मंगलवार, अगस्त 10, 2010

कश्मीर...! याद तो है ना?

आज से ठीक चार दिन बाद हम अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहे होंगे.. ब्लोगर नीरज भदवार ठीक कहते है कि दरअसल हमें आज़ादी मिल तो गयी पर अब हमें पता ही नहीं कि इसका करे क्या? कश्मीर में उठती लपटों के बारे में सोचने की किसी के पास फुर्सत ही नहीं.. शायद बाकी भारत ने कश्मीर से पहले ही नाता तोड़ लिया है.. ना वहा से कोई किसी टेलेंट हंट में आता है.. ना फ़िल्मी दुनिया में ना क्रिकेट की टीम में.. ना किसी को परवाह है उनके आने या ना आने से.. वो नाराज़ है और हमें परवाह नहीं...

दरअसल आज की चर्चा में शायदा जी की पोस्ट और उस पर प्रतिक्रियात्मक मेजर गौतम की पोस्ट को शामिल करना चाहता था पर एक लिंक से दुसरे लिंक्स तक पहुँचते पहुँचते विचारों का एक कोलाज सा बन गया.. कश्मीर के हालातो पर कोई एक विचार बना पाना अब मुश्किल हो गया है.. बहुत सारे लिंक्स बहुत सारी तस्वीरे बहुत सारे वीडियो हर किस्सा एक अलग हिस्सा बन गया है.. सुबह से तीसरी चाय पीने के बाद अब जो कोलाहल चल रहा है उसी को समेट कर यहाँ लिख रहा हूँ.. मकसद किसी एक का होंकर रहना नहीं बस अलग अलग निगाहों से मुद्दे को देखने की कोशिश भर है..

शुरुआत शायदा जी की उसी पोस्ट से कर रहा हूँ जिसमे एक मासूम की मौत का दर्द और मौत के लिए सीआरपीएफ को जिम्मेदार ठहराया गया है.. शायदा जी फेसबुक पर किसी वाल पोस्ट के हवाले से कहती है..

i am from batamaloo, i eyewitnessed the death of a 7 year old kid yesterday, here in batamaloo! he was coming back from home, after playing cricket with his friends in a nearby ground, while i was as usual collecting strings for my news re...p......ort. suddenly a group of crpf men came in a mobile bunker and started thrashing me, even broke my camera! fired indiscriminately over the residential buildings there! i was hurt! blood dripping from my head! i ran for my life and at that fateful minute, that 7 year old boy passed through that area. the dogs ran after him! and brought him down by a blow of gun on his head! he was beaten to pulp! i cried for help! i cried someone please save us! we are being murdered! no one came out! who would want to risk his life? i tried very hard! but i could barely move! when they thought it was not sufficent, they stick a cane deep down his throat till he died! ya allah!

हालाँकि इस पोस्ट से उनका मकसद किसी को भला या बुरा कहना नहीं उनका सवाल कुछ और था जो वे आगे लिखती है..
क्रप्‍या इस पोस्‍ट को उसी रोशनी में पढ़ा जाए जिसमें लिखा गया है, पाकिस्‍तान क्‍या कर रहा है, कश्‍मीर में पत्‍थर फेंकना एक व्‍यवसाय है, प्रदर्शनकारी स्‍पॉन्‍सर्ड हैं और कश्‍मीरी लोग इन दिनों जमकर तोड़फोड़ और आगज़नी रहे हैं, ये सब जानने के बाद भी मैं जानना चाहती हूं कि क्‍या इस बच्‍चे को इस तरह मर जाना चाहिए था ...?

मेजर गौतम की पोस्ट पढने से पहले मैंने शायदा जी की पोस्ट के बारे में जानना चाहा जब मैं उस प्रोफाईल तक पहुंचा जिसमे इस बात का जिक्र हुआ था तो वहा से कई लिंक मिले जो नकारात्मकता की बुनियाद पर ही बने हुए थे.. उसमे से आधे लोगो की फ्रेंड लिस्ट्स में कई पाकिस्तानी लोग मिले जो भारत को खुलेआम गालिया दे रहे है..

शबीका नाजिर जिनके बयान को शायदा जी ने अपनी पोस्ट में शामिल किया था उनकी प्रोफाईल पर मुझे इन्नोसेंट कश्मीरी की प्रोफाईल मिली अपने परिचय में वो कहते है..
Kashmir Ki Aazaadi Tak Jung rahe Jung Rahe Gi...
Bharat Ki Barbaadi Tak Jung Rahe Gi Jung Rahe Gi....

कश्मीर की आज़ादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी
भारत की बर्बादी तक... जंग रहेगी जंग रहेगी..
 

इन्ही में से एक प्रोफाईल पर कश्मीरी पंडितो के प्रदर्शन की फोटो लगी है जिसके लिए उन्होंने शब्द इस्तेमाल किये है
ना घर के ना घाट के
नीचे जो टिप्पणिया आयी है वो कुछ यू है..

Musaib Hamid - they are not worth of holding the pictures of our leaders

Aashiq Shah - humara is se kuch nahe honie wala... victory is still ours.

Sitamzad Koushir - In kutoo ko idurhi tazaab chidk dana tha

Mohammed Mustafa Khan - kon ha ya dakhan...kon sa protect kar raha ha...

Syed Muzamil - how these bastards r opposing our movement

Our Land Kashmir - thy wer protesting against freedom movement

Wazim Neals - these the people which were throw-en out of Kashmir in 90's

Mughal Kashmiri - they all are mthr fkrs......

नीचे जो तस्वीर है उसमे प्रदर्शनकारी पुलिस वाले को मार रहा है.. और नीचे लिखा है कि ये बदमाशी नहीं है बल्कि मैं सेल्यूट करता हु कि इसने पुलिस वाले को मारा है..



इसी पर एक टिपण्णी शाहिद दर नाम से है जिनका कहना है कि 

मैं उस पुलिस वाले को सेल्यूट करता हु जिसने वापस गोलिया नहीं चलायी वरना १०-१५ जाने और चली जाती..

