बुधवार, फ़रवरी 27, 2008

कुछ चर्चीले चिट्ठों की चर्चीली चिट्ठियाँ

ठेले पे हिमालय ने कोसा भगवान बनाने वाले इंसान को, और ठेलों की चर्चा और जगह भी हो रही है, कचुमर रायते की भी। तनुश्री जी इ की मात्रा उल्टी लगा रही हैं पर मैनेजमेंट के फ़ंडे हिन्दिया जी दे रहे हैं, और मिस्टर मिस्टीरियस शिव पुराण बाँच रहे हैं। और अभी मेरे बॉस ने बुला लिया, फिर बात करते हैं!

आ गया वापस, गताङ्क से आगे -

खुला चिट्ठा पता नहीं कब से खुला है, पर अभी तक गाली गलौज शुरू क्यों नहीं हुई, समझ नहीं आया। न सही, जीवन प्रभात ही सही। थोड़े अश्रु बहाएँ, और फिर कुछ क़ानून बाँचने मावलङ्कर हॉल पहुँचें, और विट्ठल प्रसाद जी की सत्यकथा पढ़ें, जिसमें, यीशु जी का अहम किरदार है। और कैसे भूलें मीडिया कॉलेज वालों को, आखिर कोमल कवियों के बाद सबसे बड़े लिखाड़ तो वही हैं न, भले ही सबसे लोकप्रिय न हों, न न नाराज़ न होना!

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1 टिप्पणी:

  1. आपके भी बॉस हैं हम तो समझते थे कि आप ही बॉस हैं... :-)

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