शनिवार, अगस्त 07, 2010

एक बच्चा कम और दो पेड़ ज्यादा

मेरी नज़र कुछ दिनों पहले एक खबर में गयी थी जिसमे गुलाम नबी आज़ाद ने देश की जनसँख्या बढ़ने पर चिंता जतायी थी लेकिन उनका मानना था कि बात अभी आपातकाल तक नही पहुँची। नेताओं के और जनता के किसी बात को देखने के नजरिये में फर्क होता है। अभी से इस बात को फैलाने की जरूरत है कि पिछली जनरेशन से एक बच्चा कम किया जाय और दो पेड़ ज्यादा लगाये जायें। जनसंख्या कहीं भी अकेले नही जाती साथ में दस अलामात साथ में लाती है। इस बात को भारत श्री में काश्मीरः समस्या और समाधान में विजय कुमार के आलेख में आकंड़ों के साथ बताया गया है, हालाँकि इसमें एक धर्म विशेष के आंकड़ों पर बात की गयी है लेकिन मेरा मानना है ये सभी के लिये सत्य है। अगर ऐसा नही होता तो नक्स्लवाद की समस्या एक राज्य से दूसरे राज्य में फैल नही रही होती। यही नही अगर ऐसा नही होता तो उत्तर भारतीयों को लेकर ठाकरे परिवार का प्रेम दिनों दिन फल फूल नही रहा होता। जनसंख्या का गणित हर किसी के दिमाग के समीकरणों की ऐसी तैसी कर देता है वो किसी की जाति या धर्म नही देखता। २०१२ में दुनिया खत्म हो ना हो २०५० तक हम जनसंख्या के बोझ तले अधमरे जरूर हो चुके होंगे।

मैं जनसंख्या को कंट्रोल करने के लिये सबको सचेत करना चाह रहा था लेकिन हमारे साथी अंशुमाला हम से एक हाथ आगे निकल आये और विपक्षी नेता की तरह हमारे हाथ से कलम पकढ़ के लिखने लगे - आओ मलेरिया फैलायें देश की बढ़ रही जनसंख्या घटायें यानि कि हींग लगे ना फिटकरी और रंग चोखा ही चोखा, जिन्हें ये समझ ना आये तो उनके लिये अपनी निठल्ली जबान में कहूँ तो
कत्ल करने का कातिल ने निराला ढंग निकाला है,
हर एक से कहता फिर रहा, इसे मच्छर ने मार डाला है
इनका कहना है -
घर को भले साफ रखे पर घर के बाहर खूब गन्दगी फैलाये घर में जब कचरा हो तो उसे उठा कर सीधे खिड़की से बाहर फेक दे और डेस्टबिन का पैसा बचाए यदि आप और ज्यादा योगदान देना चाहते है तो आस पास मच्छरों का मैटरनटी होम भी खोल सकते है किसी गढ्ढे में पानी जमा करके रखे ताकि मच्छरों को अपनी आबादी और बढ़ाने में मदद मिले जितना ज्यादा मच्छरों की आबादी बढ़ेगी उतना ज्यादा मलेरिया डेंगू फैलेगा उनकी आबादी बढ़ेगी और हमारी घटेगी
ये तो थी जनसंख्या की बात, लेकिन चर्चा के शुरू में जनसंख्या के साथ नेता का भी जिक्र आया था, तो भला ऐसा कैसे हो सकता है कि हम उन्हें बिना हलवा खिलाये जाने दें। आखिर ये लोग सारी मेहनत हलवे के लिये ही तो कर रहे हैं, हलवे के लिये एक दूसरे पर कभी हाथ पैर उठा देते हैं तो कभी अपने हलवे के हिस्से के लिये दूसरे के कपड़े उतारने से नही चूकते। कभी दूसरा ज्यादा हलवा खा ले तो मरोड़ इनके पेट में उठने लगती है। हलवे का चक्कर समझ नही आ रहा ना तो कोई बात नही इसे हमारे शिवकुमार भाई से ज्यादा अच्छे तरीके से कौन समझा सकता है, आप जाईये खुद बाँचिये - हलवा-प्रेमी राजा की कहानी खुद उनकी जुबानी