उनकी इस टिपण्णी पर फ़िरोज़ लाला नाम से किसी ने टिपण्णी की है जो कि सिक्किम मनिपाल यूनिवर्सिटी से पास आउट है और अभी अबू धाबी में सोफ्टवेयर इंजिनियर है उनके वाल पर लगभग सभी पोस्ट में परवेज मुशर्रफ साहब की तारीफों के पुल बंधे है.. वो फरमाते है कि

यदि कश्मीर के जेहाद के बारे में जानना चाहते हो तो कुरआन ए पाक पढो.. तुमने कुरआन नहीं पढ़ी है इसीलिए ऐसा कह रहे हो.. और उनका कहना है कि कुरआन में एक शब्द है गजवा ए हिंद.. जाकर पहले उसके मतलब को समझो..

इस शब्द को जब गूगल में डाल के ढूँढा तो इसका कुछ अर्थ यू निकला कि किसी मुस्लिम देश द्वारा भारत पर फतह करना.. क्या वाकई में कुरआन में ऐसा लिखा हो सकता है?????

गजवा ए हिंद के बारे में जानकारी के लिए इन लिंक्स पर क्लिक करे लिंक एक, लिंक दो..

इसी पर कई टिप्पणिया है जिन पर लगभग सभी में पुलिस वालो को और जवानो को गालिया दी गयी है और उनके द्वारा किये गए गलत कामो का ब्यौरा है..

अब मैं उलझता जा रहा हूँ फेसबुक प्रोफाईल्स में उनमे जो विडियोस है उनमे लोगो के आक्रोश में.. ऐसा लग रहा है जैसे उकसाया जा रहा है लोगो को.. और यही हो रहा है.. आम भारतीय बहुत संवेदनशील होता है और इसी संवेदनशीलता का फायदा उठाकर मासूम लोगो को बहकाया जा रहा है.. शायदा जी की संवेदनशीलता भी इसी का परिणाम लगती है.. बच्चे की फोटो लगाकर सिर्फ आधा सच दिखाया गया है..

आप फेसबुक की इन प्रोफाईल्स इनकी पोस्ट्स और इनके कमेंट्स में देख सकते है किस तरह लोगो के दिमाग में जहर भरा जा रहा है.. इनमे से आधे लोग पाकिस्तानी है आधे दुबई में है आधे से ज्यादा हिन्दुस्तान में होने के बावजूद पाकिस्तानी नेताओ की तस्वीरे लगाये हुए है.. पत्थरो की गाड़िया भरके आ रही है..

महिलाओ और बच्चो को जानबूझ के आगे किया जा रहा है.. ये सब एक सोची समझी साजिश के तहत हो रहा है.. शुक्रिया शायदा जी का कि उन्होंने ये पोस्ट डाली और मुझे एक जरिया मिला कश्मीरी लोगो के मन को पढने का.. यदि फेसबुक पे जितनी कश्मीरी है उनकी माने तो उन्हें भारत से कोई हमदर्दी नहीं है...

भारतीय कुत्तो वापस जाओ..
जी हाँ मेजर गौतम अपनी पोस्ट में ऐसा ही कुछ लिखते है.. 

यक़ीन जानिये, अपने मुख पर "indian dogs go back" के नारे को सुनकर संयम बरतना बड़ा ही जिगर वाला काम है। एक सरफ़िरा नौजवान एक वर्दीवाले के पास आकर उसके युनिफार्म का कालर पकड़ उसके चेहरे पर चिल्ला कर कहता है बकायदा अँग्रेजी झाड़ते हुये "you bloody indian dog go back" और बदले में वो वर्दीवाला मुस्कुराता है और सरफ़िरे नौजवान को भींच कर गले से लगा लेता...पूरी भीड़ हक्की-बक्की रह जाती है और वो वर्दीवाला अपने संयम को मन-ही-मन हजारों गालियाँ देता हुआ आगे बढ़ जाता है।

 कश्मीरी लोग बैनर लिए यही नारे लगा रहे है.. शायद जी के ब्लॉग पर जो घटना दी गयी है उसी का खंडन मेजर अपनी पोस्ट में करते है..

एक आठ साल का बच्चा दौड़ते हुये गिर पड़ता है और उसके तमाम भाई-बंधु उसे अकेला छोड़ कर भाग जाते हैं तो सुरक्षाबलों की टुकड़ी में हरियाणा के एक जवान को उस गिरे बच्चे को देखकर दूर गाँव में अपने बेटे की याद आती है, वो उसे अपनी गोद में उठाकर पानी पिलाता है, अपनी गाड़ी में अस्पताल छोड़ कर आता है और जब उस बच्चे की मौत हो जाती है अस्पताल में तो उसी बच्चे को बर्बरतापूर्वक कत्ल कर देने का इल्जाम भी अपने सर पर लेता है। 

पर जैसा कि डा. अनुराग कहते है कि आर्मी के पास कोई फेसबुक या ट्विटर नहीं है..

ऐसी घटनाओ का जिक्र जानबूझ कर किया जा रहा है.. लोगो को बरगलाने के लिए मासूम लोगो की भावनाओ के साथ खेल खेला जा रहा है.. जो लोग फेसबुक पर ये सब शेयर कर रहे है यदि उन्हें गौर से पढ़ा जाए तो सिवाय नकारात्मकता फ़ैलाने के कुछ नहीं कर रहे है वे भारत के लिए घोर नफरत है उनके मन में.. और वाकई एक एजेंडा लेकर किया जा रहा है ये सब कुछ..

शायदा जी का सवाल कि उस बच्चे का मरना कितना सही था का जवाब शायद ऐसे लोग दे सके जो प्रदर्शनकरियो में महिलाओ और बच्चो को जबरदस्ती आगे भेज रहे है.. यक़ीनन उन्हें रोकना होगा आज़ाद कश्मीर के लिए ना सही पर शांत कश्मीर के लिए ही सही..

अंत में फेस बुक पर ही मिले दो विडियोस शेयर करना चाहूँगा..




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58 टिप्‍पणियां:

  1. कुश जी, बहुत बधाई इस पोस्ट के लिए। हमारी सरकार पुलिस के हाथ बांध कर कहती है लडो!! हम संसद के अपमान करने वाले को मौत की सज़ा देते डरते है..... पाकिस्तानी झंडे फहराने वालों को गले लगाने के सिवा हम कर भी क्या सकते है।

    मन भारी हो गया.... ज़ायका बदलें?

    "सुबह से तीसरी चाय पीने के बाद..."
    यानि कुश के साथ काफ़ी खतम!!!!!!!

