सोमवार, अप्रैल 26, 2010

अरुंधति.....क्रांति...... नक्सलवाद .....आदिवासी..ओर वेंटिलेटर पे देश .....

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आज़ादी के बाद अगर विस्थापित लोगो का रजिस्टर टटोला जाए तो हिसाब ४० करोड़ का दिखता है जिसमे ४० प्रतिशत हिस्सा आदिवासी आबादी का है ....ये भी सोचने की बात है के वर्ष २००९ -१० के लिए आदिवासी समाज के लिए कुल आवंटित बजट ३२०५ करोड़ होता है पर राज्य सरकारे उसमे से केवल ७०६ करोड़ रुपये व्यय करती है ...अजीब बात है कोई भी राज्य सरकार इसके लिए जवाबदेह नहीं है .पिछले कुछ दिनों से नेहरु -गांधी के साथ नाचने वाले आदिवासियों की तस्वीर बदल चुकी है अब लोग नक्सलवाद ओर मायोवाद को उनके संग जोड़ने लगे है .अरुंधती आयूटलुक मेग्जिन के अपने लेख से पहले ही कमोबेश कई बौद्धिक दिमागों को रिचार्ज कर चुकी है ....आम पाठक उनके लेख को किसी क्रांति की रोमांटिक तलाश में निकली एक लेखक का तमगा भी देता है ओर राइफल के साथ तिरपाल ओर बर्तन की चित्र उन्हें भले ही सरल सौन्दर्य प्रतीत होता है पर एक आम पाठक की तरह मुझे भी स्टेट मशीनरी ओर संविधान प्रक्रिया को नकारने वाले अपनी सत्ता स्थापित करने वाले एक समूह को अति ग्लोरी फाय करता प्रतीत होता है .पढ़कर आपको लगता है के लेखक बायस है.....इंटर व्यू की बुनियादी शर्त न्यूट्रल दृष्टि का उसमे अभाव है ...... सर्जिकल टूल इस्तेमाल करते मायोवादियो को न्यायोचित ठहराना गर खलता है तो सरकारी तंत्र ओर उससे जुड़े कई संगठनों की निर्मम सचाइयो ओर शोषण की परतो को उधेड़ती उनकी ईमानदारी से   इनकार नहीं होता  ...
कौन है ये आदिवासी ?उनके साथ बरसो काम करने वाले लोग कहते है ये ऐसे लोगो का समूह है जो परिवर्तन विरोधी है .....जल जमीन ओर जंगल से जुडाव रखने वाला समूह....जिसकी आस्था को समझने के लिए कही गहरा ओर अधिक संवेदनशील होना पड़ेगा ....क्यों ओर कैसे ये एक सभ्य समाज से अलग हुआ... .इसके पीछे की प्रक्रिया न केवल जटिल है बल्कि वर्षो के शोषण से उत्पन्न हुआ एक ऐसा वेक्यूम है जिस को केश कर रहे नक्सल वादी अब देश की भीतरी सुरक्षा के लिए एक खतरा बन कर सामने आये है ...महुआ ओर तेंदू पत्ता बेचकर अपनी जीविका करने वाला वर्ग .....पटवारियों.......वन विभाग....तहसीलदार .ओर एस एच ओ से होता हुआ भू माफिया ओर मल्टी नेशनल कम्पनी को भी सरकार समझता है ......आज़ादी के बात से राज्य सरकार को तमाम ज़मीन का मिला अधिकार अचानक से किसी आदिवासी को हर चीज़ से महरूम कर देता है पूर्व मुख्य मंत्री दिग्विजय सिंह भी कहते है इसे ला एंड ऑर्डर से अलग दूसरी समस्या की तरह देखे बगैर इसका हल नहीं हो सकता ...तभी तो जिले से  दो  बार  सी . पी आई  के संसद भी मानते है के केवल नक्सिलियो को समूचे क्षेत्र मात्र से निकालने से समस्या का हल नहीं होगा जब तक आप आदिवासी से सीधे वार्तालाप नहीं करेगे हिंसा जारी रहेगी...
उस क्षेत्र में काम करने वाले पत्रकार जोशी अपने अनुभव से बताते है के १९५० में बस्तर में नेहरु जी ने लोहा निकलने के लिए एक बड़े ओधोगिक क्षेत्र की स्थापना की .पर उसकी वजह से एक बड़े जमीनी क्षेत्र बल्कि वहां की नदियों का भी दोहन हुआ जिससे न केवल आदिवासी समाज का सामान्य जन जीवन प्रभावित हुआ .अपितु उनके पुर्नवास ओर विस्थापन की समस्या ने विकराल रूप लिया.....समस्या वहां से शुरू हुई थी......
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सरकार के कर्मचारी तथा वकीलों का एक समूह इनकी अज्ञानता का गलत तरीके से भारी लाभ उठा रहा है तथा उन्हें भड़काने के लिए कई अनैतिक क्रियाकलाओं में लीन है. वर्ष १९६३ के दशहरा पर्व के समय एक युवा वकील मामा वाजपेई ने प्रेस को एक बयान दिया था कि वह चाहता था कि देवी दन्तेश्वरी को रथ पर न बिठाया जाए दशाहर के समय आदिवासी इस रथ में देवी दन्तेश्वरी के छत्र को रथासीन करते हैं. मामा वाजपेई के अनुसार - जो स्वयं को एक ब्राह्मण मानता है- आदिम समुदाय द्वारा इस रथ का खींचा जाना दासता का प्रतीक है. ये लोग बस्तर में अन्य विघ्नप्रिय एवं खुराफ़ाती लोगों जैसे मुरलीधर दुबे, गुरुदयाल सिंह, गंगाधर दास (रथ), राज नायडू, कुंवर बालमुकुन्द सिंह, रमेश दुबे, नरसिंहराव, आदर्शीराव आदि परदे के पीछे से इन आदिवासियों को दबाने तथा प्रताड़ित करने के लिए प्रशासन नामक इस पागल हाथी को प्रभावित करते रहते हैं.

उपरोक्त उद्धरण एक किताब से है जो कई सीरिज में कबाडखाना पर है .....एक नजरिये को दिखाती हुई ....

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यह किताब बस्तर के अतिलोकप्रिय महाराज प्रवीर चन्द्र भंजदेव द्वारा १९६६ में लिखी गई थी. स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद जब केन्द्र और राज्य सरकारों ने विकास के नाम पर बस्तर के प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुन्ध दोहन शुरू किया तो प्रवीर चन्द्र भंजदेव ने अपने लोगों को राजनैतिक नेतृत्व मुहैया कराया. कांग्रेस को प्रवीर चन्द्र भंजदेव एक बड़ा खतरा लगे. पच्चीस मार्च १९६६ को जगदलपुर में उनके महल की सीढ़ियों पर तत्कालीन कांग्रेसी सरकार ने उनकी नृशंस हत्या कर दी. कुल तेरह गोलियां मारी गईं उन्हें. उनके साथ सरकारी आंकड़ों के हिसाब से दर्ज़न भर लोग और मारे गए.



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राजा नरेशचन्द्र ने इसी समय एक उद्घोषणा की थी. इस उद्घोषणा में बस्तर के आदिवासी समुदाय के प्रति भारत के प्रधानमन्त्री की सहानुभूति व्यक्त की गई थी और उन्हें आश्वस्त किया गया था कि उनकी संस्कृति और परम्पराओं पर किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जावेगा. किन्तु मैं समझता हूं कि यह मात्र उनका एक राजनैतिक हथकंडा है क्योंकि ठीक दशहरा पर्व के समय ही कलेक्टर राव ने इन पर भारतीय दण्ड विधान की धारा १४४ केवल उन्हें प्रताड़ित करने के लिए थोप दी जबकि मुझे नरसिंहगढ़ जेल से विमुक्त कर छुट्टी दे दी गई थी. यहां यह उल्लेखनीय है कि भारतीय दण्डविधान की यह धारा जगदलपुर में लगातार ३३ दिनों तक प्रभावशील रही थी. दशहरा पर्व जब आरम्भ हुआ तो कलेक्टर राव ने मुझे एक पत्र भेजा था जिसमें उसने लिखा था कि यदि इसमें कोई गड़बड़ी हुई तो वह मेरी व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी होगी. किन्तु उसके साथ ही दूसरी ओर मुझे गोपनीय तरीके से सलाह दी थी कि मैं दन्तेवाड़ा जाकर वहां आयोजित पूजा अर्चना में भाग लूं तथा विजयचन्द्र को जगदलपुर के रथ पर बैठने की स्वीकृति दे दूं. इसके लिए उसने मुझे पांच हज़ार रुपये देने की पेशकश की थी तथा यह भी कि यह तत्कालीन मुख्यमन्त्री डॉ. काटजू की इच्छा है कि यह सब किया जाए.

अपने ब्लॉग पर प्रत्यक्षा एक ओर तरीके से उन मूक आवाजो की गवाही देती है ......

सामाजिक मानवविज्ञानी वेरियर एल्विन, जो 1940 के दशक में गोंड बस्तर मरिया और मुंडा आदिवासियों के बीच में रहे थे और उनके जीवन और संस्कृतिक मूल्यों के बारे में इतना हृदय स्पर्शी विवरण लिखा था, उनकी अंतर्दृष्टि ने भी राष्ट्रीय चेतना पर कोई प्रभाव नहीं बनाया । एल्विन के श्रमसाध्य काम करने के बाद, कोई भी भारतीय शिक्षाविद ने इस विषय के विस्तार का काम नहीं चुना । यह काम महाश्वेता देवी और गनेश एन देवी जैसे साहित्यिक हस्तियों के लिए छोड़ दिया गया । चाईबासा रिसर्च सैंटर के विस्तृत अनुसंधान कार्य पर भी ध्यान नहीं दिया गया। राष्ट्र राज्य ने आदिवासियों के खिलाफ एक विरोधात्मक रुख अपना लिया जिसकी वजह से पूर्वोत्तर और छोटानगपुर के पठारी इलाकों के आदिवासी क्षेत्रों में सामूहिक असंतोष की लहर फैल गई । राज्य झारखंड और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा की 1980 के दशक के आदिवासी संघर्षों को बेअसर करने में सफल हुई और उन्हें 'राष्ट्रीय' विकास के ढांचे में शामिल करने का प्रबंधन भी किया बावज़ूद इसके अभी भी एक वृहत संख्या उन गरीब शोषित प्राणियों की है जो हाशिये पर हैं और जिनके लिये इस दुर्दशा से निकलने का कोई अवलंब नहीं है ।

संवेदना के बगैर बस्तर की थाह दुष्कर- जयप्रकाश मानस

बस्तर की उदासी को मुस्कान में तब्दील करने के लिए यह लाजिमी है कि उसे मात्र दूर से पुचकारा नहीं जाये । उसके साथ रहा जाये, बहा जाये । दंतेवाड़ा की पहाड़ियों की ऊँचाई को नापा जाये । खाईयों की गहराई को खूली आँख से देखा जाये । आदिवासियों की झोपड़ी के कोन-अंतरे में मकड़ी के स्थायी जाले को हटाया जाये । कल-कल छल-छल बहती नदियों के पावन जल का आचमन किया जाये । ननिहालों के साथ स्कूलों में घंटों बैठा जाये । उनके सिलेटों पर उभर रहे चित्रों के रंगों के रहस्यों को परखा जाये। दो रोटी की जुगाड़ के लिए वर्षों से अरण्य में पदस्थ सरकारी महकमे की मजबुरियों के वितान को परखा जाये । किसी शहरी पर्यटक की तरह नहीं । बस्तर के छंद में डूबकर। उनके ताल-छंद-लय में खुद को मिलाकर । विश्वरंजन यह बखूबी कर रहे हैं । वे लोकधुन के साथ आदिवासियों के साथ थिरक रहे हैं । इस थिरकन में बस्तरिहा मन के खोये हुए आत्मविश्वास की वापसी है । माओवादी कब्जे में कसमसाती परंपराओं की पुनर्स्थापना है । बस्तर को आज सबसे बड़ी ज़रूरत उसके खोये हुए आत्मविश्वास को लौटाने की है । बस्तर से मिले बग़ैर बस्तर नहीं मिल सकता ।

image पर अरुंधती के लेख को अभय तिवारी अपनी द्रष्टि देते है .....लगातार श्रंखला बद ...उसमे  शब्दों के कई महत्वपूर्ण अर्थ है ओर विवेचना भी....मसलन

(1)अब यह पूछा जाना चाहिये कि माओवादी कौन है? आज की तारीख़ में दो तरह के माओवादी हैं: एक तो आदिवासी लड़ाके जो बन्दूक ले कर सुरक्षा बलों से लड़ रहे हैं और दूसरे वे माओवादी जिन्होने उन आदिवासियों के हाथ में बन्दूक दी है। यहाँ पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है कि आदिवासी एक लम्बी लड़ाई लड़ रहे हैं, पहले तीर-कमान से लड़ते थे, अब बन्दूक से लड़ रहे हैं; सम्भव है, ठीक है। लेकिन यह भी मानना होगा कि वो बन्दूक उन्होने अपने जंगल में नहीं उगाई। किसी ने बाहर से ला कर उनके हाथ में दी है। मैं उन लोगों की बात करना चाहता हूँ। ये कौन लोग है? ये मार्क्सवादी है, लेनिनवादी हैं, माओवादी हैं, नक्सलवादी हैं।
(2)
ईमानदारी अड़ियल है, बेलोच है, भ्रष्टाचार बड़ा लचीला है। ईमानदार आदमी सिर्फ़ अपने आदर्शों की सोचता है, भ्रष्ट आदमी समझौते का, बीच का रास्ता तलाशता है। पूँजीवाद भ्रष्ट है क्योंकि पूँजीवाद अपनी प्रकृति में ही समझौतापरस्त है।

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(3)माओवादी आन्दोलन के साथ समस्या ये नहीं है कि वे आदिवासियों के मुद्दे उठा रहे हैं, और पूँजीवाद की मुख़ालफ़त कर रहे हैं। सरकार को सबसे अख़रने वाली बात ये है कि वे राज्य को चुनौती दे रहे हैं। वे एक समान्तर सत्ता बन कर उभर रहे हैं। वे न सिर्फ़ आदिवासियों के राजनीतिक, और सामाजिक जीवन के सभी पहलू सम्हाल रहे हैं बल्कि लोकतांत्रिक/पूँजीवादी राज्य की ही तरह अपने अस्तित्व की राह में आने वाले किसी भी रोड़े को हटाने में उसी क्रूरता का प्रदर्शन कर रहे हैं जिसके लिए परम्परागत राज्य जाना जाता है। चूंकि दोनों एक ही जैसे हैं, एक ही चरित्र के हैं, और एक दूसरे की प्रतिबिम्ब हैं, इसीलिए दोनों एक दूसरे को मिटा देने के लिए इस तरह आमादा हैं
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(4)लेकिन मैं अरुंधति के बोलने से सहमत हूँ। उन्हे बोलना चाहिये और पूरे ज़ोर से बोलना चाहिये, और हम सब को चाहिये कि उनको सुनें। भले न सहमत हों। हमारा लोकतंत्र उनकी नकार की आवाज़ से मज़बूत होता है। और जो वो बोलती हैं वो एक कड़वी सच्चाई है। आदिवासी इस देश और समाज के मुख्यधारा से बाहर हाशिये पर पड़े लोग हैं जिनकी आवाज़ को मुख्यधारा में जगह नहीं है; अरुंधति उनकी आवाज़ हैं।

(5)
यह पूछने पर कि क्या वे अपना आन्दोलन अहिंसा के साथ नहीं चला सकते, कौमरेड गणपति पलट कर पूछते हैं कि ये आप को राज्य से पूछना चाहिये कि वो प्रतिरोध के शांतिपूर्ण तरीक़ो का हिंसक दमन क्यों करते हैं? शांतिपूर्ण जुलूसों पर लाठीचार्ज और फ़ायरिंग क्यों करते हैं? हड़ताल करने वालों को जेलों में ठूंस कर यंत्रणा क्यों देते हैं? वे पूछते हैं कि वे क्यों पुलिस वालों को क्यों अनुमति देते हैं कि वे औरतों से बलात्कार करें? सही सवाल हैं!

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मैं यहाँ जा कर उलझता हूँ कि अगर माओवादी सफल हो भी गए तो क्या नए समाज में हिंसा का कोई स्थान न होगा? हिंसा अपने आप में कोई चीज़ तो नहीं है ना.. वो तो अन्याय करने का एक हथियार है...

