February 28, 2008

[चर्चाकारः आलोक] [4 टिप्पणियाँ]


आवारा जानवर तेरे नाम अपनी कोमल कृतियाँ रचित कर रहे हैं, उम्मीद है और भी आएँगी, और गुंटकल, आन्ध्र प्रदेश से युग मानस वाले जय शंकर बाबु बता रहे हैं दक्षिण भारत में हिन्दी के फैलाव के बारे में।

राजकपूर ने बरसों पहले कहा था कि वह आवारा हैं, अब मिहिर कह रहे हैं कि मिथ्या, मिथ्या है और इसी लिए उसे देखना भी चाहिए। मनीष ओझा जी ने भी शुरुआत कर दी है, और अक्षय दीक्षित जी ने - नाम पसन्द आया - दो दो क्ष - तारामण्डलों को बारे में जानकारी दी है। देशराज सीर्सवाल नियामक का अर्थ बता रहे हैं, और रामनिरंजन गोयनका जी ठाकरे जी से सवाल पूछ रहे हैं

इन सात चिट्ठों में से सातों के सातों मैंने आज के पहले नहीं देखे थे।

यानी मुझे मिले 0/7।

आपको कितने मिले?

4 टिप्पणियाँ

Debashish ने कहा… @ February 28, 2008 2:54 PM

जी अपना स्कोर भी शून्य ही रहा पर फिर भी अच्छा लग रहा है क्योंकि नये चिट्ठे से जो मिलवा दिया आपने।

ajay kumar jha ने कहा… @ February 28, 2008 3:00 PM

alok jee,
chitthajagat ke aslee khabarchee to aap hain jo hamaaree khabar rakhte bhee hain aur doosron ko dete bhee hain. aapkaa yogdaan nissandeh pranshshaa yogya hai.

सागर नाहर ने कहा… @ February 28, 2008 4:34 PM

इस तह तो मुझे मिलने चाहिये कम से कम 50/50 क्यों कि इतने या इससे ज्यादा चिट्ठे तो खोजकर में एग्रीग्रेटर पर जुड़वा चुका।
:)

Udan Tashtari ने कहा… @ February 28, 2008 8:57 PM

हमारा चिट्ठा भी देख लेते तो भी शून्य पर ही रहते महाराज...देखते कहाँ हो?? :)

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