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  2. thanks kush, for sharing all these posts here on this stage... i have gone through the post of Shayda and Gautam and again going to read the links given by you... will come back and comment...

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  3. अभी हाल में प्रदर्शित एक फिल्म "लम्हा" इस समस्या को करीब से दिखाने में एक अच्छा हस्तछेप है. जो आँखें मुंड कर सोये हैं अगर वे जागना चाहें तो थोड़ी बहुत अकाल इस फिल्म से आसानी से खुल सकती है. इसके संवाद भी काफी प्रभावी हैं...

    नुक्सान सिर्फ जानों का है, तकलीफ सभी जगह बराबर होगी, भारतीय कुत्ते वापस जाओ सुन कर संयम रखना गोली मारने से कहीं ज्यादा बड़ा दिलेरी का काम है ... कश्मीर अब एक अंतररास्ट्रीय मसला बन चुका है... भारत अब तक किसी विदेशी मध्यस्थता से इनकार कर रहा है लेकिन सियासत खुद भी कुछ ना करके इस अवसरवादियों के इस विकल्प को हवा दे रही है... आज अगर भारत की आर्थिक स्थिति विश्व स्तर पर बेहतर ना होती तो इंग्लॅण्ड, और अमरीका पाकिस्तान की मध्यस्थता के आग्रह को स्वीकार कर चुके होते. यह GDP ही है जो अभी बचाए हुए है... नेताओं में इक्षाशक्ति की जबरदस्त कमी कश्मीर को कहाँ ले जायेगा यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन इनमें जो पिस रहे हैं, जो खाते यहाँ का और गाते वहां का हैं, जो मौके की ताक में हैं, जो पर्यटन को नुकसान पहुंचा रहा है और यह मसला जो धब्बा बना हुआ है इन सब का समाधान निहायर जरुरी है.


    http://epaper.hindustandainik.com/PUBLICATIONS/HT/HT/2010/08/08/ArticleHtmls/ÀFb»F¦F°Fe-I-V¸FeS-§FFMe-IZ-d³F¸FʸF-ÀF¶FI-AFªFI-08082010010002.shtml?Mode=1

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  4. Kashmir ke sawaal ka kahin jawab nahi hai...Bharat kee is peeda ka kahin ant nahee hai.

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  5. सार्थक, परिपूर्ण पोस्ट....
    यह चर्चा छिडनी चाहिए.... और इसी तरह छिडनी चाहिए....
    प्रायोजित हो या स्वाभाविक...बात से बात बढ़कर ही यहाँ ता पहुंची है...जब तक विरोधी स्वर को उस बुलंदी तक नहीं पहुँचाया जायेगा,जहाँ तक विध्वंसी स्वर पहुंचा हुआ है, समाधान कैसे मिलेगा...
    आवश्यकता है मिथ्या प्रचार को जबरदस्त झटका देने की और इसे इसी तरह प्रचारित कर दिया जा सकता है...
    सुनते तो आयें हैं,सत्य में बड़ी ताकत होती है,आजमाकर देख लिया जाय...
    साधुवाद इस सद्प्रयास के लिए...

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  6. कुश तुममें हिम्मत है, तुममें जज़्बा है.इसे बनाये रखना.
    तुमने बहुत सलीके से व्यवस्थित ढंग से सभी पहलुओं को यहाँ रखा है.सच को बाहर लाना बड़ी हिम्मत का काम है क्योंकि आज कल सच भी डर कर छुपा रहता है.आशा है प्रस्तुत तथ्य कई लोगों की आंखों की पट्टी खोल सके.
    ---------
    'हिंदी हैं वतन है हिन्दुस्तान हमारा; -
    काश !यह दिल से हर भारतीय नागरिक स्वीकार करे.
    दहशतगर्दों का कोई धरम नहीं होता.उनका काम सिर्फ देश को तोडना है.

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  7. बहुत ज्वलंत विषय पर चर्चा की आपने . पाकिस्तानी छात्राओ का विडियो देख अच्छा लगा कि उनके दिलो मे अभी जहर नही लेकिन लिखे पर्चो मे है .
    भाई कुश यह भी सच है ऎसे ज्वलंत विषयो पर इस ब्लाग की दुनिया पर ज्यादा तब्बजो नही मिलती .आप भी देखिये कुत्ते के इन्तकाम से कम पढी जायेगी यह चर्चा

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  8. बहुत सार्थक और बेबाक पोस्ट. बधाई.

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  9. कुश,
    गौतम जी की पोस्ट और शायदा जी की पोस्ट ने मुझे भी हिला दिया था... एक अजीब से हालात मे गड्डमड्ड हो रहा था मै... तुम्हे उसमे डूबकर काफी कुछ निकालते देखा तो अच्छा लगा।

    कश्मीर खुद एक कहानी बन गया है और उसमे सबने अपनी अपनी कहानिया सजा रखी है...

    अनुराग जी की बात गौर करने काबिल है.. विडियोज देखे हुये है.. कभी हमने भी इन्हे अपने ब्लोग पर जगह दी थी।

    शानदार चर्चा..
    "आज कुश तो बहुत होगे तुम! हाँय "

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  10. अल्पनाजी की टिप्पणी का समर्थन करती हूँ |

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  11. कुश
    चर्चा पढ़ कर मन विभोर हो गया. इस प्रकार किसी ठोस मुद्दे पर सही वैचारिकी के निर्माण के लिए इस मंच का उपयोग, इसकी वास्तविक सार्थकता के निर्माण में सहायक होगा.

    वस्तुतः भारतीय सेना विश्व की सर्वाधिक राष्ट्रभक्त सेनाओं में से एक है, जिसका मनोबल तोड़ कर राष्ट्रविरोधी शक्तियाँ उसका उपयोग अपने मंसूबे पूरे करने के लिए करना चाहती हैं' करें भी क्यों न, उनके सामने तो हर बार उनकी सेना के तख्ता पलट का उदाहरण जो है.

    पूर्वोत्तर भारत सहित काश्मीर में हमारे इन जुझारू धैर्यशाली सैनिकों को अपराधी सिद्ध कर सेना का मनोबल भंग करने व विद्रोह के लिए उकसाने के चोचले चल रहे हैं. जिनमें बहुतेरे भारतीय भी संलिप्त हैं. जबकि हमारे सैनिक आज भी एकनिष्ठ व समर्पित भाव से जान दे देने वाले सच्चे सपूत हैं. जिन्हें सदा प्रणाम ही निवेदित किया जाना चाहिए. उन्हीं के भरोसे देश अब तक एकसूत्र में बँधा जीवित है अन्यथा राजनीति वाले तो कब का देश बेच, खा पी कर कर डकार मार सो गए होते.