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अनिल सौमित्र गुस्से में है पर उनके तर्क  अपने आप बोलते है ......लाल मिर्ची नाम के अपने ब्लॉग पर वे एक लेखिका की क्रांति की रूमानी यात्रा की लगभग धज्जिया उड़ाते है ....

अरुंधती के पास कौन-सा स्वप्न है! क्या उनका स्वप्न आदिवासियों या आम लोगों का दुःस्वप्न है? विकास के नाम पर विनाश और हिंसा को जायज ठहराने वाले ये भी तो बतायें कि आखिर माओवादी किसका विकास कर रहे हैं? भले ही माओवादी-नक्सली विकास की आड़ लेकर विनाश का तांडव कर रहे हैं, लेकिन उनके समर्थक सरकारी कार्यवाई की निंदा यह कह कर कर रहे हैं कि माओवाद-नक्सलवाद पिछड़ेपन, विषमता और गरीबी के पैदा हुआ है। बिहार, बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ से लेकर मध्यप्रदेश, महाराष्ट और आंध््राप्रदेश तक माओवादियों के मार्फत किसका विकास हुआ है, किसका विकास रुका है? ये विनाश का कॉरीडोर किसके लिए बन रहा है यह भी देखा और पूछा जाना चाहिए। दंतेवाड़ा में इंद्रावती नदी के पार माओवादियों के नियंत्रित इलाके में सन्नाटा पसरा है। जिन बच्चों को स्कूल में किताब-कॉपियों और कलम-पेंसिल के साथ होना चाहिए था, वे माओवादियों के शिविरों में गोली-बारुद और इंसास-एके 47-56 का प्रशिक्षण लेकर विनाशक दस्ते बन रहे हैंं। स्कूलों में भय के कारण पढ़ने और पढ़ाने वाले दोनों ही नदारद हैं।

(2)एक परिवार की देश-समाज की बेहतरी चाहता है दूसरा माओवादियों का जत्था है जो किसकी बेहतरी और सुरक्षा के लिए मार-काट मचा रहा है उसे खुद नहीं मालूम। बस हत्या अभियान में मारे गए शवों और लूटे गए हथियारों की गिनती ही उन्हें करनी है। माक्र्स, लेनिन और माओ को कौन जानता है उन सुदूर वनवासी क्षेत्रों में, जानते हैं तो बस उनके नाम से चलाए जाने वाले भय को। जो वनवासी योद्धा अंग्रेजों से दो-दो हाथ कर रहा था, उसकी तुलना इन माओवादियों से नहीं की जा सकती जिनका स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व में कोई विश्वास नहीं।

(3)रॉय यह भी तो बताएं कि वे भारतीय राजतंत्र का समर्थन करती हैं कि माओवादियों की तरह खुल्लम-खुल्ला तख्ता पलट का इरादा रखती हैं। अपने इस इरादे पर उन्हें राजतंत्र के इरादे की परवाह है भी या नहीं! पश्चिम बंगाल के नक्सलवादी अब माओवादी क्यों हो गए? आखिर वहां से नक्सलवादी क्यों चले गए थे, क्या नक्सलवादियों का स्वप्न पश्चिम बंगाल में पूरा हो गया था। ये कैसा स्वप्न है जो बार-बार दःस्वप्न में बदल जाता है। बंगाल की माक्र्सवादी-कम्युनिस्ट सरकार तो नक्सलियों के स्वप्न साकार करने के लिए ही बनी थी। फिर 20-30 वर्षों के माक्र्सवादी राज में उनके स्वप्वास्वप्न क्यों हो गए? अभागे नक्सली, माओवादी बनने पर क्यों मजबूर हुए। बंगाल में असफल नक्सली छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार के सफल माओवादी कैसे हो सकते हैं?

(4)संसद द्वारा अपनाए गए संविधान से जन-जातीय समाज ही नहीं अन्य बहुत लोगों को दुःख हो सकता है तो क्या लाखों-करोड़ों लोग माओवादियों की तरह हथियार उठा लें और लाखों-करोड़ों अपना शत्रु बना लें? निश्चित तौर पद बड़े बांधों से विस्थापन होता है। सबसे अधिक प्रभावित वनवासी-आदिवासी ही होते हैं। लेकिन सिर्फ बांधों की उंचाई का विरोध निषेधात्मक काम है, अरुंधती या मेधा पाटकर विकल्प भी तो बतांए-कुछ करके भी दिखाएं

(5)इन सर्वहारा लड़कों के वे सभी वर्ग-मित्र हैं जो इन्हें अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए असलहा, पूंजी और साधन उपलब्ध कराते हैंं। बाकी सब वर्ग शत्रु। उनके नियम में लिखा है - शत्रु को नष्ट कर ही दिया जाना चाहिए, उसके हथियार छीन लेने चाहिए और उसे अशक्त कर दिया जाना चाहिए...’’ तो इस संघर्ष में सिर्फ वहीं बचेंगे जो वर्ग मित्र बन सकेंगे, बाकी सब मिटा दिए जायेंगे।


(6)अरुंधती को कॉमरेड कमला की बार-बार याद आती है। वे कई बार उसके बारे में सोचती हैं। वह सत्रह की है। कमर में देशी कट्टा बांधे रहती है। उस 17 वर्षीय कॉमरेड की मुस्कान पर वे फिदा हैं। होना भी चाहिए। लेकिन वह अगर पुलिस के हत्थे चढ़ गई तो वे उसे मार देंगे। हो सकता है कि वे पहले उसके साथ बलात्कार करें। अरुंधती को लगता है कि इस पर कोई सवाल नहीं पूछे जायेंगे। क्योंकि वह आंतरिक सुरक्षा को खतरा है। ऐसा तो सब प्रकार की असुरक्षा के प्रति कोई भी करेगा। क्या आंतरिक, क्या बाह्य असुरक्षा। केांई पुलिस की सिपाही सत्रह वर्षीय कमला होगी तो माओवादी क्या करेंगे? क्या वे उसे दुर्गारूपिणी मान उसकी पूजा करेंगे? बाद में वे ससम्मान उसे पुलिस मुख्यालय या उसके मां-बाप के पास पहुचा देंगे? अरुंधती उन माओवादी कॉमरेडों से पूछ लेती तो देश को पता चल जाता। अगर वो पुलिस की सिपाही कमला 17 वर्षीया आदिवासी भी होती तो हत्थे चढ़ने पर माओवादी निश्चित ही पहले बलात्कार करते और उसे उसके परिवार वालों के सामने जिंदा दफन कर देते

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गन' तंत्र के विरुद्ध गणतंत्र
जमीन और प्राकृतिक संसाधनों से आदिवासियों की बेदखली और उनके उत्पीड़न से उपजी रूमानी क्रांति कल्पनाएं जरूर देश के बुद्धिजीवियों को दिखती हैं पर नक्सलियों के आगमन के बाद आम आदमी की जिंदगी में जो तबाही और असुरक्षाबोध पैदा हुआ है उसका क्या जवाब है। राज्य की शक्ति को नियंत्रित करने के लिए तमाम फोरम हैं। राज्यों की पुलिस के तमाम बड़े अफसर सजा भोग रहे हैं, जेलों में हैं। किंतु आतिवादी ताकतों को आप किस तरह रोकेगें। राज्य का आतंक किसी भी आतिवादी आंदोलन के समर्थन करने की वजह नहीं बन सकता। बंदूक, राकेट लांचर और बमों से खून की होली खेलने वाली ऐसे जमातें जो हमारे सालों के संधर्ष से अर्जित लोकतंत्र को नष्ट करने का सपना देख रही हैं, जो वोट डालने वालों को रोकने और उनकी जान लेने की बात करती हैं उनके समर्थन में खड़े लोग यह तय करें कि क्या वे देश के प्रति वफादारी रखते हैं। विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यस्था और एक जीवंत लोकतंत्र के सामने जितनी बड़ी चुनौती ये नक्सली हैं उससे बड़ी चुनौती वे बुद्धिवादी हैं जिन्होंने बस्तर के जंगल तो नहीं देखे किंतु वहां के बारे में रूमानी कल्पनाएं कर कथित जनयुद्ध के किस्से लिखते हैं।
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चिंतलनार से महज़ चार किलोमीटर पहले कच्ची सड़क पर हमें उस बारूदी सुरंग निरोधक वाहन के अवशेष मिले जिसे छह अप्रैल को माओवादियों नें विस्फोट कर उड़ा दिया था. घटना के कई दिनों बाद भी इस वाहन के टुकड़े अभी तक इधर उधर बिखरे पड़े थे. विस्फोट के कारण हुए गड्ढे को देख कर और वाहन के बिखरे हुए कलपुर्जों को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि धमाका कितना ज़ोरदार था.
दंतेवाड़ा ज़िला मुख्यालय से लगभग 150 किलोमीटर दूर स्थित चिंतलनार के लोग बताते हैं कि पिछले सात दिनों से वह अपने अपने घरों में सिमटे हुए हैं. इस इलाक़े में हर मंगलवार को बाज़ार भी लगता है जो इस बार नहीं लगा.
तरकश पर दंतेवाड़ा की घटना के तुरंत बाद की रपट है जिसे पूरा आप यहाँ पढ़ सकते है ...


इस तरह की प्रतिक्रिया इस लेख पर देने वाले वे अकेले व्यक्ति नहीं है .....मै मेग्जिन के एडिटर विनोद मेहता की प्रशंसा करता हूँ के वे विरोध   के स्वरों को भी वाजिब जगह देते है ....सवाल  ये उठता है के मैगजीन के पाठको की प्रतिक्रिया यहाँ क्यों दी गयी है ....दरअसल ये विषय  ऐसा जटिल है जिसे एक चर्चा में पूरा करना संभव नहीं है .फिर विचार ....मुझे लगा वे महत्वपूर्ण है .चाहे किसी भी विधा में उन्हें व्यक्त किया गया हो.....


Mini Mathew, on e-mail
Arundhati gives voice to the voiceless, and questions the government. We Indians need to be self-critical. When we shape our country’s institutions, we must ensure they are genuinely inclusive. That said, I think Ms Roy provides no alternatives. We simply cannot have a civil war in India. The Maoists cannot continue with their guns and goonda raj. And it is equally improbable that the tribals continue with their age-old practices in the 21st century, living in the forest and competing with endangered fauna and flora—fragile natural resources. India’s population is exploding and the only way to provide decent health, education and living conditions for everyone is through common agreement and the rule of law. How can the tribals be protected in the middle of all this? How can we prevent outsiders (either Naxals/police/politicians) from taking advantage of their ignorance? That is what we have to think about.

M.J. Mansharamani, Nagpur
At the end of 2008, I was in Gadchiroli for some research. The stories I heard were quite different from those in Arundhati Roy’s essay. I heard about the murder of a local leader trying to organise his community. More than one person told me that a politician, afraid of the man’s rising popularity, paid the Naxalites to kill him. I heard that the Ballarpur Paper Mills pays the Naxals to cut the bamboo from the forest and that the Naxals, in exchange allow the mill owner to develop the road leading to those forests just enough to let him carry the bamboo out. I heard that there are two job opportunities for people in these villages—the State or the Naxalites. That people from the same families are either in the police force or with the Naxal force. All poor. All desperate. All with little other choice. Unless they can feed their families with one rice crop a year. I heard that Naxalites won’t allow development, yet traders from Bengal have been allowed to set up businesses—for a price. Unlike Arundhati, I couldn’t sleep under the stars in the Dandakaranya forest, enjoying the beauty I was surrounded with. I didn’t have a friend or a comrade with a gun to protect me. Could this be true of others like me? Unlike Arundhati, I would not dare to give a ‘name’ or ‘face’ to the people I spoke to and took photos of, can’t post their images or tell their story on my blog or to a magazine that would want to hear their story. I’m no fan of the machinery deployed by various official, corporate and media forces that work overtime to push the poor and dispossessed who are increasingly ‘falling into the hole’ as Arundhati so eloquently puts it. However, I have heard with my own ears in Gadchiroli the voices of ordinary villagers—the poor, dispossessed and unarmed say in no uncertain terms that the Naxalites are the one-stop shop for the violent settling of scores. Any score.


Sanjay Dhingra, Gurgaon
While Arundhati’s writing is persuasive, she doesn’t offer any viable alternatives. It’s true that tribal exploitation has been rampant in India and these regions are some of the most underdeveloped in the country. But by taking up arms against the state, they have ensured that doctors run away from clinics in these areas, government officials are scared to do their jobs and teachers are not prepared to go to schools. Is it Arundhati’s case that tribals do not need health and education and should be left to live happily off the forest? A majority of India’s population, however distressed we might feel by the efforts of our government, is part of the mainstream because we know it benefits us personally and as a society. Sadly, tribals know nothing better and their leaders have vested interests in ensuring developmental efforts do not reach these areas. Instead of romanticising the tribal dream, people like Arundhati should work with them to develop a way of life so that they can become a part of modern India, albeit by keeping close to their land and their way of life.
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.कहते है रांची राज्य में एक प्रोजेक्ट तीस सालो से रुका  पड़ा है ...ओर जल संसाधन के  न्योयोचित उपयोग के बाद उस राज्य में न केवल खुशहाली ओर आर्थिक सम्पान्नता के भी आसार है .पर आदिवासियों के विरोध की वजह से वो अधर में है .....सवाल विस्थापन ओर पुर्नवास की नीतियों का भी है ...जमीन का मोल आम सीमा से हटकर तय किये जाने की आवश्यकता है ओर शिक्षा ओर नौकरी के क्षेत्र में आरक्षण जैसी व्यवस्था की जरुरत....संदेह ओर चोट खाया समाज अपने घाव भूलने में भी बरसो लेगा ..
तो क्या वाकई इस समस्या का कोई निदान नहीं है ....प्लानिंग कमीशन ने बरसो पहले अपनी राय में लिखा था के आदिवासियों को राज्य सरकारे एक प्रोटेक टीव शील्ड इस तरह से प्रदान करे के उनके मौलिक अधिकारों का हनन न हो .साथ साथ कानून की धाराओ में इस तरह का प्रावधान हो जिससे आदवासियो की जमीन पे  ओर जंगल पर उनका मालिकाना हक बना रहे ....इसके अलावा क़ानूनी रूप से जमीन का एक रिकार्ड रहे ताकि कोई भू  माफिया  कब्ज़ा न कर सके .....उसमे शिक्षा ,स्वास्थ्य ओर बेसिक सिविल सर्विस की भी बात की गयी थी ....सबसे जरोरोई बात सलवा जुड़म को भंग करने की राय थी .राज्य सरकारों ने इन्हें क्यों ओर कैसे लागू नहीं किया इसकी जवाबदेही शायद किसी के पास नहीं है

उस इलाके से परिचित  बुद्धिजीवियों ओर सांसदों का कहना है ...  ..ऐसे नौकरशाहों का चुनाव जो प्रतिबद्ध ओर संवेदनशील हो .....ओर ऐसी व्यवस्था की किसी योजना की उम तक उनका ट्रांसफर न हो ....राजनैतिक दृढ  इच्छा शक्ति .....केन्द्र ओर राज्य का सही तालमेल ....आदिवासियों को मुख्या धारा में लाने के लिए उनकी भागीदारी ..जिसमे आर्थिक ओर उनके मूल अधिकार सुरक्षित रहे .....ध्यान रहे  ये केवल सरकार की जिम्मेदारी  नहीं है   इसमें  देश के  हर नागरिक की भागीदारी   है ....आखिर उन खनिजो ओर लौह तत्वों का लाभ भी तो देश का नागरिक परोक्ष रूप से उठा रहा है
  कुछ . चित्र आउटलुक ओर फ्रंट लाइन मैगजीन से लिए गए है .कुछ सन्दर्भ भी ..... फ्रंटलाइन के कुछ आर्टिकल पढने योग्य है .....आज का टाइम ऑफ़ इंडिया दो अलग  अलग खबरे दिखाता है ......एक में दंतेवाडा हमले में शहीद हुए जवानो के परिवारों में पोस्ट डेट नियुक्ति पत्रों की खबर है ताकि १८ साल का होने पर अगली पीड़ी की नौकरी सुरक्षित रहे ....दूसरे पन्ने पर  बुरे हालातो में जंगल में लगातार  पढ़े रहने पर  सी आर पी ऍफ़ के जवानो की मनोदशा पर  पढ़ते प्रभाव की खबर है ......जिससे उनमे मानसिक अवसाद  ओर   असंतोष फ़ैल रहा है ..