दशरथ जी से प्रभावित इस राजा ने भी इस आदमी को वचन की हुंडी थमा दिया था. एक दिन इस आदमी ने अपनी तिजोरी में रखे राजा के वचन को निकाला. उसे धोया-पोंछा और उसे लेकर राजा जी के पास पहुँचा. बोला; "वो आपने मुझे जो वचन दिया था, आज मैं उसे इन-कैश करवाने आया हूँ."
लो जी आज की चर्चा जनसंख्या, नेता, मच्छर और हलवे के साथ यहाँ खत्म होती है और आगे शुरू होता है इंटरवल के बाद की कहानी। अपनी कई देसी फिल्मों में ऐसा ही होता है इंटरवल के बाद फिल्म अचानक दूसरे करवट बदलती और अपनी सीट से चिपका एकटक निहार रहे दर्शक को वही सीट इंटरवल के बाद काटने लगती है और वो फिल्म छोड़ आस पास देखने लगता है, अगर कोई उठ के निकलने लगे तो ये भी साथ हो ले। इंटरवल के बाद उस दर्शक की मनोदशा गरीबी की मारी और मध्यवर्गीय बोझ तले दबी जनता जैसी होने लगती है जिसकी कुछ कर गुजरने की चाहत कुत्ते के इंतकाम की तरह कभी पूरी नही होती। चर्चा के बीच में आने वाले इस कुत्ते से परेशान मत होईये जब ये कहीं से भी सड़क के बीच आ सकता है, आप की गली में आकर भौंक सकता है तो इस चर्चा में क्यों नही। और अगर कुत्ते के आने से ज्यादा परेशानी है तो कुश को जाकर काटिये मेरा मतलब पकड़िये -

और आज जब शहर के बाशिंदे लिहाफो में घुसे पड़े ऊंघ रहे है तब कुत्ता जो है वो टांग पे टांग टिकाये फूटपाथ पे लेटे लेटे सामने लगे खम्बे को घूर रहा है.. चाहता तो वो ये है कि मोहल्ले के सारे सड़क छाप कुत्तो को ले जाके धार लगाकर खम्बे को नाले में बहा दे.. पर जबसे उस कुत्ते की फजीती की खबर बाकी कुत्तो को मिली है सब उस खम्बे से कन्नी काटने लगे है.. कुत्ता मन ही मन बाकी कुत्तो को गाली देता है.. "इंसान साले"
यहाँ हम कुत्ते के इंतकाम की बात करने में मशगुल क्या हुए वहाँ मुन्नी को मौका मिल गया बदनाम होने का, गोया कहना चाह रही हो बदनाम हुए तो क्या नाम तो हुआ। पूरी कहानी कुछ इस तरह है - मुन्नी बदनाम हुई.......डारलिंग तेरे लिए.......ले झण्डू बाम हुई....... डारलिंग तेरे लिए चूँकि किसी की बदनामी की ज्यादा चर्चा करना अच्छा नही इसलिये आप चुपके से खुद झांक कर देख आईये, अरे शर्माईये नही उसी तरह झांकिये जैसे पड़ोस वाली आँटी आप को किसी लड़की से बात करते हुए देखने के लिये झांकती है और आपको पता तब चलता है जब सारे मोहल्ले में चर्चा होने लगती है।

आज तो जिक्र पर जिक्र निकल रहे हैं हमने पड़ोस की लड़की का जिक्र छेड़ा तो गाजी साहेब ने बेटियों का जिक्र छेड़ दिया, इनका कहना है - अब तो बेटियों के मन को समझिए

कर्ज उतारने या कोई काम करवाने के लिए लोग अपनी बेटी की शादी बूढ़े, नशेड़ी, शारीरिक रूप से अक्षम और अयोग्य व्यक्ति से कर देते हैं। बेटियां न चाहते हुए भी गाय की तरह खूंटे से बंध जाती हैं। घरवाले उसकी मर्जी जानना तक जरूरी नहीं समझते। ऐसे मर्दों के साथ शादी करके बेटियां अपने पैदा होने तक पर अफसोस करती हैं, उनके मन की बात, उनकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं होता। आखिर हम किस समाज और संस्कृति में रहते हैं और किस सभ्यता पर इतराते फिरते हैं, जिसमें लड़की की शादी करते समय उसकी मर्जी तक का जानना जरूरी नहीं है।
चूँकि कहानी इंटरवल के बाद चल रही है और अक्सर ये देखने में आता कई बार आखिर का क्लाइमेक्स आनन-फानन में तुरत फुरत निपटा दिया जाता है। उनकी वजह पता नही हमारी वजह समय की कमी, कुछ और उल्लेखनीय पोस्ट जिनकी चीरफाड़ वक्त की कमी के चलते करने से रह गयी -

अगर आप कल्पना के घोड़े में बैठकर हिमालय की ऊँचाई नापना चाहते हैं और हिमालय की चोटी से बिम्ब के नये नये प्रयोग करना चाहते हैं तो एक नजर इधर - कल्पना का घोड़ा,हिमालय की ऊंचाई और बिम्ब अधिकार आयोग

क्या स्तनपान कराने से महिला सौन्दर्य पर नकारात्मक असर पड़ता है? जानकारी भरा है ये लेख, आपको कितना पता है?

