की आत्मकथा चेपें जा रहे हैं आजकल रवि भाई। कल देबाशीष से बात हुयी। उनका सुझाव है कि चिट्ठाचर्चा को एक पत्रिका के अंदाज में पेश किया जाय तो और मजेदार रहेगा। हर दिन किसी विषय पर फ़ोकस करके, ब्लागजगत की हलचल के मुताबिक, चिट्ठों की चर्चा की जाये। इस चिट्ठे का कलेवर देबू का ही बनाया है। देखिये आगे क्या बात बनती है। फ़िलहाल तो आफिस बुला रहा है- आ लौट के आजा मेरे मीत रे! जायें? आप बोलोगे नहीं। हम निकलते हैं!

    Post Comment

    Post Comment

    बुधवार, सितंबर 03, 2008

    हर चोर यही कहता है कि उसने चोरी नहीं की

    कोसी का कहर
    कोसी का कहर जारी है। रवीश कुमार ने लिखा है-
    कुल मिला कर यही कहना चाहता हूं कि इस बाढ़ ने साबित कर दिया कि राजनीति ने गरीबों को छोड़ दिया है। सियासत अब मिडल क्लास की चिंता करती है। सामाजिक और राजनीतिक एकजुटता होती तो पहले दिन से 50 हेलीकॉप्टर लगाये जाते। दस दिनों तक तीन हेलीकॉप्टर से राहत का काम हुआ, जिनसे एक दिन में सिर्फ तीन हजार पैकेट की एयर ड्रॉपिंग होती थी। समझ लीजिए कि कितने लाख लोग कितने दिनों तक भूख से तड़प रहे होंगे। इतनी बड़ी त्रासदी भी बिहार की सत्ता, समाज और सोच को नहीं झकझोर सकी है।


    मनोज बाजपेयी कहते हैंबिहार की बाढ़ से हारना नहीं है। इस आपदा के समय भी मनोज की चिंता है
    लेकिन आगे मैं उस व्यक्ति के बारे में जरुर लिखना चाहूंगा, जिसने अपने ब्लॉग पर मेरे बारे में कई गलत बाते लिखी हैं। उसका जवाब देना मैं उचित समझूंगा। निसंदेह उस व्यक्ति का मेरे जीवन से बड़ा गहरा नाता रहा है और उसका नाम है राम गोपाल वर्मा।
    इससे लगता है हम पल में ग्लोबल और छिन में लोकल कैसे हो सकते हैं।

    प्रसिद्ध कवि वेणुगोपाल नहीं रहे। उनके बारे में लिखते हुये रवीन्द्र व्यास ने लिखा:

    यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंदी में कवियों की लिस्ट जारी करने की आदत रही है। इसमें वेणुगोपाल और कई महत्वपूर्ण कवि अक्सर छूटते रहे हैं। बरसों तक उन्हें जारी लिस्ट में छोड़ते आए हैं जबकि वे अपनी कविता में हमेशा महत्वपूर्ण बने रहे।
    अब हिंदी पट्टी में कोई बड़ा जनआंदोलन नहीं है। मानवीय गरिमा और वंचितों के लिए अब कोई उठ खड़ा नहीं होता। हिंदी पट्टी में अब कोई जनआंदोलन नहीं है और न कवि का समाज और जीवन में बड़ा कद और दूर तक सुनाई देने वाली आवाज।



    सच्ची कहानियों के सच्चे किरदार में मनविन्दर भिंभर ने इमरोज के अमृता प्रीतम के बारें उद्गगार बताये।
    सुनिये देखिये: गणपति बप्पा मोरिया

    आज के नये चिट्ठे


    बिहार में बाढ़

    1. जावेद जावेद चित्रकारी को पूजा की तरह मानते हैं और यही कारण है की आज तक उन्हों ने अपनी कला का मूल्य नहीं लगाया है। उन्होंने अपनी रंगशाला ब्लाग पर भी खोली है।

    2. धीरेन्द्र प्रताप सिंह दुर्गवंशी जौनपुर के हैं। पीर पर्वत सी हो गयी इनकी। सो पिघला रहे हैं। अलग विचार पेश कर रहे हैं।

    3. जवाहरलालनेहरू विश्वविद्यालय के विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्र में एम.फिल के छात्र मुकेश कुमार मिश्र को कविताएँ पढना व लिखना बहुत प्रिय है । हिंदी कवितायें ब्लाग शुरू किया है।

    4. सनातन धर्म भी है यहां। बताया जा रहा है परमात्मा कैसा है?

    5. राधिका वुधकर अपने ब्लाग वीणापाणी और आरोही शुरू कर रही हैं। ये नये ब्लाग्स उन्होंने इसलिये शुरू किये क्योंकि उनके पुराने ब्लाग्स के पासवर्ड खो गये हैं।

    6. कोटा, राजस्थान के ई.भारतरत्न गौड़ मेरा भारत महान कह रहे हैं।

    7. नोयडा प्रेस क्लब अपराध सूचनायें देने के लिये क्राइम न्यूज शुरू कर रहा है। करीना-बिपाशा की दोस्ती भी लगता है प्रेस क्लब की निगाह में क्राइम न्यूज है।

    8. राजीव कुमार बनारसी हैं। आतंकवाद के खिलाफ़ खड़े हैं।

    9. दिल्ली विश्वविद्यालय के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लोगों नेचुनाव के लिये ब्लाग शुरू किया है। चुनाव के बाद तेरा क्या होगा रे ब्लाग!