मुद्दा ऐसा है जिसे एक पोस्ट में समेटा  नहीं जा सकता....चिट्ठो से अलग नेट पर मिली जानकारी शायद इस समस्या को समझने में मदद करती है .इसलिए यहाँ दी गयी है ...उद्देश्य सिर्फ  तथ्यों को  सामने  रखना है .....जिससे  एक खुली बहस... खुले दिमाग से हो सके ....आखिर...गोली तो एक भरतीय को ही लगनी है चाहे चले कही से



पुनश्च..आदरणीय अफलातून जी कुछ लिंक दिए है जो क्रमश .....

एनजियोकरण और विदेशी हाथ / सुनील


हिंसक रणनीति की सीमा


दन्तेवाड़ा की जड़ें / सुनील


दन्तेवाड़ा की जड़ें / सुनील

 

 है .इनसे विषय को  समझने में ओर अधिक विस्तार मिलेगा


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59 टिप्‍पणियां:

  1. Thank you for ALL these Links -- I am going to READ all these POSTS, one by one.

    MAOWADEE --
    is a HUGE & terrifying problem for BHARAT
    The SARKAR / GOVT. must " WAKE UP "

    उत्तर देंहटाएं
  2. " माओवादी " भारत की स्वतंत्रता और अस्तित्त्व के लिए बहुत भयंकर खतरा है
    सरकार - कब जागेगी ?
    सभी लिनक्स महत्त्वपूर्ण है ..और ध्यान से पढूंगी ..
    शुक्रिया इन्हें यहां समेटने के लिए
    - लावण्या

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  3. काफ़ी कुछ निचोड दिया आपने इस चर्चा मे.. अभय जी के नोट्स पढे थे.. बाकी लिन्क्स के लिये आभार..
    अज़दक बाबा की एक पोस्ट पर भी हुयी चर्चा समझने लायक थी.. उन्ही की शैली मे उन्होने किन्ही साहब से कहा था कि

    "यह बदला लेने वाली भाखा काहे बोलते हो, भाई? यहां लोगों की ज़ि‍न्‍दगी चपेटे में है, यह कोई फ़ि‍ल्‍म शोले का सीनारिओ नहीं है, बाबू. यह बदला फिर कहां, कब खतम होगा, जब मुलुक के सब आदिवासी खत्‍म हो जायेंगे, तब? तब्‍बो खतम हो जाएगा?"

    link: http://azdak.blogspot.com/2010/04/blog-post_09.html

    कमेन्ट्स भी पढने वाले है..

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  4. सही बात है-
    माओवादी आन्दोलन के साथ समस्या ये नहीं है कि वे आदिवासियों के मुद्दे उठा रहे हैं, और पूँजीवाद की मुख़ालफ़त कर रहे हैं। सरकार को सबसे अख़रने वाली बात ये है कि वे राज्य को चुनौती दे रहे हैं।

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  5. Thanks a lot for the information.

    I am Chhatisgarh, and I know how much Aadivasi love there land and forest.

    thanks a lot for letting everybody know the other side of coin.

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  6. यह चर्चा एक मील का पत्थर है - आगे रास्ता चाहे खो जाए या बन ही ना पाए, जंगल के सरोकार अंतर्जाल पर तो आ ही गये हैं उसकी पावती है यह..अंतर्जाल के बाशिंदे जंगल जाए बिना वहां की स्थितियों में कोई फ़र्क कैसे पैदा कर पाएंगे, कर भी पाएंगे तो कैसे? ये देखना हैं!

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  7. थ्री क्लैप फॉर दिस चर्चा..

    रोज़ अखबारों में पढने के बावजूद कभी इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचा नहीं.. पर आज यहाँ मिले लिंक्स को टटोल कर देखा तो बहुत कुछ ऐसा मिला जो जानना बहुत ज़रूरी था सिर्फ मेरे लिए ही नहीं आधे भारत के लिए.. जयप्रकाश मानस का लेख मुझे प्रभावित करता है.. पर अभय तिवारी कोई और ही आयाम देते है.. मैन अपनी सोच को स्थिर नहीं रख पा रहा हु., किसी एक नजरिये की तलाश है जो यक़ीनन और अधिक पड़ताल करने के बाद डेवलप होगी.. पर इतना पता है कि नाक सिकोड़ने से समस्या सुलझने नहीं वाली..

    अभी ऐसी कुछ और खबरों की तरफ बढ़ रहा हूँ...

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  8. आदरणीय अफलातून जी कुछ लिंक दिए है ....कृपया उन्हें क्लिक करने के लिए यहाँ देखे

    दूसरे पन्ने के लिए यहाँ देखे


    तीसरे पन्ने के लिए यहाँ देखे ....इस पोस्ट का शीर्षक दंतेवाड़ा की जड़े है ....


    चौथे पन्ने के लिए यहाँ देखे ....ये भी दंतेवाड़ा का ही अगला पार्ट है ....ओर वाकई पढने जैसा है ......

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  9. सुनील जी चौथी पोस्ट पर "उदय प्रकाश जी "एक महत्वपूर्ण टिपण्णी है .जिसे यहाँ उद्धत कर रहा हूँ........

    आगे की कड़ी की प्रतीक्षा है. लेकिन सुनील जी, एक प्रश्न यह भी है कि क्या वर्तमान राज्य-व्यवस्था सचमुच लोकतंत्र का वह स्वरूप चाहती है और उसके साथ किसी तरह के संवाद, सहकार और अहिंसक व्यवहार के लिए तैयार है, जो हमारी-आपकी अवधारणाओं में, बीसवीं शताब्दी के ऐतिहासिक अनुभवों पर आधारित है? आज लोक सभा में गृहमंत्री पी.चिदंबरम और विपक्ष के नेता अरुण जेटली का भाषण सुना, जाने क्यों मेरे जैसे साधारण लेखक-नागरिक को भी ऐसा लगता है कि जैसे सरकार आदिवासियों और उनके बीच विभिन्न सामाजिक-आर्थिक कारणों से पनप रहे माओवाद-नक्सलवाद के विरुद्ध लगभग एकमात्र सैन्य विकल्प पर एक मत हैं। यह अमेरिका के ‘वार अगेंस्ट टेरर’ की ही प्रतिलिपि है।
    सारे देश के नागरिकों में गहरी चिंता व्याप्त है। भय भी। आज अरुण जेटली ने माओवाद के जिन ‘चार चेहरों’ को गिनाया है, उसमें मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों और अरुंधती राय या हमारे-आपके जैसे स्वतंत्र विचार रखने वाले लोगों (अहिंसा पर जिनकी आस्था असंदिग्ध है) को भी एक साथ सम्मिलित कर लिया है।
    मै सचमुच एक स्वतंत्र नागरिक होने के नाते यह जानना चाहता हूं कि क्या
    दांतेवाड़ा की घटना के बाद आज हर नागरिक से यही कहा जाएगा कि तुम्हारे सामने अब इस देश में स्वतंत्र रहने के लिए दो ही विकल्प बचे हैं, जिसमें से एक को तुम्हे चुनना है -’तुम माओवाद-नक्सलवाद के साथ हो? या सरकार और कार्पोरेट कंपनियों के साथ?’
    क्या इसमें से किसी एक को चुनना संभव है? क्या हम अब अपने आपको सुरक्षित मानें?
    आपको ये प्रश्न बहुत साधारण लग रहे होंगे, लेकिन मुझे लगता है, ये प्रश्न बहुतों के दिमाग में घूम रहे होंगे।
    रही बात अरुंधती राय के ‘आउट्लुक’ में छपे लेख की तो उसको अगर गहराई से पढें तो वह किसी भी तरह की हिंसा (माओ-नक्सलवादी हिंसा, राज-संपोषित सलवा जुडुम और ग्रीन हंट जैसी हिंसा या सेना-अर्धसैनिक बलों की सीधी हिंसा) के पक्ष में नहीं है, बल्कि उसकी केंद्रीय चिंता जनता के प्रतिरोध के किसी ‘अहिंसक’ विकल्प के व्यर्थ हो जाने की हताशा और चिंता है।
    लगता है जैसे ९/११ के बाद अमेरिका और शक्तिशाली देशों के सामने छोटे, कमज़ोर और अल्प-विकसित लेकिन प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न देशों के राष्ट्रनायकों, जनता द्वारा चुनी गई सरकारों को भी ‘आतंकवादी’ ठहरा दिया गया, लगता है हम इतिहास के उस मोड़ पर हैं, जब हमें यह मानने के लिए विवश कर दिया जाएगा कि इस देश की सारी संपदा, जल, जमीन, खनिज, हवा, पशु-पक्षी और मनुष्य सबके दोहन -खनन-क्रय-विक्रय का एकतरफा अधिकार सरकार को है।
    इस पर किसी भी तरह के प्रश्न को उठाना खुद को जोखिम में डालना है।
    अगली कडी का इंतज़ार है।

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  10. उदय प्रकाश जी की टिपण्णी विचारणीय है..

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  11. गम्भीर समस्या को हल्के में लेने से स्थितियाँ हाथों से सरक जाती हैं ।

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  12. बांग्ला में एक अत्यंत मूल्यवान पुस्तिका आई है- ‘शहीबदेर के प्रति श्रद्धांजलि’ (शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि)। इसके लेखक हैं लाल मोहन टुडू। लालगढ़ में जल-जंगल-जमीन यानी जीने के अधिकार की लड़ाई में 25 फरवरी 2009 से 22 फरवरी 2010 के बीच मारे गए 54 लोगों का पूरा विवरण इस पुस्तिका में दिया गया है। इसमें एक-एक शहीद का नाम, उसके गांव का नाम, हत्या की तारीख लिपिबद्ध की गई है। साथ ही यह भी बताया गया है कि किसके द्वारा हत्या हुई। इस तालिका में एक्टिविस्ट लेखक लाल मोहन टुडु का नाम भी जुड़ गया है।

    लाल मोहन की पुस्तिका विचारशील जगत को संवाद का उत्तेजक आमंत्रण देती है। लालगढ़ महज एक जगह का नाम नहीं है। देश में कई लालगढ़ हैं। उन लालगढ़ों के आदिवासियों के मनोभावों को हम कब समझेंगे? उनके मनोभावों को समझने और जंगलपुत्रों को जीने का अधिकार देने के बजाय उन जगहों में सेना-पुलिस भेजकर दमन चलाना शासन की किस दृष्टि का परिचायक है?

    लालगढ़ में केंद्रीय अर्धसैनिक बल, राज्य पुलिस और हर्मदवाहिनी (माकपा के कार्यकर्ताओं का हथियारबंद संगठन) की त्रिशक्ति आए दिन गांवों में जाकर निरीह आदिवासियों पर कहर बरपा रही है। माओवादियों की तलाश के नाम पर यह त्रिशक्ति गांव-गांव अत्याचार चला रही है। त्रिशक्ति की 70 सदस्यीय वाहिनी ने अभी-अभी लालगढ़ अंचल के हरिना गांव में पुरुषों-महिलाओं और बच्चों पर निर्मम तरीके से लाठीचार्ज किया।

    सुनील, उनके तीनों भाई, उनके घर की महिलाएं के एकमात्र जल स्रोत कुंओं में शौच किया ताकि वह पीने योग्य न रहे। स्कूलों में कैंप खोल दिए गए ताकि बच्चे पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर हों। कैंप हटाने के लिए स्थानीय बाशिंदों को हाई कोर्ट का आदेश लाना पड़ा। पढ़ाई शुरू हुई तो स्कूली बच्चों को नंगा कर अब तलाशी ली जा रही है।

    इन सब अत्याचारों के खिलाफ जो आवाज उठाती, उस पुलिस संत्रास विरोधी जनसाधारण कमेटी पर भी कहर बरपाया जा रहा। समिति के अध्यक्ष लाल मोहन टुडु को गोली मार दी। केंद्रीय अर्धसैनिक बल ने तो समिति के महासचिव छत्रधार महतो को यूएपीए कानून के तहत बंदी बना लिया गया। आदिवासियों को दरअसल इसलिए संत्रस्त किया जा रहा है कि वे इलाका छोड़कर अन्यत्र चले जाएं और वहां जिंदल का विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) बन सके। उसी सेज के लिए वहां आपरेशन ग्रीन हांट चल रहा है। उसी सेज के लिए 55 लोगों को बलि लेने की बंगाल की जनविरोधी-अत्याचारी वामपंथी सरकार को बहुत दरकार थी।

    चिदंबरम को भी लालगढ़ आकर मानना पड़ा कि वहां असंतोष की वजह विकास का नहीं होना है। मैं पूछती हूं कि मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, पश्चिमांचल विकास मंत्री सुशांत घोष और मेदिनीपुर माकपा के सर्वेसर्वा दीपक सरकार जवाब देंगे कि लालगढ़ समेत पूरे मेदिनीपुर के विकास के लिए आया केंद्रीय धन कहां गया? विकास की पोल तो मेदिनीपुर के आमलासोल में आदिवासियों की भूख से हुई मौत की घटना ने ही खोल दी थी।

    बुद्धदेव भट्टाचार्य, सुशांत घोष और दीपक सरकार जवाब देंगे कि जंगल बहुल इलाकों के विकास के लिए आया केंद्रीय धन कितना खर्च हुआ और कितना पार्टी कोष में गया? राज्य के जंगलबहुल इलाकों में विकास नहीं होने का रहस्य क्या है? सिर्फ जंगल क्षेत्र ही नहीं, मैदानी क्षेत्रों के अनेक गांव विकास से वंचित हैं। खुद बुद्धदेव सरकार ने स्वीकार किया है कि राज्य के चार हजार गांव विकास में अत्यंत पिछड़े हैं।

    बुद्धदेव सरकार जवाब दे कि इन गांवों में बिजली क्यों नहीं पहुँची? सड़कें क्यों नहीं बनीं? राज्य की आधी आबादी पेयजल संकट से क्यों जूझ रही है? जंगल बहुल इलाकों में विकास में माओवादियों के बाधा देने का शोर मचाया जाता रहा है। लेकिन राज्य के उन गांवों में भी विकास क्यों नहीं हुआ, जहां माओवादियों का लेश मात्र भी असर नहीं?

    पश्चिमी मेदिनीपुर, बांकुड़ा और पुरुलिया माओवाद प्रभावित हैं पर राज्य सरकार की ही रिपोर्ट के मुताबिक वीरभूम, रामपुर हाट, बालेपुर, सिदरी के सैकड़ों गांव जीवन की मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। जाहिर है, वहां के विकास के पैसे भी पार्टी मद में गए। यही वामपंथ का सुशासन है।

    --------- महाश्वेता देवी कल दैनिक हिंदुस्तान में

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  13. भारत दो तरह के जहरीले सांपों से जूझ रहा है। दोनों आतंक के डंक मारते हैं। एक बाहरी है, एक भीतरी। बाहरी पड़ोसी का प्रसाद है, भीतरी मतिभ्रष्ट माओवादियों का। हम अपने काम से काम रखते हैं। मुल्क की चिन्ता के लिये नेता हैं। जब से लीडरों ने धन और खानदान के खातिर देश की चिन्ता त्याग दी है, हमें लगता है कि कुछ अपना भी कर्तव्य है। ऐसे भी अस्तित्व का सवाल है। न बाहरी सांप सीमा तक सीमित है, न भीतरी, जंगल-कस्बों तक। हमने ज्ञानी मित्र आतताई की शरण ली, यह पता करने को कि ज्यादा खतरनाक कौन है? उन्होंने ‘घर का भेदी लंका ढाये’, कहकर हमारी छुट्टी कर दी। उनका इशारा समझने में हमने चाय और सिगरेट का सहारा लिया। अब हम मुरारी से सहमत हैं।
    यह तथाकथित गरीबों के हितचिन्तक गरीबों को ही मारते हैं, वह भी क्रूर, बर्बर, पाशविक अंदाज में। कभी अंग-भंग करके, कभी गर्दन रेत के। अरबों की वसूली करते हैं। हमें तो इनके इंसान होने पर शक है। इनके बुद्धिजीवी हमदर्दो पर गुस्सा आता है। विकास के अभाव पर घड़ियाली आंसू बहाते हैं। नक्सली हिंसा की वकालत करते टीवी पर इनका जलवा दर्शनीय है। जब सुरक्षा बल के सैकड़ों निर्धन जवान हलाक होते हैं तो उनकी जुबान पर ताला लगता है। वह क्यों बोलें? गरीब के वास्ते गरीब का सिर काटना ही तो असली वर्ग-संघर्ष है। प्रजातंत्र में सत्ता वोट का जुगाड़ है। कोई उसे ऐतिहासिक न्याय के नारे से करता है, कोई अल्पसंख्यकों का मसीहा बनकर। कोई ढांचा गिराकर, कोई आरक्षण बांटकर। नेताओं ने गरीबी को भी अगड़े-पिछड़े जातियों और सम्प्रदाय में विभाजित कर दिया है। माओवादी वर्ग संघर्ष का मखौल उड़ा रहे हैं तो ताज्जुब क्यों? गरीब कल मरता है तो आज टें बोले। इन सबकी इकलौती मंजिल सत्ता है। सबको उसी की तलाश है!