    इन प्रणम्य सैनिको के श्रीचरणों के सम्मान में तुम्हारे शब्दों का यह पुष्प सही समय पर आया है. बधाई!

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  12. प्रिय कुश... इस पोस्‍ट के लिए दिल से बधाई...

    दरअसल दोनों पक्षों को लेकर चलते हुए नतीजा निकालने के बजाय सवाल छोड़ते जाना विचार को जिंदा रखने का काम लगता है...

    इस पोस्‍ट में तुमने वही किया है..

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  13. कुश जी, बहुत बधाई इस पोस्ट के लिए। अल्पनाजी की टिप्पणी का समर्थन ।

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  14. ..टिप्पणी लम्बी हो जाने के आसार हैं, सो पहले कुछ लाइनें मॉडरेशन माइन स्निफ़र के तौर पर पोस्ट कर लूँ । :)

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  15. चलो..किसी ने इस विषय पर पहल तो की ।
    कश्मीर आज कई विसँगतियों का कचूमर-सलाद बन कर रह गया है.. और कोई भी पक्ष उसे ईमानदारी से स्वीकार करने को तैयार नहीं है । टिप्पणी लम्बी न हो, इसलिये कुछ विचार-बिन्दु ही छोड़ रहा हूँ ।
    1. आज हालात यह हैं कि वह ( आक्रोशित कश्मीरी मुस्लिम ) हमें 63 वर्ष पहले लौटा ले जाना चाहते हैं.. जो अब सँभव ही नहीं ।
    2. उन्हें यह सच स्वीकार करवाने की पहल होनी चाहिये, कि स्वतँत्र कश्मीर को अपना अस्तित्व बनाये रखन कठिन होगा, अँततः उन्हें भारत या पाकिस्तान के बचे-खुचे हिस्से के साथ ही रहना होगा ।
    3. पँडित नेहरू की स्वप्नदृष्टि को अब तक वैसे भी मोतियाबिन्द हो चुकी है, ऑल इँडिया रेडियो पर दिया गया उनका भाषण पढ़िये..
    " In fact, the then Indian Prime Minister Jawaharlal Nehru made it clear in a speech on All India Radio that the people of Kashmir were free to choose their future and accede to either of the Domains:
    We have declared that the fate of Kashmir is ultimately to be decided by the people. That pledge we have given, and the Maharaja has supported it not only to the people of Kashmir but the world. We will not, and cannot back out of it. We are prepared when peace and law and order have been established to have a referendum held under international auspices like the United Nations. We want it to be a fair and just Reference to the people, and we shall accept their verdict. I can imagine no fairer and juster offer.[1]
    I wish to draw your attention to broadcast on Kashmir which I made last evening. I have stated our government’s policy and made it clear that we have no desire to impose our will on Kashmir but to leave final decision to people of Kashmir. I further stated that we have agreed on impartial international agency like United Nations supervising referendum.[2]
    क्या वह भूल गये थे कि हैदराबाद और जूनागढ़ में उन्होंने ऎसी अव्यवहारिक नज़ीर क्यों नहीं पेश की ! जब कि वह ज़िन्ना को उनके अपने ही तर्क से हरा सकते थे..
    " Jinanh position was that Pakistan went by prerogative of ruler not of the people. Pakistan accepted the instrument of accession of Junagarh of Nawab of Junagarg when the it was A Hindu Majority State? Why? but when plebiscite was held there it protested because it went with prerogative of ruler. Now why this prerogative of ruler and not with will of masses, the reason was that many of the Muslim rulers like Nawab of Bhopal, Nizam of Hyderabad, Nawab of Junagarh etc had fully invested in Muslim league when it was formed so league could not abandon when they needed them, & strategically they wanted to weaken India Even Maharaja of Jodhpur and maharaja of Travancore also were encouraged by Pakistan to accede to Pakistan Now why Kashmir was left out, at the time of independence Gurdas-pur was not granted to India, at this point Pakistan was fully aware that Maharaja cannot but accede to Pakistan but here his calculation failed "
    सो भारतीय नेतृत्व को आज के हालात के हिसाब से पहल करनी चाहिये, कोई ताज़्ज़ुब नहीं कि यदि नागालैन्ड-मिज़ोरम जैसे राज्यों के मसले हल हो सकते हैं तो यह क्यों नहीं ?
    4. इसका समाधान राहत पैकेज़ में खोजना निताँत बेबुनियाद सोच है । आर्थिक और घरेलू मामलों में उन्हें मतलब भर की स्वात्यत्ता देकर सेना, विदेश-व्यापार, सँचार सेवायें यदि मुख्य भूमि के पास रहें तो उन्हें ऎतराज़ न होना चाहिये ।
    5. केवल और केवल 10 ज़िलों की हठधर्मिता के आगे झुक जाना और झुकते जाना, इस कवायद में अपने सँसाधनों को झोंकते जाना क्या नेहरू की नासमझी का श्राद्ध-तर्पण है.. यह कब तक चलता रहेगा ?

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  16. आगे जारी है..
    6. सेनाओं की तैनाती कोई हल नहीं, बल्कि यह एक तरह से उनकी प्रतिहिंसा का उत्प्रेरक ही है । यदि एक सामान्य शहरी के नाते मैं स्वयँ भी सेना को विशेषाधिकार दिये जाने का विरोध करता हूँ, तो उनके गुस्से को समझने की ज़रूरत क्यों नहीं है ?
    7. सामान्य और निर्दोष नागरिकों का मारा जाना दुखःद तो है ही... उनके गुस्से की भर्त्सना करने से पहले उसके कारणों को समझने की ज़रूरत नहीं है, क्या ?
    8. यदि वह आज तक अपने को भारतीय न कह कर कश्मीरी कहते हैं तो हम भी उन्हें बार बार याद दिलाते रहते हैं, कि हमने ( जैसे कि वह हमसे अलग हों ! ) आपको यह दिया वह दिया.. इतना दिया उतना दिया । नतीज़न उनकी राजनैतिक पार्टियों ( नाम न लेते हुये ) का चुनावी ऍज़ेन्डा यही रहता है.. कि कौन कितना पैकेज़ लायेगा.... और इसका कहीं कोई विरोध तक नहीं होता ।
    9. यदि वहाँ नागरिक मारे जाते हैं, तो शेष सारा देश चुप रहता है, मुझे याद नहीं आता कि कभी भारत के ( दिल्ली सहित ) किसी हिस्से में ऎसी घटनाओं के लिये विरोध-प्रदर्शन हुये हों । नतीज़ा.. वह सोचने पर मज़बूर हैं कि वह अकेले हैं, और उन्हें अपनी लड़ाई अकेले ही लड़नी है ।

    सेना के ज़वानों को शत-शत नमन कि वह राष्ट्र-हित में अपने को कुर्बान करते आये हैं, और एक स्वस्थ सैनिक परँपरा को निभाते हुये अपने को राजनैतिक हस्तक्षेप के मँच से अलग रखा है..