    10. डा. नजर महमूद का दुनिया को देखने का अपना ही नजरिया है। मई से शुरू हुये ब्लाग में अभी तक दस पोस्टें हुयीं हैं।

    11. १४ साल की यामिनी गौड़ कोटा राजस्थान से हैं। चित्र संसार में अन्तर्मन की उड़ती कल्पनाएं पेश करती हैं।

    12. साहित्य शिल्पी हिन्दी और साहित्य की सेवा का एक एसा अभियान है जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा| सेतु अभी निर्माणाधीन है।


    13. प्रशान्त वर्मा अवाम के माध्यम से अपनी बात कहना शुरू कर रहे हैं।


    14. सभी नये साथियों का स्वागत है जी इस ब्लाग जगत में।


    एक लाइना



      इतिहास की मिक्सियां
      मुझे ये दोनो (इतिहास की) मिक्सियां अपने काम की नहीं लगती हैं। एक २००० वोल्ट एसी सप्लाई मांगती है। दूसरी ३००० वोल्ट बीसी। दोनो ही सरलता से नहीं चलती हैं। वजह-बेवजह शॉक मारती हैं।
      ज्ञानदत्त पाण्डेय

    1. माना पोस्ट मेरी नही है पर चोरी कतई नही है जी : हर चोर यही कहता है!


    2. ऐतिहासिक मन्थन से क्या निकलता है? :बहसियाने, गरियाने, लतियाने, जुतियाने के अनेकानेक अवसर!


    3. सच बोलने से हमेशा कुछ न कुछ लफड़ा खड़ा हुआ है. झूठ बोलने से अक्सर लफड़े बैठ जाते हैं. सच अगर नहीं बोला जाता तो इतिहास बनता ही नहीं क्योंकि लफड़े नहीं होते!शिवकुमार मिश्र

    4. उस शायर को जो रेडियो मे घुसकर लोरिया सुनाता था :मेरठ के एक डाक्टर ने पकड़ के अपनी पोस्ट के कोने में चेंप दिया।


    5. लोग खुद से रूबरू होकर यही कहते रहे,
      कितना मुश्किल है मियां शर्मो-हया को ढूंढना.

      अजनबी नगरी में अपनापन मिले तो किस तरह,
      है बहुत मुश्किल यहां राहे-वफ़ा को ढूंढना.योगेन्द्र मौदगिल



    6. तेरा ख्याल :आजकल अपना काम ठीक से नहीं करता। रुला ही नहीं पाता। ऐसे कैसे चलेगा जी!


    7. ब्लॉग पोस्ट का टॉपिक, बालकिशन और विदेशी कवि:सब एक ही पोस्ट पर कब्जा कर लिये।

    8. लोग फ़ासले लाख बढा़यें पर बढ़ नही पाता,
      जुदाई में भी इश्क कभी मर नही जाता,
      महबूब से जन्नत सी लगती है जिंदगी,
      पर तनहाई में एक पल रहा नही जाता।सुनीता शानू


    9. बिहार की बाढ़ से हारना नहीं है :हां भाई, ये भी कोई बात हुयी। हारना अच्छी बात नहीं है।


    10. भिय्या ये तोगड़िया खसक गया है क्या? : बिहार की बाढ़ की बातें कर रहा है।

    11. सात सौ लोग मारे गए,
      अखबार कहता है
      टूटे हुए खंडहरर और शहतीर दूरदर्शन दिखाता है
      मेरे भीतर से कई खबरें आतीं है हरहराकर।रघुवीर सहाय


    12. क्या जाग रहे हो : आओ कविता पढो़ , टिपियाओ, हौसला बढ़ाओ।

    13. रिश्तों की परिभाषा : इत्ते दिन बाद दे रही हैं।


    14. अपनी भूल सुधारे कौन :सुधारना दूर की बात, यहां अपनी गलती ही नहीं मानेगा कोई!

    15. मिलिए बर्ग वार्ता वाले स्मार्ट इंडियन से :क्या करें मिलकर जी! पढ़ तो लिया ब्लाग पर। क्यूट हैं!

    16. अब हिंदी पट्टी में कोई बड़ा जनआंदोलन नहीं है। मानवीय गरिमा और वंचितों के लिए अब कोई उठ खड़ा नहीं होता। हिंदी पट्टी में अब कोई जनआंदोलन नहीं है और न कवि का समाज और जीवन में बड़ा कद और दूर तक सुनाई देने वाली आवाज।रवीन्द्र व्यास

    17. भिय्या ये तोगड़िया खसक गया है क्या? : बिहार की बाढ़ की बातें कर रहा है।
    18. अगर उस पार हो तुम " मैं अभी कश्ती से आता हूँ .....
      जहाँ हो तुम मुझे आवाज़ दो " मैं दूंढ लाता हूँ"
      किसी बस्ती की गलियों में किसी सहरा के आँगन में ...
      तुम्हारी खुशबुएँ फैली जहाँ भी हों मैं जाता हूँ सीमा गुप्ता

    19. इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी... उफ्फ! :ये भारत है भाई रवीश कुमार!