    ---- गोपाल चतुर्वेदी

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  14. Ek Rasta:

    बिहार में 2001 से 2004 के बीच नक्सली हमलों में 668 लोग मारे गये थे। पर सन 2006 से 2009 के बीच नक्सली हमलों में मृतकों की संख्या घटकर 160 रह गई। इस अवधि में नक्सली हिंसा की कुल घटनाएं भी क्रमश: 1117 और 338 रहीं। इसके साथ हालांकि यह खबर भी आई है कि नक्सलियों ने हाल के वर्षों में पहले की अपेक्षा कुछ अधिक भूभाग में अपने प्रभाव का विस्तार किया है। पर माओवदियों की असली पहचान तो उनकी मारक क्षमता ही है जिसमें कमी आई है।



    नीतीश सरकार ने गत वर्षों में जो कुछ दूसरे काम किए, उससे माओवादियों की मारक क्षमता कम होने लगी। अपुष्ट खबर के अनुसार माओवादियों को हमले के लिए उनकी ‘फौज’ के सैनिकों की संख्या कम होने लगी। एक तो कानून का शासन काफी हद तक लागू होने के कारण हत्यारे दस्ते के सदस्यों में यह भय व्याप्त हो गया कि यदि उन्होंने हिंसा की तो उन्हें अब अदालतों से सजा जरूर दिलवाई जाएगी। पहले ऐसी बात नहीं थी। दूसरी ओर सरकार ने विकास की गति तेज करके ऐसे गरीब लोगों में उम्मीद बंधाई जिनके पास कल तक माओवादी फौज में शामिल होने के अलावा कोई और उपाय नजर नहीं आ रहा था। याद रहे कि माओवादियों की फौज में शामिल हो जाने पर उन्हें भुखमरी से तो मुक्ति मिल ही जाती थी। कुछ साल पहले तक उन्हें कानून का भय भी नहीं था।

    पिछले बिहार विधान सभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग के पदाधिकारी तैयारी के सिलसिले में बिहार आये तो उन्हें बिहार सरकार के प्रतिनिधियों ने बताया कि तब राज्य में 40 हजार ऐसे लोग हैं जिनके खिलाफ विभिन्न अदालतों से गिरफ्तारी के लिए गैर जमानती वारंट तो जारी हो चुके हैं, पर उन्हें बिहार पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकी है। इसके विपरीत इस मामले में सन 2010 की स्थिति यह है कि त्वरित अदालतों के जरिए गत चार साल में करीब 38 हजार अपराधियों को सजाएं दिलवाई जा चुकी है। इन सजायाफ्ता लोगों में आम जघन्य अपराध, राजनीतिक हत्याएं, सांप्रदायिक दंगे और नक्सली हिंसा के मुकदमों के अभियुक्त भी शामिल हैं। इतने कम समय में इतने अधिक अपराधियों को सजाएं मिल जाने का असर यह है कि बिहार में हर तरह के अपराधों में कमी आई है जिनमें नक्सली हिंसा और प्रतिहिंसा भी शामिल है।

    यानी किसी राज्य में तरह-तरह के अपराध करने वालों को अदालतों से सजा मिल जाने की गारंटी मिल जाए तो कोई पीड़ित, असहाय व गरीब व्यक्ति माओवादियों की कंगारू अदालत की शरण में आखिर क्यों जाएगा? बिहार का यह उदाहरण उन राज्यों के लिए नजीर बन सकता है जहां के गरीब सिस्टम से न्याय नहीं मिलने के कारण माओवादियों को ताकत पहुंचा रहे हैं।
    बिहार सरकार ने कुछ समय पहले नक्सली इलाकों में ‘आपकी सरकार आपके द्वार’ कार्यक्रम चलाया। इसके जरिए सरकार ने जन विरण प्रणाली में सुधार किया। संचार व्यवस्था बेहतर की। साथ ही बिजली आपूर्ति में सुधार कराया। इसके अलावा भी गरीबी कम करने और राहत तथा कल्याण के कार्यक्रम चलाये। इन कार्यक्रमों के जरिए सिद्धांतों से लैस कट्टर माओवादी कॉडर से गरीबों को अलग करने में मदद मिली। नक्सली हिंसा के कम होने का यह एक महत्वपूर्ण कारण रहा। पर इससे बड़ा कारण अदालती सजा का डर रहा। साथ साथ जहां जरूरत पड़ी, वहां पुलिस ने माओवादियों के खिलाफ आपरेशन भी चलाया।

    - - - - - सुरेन्द्र मोहन
    पूरा आलेख यहाँ उपलब्ध है.

    http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/57-62-108166.html

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  15. हम बंदूक का सामना बंदूक से जरूर करें पर जिन शैतान विचारों ने हमारे लोगों को हम पर हथियार चलाने के लिए प्रेरित किया है, उनसे भी जूझना होगा। विचारों का जवाब सद्विचार हो सकते हैं, बंदूक नहीं। अफसोस! विचारों के मोर्चे पर हम अब तक मात खाते आए हैं। नक्सलवाद का विस्तार इसका जीवंत प्रमाण है।

    साठ के दशक में जब पश्चिम बंगाल के कुछ उतावले नौजवानों ने बंदूक उठाई थी तो इसे हल करने का तरीका औपनिवेशिक रीति-नीति से उपजा था। छोटे से समूह का जवाब बड़ी सी सेना और आतंक के उत्तर में प्रति आतंक। उस समय तक यह आंदोलन कुछ लोगों के मनों में उपजी सुगबुगाहटों का नतीजा था, इसीलिए लगा कि उसे दबा दिया गया है। पर देश के नक्शे को फैलाकर देखें तो पाएंगे कि पिछले साढ़े चार दशकों में लाल दायरा लगातार फैलता चला गया है।

    सरकार को हर बार लगा है कि उसने फतह हासिल कर ली है, पर कुछ ही दिनों बाद वे पहले के मुकाबले ज्यादा ताकतवर होकर उभरते नजर आए हैं। देश के दिल में धड़कते नौ राज्यों में इसकी तपिश सीधे तौर पर महसूस की जाती है। उनकी धधक और धमक बढ़ती जा रही है। दंतेवाड़ा का संहार इसका नवीनतम नमूना है।

    इसे कैसे रोकें? नॉर्थ और साउथ ब्लॉक के महफूज कमरों में पसरे हुक्मरां हमेशा की तरह दिग्भ्रमित हैं। खुद की बनाई शंकाओं के कुहासे ने उन्हें इतना ढंक लिया है कि रोशनी पूरे तौर पर उन तक नहीं पहुंच रही है। गृहमंत्री पी. चिदंबरम की काबिलियत पर अभी तक कोई उंगली नहीं उठी है। पर दंतेवाड़ा ने जैसे उनके समूचे वजूद को चुनौती दे डाली है। खुद कांग्रेस में तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं।

    एक लोकतांत्रिक पार्टी में यदि किसी मुद्दे पर बहस-मुबाहिसा हो तो कोई बुराई नहीं। पर हमें सतर्कतापूर्वक इसका ध्यान रखना होगा कि सवाल कीचड़ के गोले न बन जाएं और मूल मुद्दा उसके नीचे ढक-छिप न जाए। पंजाब समस्या के दौरान हमने किंतु-परंतु के ऐसे तमाम दौर देखे थे। इसका नतीजा पूरे देश ने भुगता था। डर है कि हम फिर कहीं अपने ही बनाए संदेहों के चक्रव्यूह में न घिर जाएं।

    यह ठीक है कि आंतरिक सुरक्षा से जुड़े बलों को दुरुस्त किया जाना चाहिए। भारत आबादी और भूगोल के लिहाज से बहुत बड़ा देश है। इसकी सुरक्षा के लिए तैनात जवान तरह-तरह की दिक्कतों से जूझने में सक्षम होने चाहिए। यदि कोई देश की प्रभुसत्ता के खिलाफ बंदूक उठाता है तो उसके हौसले को भी जमींदोज करने में कोताही नहीं बरती जानी चाहिए, पर नक्सलवादियों का मामला इतना सरल नहीं है। यह समस्या कमोबेश उतनी ही पुरानी है, जितनी कि हमारी आजादी।

    पंजाब या उत्तर-पूर्व में हमने आतंक और अलगाववाद को दबाने में कामयाबी जरूर हासिल कर ली, पर यह सच है कि यह समस्या घटने के बजाय बढ़ती गई है। मतलब साफ है। यह निरा कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है, हमारे ही लोगों की तीन पीढ़ियां अगर सिलसिलेवार बगावत करती नजर आती हैं तो इसको हल्के से लेना खतरनाक होगा।

    हमने पंजाब में देखा है। सीमापार के प्रोपेगंडा से प्रेरित कुछ लोगों ने पहले बंदूक उठाई और फिर धर्म का कवच धारण कर लिया। एक बेहद न्यायोचित धर्म के साथ जुड़ी उत्सर्ग की कहानियों को उन्होंने मनपसंद नकाब पहनाया और खून की होली खेलने लगे। डरावने दिन थे वे। सीमा से सटे जिस सूबे में यह सब हो रहा था, उसके लोगों ने हमेशा देश की रक्षा में जी-जान एक किया था।

    continue...

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  16. वैदिक संस्कृति ने यहीं अंगड़ाई ली थी और ऋग्वेद की ऋचाओं को यहां की पांच नदियों ने पहले-पहल सींचा था। ऐसा लगता था जैसे सिर्फ एक सम्प्रभु देश नहीं बल्कि एक शाश्वत संस्कृति पर खतरा मंडरा रहा है। उन्हीं अंधियारे दिनों में पंजाब का आम आदमी उठ कर खड़ा हो गया था।

    आप याद कर सकते हैं कि चुनाव में किस तरह बेअंत सिंह की ताजपोशी हुई थी और केपीएस गिल के साथ मिलकर उन्होंने इस समस्या को सिरे से निपटा दिया था। यहां मेरा यह आशय कदापि नहीं है कि इससे हमारे सैनिक, अर्धसैनिक और पुलिस बलों की शहादतें निर्थक हो जाती हैं। पर यह तय है कि बंदूक के साथ समाज का भी सहयोग जरूरी है। दुनिया के इतिहास में इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं।

    इटली में गेरीबाल्डी ने जब स्वाभिमान और राष्ट्रीय एकीकरण के लिए अभियान चलाया तो वहां हालात आज के नक्सलवाद प्रभावी इलाकों से भी ज्यादा खराब थे। पर उसने नौजवान वालंटियर्स का संगठन बनाया। उन्हें लालकुर्ती वालों का दल कहा जाता था। लाल कमीजें पहने इन लोगों ने इटली को वह मान-सम्मान दिलाया जो आज भी पूरी दुनिया के लिए एक नजीर है।

    अफसोस! 19वीं शताब्दी के छठे दशक की शुरुआत में गेरीबाल्डी जान जोखिम में डालकर इटली का एकीकरण कर चुके थे। उसके सौ साल बाद हमारे देश में कुछ नौजवान राष्ट्रीय सम्प्रभुता को अपने प्राणों की कीमत पर चुनौती दे रहे थे। सोचना होगा कि पांच दशक होने को आए, हम इस समस्या का समाधान क्यों नहीं निकाल सके?

    यह ठीक है कि सशस्त्र संघर्ष से जूझने के लिए आग के जवाब में आग ही झोंकनी होती है, लेकिन अपना दामन झुलस रहा हो तो साथ में पानी और बालू का भी उपयोग जरूरी है। केन्द्र और राज्य सरकारों के अहमपूर्ण झगड़े, सूबाई सरकारों में नक्सलवाद समर्थकों की मौजूदगी और समानांतर शासन व्यवस्था के लगातार पुख्ता होते जाने की दिशा में तय करना होगा कि किस रास्ते पर चलें?

    क्या यह संभव है कि विभिन्न गठबंधनों और पार्टियों की हुकूमतों वाली राज्य सरकारें केन्द्र के प्रतिनिधियों के साथ साझा मंच बनाएं? अनुभव गवाह हैं कि हर रोज इस समस्या का विस्तार हो रहा है। इसके लिए सामूहिक तौर पर जूझना होगा। माओवादी इसे सामाजिक आंदोलन बताते हैं। हमें उनको समाज के दबाव से ही सही रास्ते पर लाना होगा।

    यह ठीक है। गेरीबाल्डी जैसी ताकतें इतने जटिल लोकतंत्र में नहीं पैदा होतीं। पर उनकी शानदार उपलब्धियों से सीखा तो जा सकता है। छत्तीसगढ़ में रमन सिंह ने सलवा-जुडूम की शुरुआत शायद यही सोचकर की थी कि आदिवासियों को और ज्यादा उफनने से रोका जा सके। पर एक भूभाग में किया गया कोई भी उपाय इसलिए कारगर नहीं हो सकता क्योंकि नक्सलवादियों ने अपना विस्तार प्रशासनिक सीमाओं से कहीं ज्यादा बड़ा कर लिया है। अब हर नक्सल प्रभावी राज्य को समान नीति बनानी होगी। समाज के पढ़े-लिखे लोगों को भी आगे आना होगा। जो लोग भटक रहे हैं, उन्हें यह बताना होगा कि बदलाव बंदूकों से नहीं विचारों से आता है।

    उन्हें कुछ बल, तो बहुत कुछ विनम्रता से याद दिलाना होगा कि वे उस देश की उपज हैं जो पूरी दुनिया में कभी विचार का आलोक फैलाता था। यहां सोच पर अंधियारे की हुकूमत नहीं चल सकती और अगर हम भारत मां को मानते हैं तो हमें यह भी मानना होगा कि उसे अपने बेटों के रक्त स्नान की कभी आदत नहीं रही। सुबह के भूलों-भटकों को अगर शाम को घर वापिस ले आया जाए तो इसे समझदारी कहा जाएगा।

    - - - - शशि शेखर

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  17. अब अपनी बात...

    मैं इस विषय पर बहुत ज्यादा कुछ नहीं कह सकता... इसलिए यह सब कतरने यहाँ दी हैं हमारे बिहार में 'जहानाबाद' में रणवीर सेना 'अलवर' में अक्सर रक्तपात करते थे... तब समझ नहीं आता था यह सब आज भी इसकी जटिलता आधी आधी में बँटी है... सो बस इतना कहूँगा की अफ़सोस है और दुर्भाग्य है इस देश का जहाँ खून ऐसे बहता है... जहाँ जिंदगी इतनी सस्ती है... जहाँ ...........................................

    एक बात और ... चर्चा का लेवल बहुत ऊँचा रहा, जानकारी बहुत सारी मिली ... जाहिर है ढेर सारी प्रतिक्रिया नहीं होगी पर कुछ अच्छी बातें जरूर सामने आएँगी...

    दिल की बात : मेरे दोस्तों में अक्सर इसपर बहस होती है की लेखक को सिर्फ अपने लेखन पर ध्यान देना चाहिए मसलन विवादों में नहीं रहना चाहिए... पर लेखन एक सरोकारी चीज़ होती है, आँखें बंद नहीं होती और घटनाओं से जुड़ना ही पड़ता है. कई प्रेम पर लिखने वाले शायरों का मैं उदाहरण मैं देता हूँ... साहिर भी खान बचे रहे...

    साथ ही, संभवतः इस मुद्दे को भी विराम मिलेगा कि एक साहित्यिक आदमी अबकी कोई कविता, कहानी या फेवरेट ब्लोग्स नहीं बांचा....

    वैसे मैंने आपकी चर्चा के लिए कुछ कविताओं के लिंक बचा रखे थे... शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  18. वर्ष की बेहतरीन पोस्टों के लिए इसे सहेज़ रहा हूं । चर्चा इतनी अद्भुत है कि अभी कुछ भी कहना मुश्किल हो पा रहा है , डा. अनुराग जी के अलावा किसी और से ये संभव भी नहीं थी

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  19. इस विषय में अपनी सोच के विस्तार के लिए अनुराग, आपने काफी खुराक मुहैया कराई है। साथ ही टिप्पणियों में सागर साहब ने भी कुछ ऐसे लोगों के इस विषय पर विचार उपलब्ध कराए हैं जो इस मसले को करीब से देखने समझने वाले रहे हैं।

    एक बार फिर आपकी इस सार्थक मेहनत को नमन !