    हमारे परिश्रमी चर्चाकार ने केवल वही लिंक खोजे और यहाँ दिखाये हैं, जो उनको माफ़िक आते थे । सरकारी अमला यदि किसी कूटनीति के तहत हमें वही बताता आया है, जो उसके हितों को साधता है.. तो एक बुद्धिजीवी के हैसियत से हमने भी अपनी नज़रें दूसरी ओर से फेर रखी हैं !

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  17. अब जबकि डॉ अमर कुमार की टिपण्णी ने कई ऐसे संदर्भो को उल्लेख किया है जो निसंदेह बहस का विषय है खास तौर से ६ नंबर के बाद से ...


    लोकतान्त्रिक तरीके से से चुनी हुई ऐसी सरकार जो किसी अति संवेदनशील क्षेत्र में काम कर रही है .....उससे अतिरिक्त सूझ बूझ ओर सतर्कता की अपेक्षा की जाती है .क्यूकी उसमे शामिल नुमाइंदे वहां की लोकल जनता के प्रतिनिधि है .....दुर्भाग्य से वे हालात के आकलन में फेल हुए ये मेनेजमेंट फेलियर है ..... किसी ऐसी समस्या को जो ६३ साल से हमारे देश के लिए चिंता का विषय रही है ...किसी आदर्शवादी हल की अपेक्षा करना भी यथार्थ से उतना ही मुंह मोड़ना है .क्या कारण है ४ महीने पहले सामान्य कीओर बढ़ते ऐसे प्रदेश में अचानक ऐसे हालात क्यों पैदा हुए के स्थितिया इतनी विस्फोटक हो गयी.....ये भी के जब कश्मीर पर करोडो रुपये खर्च हो रहे है हम अभी तक वहां की पोलिस को उन आधुनिक तरीको से ट्रेंड नहीं कर पाए है न वो हथियार उपलब्ध करा पाए है जिन्हें विकसित दिशा की पोलिस मोब कंट्रोल में इस्तेमाल करती है जिसमे कम से कम जाने जाने की सम्भावना रहती है .....
    .बरहाल तमाम कवायदों ओर बहसों के बीच मै प्रधान मंत्री की इस पहल का स्वागत करता हूँ ....क्यूंकि ऐसे अशांत प्रदेश में जहाँ लोगो के भीतर गुस्सा ओर आक्रोश है ओर ये सोच भी के भारत उन्हें इग्नोर कर रहा है ...उससे एक गलत सन्देश जा रहा था .......
    बिना भावुक हुए पहले हमें कुछ तथ्यों को खुली आँखों से स्वीकारना होगा...क्यूंकि .जटिल समस्याए कोरी भावुकता से नहीं सुलझाई जा सकती है ....
    ये एक बड़ी पोलिटिकल समस्या है .जिसके न केवल सामजिक .,आर्थिक पहलू है इसके पीछे देश के बाहर की कुछ ऐसी ताकते भी है .जिनका अपना निजी स्वार्थ है ....ओर ..जो अब इस समस्या को धर्मीकरण करने लगी होने लगा है ............दुर्भाग्य से कश्मीर के पढ़े लिखे वर्ग के बीच में भी निराशा कुंठा ओर आक्रोश पनपने लगा है .ऐसे नाजुक दौर में उनका विश्वास जीतना ओर भी आवश्यक हो जाता है जो भारत के संविधान के दायरे में रहकर इस समस्या से मुक्ति पाना चाहते है....क्या इस देश की सभी राजनैतिक पार्टियों की भीतर इतनी इच्छा शक्ति है के वे अपना लाभ हानि तौले बगैर किसी ठोस निर्णय की ओर सामूहिक रूप से बढे ..क्यूंकि इसमें कई ऐसे कदम भी उठाने पढ़ सकते है .जिनमे शायद आम सहमति न बने ....ये भी सच है के जाने जा रही है चाहे वो किसी भी परिस्थिति में जा रही हो...ओर दुर्भाग्य से उनका इस्तेमाल भी हो रहा है ....ऐसे अशांत प्रदेश में जहाँ लगातार हिंसा ओर मौते एक नियमित अंतराल पर कई सालो से हो रही हो ऐसे प्रदेश में बच्चो ओर नौजवानों की मानसिक सोच में निसंदेह कुछ ऐसे बदलाव होगे जो सामान्य नहीं होगे .ओर ऐसे माहोल में वे आराम से भटक सकते है ...शायद उस रास्ते पे भी जो देश को टूटन देगा ..
    किसी भी देश की सेना औरतो ओर बच्चो के खिलाफ खड़े होने में गौरवान्वित महसूस नहीं करती है चाहे उन्हें चालाकीसे आगे शामिल किया गया हो ..या वे स्वंय से शामिल हुए हो...इस देश की सेना ने हजारो कुरबानिया दी है ..ओर बिना उनका मनोबल तोड़े सामरिक ओर देश की सुरक्षा की दृष्टि को मद्दे नज़र रखते हुए सेना के जानकारों को भी इसमें शामिल कर हमें किसी मध्यस्थ रास्ते की ओर बढ़ना तो होगा ही....

