शनिवार, दिसंबर 10, 2005

मेरा विश्‍वास तुमसे मुठ्ठी भर कम है

अलकायदा के तीसरे साथी के बारे में जानना हो तो देशदुनिया देखिये।पियक्कड़ मुर्दे का ताबूत देखिये जापानी साथी मत्सु से।लाल्टूजी अपना सारा पुराना स्टाक छापे दे रहे हैं नेट पर भी। मसिजीवी ने सूरज कविता के जवाब में प्रतिकविता लिखी।

मेरा विश्‍वास तुमसे मुठ्ठी भर कम है
कि सारी दुनिया सूरज सोच सकेगी
पर यकीन मानो मैं इस खयाल से भयभीत नहीं हूँ
मेरी चिंता फर्क है
और वह यह है मेरे दोस्‍त
कि इसकी राह देखती तुम्‍हारी ऑंखें
कहीं पथरा न जाए
चिर आसन्‍न प्रसवा पृथ्‍वी डरती है
पथराई ऑंखों के सपनों से।


क्या स्वतंत्रतता भी बंधक बन सकती है!- अतुलबतायेंगे।आपका दिमाग कैसे काम करता है बतायेंगे कनिष्क रस्तोगी।
जीतेन्द्र योगाभ्यास दिखाने लगे। उधर स्वामीजी के कहने पर रविरतलामी,आशीष श्रीवास्तव तथा फ़ुरसतिया आदर्शवादी संस्कार के बारे में अपने विचार लिखने को मजबूर हुये।

रचनाकार में रविरतलामीजी ने हितेश व्यास की कवितायें पढ़ाईं। हितेश व्यास का वसन्त कहता है:-

ज़्यादा से ज़्यादा तुम क्या कर सकते हो?
हजामत! कर दो, रुण्ड मुण्ड कर दो
मैं आऊँगा पेड़ों के विग लगाता हुआ
इससे अधिक तुम्हारी औक़ात क्या है


अनूप जी (कौन वाले यह नहीं बताया)का ब्लाग देखकर रति सक्सेना जी भी कविता में गणित ले आईं।
ब्लाग लिखने से हुये फायदे-नुकसान का लेखा-जोखा अतुल सबनीस कर रहे हैं।खेल-खेल में पैसा कमाने के गुर सिखाने में जुटे हैं पंकज।रजनीश मंगला को कुछ गाने चाहिये ।सूची देखें। हों तो भेजें।कविता ,ज्योतिष व हायकू के बाद अब मानसी ने बाल कविताओं पर हाथ आजमाना शुरु किया। बाल कवितायें आप भी पढ़ें-लिखें।

सैन्टा बाबा उनको तोहफ़ा देते
जो मम्मी-पापा का कहा सुनते
आओ हम अच्छे बच्चे बन जायें
क्रिस्मस में मन के तोहफ़े पायें


लक्ष्मी गुप्त जी नये अंदाज में सबअर्ब की गाथा लिख रहे हैं:-

कोमल तन की सुघर मेहरियाँ रहतीं सबै सबर्बिया माँ
चंचल नैनन वाली गोरियाँ चितवत रहैं सबर्बिया माँ
नाचैं, गावैं, भाव बतावैं बारन और किलबिया माँ
मन लागो मेरो यार....


महावीर शर्मा जी विचारोत्तेजक लेख में हिंदी को जानबूझकर गलत अंदाज में उच्चारित किये जाने के बारे में बता रहे हैं।यह देखा जा रहा है कि हर क्षेत्र में व्यक्ति जैसे जैसे अपने कार्य में सफलता प्राप्त करके ख्याति के शिखर के समीप आजाता है, उसे अपनी माँ को माँ कहने में लज्जा आने लगती है।

आज की टिप्पणी:जीतू की पोस्ट में सूर्य नमस्कार करते हुये बालक के आगे-पीछे कोई शब्द नहीं था तब यह टिप्पणी की गई थी-देखो जीतू, तुम जब तक लिख नहीं रहे थे तब तक यह सूर्य नमस्कार करता बालक चुपचाप खड़ा रहा। तुम्हारी पोस्ट देखते ही ये बालक सूर्य दंड पेलने लगा। बेचारा नमस्कार करते करते गिर जायेगा लेकिन देखेगा उधर ही जिधर इस पोस्ट का कोई शब्द नहीं दिखेगा। क्या बात है। बकिया लेख जैसा कि होता है बढ़िया है। बाद में जीतू ने बालक के तीनो तरफ शब्दों की बाड़े-बंदी कर दी।

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1 टिप्पणी:

  1. आज ब्लागिये विश्वजाल की गली गली में पागल कुत्ते की तरह भौंक्ते नजर आ ही जाते हैं जिन्हे न तो अपने देश नही अपनी भाषा से कुछ लेना देना है.सकारात्मकता से दूर अपनी प्रशंसा के लिये लालायित....

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