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  20. शुक्रिया सागर ....तहलका के पुराने अंक में "सलवा -जुड़म" से सम्बंधित पोस्ट को ढूँढने का असफल प्रयास कर रहा था .....तीन ब्लॉग ओर है जिन्होंने इस मुद्दे पर लिखा है .उनके लिंक दे रहा हूँ ........
    एक जिद्दी धुन की ये पोस्ट
    आरम्भ की ये पोस्ट
    ओर तीसरा अंग्रेजी का एक ब्लॉग है ....उसकी ये पोस्ट

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  21. बहुत अच्छी चर्चा रही।

    डौक्टर साहब, आप ने तो मेहनत की ही साथ ही सागर ने भी तमाम अन्य स्रोतों से विचारों को यहाँ डालकर चर्चा को और रिच बना दिया।

    उत्तर देंहटाएं
  22. बहुत अच्छी चर्चा रही।

    डौक्टर साहब, आप ने तो मेहनत की ही साथ ही सागर ने भी तमाम अन्य स्रोतों से विचारों को यहाँ डालकर चर्चा को और रिच बना दिया।

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  23. आज की चर्चा के लिंक और सँदर्भों के सहारे मेरी टिप्पणी यात्रा ...

    प्रातः 10.40 AM
    भई अनुराग, तुमने ऎसी रग पर हाथ रखा है कि,
    इतनी पब्लिक के सामने मैं ठीक से कराह भी नहीं सकता ।

    दोपहर : 1.30 PM
    कराह की समीक्षा, कराहने के तरीकों की समीक्षा, कराह के हथियारों की समीक्षा के बनिस्पत
    क्या कभी कराहने के कारणों की समीक्षा कभी की भी गयी है ? विश्वास रखो यह कभी की भी न जायेगी !
    मु्द्दा ऎसा है कि एक पोस्ट में समेटा नहीं जा सकता... और टिप्पणियों में तो कभी समेटा भी न जा सकेगा,
    क्योंकि मुद्दे हमेशा सत्तासीन पक्ष की ओर से थोपे जाते हैं, और थोपे जाते रहेंगे । एक मुद्दा दम तोड़ेगा, दूसरे को खड़ा कर या करवा दिया जायेगा, वह इसलिये कि राज्य की अशाँति ही शासक की सँजीवनी है ! प्रतिरोध और विरोध का होना सत्तापक्ष की ज़रूरत है । वह ऎसी ज़रूरतें स्वयँ ही पैदा करती है, उनके महिमामँडन के स्तर तक पहुँचने तक आँखें मूँदें रहती है, ताकि वह अपने बने रहने के औचित्य को अपरिहार्य दिखा सके !
    शुक्र है कि कभी अई-स्वामी को कम्यूनिस्ट ठहरा कर ख़ारिज़ कर देने वाले ई-स्वामी इस चर्चा को मील का पत्थर ठहरा रहे हैं !

    त्रिपहर : 2.45 PM
    स्वामी ठीक है कि, "आगे रास्ता चाहे खो जाए या बन ही ना पाए" पर सत्ता के खलनायक कैसे तैयार किये जाते हैं, कबाड़खाने पर ’आई प्रवीर - द आदिवासी गॉड ’ पढ़ने के बाद भी क्या ज़ाहिर नहीं होता ? नक्सलियों के प्रति मौन या मुखर समर्थन को केवल बुद्धिजीवी शगल कह कर हवा में भले ही उड़ा दिया जाये, पर मरने और मारने वाले आदिवासियों ने इसे शगल के तौर पर तो न अपनाया होगा ? अबूझमाड को छोड़ कर कोई अन्य आदिवासी क्षेत्र 4 दशक से पहले हिंसक क्यों नहीं था ? यह हताशा का क्लाइमेक्स है, हम यह क्यों भूलते हैं कि अहिंसा के मसीहा गाँधी ने ’करो या मरो’ का नारा किन मज़बूरियों में दिया था ? क्या करो... और क्यों मरो, शायद किसी ने न पूछा क्योंकि चिंगारियाँ मौज़ूद ही थी, और यह एक सोचा समझा हुआ आवाह्न था । भारती दँड सँहिता IPC के तहत थानों को फूँकना, रेल पटरियाँ उखाड़ देना इत्यादि तब भी राजद्रोह में शुमार था, आज भी है ।
    काश कि अँग्रेज़ों ने उन चिंगारियों की अनदेखी न की होती, जैसे हमारे द्वारा चुनी हुई व्यवस्थायें आज भी कर रही हैं । फ़र्क केवल इतना है कि उनके नज़र में तब हम अपरिपक्व और ज़ाहिल थे, जितने कि हम आज इन आदिवासियों को समझ रहें हैं ।
    शाम : 7.10 PM
    आउटलुक की प्रति मँगवायी है, उसे पढ़े बिना उस पर कोई टिप्पणी करना मेरी एक गलैमराइज़्ड बेईमानी होगी । अँतर्जाल पर इस तरह की हलचल सुखद है, पर ज़ँगल की सच्चाइयाँ उससे कहीं अधिक दुखद हैं । भारत को अपनी आँखों देखने की ललक या सनक में, झाबुआ से 1992 में शुरु हुआ टुकड़ों में चल रहा मेरा यह सफ़र ( नवीनतम अँतिम पड़ाव : जनवरी 2010 ) अब तक कई बार लोमहर्षक सच्चाइयों से इस कदर रूबरु हुआ है, कि मैं उनको लिपिबद्ध भी नहीं कर सकता !
    चँद कप क़ाफ़ियों पर टिकी उनकी चर्चायें हमें आहत होने का सँतोष भले ही दे दें, पर उनका दर्द नहीं बाँट सकतीं ।
    रात्रि 11.30 PM
    आउटलुक पढ़ी और सहमत हुआ कि यह बुद्दिजीवी शगल ही था, जो उनसे यह यात्रा करवा सका । लोमहर्षक को रोमाँचक बनाने में वह सफ़ल रहीं हैं । यदि इस स्टोरी में रोमाँच ही न होता तो यह ख़रीदता ही कौन ?
    न तो प्रकाशक और न ही पाठक !

    शुभरात्रि : इस चर्चा से तुम मुझे डिस्टर्ब करने में पूर्णतया सफ़ल रहे हो, बधाईयाँ लो ।
    टिप्पणियों की समय सारिणी और मेरे सिर पर सवार गृहिणी इस बात की गवाह हैं कि, मैं आज क्लिनिक ही नहीं गया था । क्योंकि मैं यह मानता आया हूँ कि, बिना उचित मनोस्थिति के दूसरे के हाड़-माँस से किसी भी प्रकार न खेलना चाहिये !

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  24. चलते चलते :
    यह बताना तो भूल ही गया था, कि चीन का पिछले वर्ष इन माओवादियों से 1600 करोड़ रुपये का हथियारों का व्यापार था, और उसने आशा जतायी है कि इस वर्ष इसमें और वृद्धि होगी ।
    सरकार-ए-हिन्द इस ज़ानकारी से वाक़िफ़ है, तभी फ़ौज़ फाटा लेकर टूटने की भूमिकायें तैयार की जा रही हैं । विपक्ष को तैयार किया जा रहा है, फोन टेपिंग हो रही है, हथियारों की फ़रोख़्त के नये अवसर सामने खड़े हैं ।
    निर्दोष नागरिकों की कीमत पर युद्ध का यह नये किसिम का बाज़ारवाद है । वह आई.पी.एल. घपलों में करोड़ों तड़ीपार होने देते हैं, एक दूसरे को सुनने सुनाने के मौके दिये जा रहे हैं, ताकि गुनाह साबित हो सके । उधर वह वसूली करते हैं.. तो गुनाहगार हैं, इतने भारी गुनाहगार कि पहले सज़ा सुनाओ, गुनाह बाद में तय किया जायेगा ।
    अमें म्याँ डाक्टर, क्या समझे ?

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  25. देखिये ऐसे जितने भी समस्याग्रस्त इलाके हैं वो सब किसी न किसी कलक्टर के अंडर में तो रहे ही हैं . सो ऐसे तमाम ज़िम्मेदार ,मुआज्ज़िज़ लोगों की एक लिस्ट बनायी जाए और फिर उनमें से जो ज़िंदा हैं उनके चूतडों पे सार्वजनिक रूप से लात मारने का हक उन-उन इलाके के आदिवासियों को दिया जाए जहाँ वो पोस्टेड रहे और मर चुकों के लिए एक 'हॉल ऑफ़ शेम' जैसी कोई सूची जारी की जाए तो निस्संदेह इन आदिवासियों का विश्वास जीतने की शुरुआत होगी . मगर चूंकि ये तरीका गैर-कानूनी है सो वही होगा जो हो रहा है और यदि सेना का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा तो इस से भी बुरा होता चला जाएगा . मार कर सुरक्षा कर्मियों के हथियार छीन लेने , लाश को लात मार कर देखने और एकदम बड़ी तादाद में प्रकट होने का तरीका भारत-चीन युद्ध की याद यदि नहीं कराता तो निस्संदेह आपसे बड़ा चुगद अभी पैदा नहीं हुआ मिस्टर बुद्धिजीवी. हम चीन की चालों में बुरी तरह घिर गए हैं और केवल हनुमान जी ही रक्षा कर सकते हैं . ऐसे में हर भारतीय को अन्य सभी प्रयासों के साथ -साथ सुन्दरकाण्ड का पाठ अवश्य करना चाहिए वर्ना......

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  26. आप सभी के विचार पढे,आप सभी लोगों का बस्तर और नक्सलवाद के प्रति जागरूक होना अच्छा लगा।ज्यादा क्या कहूं आप सभी को बस्तर देखने का बुलावा दे रहा हूं,यंहा आईये और खुद ही देखिये कि क्या नक्सलवाद आतंकवाद से अलग है?क्या वो एक विचारधारा है?तेंदूपत्ते की तोडाई के लिये ठेकेदारो के विवाद के साथ बस्तर मे आंध्र से कदम रखने वाले नक्सलवाद ने यंहा के हज़ारो करोड़ रूपये के वनोपज के कारोबार पर कब्ज़ा जमा लिया है और अब उनकी नज़र खनिज के कारोबर पर भी है।आदिवासी तो पहले ही लुटा-पिटा है उसे कोई क्या लूटेगा,लूटने के लिये तो बस्तर के जंगल हैं,खनिज है,लोहे के पहाड़ हैं।आदिवासी तो खुद का महुवा आफ़ सीज़न मे कई गुना महंगा खरीदने परमज़बूर है।क्या बतायेगी अरूंधति और क्या बतायेगा विश्वरंजन्।आप ने डाकसाब इस समस्या प्र चर्चा करके दिल जीत लिया।कोई आये ना आये आप आईये,आपको दिखायेंगे बस्तर्।

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  27. गोली नक्सली की बंदूक से निकले या सीआरपीएफ की बंदूक से...मरता आदिवासी ही है...

    दलित खुशकिस्मत हैं कि उन्हें बाबा अंबेडकर, कांशीराम, मायावती मिलते रहे...

    लेकिन आदिवासियों को कौन मिला...

    जय हिंद...

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  28. उदयप्रकाश जी से सहमत हूँ.. कोई संशय नहीं कि ये अब तक की सबसे बेहतरीन चर्चाओं में से एक है, ऐसी बौद्धिक और सार्थक चर्चाओं की नितांत आवश्यकता है लेकिन ये चर्चा सिर्फ चर्चा बनकर ना रहे बल्कि ब्लॉगजगत के बाहर भी इसका असर हो.. कोई परिणाम निकले.. और निकला हुआ निष्कर्ष अवाम की आवाज़ में रूप में सरकार के बंद कानों तक पहुंचे. तब गर्व से कह सकेंगे हम कि हम जागरूक ब्लोगर हैं.
    इस विषय पर शीबा असलम फहमी का आलेख भी पढ़ें या उनके फेसबुक प्रोफाइल पर जाएँ. अनुराग जी शुक्रिया..

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  29. सिर्फ़ शुक्रिया कहना काफ़ी नही होगा आपके द्वारा इतनी विशद और ज्वलंत चर्चा का प्लेटफ़ार्म तैयार करने के लिये. बल्कि इस किस्म के कदम उठाने मे जो निर्भय ईमानदारी और साफ़गोई इस्तेमाल की गयी है उसको रेकग्नाइज करना बेहद जरूरी है. मूल्य-क्षरण के इस दौर मे हमारे लगभग अतार्किक से होते जा रहे समाज के अंधेरे मे एक निष्पक्ष और सामाजिक-विकासोन्मुखी सोच का दिया जलाये रखने के लिये ब्लॉग-जगत से बेहतर जगह भी कोई नही लगती मुझे.
    बड़ा अफ़सोस होता है कि दंतेवाड़ा के भीषण संहार के बाद कुछ समय के भावनात्मक-ज्वार और विधवा-प्रलाप के (ब्लॉग-जगत भी इससे अछूता नही है) २-३ दिन के भीतर ही यह सब विस्मृत हो गया और सारी हाइलाइट बेहद निर्ममता के साथ पुनः सानिया और आइ पी एल पर शिफ़्ट हो गयी. हमारे समाज की यही विडम्बना भी है और तमाम समस्याओं की जड़ भी.
    किसी समस्या की निष्पक्ष छानबीन के लिये दिमाग को पूर्वाग्रहों से मुक्त रखना जरूरी होता है, और यही आज के टी-आर-पी-रेटेड भावनात्मकता के दौर मे समस्या-समाधान मे सबसे बड़ी बाधा भी होती है.
    माओवादी हिंसा निःसंदेह इस वक्त देश की सबसे ज्वलंत समस्या है. नक्सलिज्म को मात्र एक कानून-व्यवस्था की समस्या समझ लेना हमारी पहली भूल है. इसके जड़ मे वे सामाजिक समस्याएं हैं जो हमारे लोकतांत्रिक समाज को अंदर ही अंदर खोखला बनाने मे जुटी हैं. और वर्तमान मे इनमे सबसे बड़ी और भयावह समस्या है आदिवासियों के जबरिया विस्थापन की.
    संविधान की पंचम अनुसूची मे सूचीबद्ध लगभग ७०० जनजातियों मे भारत की लगभग दस करोड़ से कुछ ऊपर की जनता आती है. इस तरह शायद विश्व की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी भारत मे बसती है. समाज के निम्न से भी निम्नतम पायदान की यह जनता हमेशा से अपने पिछड़ेपन के कारण अनवरत्‌ शोषण का शिकार रही है. यह विचारणीय तथ्य है कि माओवादियों को सबसे ज्यादा प्रभाव उन्ही क्षेत्रों/प्रांतों मे है जहाँ आदिवासियों की तादाद ज्यादा है. क्या सभी आदिवासी ही सरकार के खिलाफ़ रातों-रात हिंसक हो गये? उनका गुनाह यह है कि वे उन क्षेत्रों से तअल्लुक रखते हैं जो खनिज/प्राकृतिक/वन-संपदा के प्रचुर भंडार हैं. और उन्हें इसी संपदा के संरक्षक होने की कीमत चुकानी पड़ रही है. कुछ निजी कंपनियों को लाभ पहुँचाने के लिए आदिवासियों को सरकारी शह पे उनकी अपनी जमीन से किस तरह खदेड़ा गया इसकी एक बानगी अभी ताजी सरकारी रिपोर्ट मे ही मिलती है. भूमि-सुधार प्रक्रिया की समीक्षा के लिये गठित प्रधानमंत्री द्वारा गठित राज्य कृषि संबंध एवं अपूर्ण भूमि-सुधार कार्य समिति (committee on state agrarian relations and the unfinished task in land reforms) जिसके अध्यक्ष केंत्रीय ग्रामीण विकास मंत्री स्वयं हैं, ने पिछले वर्ष अपनी जो समीक्षा रिपोर्ट प्रस्तुत की थी उसमे स्वयं सरकारी दावों की धज्जियाँ उड़ती नजर आती हैं. नेट पर यहाँ पर उपलब्ध यह रिपोर्ट आदिवासियों की भूमि-हरण को कोलम्बस के अमेरिकी-अभियान के बाद की इतिहास की सबसे बड़ी घटना बताती है. दंतेवाड़ा के आंशिक सच को जानने वाले पाठकों के लिये रेपोर्ट से एक बानगी पेश है जिसमे बस्तर बीजापुर और दंतेवाड़ा की सिचुअएशन को ’सिविल-वार’ से आँका गया है-