    जाहिर है इस समस्या के कई पहलू है कई दृष्टिकोण.... ..सो इसे अभी टिपण्णी का केवल एक भाग माना जाए

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  18. तीन दिन पहले रात में एन डी टी वी के कार्यकर्म ' हम लोग "की बहस बड़े गौर से सुन रहा था ....जिसमे एक कश्मीरी नौजवान आक्रोश में कहता है के जब वहां कश्मीरियों की जान जाती है तो क्यों दिल्ली या भारत के किसी कोने में उसके सपोर्ट में प्रोटेस्ट नहीं होता देश के बाहर होता है ....वाकई उनके सोचने की बात है क्यों नहीं होता.?......तभी वहां खड़े दूसरे दर्शक ने कहा ....आप कश्मीरी पंडितो को ज़मीनी हक में शामिल करिए....उनके हक के लिए भी... लड़िये...मत कहिये के भारत अलग है फिर देखिये फिर कैसे लोग आपके साथ आते है......
    कल देर रात ...एन डी टी वी पर अलगवादी कश्मीरी .नेता सज्जाद लोन भी एक बहस में कश्मीरी पंडितो से सम्बंधित प्रशन को टाल गये ओर दुर्भाग्य से किसी भी कश्मीरी नेता का अभी तक इस पर कोई स्टेंड क्लियर नहीं है ..क्यूंकि अगर वे आज़ादी मांग भी रहे है ओर उसमे उन्हें सभी कश्मीरियों के हकों की बाबत बात करना चाहिए ...अन्यथा इस मुद्दे का धर्मीकरण की ओर ध्रुवीकरण स्वंय हो जायेगा जिससे भारत की जनता शायद अपने आप को न जोड़ सके

    अभी टिपण्णी का एक भाग ही माना जाए

    उत्तर देंहटाएं
  19. एक बहुत ही बेहतरीन चर्चा जाने कितनी ही चर्चाओं और बहस को समेटे हुए और कितनी को शुरू करती हुई.......आभार स्वीकारें

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  20. The following is the text of Prime Minister Manmohan Singh’s speech on Jammu and Kashmir:

    ‘I welcome you today with grief in my heart, but hope in my mind.

    I grieve for all those who have lost their near and dear ones in Kashmir and in the Ladakh region.

    I propose that we rise to observe a minute’s silence to pray for the departed.

    (one minute silence)

    The Government of India will continue to provide relief and other assistance and help the State Government in providing rehabilitation for all those affected by the unfortunate natural disaster in Ladakh. The whole country is with the people of J&K in their hour of sorrow.

    The events in Kashmir over the past few weeks have caused me great pain. I share the grief, the sorrow and the sense of loss of every mother, every father, every family and every child in Kashmir.

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  21. I can feel the pain and understand the anger and frustration that is bringing young people out on to the streets of Kashmir. Many of them have seen nothing but violence and conflict in their lives and have been scarred by suffering.

    Today I wish to share with you my sense of hope for the people of Jammu and Kashmir that I have long nurtured.

    The State is only now emerging from the shadow of more than two decades of a deadly insurgency, which brought only death and devastation to the beautiful State. These were two lost decades in the history of Jammu & Kashmir’s development.

    Let us make a new beginning. I appeal to the youth to go back to their schools and colleges and allow classes to resume. I ask their parents: what future is there for Kashmir if your children are not educated?

    I am convinced that the only way forward in Jammu and Kashmir is along the path of dialogue and reconciliation.

    Our Government, more than any other government in the past, has invested heavily in the peace process in Kashmir. The brave rejection of militancy by the people opened the door for us to pursue an unprecedented and intensive internal and external dialogue on the issues that have bedeviled Jammu and Kashmir for six decades.

    With Pakistan we took a number of bold and indeed historic decisions. A bus service was started. We facilitated trade across the LOC. We facilitated arrangements for divided families to meet. We changed the policy on allowing people representing different shades of opinion to visit Pakistan because we wanted to involve all sections of the people in the peace process.

    We set up a number of round-tables and then working groups in which many of you participated actively. Recognising the diversity of the State, we tried to address the problems of the Kashmir valley, Jammu and Ladakh in a comprehensive manner. We committed unprecedented financial resources for the State’s economic reconstruction.

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  22. I can feel the pain and understand the anger and frustration that is bringing young people out on to the streets of Kashmir. Many of them have seen nothing but violence and conflict in their lives and have been scarred by suffering.

    Today I wish to share with you my sense of hope for the people of Jammu and Kashmir that I have long nurtured.

    The State is only now emerging from the shadow of more than two decades of a deadly insurgency, which brought only death and devastation to the beautiful State. These were two lost decades in the history of Jammu & Kashmir’s development.

    Let us make a new beginning. I appeal to the youth to go back to their schools and colleges and allow classes to resume. I ask their parents: what future is there for Kashmir if your children are not educated?
    I am convinced that the only way forward in Jammu and Kashmir is along the path of dialogue and reconciliation.
    Our Government, more than any other government in the past, has invested heavily in the peace process in Kashmir. The brave rejection of militancy by the people opened the door for us to pursue an unprecedented and intensive internal and external dialogue on the issues that have bedeviled Jammu and Kashmir for six decades.
    With Pakistan we took a number of bold and indeed historic decisions. A bus service was started. We facilitated trade across the LOC. We facilitated arrangements for divided families to meet. We changed the policy on allowing people representing different shades of opinion to visit Pakistan because we wanted to involve all sections of the people in the peace process.
    We set up a number of round-tables and then working groups in which many of you participated actively. Recognising the diversity of the State, we tried to address the problems of the Kashmir valley, Jammu and Ladakh in a comprehensive manner. We committed unprecedented financial resources for the State’s economic reconstruction.

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  23. I can feel the pain and understand the anger and frustration that is bringing young people out on to the streets of Kashmir. Many of them have seen nothing but violence and conflict in their lives and have been scarred by suffering.

    Today I wish to share with you my sense of hope for the people of Jammu and Kashmir that I have long nurtured.

    The State is only now emerging from the shadow of more than two decades of a deadly insurgency, which brought only death and devastation to the beautiful State. These were two lost decades in the history of Jammu & Kashmir’s development.

    Let us make a new beginning. I appeal to the youth to go back to their schools and colleges and allow classes to resume. I ask their parents: what future is there for Kashmir if your children are not educated?

    I am convinced that the only way forward in Jammu and Kashmir is along the path of dialogue and reconciliation.

    Our Government, more than any other government in the past, has invested heavily in the peace process in Kashmir. The brave rejection of militancy by the people opened the door for us to pursue an unprecedented and intensive internal and external dialogue on the issues that have bedeviled Jammu and Kashmir for six decades.

