शनिवार, फ़रवरी 16, 2008

बादल है या किसी का चेहरा

यूं ये रोज ही होता होगा पर आज तो मुझ जैसे कवित्त सवैया छंद के अखंड रिपु को कुछ कविताई दिख गई ब्लॉगवाणी के एक पृष्ठ पर। नोश फ़रमाईयेः

भैया के पीछू दो-दो भाई
बड़े प्यारे होते हैं दारू पीने वाले....

नया ब्लू-टूथ आई.डी. कार्ड वाकई में नया है
गा* मार लो पत्रकारिता की

राजनीति का गंदा चेहरा
फूल देखूं जिधर खिलें

प्रिय भडासियो
ब्रॉकली कैसे बनायें

उधार की जिंदगी
बीबी तो इन्तजार करेगी ही...

इसे अपने ब्लॉग पर शब्दों को फेंट कर एक ठौ कविताई पोस्ट बनती थी ;)

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2 टिप्‍पणियां:

  1. वेरी पोस्‍ट-मॉडर्निस्‍ट, देबू दा. कहां से कहां निकल लिये? और यहीं बने भी रहे!

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  2. सही है कुछ और जोड़ते तो ज्यादा मजा आता।

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