    'A civil war like situation has gripped the southern districts of Bastar, Dantewara and
    Bijapur in Chattishgarh. The contestants are the armed squads of tribal men and women of
    the erstwhile Peoples War Group now known as the Communist Party of India (Maoist) on
    the one side and the armed tribal fighters of the Salva Judum created and encouraged by the
    government and supported with the firepower and organization of the central police forces.
    This open declared war will go down as the biggest land grab ever, if it plays out as per the
    script. The drama being scripted by Tata Steel and Essar Steel who wanted 7 villages or
    thereabouts, each to mine the richest lode of iron ore available in India.'
    (पेज १६०-१६१)

    (आगे जारी)

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  30. इससे आगे पढ़ें-

    ’सलवा-जुड़ुम की मुख्य कमान ’मुरिया’ लोगों के हाथ मे रही, जिनमे से कुछ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माओ) के पूर्व-कार्यकर्ता रह चुके थे. सलवा-जुड़ुम की स्थापना के पीछे वे व्यावसायी, ठेकेदार और खनन करने वाले थे जो इस रणनीति के सफ़ल परिणामों की प्रतीक्षा कर रहे थे. सलवा-जुड़ुम को ’शांति’ की तलाश के नाम पर आर्थिक श्रोत मुहया कराने वाले थे टाटा और एस्सार. सलवा-जुड़ुम द्वारा प्रथम नरसंहार मुरिया गांव के ग्रामीणों का हुआ जिनका अभी भी रुझान कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माओ) की तरफ़ था. यह एक तरह से भाइयों के बीच के खुले युद्ध मे तब्दील होता गया. ’सरकारी’ आँकडों के अनुसार ६४० गाँवों को उजाड़ कर जला दिया गया, और बंदूक की नोक पर तथा ’राज्य’ की खुली शह पर ३५००० आदिवासी (दंतेवाड़ा की आधी जनसंख्या के बराबर) अपनी जमीन से खदेड़ दिये गये, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, उन्की बेटियों की हत्या कर दी गयी और यवकों को अपंग बना दिया गया. जो लोग जंगलों मे भाग नही सके उन्हे रिफ़्यूजी-कैंपों मे ठूँस दिया गया जो सलवा-जुड़ुम के हाथों मे ही थे. बचे हुए लोग अभी भी जंगल मे छुप कर रह रहे हैं या पड़ोंस के महाराष्ट, आंध्र और उड़ीसा के आदिवासीय इलाकों मे पलायन कर गये हैं.
    ये ६४० गाँव खाली है. टनों लौह-अयस्कों के ऊपर बसे ये गाँव अब निर्जन करा दिये जाने के बाद सबसे ऊँची बोली लगाने वाले के लिये उपलब्ध हैं. अद्यतन जानकारी के अनुसार ऎस्सार स्टील और टाटा स्टील दोनो ही इस खाली हो चुकी भूमि को अधिग्रहीत कर अपनी खानें विकसित करने की ओर अग्रसर हैं.’
    (पेज १६१)

    चीजें कितनी जटिल और भयावह हैं, यह सरकारी रिपोर्ट-अंश तो उसकी सिर्फ़ छोटी से बानगी देता है. रिपोर्ट के ही अनुसार पिछले दो दशकों मे तकरीबन ढाई लाख एकड़ जमीन को उद्योगों के लिये और साढ़े सात लाख एकड़ जमीन खनन के लिये हथियायी गयी है. इस तरह एक पूरे समुदाय के जबरिया सामूहिक-विस्थापन मे सारे नियम-कानूनों की जम कर धज्जियाँ उड़ायी गयी हैं. जब हमे यह पता लगता है कि सिर्फ़ मध्य-प्रदेश मे ही विस्थापन के लिये मिलने वाले मुआवजे के ९०% से ऊपर केसेज या तो खारिज कर दिये गये या निलंबित हैं, तो इस नाकामी के भयावह परिणामों का अंदाजा लगने लगता है. रिपोर्ट तत्काल जरूरी कदम और समस्या के उपाय भी सुझाती है (पेज-११३, पेज-१५७) विस्थापन के इसी मुद्दे पर संयुक्त-राष्ट्र की अंतर्राष्ट्रीय गाइडलाइन्स (विकास-आधारित विस्थापन संबंधी मूलभूत नियम एवं दिशा-निर्देश) यहां पर पढ़ी जा सकती हैं. कुछ लाइनें यहां दृष्टव्य हैं-

    States should carry out comprehensive reviews of relevant strategies, policies and
    programmes, with a view to ensuring their compatibility with international human rights norms.
    In this regard, such reviews must strive to remove provisions that contribute to sustaining or
    exacerbating existing inequalities that adversely affect women and marginalized and vulnerable
    groups. Governments must take special measures to ensure that policies and programmes are not
    formulated or implemented in a discriminatory manner, and do not further marginalize those
    living in poverty, whether in urban or rural areas.
    (सेक्शन II.D पैरा २९)

    यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि शिक्षा की रोशनी और सामान्य नागरिकीय सुविधाओं से मीलों दूर घोर-पिछड़ेपन के इन टापुओं पर जंगलों मे रहने वाले आदिवासियों के लिये सरकार का मतलब प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री नही होते. वहाँ पर सरकार के प्रतिनिधि होते हैं थानेदार या पटवारी. और साधनहीन, पहुँचहीन अशिक्षित लोगों के शोषण-तंत्र मे इन सरकारी प्रतिनिधियों की भूमिका क्या रहती होगी, यह समझना किसी भी भारतीय व्यक्ति के लिये अबुझ नही है.

    (आगे जारी..)

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  31. और सबसे दुखद बात है है कि इन मूलभूत समस्याओं की हाई-टी-आर-पी-वैल्यू न होने की वजह से ऐसी चीजें मेन्स्ट्रीम मीडिया से पूरी तरह बाहर और उपेक्षित रहती हैं. और शहरों-कस्बों मे बैठा हमारा पूरा मध्यवर्गीय समाज आदिवासियों के प्रति इस अत्याचार से बेखबर और निश्चिंत रहता है. इसीलिये जब अपने इंटरव्यू मे कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया का प्रवक्ता, जो (विडम्बनापूर्ण ढ़ंग से) खुद को ’आजाद’ कहता है, दावा करता है कि उनके बंदूक का सहारा लिये जाने के फ़लस्वरूप आदिवासियों की समस्या की तरफ़ देश का ध्यान गया है. (पूरा इंटरव्यू यहां पर उपलब्ध है) अगर उसका कथन वास्तविकता मे सच है तो हमें अपने देश के सूचना-तंत्र, मीडिया आदि की भूमिका और उनकी सफ़लता के बारे फिर से सोचना पड़ेगा. सवाल सिर्फ़ यह नही है कि क्या हिंसा ही हमारी समस्याओं का समाधान दे सकती है? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या हिंसा ही हमारा ध्यान मूलभूत मुद्दों की ओर खींच सकती है? हमें इसका जवाब जल्द से जल्द ढूँढना होगा.
    इस तरह यह स्पष्ट होता है कि कैसे आदिवासियों की इन विकट समस्याओं को आधार बना कर माओवादी अपनी पैठ उनमे बना लेते हैं. सरकारी व ’भारतीय-समाज’ के अहर्निश उपेक्षा से निराश आदिवासियों को भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों के चंगुल से मुक्त करा कर यही लोग उनके रहनुमा बन जाते हैं. यह विचारणीय बात है कि क्या हिंसा उन सम्स्याओं का समाधान है? क्या भारतीय सरकार का तख्ता-पलट करना ही इन समस्याओं को सुलझाने का एकमात्र तरीका है? मुझे ऐसा नही लगता ! राज्य के खिलाफ़ युद्ध छेड़ कर हो सकता है इन अतिवादियों ने इन समस्याओं को हाइलाइट कर दिया हो, मगर इसे और ज्यादा उलझा भी दिया. कितने आदिवासी माओवादी विचारधारा से परिचित होंगे या इसके प्रोस-एंड-कांस का निर्धारण कर सकेंगे. माओवादियों ने पिछले दो दशकों मे कितने आदिवासियों को शिक्षित, आत्मनिर्भर बनाने मे योगदान किया, मुझे नही पता. बल्कि अब १६०० करोड़ सालाना का यह आर्थिक एम्पायर जो उन्ही ठेकेदारों से वसूली और एक्स्टार्शन पर बना है, क्रांति के उद्धेश्यों को कितना पवित्र रखेगा, कहना बहुत मुश्किल है. बंदूक के आधार पर कायम शासन बंदूकों द्वारा ही चलाये जाते हैं और उनके लिये सबसे बड़ा खतरा भी बंदूके ही होती हैं. फिर माओत्से तुंग द्वारा आरंभ छठे दशक की चाइनीज सांस्कृतिक-क्रांति के भयावह परिणाम चीन को अभी भी आक्रांत किये हुए हैं, और माओ के निधन के दो साल से भी कम समय मे उन्ही की पार्टी के शासन ने उनकी विचार-धारा से दूरी बना ली और आर्थिक सुधार के पूंजीवादी सूत्र अपना लिये. नेपाल मे सशस्त्र क्रांति की पूर्णाहुति के बाद माओवादियों की एकता का छिन्न-भिन्न हो जाना विचारधारा के दरकने की ताजी कड़ी है. मजे की बात है कि भारत मे कम्यूनिस्ट पार्टी आफ़ इंडिया (माओ) के सबसे बड़े (?) लीडर ’किशन जी’ अपनी आइडियालॉजी को विश्व के बाकी उदाहरणों से अलग मानते हैं (उनका इंटर्व्यू पिछले नवंबर के तहलका साप्ताहिक के अंक मे देखा जा सकता है, जहाँ वो खुद को असली देश-भक्त बताते हैं).
    समस्या का तार्किक और सहज-अवीकार्य समाधान खोजा जाना एक बड़ी चुनौती है. घोर-पिछड़ापन आदिवासी इलाकों की सबसे बड़ी समस्या है. आरक्षण और तमाम सरकारी वादों के बावजूद अनुसूचित जनजातियों मे नौकरी और शिक्षा का प्रतिशत कितना बढ़ा है, यह हम सब जानते हैं. जनजातियों के विकास के लिये आवंटित और खर्च धनराशि की हकीकत तो अनुराग जी की इस चर्चा के आरंभ मे ही स्पष्ट हो जाती है. मुझे लगता है शोषण के इस दलदल से जनजातियों को निकालने के लिये उनकी शिक्षा और सम्यक विकास पर समुचित ध्यान देना बहुत जरूरी है. मगर यह विकास सरकारी या हमारी ही मनमर्जी से नही होना चाहिये. अगर किसी निर्धन की जमीन छीन कर उस पर शापिंग-माल बनवाने का हम उससे वायदा करते हैं, ताकि उसमे वह टामी हिल्फ़िगर की शर्ट्स या लिवाइस के जीन्स खरीद सके, तो इस वायदे का खोखलेपन स्पष्ट हो जाता है. सबसे अहम्‌ है विकास की प्रक्रिया मे स्थानीय जनता को विश्वास मे लेना और उसको सक्रिय भागीदारी देना. भ्रष्टाचार से मुक्त हो कर और निजी कम्पनियों के स्वार्थी हित-चिंतन को अलग कर जब सरकार स्थानीय आदिवासियों के साथ उनके पुनरुत्थान मे सक्रिय भागेदारी करेगी तब शायद यह असंतोष और तंत्र से मोह-भंग की स्थिति समाप्त होगी.

    (आगे जारी..)

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  32. मै समझता हूँ कि हमारी पिछले साठ सालों की अनगिनत विफ़लताओं के बावजूद सबसे बड़ी उपलब्धि एक सशक्त और अच्क्षुण लोकतंत्र की स्थापना रही है. शायद यह शासन की सर्वश्रेष्ट अवधारणा न हो और इसमे तमाम कमियाँ अंतर्निहित भी हैं मगर फिर भी अब तक उपलब्ध समस्त अवधारणाओं मे यही श्रेष्ठ्तम विकल्प है, और भारत जैसे सामाजिक/राजनैतिक/जैविक रूप से जटिलतम देश के लिये सबसे समीचीन भी. इसलिये हम अपनी तमाम समस्याओं का समाधान इसी की हद मे रह कर सफ़लतापूर्वक तलाश सकते हैं. सामूहिक विस्थापन और उससे जनित विस्फ़ोटक असंतोष की समस्या हमारे लोकतंत्र की बड़ी चुनौतियों मे से एक है, और हमारे लिये सिस्टम को दुरस्त करने की एक चेतावनी भी. भारतीय संविधान ही इस समस्या से निपटने के प्रभावी संवैधानिक हथियार देता है. शायद आज ही प्रधानमंत्री ने किसी बयान मे माओवादियों से निपटने मे ग्राम-सभाओं की भूमिका पर बल दिया था. यदि इसी को सही और सकारात्मक संदर्भों मे लें तो यह माओवादी समस्या से निपटने मे सबसे प्रभावी हथियार साबित हो सकता है. हमारे संविधान का पीसा एक्ट (प्रोविजन ओफ़ पंचायत-एक्स्टेंशन टु शेड्यूल्ड एरियाज, १९९६) आदिवासी क्षेत्रों मे एक बेहद सशक्त भूमिका निभा सकता है. यह अधिनियम किसी भी क्षेत्र के विकास के लिये, उसके लिये धन आवंटित करने के लिये या क्षेत्र की प्राकृतिक आदि संपदा के समुचित प्रयोग के लिये वहाँ की ग्राम-सभा को सबसे महत्वपूर्ण घटक का दर्जा देता है. इस तरह यह नियम उस क्षेत्र के आदिवासियों को, जो कि ग्रामसभा का हिस्सा होते हैं को अपने स्वयं के विकास का औजार दे देता है. इसके अतिरिक्त फ़ारेस्ट राइट्स एक्ट २००६ आदिवासियों को उनकी भूमि पर मालिकाना हक देता है. इसके अलावा उपरोक्त रिपोर्ट भी विवादित लैंड एक्वीसिशन एक्ट और स्पेशल इकानॉमिक ज़ोन एक्ट के तुरंत संशोधन की जरूरत पर जोर देती है.
    हम अपनी प्रवृत्ति के मुताबिक आज इन समस्याओं की उपेक्षा कर सकते हैं, या इन समस्याओं को ला-एंड-आर्डर की समस्या मान कर उनके सिर्फ़ सशस्त्र समाधान के बारे मे बात कर सकते हैं. मगर जैसा कि ऊपर स्पष्ट होता है कि देश के बदन के जिस घाव का तुरंत इलाज हमें करना है, माओवादी हिंसा सिर्फ़ उससे रिसता हुआ मवाद है, मवाद को पोछ देने से घाव खत्म नही होगा वरन वक्त के साथ और बड़ा नासूर बनता जायेगा जो अंततः अंगच्छेद के विकट परिणाम के रूप मे सामने आता है. अगर हम भारतीय गणतंत्र को अगले ५० सालों के लिये इन्डिस्ट्रक्टिबल बनाना चाहते हैं तो समाजगत समस्याओं का प्रभावी समाधान खोजना ही पड़ेगा. अपनी पुस्तक ’डेमोक्रेसी-एन एनालिटिकल सर्वे’ मे जेन बेश्लर इस सामाजिक विषमता की ओर इशारा करते हैं-
    ’निःसंदेह लोकतंत्र के लिये सबसे गंभीर और घातक बाधक-तत्व है- सामाजिक परतीकरण (समाज मे अलग-अलग लेयर्स का बन जाना), जो अनगिनत अन्य बाधक-तत्वों का जनक भी है...किसी समय पर जिन लोगों के पास ज्यादा संपत्ति, प्रतिष्ठा और शक्ति है, बड़ी सम्भावना है कि वे इसे संपत्तिहीनों, प्रतिष्ठाहीनो व शक्तिहीनों से बचा कर रखना चाहेंगे. बल्कि वे लोग अपनी शक्ति और सत्ता का प्रयोग दूसरों को सत्ता, धन संपत्ति से परे रखने के लिये करेंगे और इस तरह अपने आसपास भ्रष्ट लोगों का तंत्र तैयार कर लेंगे. शक्ति और संपदा का अपनी ही पीढ़ियों को यह अनुचित स्थानांतरण समाज का स्थाई रूप से भेदभावपूर्ण वर्गीकरण करता है. इस तरीके से मेधा, सामाजिक-योगदान और प्राकृतिक एवं व्यक्तिगत योग्यताओं को अहमियत मिलनी कम होती जाती है और लोकतांत्रिक न्याय के विरुद्ध एक भ्रष्ट सत्ता का निर्माण होता जाता है....लोकतंत्र का सबसे मूलभूत भाव या नियम है: सारे नागरिकों के अधिकार समान हैं’ (अध्याय-९:करप्शन्स ओफ़ डेमोक्रेसी)

    (आगे जारी..)