हरि प्रसाद अवधिया की ठुकराना मत मेरी विनती में कुछ शब्दों का प्रयोग अच्छा लगा - तेरी बाहों का आलिंगन / एक यही बस साध प्रिये / साथ रहें अन्तिम श्वासों तक / हाथों में हम हाथ लिये

अनिताजी को सुनायी दे रहा है शब्दों का कराहना - मेरी रगों में / खून नहीं / शब्द बहते हैं

अल्पना जी के लिये टोपियाँ उछाले जा रहे हैं अरविंद जी: एक टोपी हमारे लिये भी बचाकर रखियेगा - हैट्स आफ अल्पना जी ....ब्लॉग जगत आपके अवदानों से कृत कृत्य है! और हम इतनी सारी टोपियाँ देख चमत्कृत ;) - अल्पना जी हमारी तरफ से भी एक अदद टोपी यहीं से कबूल कर लीजिये

एक ब्लोग है समय के साये में, इसमें कटेंट अच्छे हैं लेकिन भाषा बहुत कठिन यानि कि शुद् हिंदी चूँकि ये मनोविज्ञान से संबन्धित ब्लोग है तो कुछ कठिन शब्दों का होना लाजिमी है, अच्छा होता अगर ब्लोग लेखक उन शब्दों का अंग्रेजी नाम भी दे देते। आप लोगों के लिये कह नही सकता हमारे लिये कुछ शब्द बहुत वजनी थे।

शिवम् मिश्र गुलशन बावरा को श्रृद्धांजलि दे रहे हैं - पहली बरसी पर विशेष - गीतकार गुलशन बावरा लेकिन सच मानिये इसमें कुछ विशेष था नही शिवम् मिश्र जी से अनुरोध है इसमें थोड़ी और जानकारी दी जाये।

और आज की आखिरी पोस्ट काव्यांचल से, आशुतोष द्विवेदी का मुक्तक -
तुम गंध बनी, मकरंद बनी, तुम चन्दन वृक्ष की डाल बनी
अलि की मधु-गुंजन, भाव भरे, मन की मनभावन चाल बनी
कभी मुक्ति के पावन गीत बनी, कभी सृष्टि का सुन्दर जाल बनी
तुम राग बनी, अनुराग बनी, तुम छंद की मोहक ताल बनी

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13 टिप्‍पणियां:

  1. इतने दिनों बाद आपको उसी अंतरजाल में उलझा देख अच्छा लग रहा है ....जीवन की आपाधापी में लगता है मुआ कंप्यूटर ही बस में है ....या हम इसके ?

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  2. कलेवर भी अच्छा और चर्चा भी उम्दा ...

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  3. अति सुन्दर.........
    आपका आलेख पढ़ कर दिल ये गदगद हो गया।
    भाव-नगरी की सुहानी वादियों में खो गया॥
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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  4. आज चर्चा के कलेवर में पुराने महीन बासमती चावल की सी भीनी खुशबू है ।
    जिसके भात के सँग दाज्यू ने जैसे भुँसियारी का राज़मा ही परोस दिया हो !

    तारीफ़ कुछ ज़्यादा तो नहीं हो गयी..... क्या ?
    माफ़ करना अभी अभी बिम्ब अधिकार आयोग के काँज़ीहाउस से अपनी कल्पना का घोड़ा रिहा करवा कर लाया हूँ ।

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  5. visible after approval ?
    भाई यह तो गँदी बात हो गयी ।
    आप ऎसे तो न थे ?

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  6. असभ्य भाषा व व्यक्तिगत आक्षेप करने वाली टिप्पणियाँ हटा दी जायेंगी ।
    बेशक हटाइये, पर हटाने की प्रक्रिया को पारदर्शी तो बनाइये ।
    पाठकों को भी बताइये कि बँद कमरे में आपको किसको और क्यों कूटा पीटा ।
    कोई क्यों यहाँ अपना माथा गर्म करने को टिपियाये ?

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  7. ek behad hi prashansniy aur bhavnaon se ot-prot aalekh bahut sundar,saath me muktak bhipadhkar achha laga.
    behatareen----.
    poonam

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  8. सँशोधन :..... आपको किसको और क्यों कूटा पीटा ।
    पढ़ें = आपने किसको और क्यों कूटा पीटा

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