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  24. With Pakistan we took a number of bold and indeed historic decisions. A bus service was started. We facilitated trade across the LOC. We facilitated arrangements for divided families to meet. We changed the policy on allowing people representing different shades of opinion to visit Pakistan because we wanted to involve all sections of the people in the peace process.

    We set up a number of round-tables and then working groups in which many of you participated actively. Recognising the diversity of the State, we tried to address the problems of the Kashmir valley, Jammu and Ladakh in a comprehensive manner. We committed unprecedented financial resources for the State’s economic reconstruction.

    I repeat all this to remind you of the many positive things that have happened as a result of the peace process and the sincere efforts we have made to bring about a durable peace in Jammu & Kashmir.

    Nothing will give me greater satisfaction than to see a permanent and just settlement of all outstanding issues that protects the honour and self-respect of all sections of the people of the State.

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  25. But even with the best of these intentions, I cannot say that a complex problem that has defied resolution for 63 years can be solved easily or quickly. We need patience, wisdom and a spirit of conciliation to guide us through ups and downs in the process.

    I urge the people of Jammu and Kashmir to give peace a chance. There is a lot of hard work that needs to be done to rebuild the State and its institutions. We must promote economic activity and create opportunities for employment. We must build physical and human resource infrastructure.

    But I recognize that the key to the problem is a political solution that addresses the alienation and emotional needs of the people. This can only be achieved through a sustained internal and external dialogue. We are ready for this. We are willing to discuss all issues within the bounds of our democratic processes and framework.

    But this process can gather momentum and yield results only if there is a prolonged peace.

    I believe that the vast majority of the people want a peaceful resolution of all issues. Let us recognize that repeated agitations whether violent or otherwise only obstruct this process.

    The cycle of violence must now come to an end. We must collectively ensure that no innocent life is lost again. It is, of course, the bounden duty of the Government to maintain law and order. We cannot allow the turmoil to continue.

    We understand the prevailing public sentiment on the issue of the Armed Forces Special Powers Act. Eventually the J&K Police has to take on the burden of normal law and order duties. They do not require special powers to discharge their functions. We will help to accelerate the process of strengthening and expanding the J&K Police so that they can function independently and effectively within the shortest possible time.

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  26. The J&K Police and other security forces are performing an extremely challenging task in difficult circumstances. Many of them have been seriously injured during the past few weeks.

    There are elements that are trying to weaken the resolve of the J&K Police and trying to undermine their lawful efforts. I urge the State Government to take effective action to protect its policemen and their families. We should not do anything to demoralize the security forces.

    The State Government and the Chief Minister are making efforts to renew contact with the people. The Central Government is fully supportive of these efforts, which should be intensified. I believe that all of you have the solemn duty of reaching out to the people and reinvigorating peaceful political activity on the ground, which is lacking today. The youth wings of your parties should be activated. In a democracy leaders have to listen to the voice of the people and gain their trust and confidence.

    I believe that local body elections should be held early to increase peoples’ participation in democratic governance and to ensure political empowerment at the grassroots level.

    I would urge you to build a consensus on a practical and realizable vision of Jammu and Kashmir’s future. And the people have to be convinced that this future has to be grounded in political and economic realities of our time.

    Recently, young MPs from all political parties made an appeal to their brothers and sisters in J&K to exercise restraint and have trust in the power of dialogue. I fully endorse their call.

    Every possible effort should be made to reach out to the youth in Jammu and Kashmir. We must respond in a sincere and substantive manner to their genuine aspirations for freedom from fear and for freedom to build for themselves a life of dignity, security and well- being.

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  27. I assure the youth of Jammu and Kashmir that their genuine empowerment will be accorded the highest priority in our Jammu and Kashmir policy.

    I recognize that the benefits of the large economic reconstruction package for J&K have not been fully felt on the ground. We will quicken the pace of its implementation in cooperation with the State Government.

    Based on the experience gained, I am proposing to set up an Expert Group headed by Dr. C. Rangarajan with Shri N.R. Narayana Murthy, Shri Tarun Das, Shri P. Nanda Kumar, Shri Shaqueel Qalander and an official representative of the J&K Government as members to formulate a Jobs Plan for the State, involving both the public and the private sectors. To increase employability in the State the Group will interact with the National Skill Development Mission and submit its report within three months.

    But to show results of such efforts on the ground, you will have to engage actively with the youth and give them the sense of purpose, hope and direction they need to make use of the many opportunities that our economy provides.

    I am optimistic about the future of Jammu and Kashmir. India’s democracy has shown that it has the resilience to accommodate a diversity of aspirations and unique circumstances and the capacity to solve complex problems.

    If all sides show wisdom and restraint, I believe that we can put the bitterness and pain of the recent past behind us and breathe new life in to the peace process. I urge you to carry back with you a message of peace and reconciliation, a message of our serious will and intent to solve all problems through dialogue and a message of deep empathy for the youth of Jammu and Kashmir.’

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  28. हमारे इलाके में एक कवाहत है; "जेकर जेतने जतन, ओकर ओतने पतन."

    मतलब यह कि जिसकी जितनी जतन होती है उसका उतना ही पतन होता है. वह उतना ही निकम्मा हो जाता है. वह अपनी नाकामी छुपाने के लिए दूसरों को दोष सेता है. वह दूसरे के ऊपर आरोप जड़ सकता है. उसे सही तरीके से जीने का सलीका नहीं पता रहता क्योंकि उसके मुंह में कोई दूसरा खाना डालता है. उसकी सोचने-समझने की शक्ति तक चली जाती है. उसे अपने बुरे-भले के बारे में फैसला करना मुश्किल हो जाता है. १९६५ में भी हमारे कर्णधारों ने यही कहा होगा कि; "२० साल पुरानी समस्या एक दिन में हल नहीं होगी और आज ६३ साल बाद यह कह सकते हैं कि ६२ साल पुरानी समस्या एक दिन में हल नहीं हो सकती."

    यह इच्छाशक्ति पर निर्भर होगा कि वे १०० साल बाद क्या कहते हैं. उनकी इच्छा होगी तो आराम से कह सकते हैं कि १०० साल पुरानी समस्या एक दिन में हल नहीं होगी.