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  33. बातें कितनी तार्किक परिणित ले पायेंगी कहना मुश्किल है. हम भारतीय लोग एक प्रचुर विरोधाभासों के समाज की रचना करते हैं. हमीं लोग किसी चाय के ढाबे पर किसी अखबार के बाल-श्रम के लेख पर चर्चा करते हुए कहते हैं कि ’यार बच्चों से काम लेने वालों को तो फ़ाँसी पर लटका देना चाहिये’, और अगले ही पल छोटू को चाय लाने मे देरी करने पर धर भभकते हैं (आज पढ़े एक एस एम एस से साभार).
    कहने को बहुत कुछ है मगर समय की अपनी सीमाएं हैं. अंत मे यह जरूर कहूँगा कि अरुंधति राय की कुछ प्रपत्तियों/निष्कर्षों से मै सहमत नही हो पाता हूँ. स्टेट-अप्रेशन के खिलाफ़ आवाज उठाते हुए वे परोक्ष रूप से राष्ट्र के बाल्कनाइजेशन की ओर भी इशारा करती प्रतीत होती हैं, अर्थात छोटे-छोटे टुकड़ो को अलग-अलग स्वतंत्र करना; जो मुझे लगता है कि किसी भी समस्या को पूर्णस्थाई बना दिये जाने जैसा है, भारत-पाक या उत्तर व द्क्षिण कोरिया की समस्याओं की तरह, हो सकता है कि मै उनके इंटरप्रेटेशन मे गलत होऊँ. मगर असहमत होते हुए भी मैं उनके बोलने के अधिकार का पुरजोर समर्थन करता हूँ. क्योंकि अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता और किसी भी विरोधी पक्ष को धैर्य और गंभीरता से सुन पाने की क्षमता ही लोकतंत्र की प्राणवायु है.
    खैर इस विशद चर्चा मे कई अच्छे लिंक्स मिले जो अगले २-३ दिन तक स्वयं को व्यस्त रखने के लिये काफ़ी होंगे, खासकर अभय तिवारी जी के लेख. हाँ, नक्सलवादी समस्या पर तहलका साप्ताहिक ने शोमा चौधरी व अन्य पत्रकारों के विचारयोग्य लेखों की श्रंखला चलाई थी, जिसे देखने का आग्रह मैं अवश्य करूँगा.

    पुनश्च: इतने ज्वलंत विषयाधारित और मेहनत से बनायी गयी चर्चा मे कुछ सामान्य सी वर्तनीगत कमियाँ भी खटकती हैं.

    (समाप्त)

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  35. बहुत विचारपूर्ण व गहन चर्चा। अत्यन्त श्रमपूर्वक व निष्ठा से लिखी गई।

    यह यद्यपि देश का दुर्भाग्य है कि सरकारों और तन्त्र की विफलताओं व स्वार्थ ने देश में ऐसी स्थितियाँ खड़ी कर दी हैं कि अब बाहर से नहीं किन्तु देशवासी ही अपनी सुरक्षा सेनाओं के हत्यारे हो गए हैं। यह लगभग गृहयुद्ध जैसी स्थिति है किन्तु ठीक ठीक वैसी देश के बँटने जैसी नहीं अपितु देशवासियों में स्वार्थ की वृत्ति का भयावह रूप है यह; जो प्रतिपादित करता है कि मूलत: देश में किसी को देश की चिन्ता है ही नहीं। इन सब चीजों के लिए जितनी बाह्य शक्तियाँ उत्तरदायी हैं या सरकार उत्तरदायी है, उस से एक भी अंश कम देश का सामान्य नागरिक नहीं, जिसे स्वार्थ, आत्मलिप्सा, ईर्ष्या, कुंठा, लोभ, झूठ, निष्क्रियता, हर प्रकार के हथकण्डे अपना कर आत्मुग्धता को पोसने आदि आदि आदि आदि से ही विराम नहीं , विश्राम नहीं।

    ये सब हाहाकार और स्थितियाँ तो देश के स्वार्थ और झूठ, कमीनगी, और बेशर्मी के वृक्ष पर आए फल हैं, जो दीख रहे हैं। अंकुर तो कहाँ छिपा है, उसे देखने की जहमत कोई नहीं उठाता।

    पतित हो चुकी कौमों का भयावह हश्र संसार ऐसे ही देखता है। हम उसी ओर बढ़ रहे हैं.... फिर भी अपने थोथे गुणानुवाद करते नहीं अघाते.... धिक्कार है हमें.... और हमारे पतन के सारे कारनामों पर...।

    बौद्धिक इन पर विमर्श की रोटियाँ सेंक लेंगे.. क्योंकि उनके लिए यह भी अपनी बौद्धिकता के प्रदर्शन और अपनी प्रतिबद्धता के प्रदर्शन का अवसर ही जैसा है; परन्तु जिस आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता भारतीय चरित्र में है, वह कहाँ से लाइयेगा ? कहाँ से तैयार किजिएगा राष्ट्रप्रेमी सन्ततियाँ, चरित्रवान नई पीढ़ियाँ ? पातकों के अंडों से ... ?

    ये तथाकथित छद्मबुद्धिजीवी ... विमर्श की थोथी पोथी लिखने वाले.... गोली मार देनी चाहिए चुन चुन कर सबको; जिन्होंने देश में ऐसी आग के अंकुर बोए थे।

    क्षमा करें मुझे, मेरी तल्खी के लिए। इस विषय पर इस से भी कड़वा होने की छटपटाहट है।
    मैं इसीलिए ऐसे विषयों पर विषघूँट पीकर मौन रहना बेहतर समझती हूँ।

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  36. अपूर्व द्वारा दिया गया अपडेट सचमुच तिलमिला देने वाला है..
    मैं उनके श्रम और अन्वेषण का मुरीद हुआ, हैट्स ऑफ़ टू यू !
    हिन्दी ब्लॉगिंग में यदि सामाजिक प्रतिबद्धता के प्रति ईमानदार केवल दस प्रतिशत योगदानकर्ता भी हों, तो यहाँ टिके रहने की एक आस दिखती है.. अपनी लाचारगियों का रोना लेकर ’उर्वारुकमे्व बन्धनात’ टाइप ब्लॉगिंग करने वालों ब्लॉगर का इस विषय पर मौन रख लेना ही उचित है । यह आत्मश्लाघाओं की चर्चा नहीं, अपितु आत्मप्रवँचनाओं की चर्चा है, उन स्याह चेहरों की चर्चा है, जो हमारी आँखों से ओझल रह कर अपनी चालाकियाँ बौद्धिक जगत पर थोपते रहें हैं ।

    प्रस्तुत पोस्ट याकि चर्चा के मॉडरेटर से अनुयय है कि, वह अँतरिम उपसँहार की अपनी औपचारिक टिप्पणी तक इस पोस्ट को अपनी जगह पर बनी रहने दें ।
    डा. अनुराग.. तुमने नँगे सच को उखेलने वाली एक स्वस्थ पहल की है, लगता है कि मेरे भेजे हुये ’दँश’ ने तुम्हें उ्द्वेलित किया है । कुछ और सी.डी. भेजूँ क्या ? हमारे इर्द-गिर्द ऎसे सच दफ़न हैं कि, उनसे आँखें मोड़ कर खाने का एक निवाला निगलने तक में ग्लानि होती है । इस चर्चा में विषघूँट के पारिश्रमिक पर रुदालियों के होने का कोई मतलब भी है ?
    अब तक के सभी टिप्पणीकर्ताओं को मेरा सशर्त अभिवादन... क्योंकि यह सुगबुगाहट जारी रहनी चाहिये !

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  37. तो आ ही टपका ऍप्रूवल ?
    यानि मुखर आवाज़ों पर धारा 144 ?
    सही है,सही है,सही है ’मृत्योमुक्षीय मामृतात’ !
    वह अपने करमों का फल भोग रहें हैं, मुझे मेरा मोक्ष दे दो.. हुँह !

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  38. Bhasha apne tewaron se apni baat ki sachayi ko abhivyakt kar payi hai. aapke prayasoon ko mera naman

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  39. भारत में उग्रवाद अमूमन इक पैटर्न पर चलता है.शुरू में हिंसा का ग्राफ चढ़ता है.लेकिन इक सीमा के बाद उग्रवादियो को समझ आने लहता हैकि सरकार से लडाई आसान नहीं है और उसे इक दिन की लडाई में हराया नहीं जा सकता.माओवादी भी कोई अपवाद साबित नहीं होने चाहिए.लेकिन वो लोग हथियार तभी डालेंगे जब उन्हें लड़ाई की निरथर्कता समझाई जायेगी और स्थाई शांति तभी हासिल हो सकेगी जब आप ताकतवर स्थिति में होने के बाद समझोते का हाथ बढाये.
    शांति समझोतों के मौको पर सरकार ने हमेशा उदारता का ही परिचय दिया है.असम,मिज़ोरम और नागालैंड में शांति समझोतों के बाद पूर्व विद्रोही सत्ता तक में आये.पंजाब में इक अधिक जटिल राजनितिक प्रक्रिया के मार्फ़त भी अकालियो के साथ कमोबेश यही हुआ.दूसरी बात यह की युद्ध की रणनीतिओ के बारें में मीडिया में बात नहीं की जानी चाहिए.स्थापित सिद्धात यही है की कानून व्यवस्था में किसी चनौती का सामना करने के लिए सरकार को न्यूनतम ताकत का इस्तेमाल करना चाहिए.यह ' न्यूनतम ' ताकत क्या है,इसका फैंसला नेताओ पर छोड़ देना चाहिए.६० के दशक में नेहरू की न्यूनतम ताकत की परिभाषा में वायुसेना भी शुमार थी.इंदिरा गाँधी ने मिज़ो उग्रवादियो पर हवाई जहाजों से बम्ब बरसवाए.ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत टैंको का इस्तेमाल किया गया.जबकि नेहरू ने तो गोवा मुक्ति आन्दोलन के लिए जल और वायुसेना को भी तैनात कर दिया.इसलिए 'न्यूनतम' क्या है,ये तय करने के अपने विकल्प खुले रखे और 'हौंसलें' का इस्तेमाल करते हुए लम्बी लडाई के लिए तैयार हो जाये..

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  40. This one is the best...

    http://www.tehelka.com/channels/Naxal/page.asp

    especially the second post i.e. Shoma Chaudhary's Article.

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  41. संक्रमित समाज की पहचान यही है ...."सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट" को रुल को अपने मुताबिक मोडिफाय करना .... वर्ग विभाजित समाज में एक शक्तिशाली वर्ग का अपने जीने के लिए बेहतर अवसरों को बनाने के लिए सभी संसाधनों का अंधाधुंध दोहन ......कहते है आपके आधिकार वहां ख़तम हो जाते है जहाँ से दूसरे की सीमा शुरू हो जाती है ..ईश्वर ने मानव को श्रेष्ट जीव के रूप में इसलिए भेजा क्यूंकि उसमे दया .....ओर दूसरे मानव के हितो की रक्षा करने की प्रबल भावना थी .... .मानवो के समूह ने एक व्यवस्था बनायीं ...जिसे समाज का नाम दिया ....इस समाज के कई नियम थे ...
    मुझे संसाधनों के उपयोग से आपत्ति नहीं है ...क्यूंकि ये बढती जनसँख्या के कारण होने वाली आवश्यक मांग है ...मुझे आपत्ति संसाधनों के उपयोग में समुचित हिस्स्सेदारी की है ..जिसका निर्णय भी शक्तिशाली वर्ग का है .एक ऐसा समाज जो अपनी आस्था ओर अज्ञानता के चलते जो समाज समय के साथ मुख्यधारा में सम्मिलित नहीं हुआ है ...जिसमे इन संसाधनों का उपयोग करने की समझ नहीं है . ... .जिस तत्परता से हम इन संसाधनों का उपयोग करने को आतुर दीखते है ...वही तत्परता हम उस वैकल्पिक व्यवस्था के निर्माण में क्यों नहीं दिखाते? आखिर .उसकी मूलभूत आवश्यक ताओ को पूरा करने की जिम्मेवारी भी हमारी है ....हम एक समाज को ओर "आइसोलेटेड ज़ोन" में धकेल देते है .... क्या उस समाज में विद्रोह ओर असंतोष अस्वाभविक है... इस सत्य को हमें स्वीकारना होगा.....कब तक हम सत्य को स्वीकारे बगैर "डिनायल मूड" में रहेगे ?.विकास का ढांचा यदि कई समान्तर प्रक्रियायो के साथ नहीं चलेगा तो वो वर्ग विभाजित समाज को ओर कई भागो में विभाजित करेगा ओर ऐसे संघर्ष की ओर धकेल देगा .....जिससे इस समाज के फेब्रिक के सारे धागे टूट कर बिखर जायेगे .....इस मुद्दे को पढ़ते को पढ़ते हुए आप कई विरोधाभासो से गुजरते है ......ऐसे विरोधाभास आपकी चेतना पर प्रहार करते है ....आप कई जगह पुरजोर असहमत होते है ...फिर ठन्डे दिमाग से सोचकर आप की राय बदली नजर आती है ....पर सवाल यही है क्या हमें उस समाज को अब अपनी मन मर्जी के मुताबिक व्यवस्था को तय करने की छूट देनी होगी जो दिशा हीन है ..हिंसक है ....जवाब पूरे देश को ढूंढना है .बड़ी जिम्मेवारी उन लोगो की है जिनके हाथ में व्यवस्था है ...ऐसा नहीं है के सारे नौकरशाह असंवेदनशील है...प्लानिंग कमीशन को राय देने वाले एक्सपर्ट की रिपोर्ट इस सोच को नकारती है ....पर केवल संवेदन शीलता से ही काम नहीं चलता है ...जब तक वो संवेदनशीलता वास्तविक रूप में हमारी कार्य प्रणाली में नहीं दिखती है ..अपना अर्थ खो देती है ....आखिर में एक प्रशन से जूझ रहा हूँ ...
    इतने बड़े देश में कोई भी मुद्दा राष्ट्रीय मुद्दा कब बनता है ....सूचना से ...सूचना को तथ्यों के साथ सिलेवार तरीके से लगा कर सार्वजनिक करने की जिम्मेवारी किसकी है ..?क्यों ऐसा है के देश के एक हिस्से में हुई कोई घटना दूसरे हिस्से का सरोकार नहीं बनती ?क्या हमारी संवेदनाये भी रिमोट पर निर्भर हो गयी है ?

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  42. @अपूर्व @सागर ने इस जटिल विषय को ओर अधिक बेहतर तरीके से समझने के लिए ओर इसके कई बिन्दुओ को छूने के लिए विभिन्न तथ्यों को इकठ्ठा करके इसे एक बड़ा आयाम दिया है .....
    @सागर जिस लेख को पढवाना चाह रहे है .उसे पढने के लिए यहाँ क्लिक करे




    ....

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  43. आज जाकर इसे पूरा बांचा! बेहतरीन चर्चा है। माओवादी-नक्सलवादी समस्या पर जनता के द्वारा लाये श्वेतपत्र की तरह। टिप्पणियां भी शानदार हैं।

    बहुत-बहुत बधाई इतने विस्तार में चर्चा करने के लिये।

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  44. अपूर्व ने एक लिंक भेजा है .उसे यहाँ चस्पा कर रहा हूँ.....


    ताकि सनद रहे....