    20. क्या कभी टीवी पर ये सीन देखा है आपने नहीं देखा तो क्या देखते हो यार! अच्छा इसे पढ़ो! :

    21. ये क्या हुआ? :क्यूं हुआ? कैसे हुआ? मेरे दो ब्लाग उड़ गये।

    22. थम थारी अठ्ठन्नी थारै धोरै राखो ! : तेरी अक्ल ख़राब हो री सै के तिवारी ?

    23. आंखे खोज रही हैं उस मां को
      जो बह निकली जलधारा संग
      और पिता का भी कुछ अता नहीं
      कहां है वो उसको पता नहीं
      प्रीती बङथ्वाल "तारिका

    24. क्या बाढ़ राहत में कंपनियों का कोई दायित्व नहीं! : ये सवाल कंपनियों के लिये आउट आफ़ कोर्स है!



    25. ताकि हमेशा कायम रहे अपने पर अटूट आस्था :जिसकी अपने पर आस्था खत्म हुई, समझो वह निपट लिया।

    26. नर-नारी समानता: शास्त्री जी के सौजन्य से


    27. बिहार में बाढ़ और राष्ट्रीय शर्म :उड़ीसा में।


    28. :




    मेरी पसन्द


    लाखों तारे आसमान में नीचे इन्हे उतारे कौन,
    काँटों के सौदागर सारे घर और द्वार बुहारे कौन.
    नसीहतों से भरे टोकरे लिए खड़े हैं लोग तमाम,
    मुल्लाओं की महफ़िल में अपनी भूल सुधारे कौन.
    तालीमों की किसे जरूरत किसको इंसानों से काम,
    दरवाजे पर दस्तक देकर मेरा नाम पुकारे कौन.
    खुशहाली में सभी पूछने आते थे मेरे हालात,
    लेकिन तन्हाई के लम्हे मेरे साथ गुजारे कौन.
    हालात से समझौतों में खामोशी बन गया जमीर,
    सन्नाटे में चौराहे पर दिल की बात गुहारे कौन..

    विनीता वशिष्ठ

    ... और अंत में


    कल की चर्चा में डा.अमर कुमार ने हमारे ऊपर पंक्चुअलिटी का आरोप लगाया
    -चर्चा तो पढ़ ली,
    पर यह बताइये कि पंक्चुअलिटी एवार्ड आपको क्यों न दिया जाय ?
    नितीश राज ने कहा:
    अनूप जी फिर से वो ही लाइन बढ़िया चर्चा, लेकिन कई बार सोचता हूं कि इतना पढ़ कब पाते हो आप और फिर सब पर कमेंट फिर चर्चा...सच बहुत काम है।

    लवली कुमारी ने भी लिखा
    :
    हमेसा की तरह अच्छी चिठ्ठा चर्चा .आश्चर्य होता है आप वक्त कहाँ से निकालातें हैं.
    अब इन अब बातों के क्या जबाब दिये जायें? डा.अमर कुमार कह ही चुके हैं कि तारीफ़ भी एक तरह की घूस है। कल कानपुर में एक दरोगा अन्दर हो गया। वह डी.आई.जी. को घूस देने की कोशिश कर रहा है। डी.आई.जी. ने उसे पकड़वा दिया।

    चर्चा अपने मजे और खुशी के लिये करता हूं। समय निकल आता है अगर आप करना चाहें कोई काम मन से। इसका भी मजा ही कुछ और है। ब्लाग लेखन के बारे में हमने काफ़ी पहले लिखा था:
    आंख खुलते ही लैपटाप से चिपक जाने का
    चाय लाती पत्नी को देखकर सकपकाने का
    ‘बड़ी अच्छी लग रही हो’ कह मस्का लगाने का
    ‘उठो बच्चों’ कह फिर से टाइपिंग में जुट जाने का

    मजा ही कुछ और है।


    यही हमारे बारे में चुगली करती है। आज भी बहुत सारे ब्लाग छूट गये। प्रमोद जी ने एक बहुत अच्छा लेख लिखा कल वह छूट गया। प्रगति मैदान की सैर छुट गयी। और न जाने क्या-क्या। लेकिन जो पकड़ पाये वो यहां पेश है। अनुराग शर्मा ने कहा भी है-लेट परफेक्शन नोट बी दि एनेमी ऑफ़ द गुडमतलब कुछ नहीं से कुछ तो बेहतर है। आज की चर्चा कुश को करनी थी। वे न कर पाये सो आपको हमें ही झेलना पड़ा। क्या करें। होइहै सोई जो राम रचि राखा।
    फ़िलहाल इतना ही। बकिया फ़िर।

    Post Comment

    Post Comment

    Google Analytics Alternative