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  45. कुछ छोटे-छोटे लेख पुनर्नवा पर भी उपलब्ध हैं मसलन यह

    http://masscommdept.blogspot.com/2010/04/blog-post_8324.html

    यह

    http://masscommdept.blogspot.com/2010/04/blog-post_8650.html

    और यह

    http://masscommdept.blogspot.com/2010/04/blog-post_105.html

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  46. बहुत अच्छा संकलन आपने किया है .. तारीफ के काबिल

    मेने भी इस विषय में लिखा था - http://meriawaaj-ramtyagi.blogspot.com/2010/04/blog-post.html

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  47. एक बेहद गंभीर विषय जिस पर यह विस्तृत चर्चा हुई.टिप्पणियां भी पढ़ीं .लिंक अब पढूंगी.
    यह एक ऐसा विषय है जिसके बारे में हम बाहर रहने वाले ही नहीं भारत में रहने वाले ,जो इन प्रभावित इलाकों से दूर हैं , इतना नहीं जानते होंगे,जितना आज मुझे इस Post से जानने को मिला .हमें तो जितना मीडिया दिखाती है बताती है उतना जानते हैं .
    नक्सलवाद आतंकवाद का पर्याय ही बन चुका है आज यह कहना अतिश्योक्ति न होगा.
    एक आम नागरिक के पास कौन सा विकल्प बचा है ..सरकारी या कॉर्पोरेट ग्रुप में भी तो वही खतरे हैं जो माओवादी ग्रुप के साथ होने में.
    अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई तो कुदरत भी लडती है और अगर देश को अपना एक रूप बनाये रखना है तो सरकार को बहुत ही सख्त क़दम उठाने होंगे .[श्रीलंका ने लिट्टे समूह का सफाया किया.. कैसे?विवादित है ....लेकिन???]
    देश को किश्तों किश्तों में दीमक की तरह खा रहे इस नकसलवाद को कैसे भी खतम करना ही चाहिये अन्यथा वेंटिलेटर पर भी कितने रोज़ सांस ले सकेगा ये देश?
    चिटठा चर्चा पर एक महत्वपूर्ण सामाजिक विषय पर जागृत करता हुआ अब तक का सर्वश्रेष्ठ और सार्थक लेख.

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  48. Mao ( माओ ) - चीन की साम्यवादी क्रांति का नेता था , जिसने रास्ट्रवादी पाटीँ को हटा दीया था. भारतमें माओवाद बढने का मतलब चीन की भारत को नुकशान करने की चाल ही है.

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  49. डा साहब्…इतनी चर्चा हुई और हमें पता भी नहीं चला…उदय जी ने इस मुद्दे पर सही राय रखी है। सरकार और आतंकवादी भटकाव के शिक़ार नक्सलवादी ग्रुप ने अब आपके सामने कोई विकल्प नहीं छोड़ा…कोई किसके साथ खड़ा हो? नक्सलवाद से निकले ऐसे भी ग्रुप हैं जो हिंसा का रास्ता नहीं मानते और जनता के बीच से नये विकल्प खड़े करने का प्रयास कर रहे हैं…पर उनकी बात सुनता कौन है? आज आप अगर आदिवासियों के हालात और विस्थापन तथा संसाधनों की लूट पर सवाल खड़े करें तो आपको सीधे माओवादी घोषित कर दिया जाता है। जिसे सिविल सोसाईटी कहा जाता है वह लगभग एब्सेन्ट है या है तो उसे छ्द्म बुद्धिजीवी कहके टाल दिया जाता है…यह लोकतंत्र के नाम पर एक ख़ास तर्ह का फ़ासीवाद लाद जा रहा है…

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  50. बेहतरीन चर्चा...बहुत सारी जानकारी मिली....लेकिन मेरा सवाल बरक़रार है....हम पढ़े लिखे लोग सिर्फ चर्चाओं तक सीमित रह जाते हैं...सशक्त कदम उठाना किसकी जिम्मेदारी है? उन लोगों को कौन समझायेगा जो शराब और माँस के लिए झंडा उठाकर भीड़ में "इन्क़लाब जिंदाबाद" के नारे लगाने लग जाते हैं?

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  51. अनुराग जी, कल जब अपने इसे शेयर किया तो लगा कि कोई नयी चर्चा है (ब्लोगिंग की दुनिया में अभी बहुत नया हूँ) , पर जब पोस्ट और कमेन्ट देखे तो पता चला चर्चा पुरानी ज़रूर है पर आज के वक्त में उतनी ही सटीक है | कल रात इसे पढ़ते पढ़ते ही सो गया और सुबह उठ के लैपटॉप बंद किया |

    इतना कुछ दिमाग में घूम रहा है , कुछ कहना तो चाहता हूँ, पर "एक्जेक्ट" क्या सोच रहा हूँ बता नहीं सकता |

    ऊपर ही किसी एक लाइन में पढ़ा कि "ये समस्या उतनी ही पुरानी है जितनी हमारी आज़ादी" | दरसल मुझे ये लगता है कि ये समस्या उससे भी कहीं ज्यादा पुरानी है | ये वही सैद्धांतिक लड़ाई है जो गांधी जी और शहीद भगत सिंह में रही होगी , वही लड़ाई जो नरम-दल और गरम-दल में रही होगी | शायद इसके बीज तब पड़े हों, जब बहस इस बात पे भी थी कि "पूर्ण-स्वराज्य" या "डोमिनियन स्टेट" |

    मैं अक्सर अपनी दादी से पूंछता था कि १५ अगस्त १९४७ को क्या हुआ था? आपको कैसा लगा था ? कुछ अलग हुआ था क्या? और वो कोई जवाब नहीं दे पाती थी | उन्हें कुछ अलग होता महसूस ही नहीं हुआ था | मुझे लगता है ये समस्या तब ही घर कर गयी थी लोगो में | आज़ादी का सही मतलब क्या था और एक आज़ाद मुल्क कैसे चलाना है, दोनों ही बातें, शायद, हमारे हुकुमरानों और देश के नागरिकों दोनों को ही नहीं पता थी | वो ऐसी क्या ज़रूरत थी जो तब के लोगो को "डोमिनियन स्टेट" में ही खुश हो जाने पर मजबूर कर रही थी | अगर मकसद केवल ये था कि सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ले ली जाये तो ही इसे सही समझा जा सकता है अन्यथा एक देश, जो सैकड़ों सालों से दासता में जकड़ा हुआ था, उसके लिए "डोमिनियन स्टेट" कोई समाधान नहीं हों सकता था | खैर, वक़्त बदला, हमें "अहिंसा" के मार्ग पे चलकर "आज़ादी" भी मिल गयी | सब लोग खुश हो गए | पर आने वाली विकट समस्याओं को हम नहीं देख पाए | (क्रमशः)

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  52. अनुराग जी, कल जब अपने इसे शेयर किया तो लगा कि कोई नयी चर्चा है (ब्लोगिंग की दुनिया में अभी बहुत नया हूँ) , पर जब पोस्ट और कमेन्ट देखे तो पता चला चर्चा पुरानी ज़रूर है पर आज के वक्त में उतनी ही सटीक है | कल रात इसे पढ़ते पढ़ते ही सो गया और सुबह उठ के लैपटॉप बंद किया |

    इतना कुछ दिमाग में घूम रहा है , कुछ कहना तो चाहता हूँ, पर "एक्जेक्ट" क्या सोच रहा हूँ बता नहीं सकता |

    ऊपर ही किसी एक लाइन में पढ़ा कि "ये समस्या उतनी ही पुरानी है जितनी हमारी आज़ादी" | दरसल मुझे ये लगता है कि ये समस्या उससे भी कहीं ज्यादा पुरानी है | ये वही सैद्धांतिक लड़ाई है जो गांधी जी और शहीद भगत सिंह में रही होगी , वही लड़ाई जो नरम-दल और गरम-दल में रही होगी | शायद इसके बीज तब पड़े हों, जब बहस इस बात पे भी थी कि "पूर्ण-स्वराज्य" या "डोमिनियन स्टेट" |

    मैं अक्सर अपनी दादी से पूंछता था कि १५ अगस्त १९४७ को क्या हुआ था? आपको कैसा लगा था ? कुछ अलग हुआ था क्या? और वो कोई जवाब नहीं दे पाती थी | उन्हें कुछ अलग होता महसूस ही नहीं हुआ था | मुझे लगता है ये समस्या तब ही घर कर गयी थी लोगो में | आज़ादी का सही मतलब क्या था और एक आज़ाद मुल्क कैसे चलाना है, दोनों ही बातें, शायद, हमारे हुकुमरानों और देश के नागरिकों दोनों को ही नहीं पता थी | वो ऐसी क्या ज़रूरत थी जो तब के लोगो को "डोमिनियन स्टेट" में ही खुश हो जाने पर मजबूर कर रही थी | अगर मकसद केवल ये था कि सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ले ली जाये तो ही इसे सही समझा जा सकता है अन्यथा एक देश, जो सैकड़ों सालों से दासता में जकड़ा हुआ था, उसके लिए "डोमिनियन स्टेट" कोई समाधान नहीं हों सकता था | खैर, वक़्त बदला, हमें "अहिंसा" के मार्ग पे चलकर "आज़ादी" भी मिल गयी | सब लोग खुश हो गए | पर आने वाली विकट समस्याओं को हम नहीं देख पाए | ..continued

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  53. आज़ादी का बिगुल बंटवारे के दुःख से साथ बजा| लाखों लोग, दोनों-तरफ , बेघर हो गए , मारे गए | खालिस लहू की स्याही से बंटवारे की रेखा खींची गयी | आम हिन्दुस्तानी के लिए ये बहुत बड़ी चोट थी | शरणार्थियों ने जो दिन काटे वो अभी मैंने कुछ दिन पहले मार्गरेट ब्रूक-व्हाइट के तत्कालीन चित्रों में देखे थे | पर देश को,शायद, लगा की आज़ादी की कीमत है ये | पर दरसल ये आज़ादी की कीमत नहीं , महज कुछ लोगो कि सत्ता लोलुपता साबित हुई | आज़ादी के बाद कुछ ना बदला सिवाय हुकुमरानों के चेहरे के | और जैसा "लेजेंड ऑफ भगत सिंह" में भगत को कहते सुना है कि "गोरे साहब जायेंगे तो भूरे साहब आ जायेंगे" | कुछ वैसा ही हुआ | "हस्ताक्षर" करके हमने देश आज़ाद कराने का बिगुल बजा दिया | पर क्या कुछ ऐसा बदलाव हुआ जो आम जनता के जीवन को बदलता | नहीं हुआ |

    थोड़ा और पीछे चलते हैं | "कामरेड" शब्द भी अक्सर सुना जाता है | कुछ दिनों पहले एक फिल्म आयी थी "खेलें हम जी जान से" | चटगांव क्रांति के बारे में उसके बाद और जानने कि इच्छा हुई, जितना जाना उसे यही लगा की कांग्रेस में मतभेद बड़े गहरे थे, उससे भी ज्यादा जितने हमें आम-तौर पे दिखते हैं | मतभेद केवल नेता जी सुभाष चंद्र बोस, महत्मा गांधी, लौह पुरुष पटेल या पहले प्रधानमंत्री नेहरु में नहीं थे | बल्कि हर स्तर पर थे | तभी चटगांव का एक कांग्रेस कार्यकर्ता "सूरज सेन" बन्दूक उठाने पर मजबूर हुआ | "कामरेड" शब्द वहाँ भी सुनाई दिया था | अगर और अंदर जाएँ तो ऐसे और भी उदहारण निश्चित ही मिलेंगे |

    इतिहास शायद केवल दुःख मनाने के लिए नहीं होता , उससे बहुत कुछ सीखना पड़ता है | पर शायद ऐसा हों नहीं पाया | हम वही गलतियाँ बार बार करते चले गए | "Indians and Dogs are not allowed" के पोस्टर कई जगह "आज़ादी" के दीवानों को उकसाते दिखाई दिए हैं, ज्यादातर फिल्मों में | किताबों में भी कहीं कहीं इनके बारे में मिलता रहता है | एक छटपटाहट सी होती होगी ये देख के लोगों में | पर क्या आज़ादी के बाद वो चली गयी ? नहीं गयी | आज भी "क्लास" के नाम पर हम उतने ही बनते हैं | कितने ही क्लब्स हैं जहाँ हर "हिन्दुस्तानी" नहीं जा सकता, और वहाँ जाने की योग्यता अक्सर काबिलियत या मेहनत नहीं होती | क्या कहीं ना कहीं ये बात फिर से उसी छटपटाहट को नहीं बढाती ? "divide and rule" को हम कैसे भूल सकते थे , आखिर हमारी सत्ता उन्ही से तो मिली थी, पहले हमने धर्म के नाम पर ज़मीन बाँट ली, फिर "भाषा" के नाम पर राज्य | और जब कुछ नहीं बचा तो "सत्ता के विकेन्द्रीकरण" के नाम पे और छोटे छोटे राज्य | कभी आरक्षण आ गया | सबने हमें बांटा | हम बंट के खुश होते रहे | continued..

    उत्तर देंहटाएं
  54. पर इस तरह बार बार बंटने से आम हिन्दुस्तानी खोखला होता चला गया | विकास के लिए आये पैसे चंद लोग डकार गए | विदेशों से सहायता के नाम पे जो पैसा आया वो वापस विदेशों की बैंक्स में महफूज़ भिजवा दिया गया | आम आदमी उसी कूड़े में रहा जो अंग्रेजों के वक्त था | क्या इतना काफी नहीं था लोगो में कुंठा भर देने के लिए ? रही सही कसर तब पूरी होने लगी जब लोगो से उनके घर, पीने का पानी , खेत, नदी, तालाब , झरने, पेड़ , पहाड भी छीने जाने लगे | आज़ादी बेमानी नहीं हों गयी | और फिर जिसने देश के लिए सोचा वो या तो इन "चंद" मौकापरस्तों की गोली का निशाना बना नहीं तो भूखा मर गया | पैसों की खनक ने जब हुकुमरानों को बहरा बना दिया तो आम इंसान सड़क पे आ गया , विरोध करने लगा | अब उसपे लाठियां चली, गोलियाँ बरसी | कुछ कुछ वैसा, जैसा जालियां वाला बाग में हुआ होगा | कब तक इंसान खामोश रहता | हथियार उठ गए |

    लाचारों ने जब लाठी उठाई तो उन्हें बन्दूक थमा के भी लोगो ने अपना उल्लू सीधा करना शुरू कर दिया | नतीजा हम सबके सामने आ गया है | ये वही लाचार हैं जिन्हें "भ्रष्टतम" हुकुमरानों ने बागी बनने पे सबसे पहले मजबूर किया फिर उनको हथियार पहुचने में भी बिचौलिए बन पैसे उड़ाए | वाकई में पुलिस का कोई जवां मरे या कोई माओवादी, मरना एक हिन्दुस्तानी को है | वो सन ४७ के पहले भी मरा, ४७ में भी मरा और आज भी मरता ही जा रहा है |

    अंग्रेजों ने कुछ उपधिया बाँट एक नए "काले अंग्रेजों" का निर्माण किया था | ये वो लोग थे जो लोगो को गुलामी के फायदे गिनाते थे | ब्रिटिश सरकार इनकी रक्षा करती, मोटी रकम चुकाती | आज़ादी के बाद इन्होने फट पाला बदल लिया | ये सरकार के साथ हो लिए | और इनकी देखा देखी और ना जाने कितने इन्ही की तरह हो गए | ये वही लोग हैं जो इंसान को उसकी काबीलियत से ज्यादा उसके रुतबे, शान-ओ-शौकत से तौलते थे | धीरे-धीरे इनकी संख्या भी बढ़ती गयी | इसने गरीब और अमीर की खाई को और बढ़ाया | continued...

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  55. कुल मिलाके मुझे तो यही लगता है कि हम खुद ही इस सबके जिम्मेदार हैं, हम ना तो खुद अच्छे लीडर बन पाए और ना ही ढूंढ पाए | कभी "बोली" के नाम पर , कभी भाषा के नाम पर हमने खुद को बांटा | और ये हमारे ही पापों का घड़ा है जो अब फूट रहा है | हम खुद जिम्मेदार हैं और खुद ही जिम्मेदारी नहीं ले रहे हैं |

    मैंने एक बार अरुंधती राय की "The Algebra of Infinite Justice" पढ़ने की कोशिश की थी | पूरी नहीं पढ़ पाया , पर जितने भी दूर तक पढ़ा, यही लगा कि एक आवाज़ है जो सिस्टम के खिलाफ तो है पर ये नहीं बताती की सिस्टम सही कैसे करना है ? और अगर आवाज़ की अलग बात केवल ये है कि वो सिस्टम के खिलाफ है तो ऐसे बहुत हैं | केवल यही क्यूँ? जब इंसान एक दायरे से ऊपर उठ जाता है तो उसे समस्या की आवाज़ भर नहीं , उनका समाधान बनना चाहिए | रोग के साथ जीते रहने से शरीर गल जाता है | रोग का समाधान ज़रूरी है उसके लिए बातें करने से ज्यादा |

    ******
    आपकी पोस्ट पढ़ने के बाद ये सब मेरे दिमाग में आया | पता नहीं क्या सही है क्या गलत | जो भी है बस लिख देने का मन हुआ | कुछ ज्यादा या गलत बोल गया हूँ, तो माफ़ी चाहूँगा !!!!

    उत्तर देंहटाएं

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