    कश्मीर का समाज अब तथाकथित सेकुलर समाज नहीं है. कश्मीरियत जैसे लफ़्ज़ों का झुनझुना हमारे नेता से लेकर कश्मीर के बुद्धिजीवी तक उछालते रहते हैं. और झुनझुनों के शोर में वहां के 'नौजवान' पत्थर चलते हैं. नीचता की हद है. ४० साल पहले भी मरहम लगा रहे थे. आज भी मरहम लगा रहे हैं. यह कैसे बेअसर मरहम है जो काम ही नहीं करता. कितना मरहम चाहिए कश्मीर को?

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  29. I am proud of you Anurag for having such a clarity on this issue.
    Though you don't need mine / anyone's certificate.. But I could not resist myself !

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  30. क्या इत्तेफ़ाक़ है ?
    अमाँ.. August 11, 2010 11.31 AM और 11.35 PM !
    लोग कहीं यह न समझ लें कि मिलीभगत है... मैं तेरी खुजाऊँ, तू मेरी खुजा.. हा हा हा हा !

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  31. जितनी सारगर्भित चर्चा है, टिप्पणियाँ भी उतने ही मन से लिखी गयी है।

    जब अपनी ये पोस्ट लिख रहा था मैं, "रूल्स आफ इंगेजमेंट" नाम की फिल्म जेहन में थी। यमन के अमरीकि दुतावास से अमरीकी राजदूत को सुरक्षित बाहर निकालने की प्रक्रिया में अमेरिकन आर्मी के टुकड़ी कमांडर जो कि एक कर्नल हैं द्वारा दुतावास को घेरी भीड़ पर गोली चलाने का हुक्म दिया जाता है जिसमें कई महीलायें, बच्चे भी मारे जाते हैं। कर्नल पर अभियोग चलाया जाताहै...और बाद में पता चलता है कि भीड़ में शामिल छोटे-छोटे बच्चे भी आर्मी पर एके और पिस्तल से फायर कर रहे थे...

    डा० अमर साब की टिप्पणी यूं तो सबकुछ स्पष्ट कर देती है...लेकिन कुछ शब्द विशेषाधिकार के बारे में कहना चाहूंगा कि विगत बीस वर्षों कश्मीर आतंकवाद में अदि स्थिति कुछ नियंअत्रण में आयी है तो इसी विशेषाधिकार की बदौलत...निसंदेह कुछ दुरूपयोग भी हुये हैं...वर्ना पूरे विश्व के सामने चेचेन्या और अपने पड़ोसी मुल्क की स्वात घाटी का उदाहरण भी मैजूद है। काबिले-गौर हो कि कश्मीर में इतने के बावजोद भी एक टैंक तक नहीं उतारा गया है आर्मी द्वारा।

    एक बेमिसाल चर्चा के लिये सलाम तुमको कुश

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  32. डॉ. अमर कुमार और डॉ. अनुराग की बातों से मैं सहमत हूँ और ये भी समझना चाहिए हमें कि ये मुद्दे कोरी भावुकता से नहीं सुलझाए जा सकते, चाहे ये पक्ष हो या वो.
    ये बात सच है कि जब कश्मीर में लोगों की मौत होती है तो दिल्ली में कोई विरोध नहीं होता, पर इस स्थिति के ज़िम्मेदार स्वयं कश्मीर के लोग हैं, वहाँ के राजनीतिक दल और अन्य गुट भी हैं और हमारी केन्द्र सरकार भी, जो हर मुद्दे को बस राहत पॅकेज से सुलझाना चाहती है.
    डॉ. अनुराग की ये बात भी गौर करने लायक है कि अचानक से ये हिंसा क्यों भड़की, इस पर भी ध्यान देना चाहिए. वहाँ का सत्ताधारी दल निश्चित ही स्थिति का आकलन करने में नाकाम हुआ है.

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  33. @ शीब मोशाय
    "जेकर जेतने जतन, ओकर ओतने पतन !"
    यह बीती तवारीखों में झाँकने का विषय है कि.. इस जितनी जतन का सूत्रपात कैसे हुआ ...
    यदि पँचशील जैसे फ़्लॉप-शो का प्रवर्तक, एक ओर मुँहकी खाने के बाद.. यह महान उदारवादी विस्थापित तिब्बतियों सहित.. कश्मीरियों को पैकेज़ देने लगा ताकि अँतर्राष्ट्रीय मँच पर यह दिखा सके.. भारत उसका सच्चा और ज़ायज़ रहनुमा है । घर की अँदरूनी ज़रूरतों में कतर-ब्यौंत करके भी सही.. अपने मसीहाई युगदृष्टा की छवि तराशता रहा, तो दोष कहाँ है ?
    उत्तरी बिहार में "जेकर जेतने जतन, ओकर ओतने पतन !" के उलट एक लोकोक्ति प्रचलित है कि, " एकरा एतना कोढ़ी बना दू कि अपनी गाँ.. भी न धोये !"

    यह कैसे बेअसर मरहम है जो काम ही नहीं करता. कितना मरहम चाहिए कश्मीर को ?
    जब तक मैं अपने मरीज़ को चेताता रहूँ कि तुम घायल बीमार और अक्षम हो.. तुमको हमारे मरहम की आवश्यकता है ! इसके बिना तुम्हारा गुज़ारा नहीं.. इत्यादि इत्यादि

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  34. पाकिस्तान अक्सर यू एन रिज़ुलुशन का हवाला देता है .पर ये भूल जाता है के तब से यू एन के कहने के बावजूद पाकिस्तान ने उस हिस्से को खाली नहीं किया है जिस को उसने तब कब्ज़ा किया था .एक ओर सत्य है .गर इसे डेमोग्राफिक प्रोफाइल में देखा जाए ....वो ये है वह क्षेत्र मुख्यता तीन भागो में बंटा हुआ है .जम्मू ,कश्मीर ओर लद्दाख ...जिसमे कश्मीर में बहुतायत में मुस्लिम आबादी है ....जिसमे से तमाम हिन्दू आबादी का वहां से जबरदस्ती पलायन हो गया है ....लद्दाख में मूलत बौध अधिक संख्या में ओर जम्मू में हिन्दू बहुतायत में है ...... पर वहां की मुस्लिम आबादी का पलायन नहीं हुआ है......अलबत्ता लद्दाख में मुस्लिम आबादी धीरे धीरे बढ़ रही है ...पाकिस्तान का उस क्षेत्र को मुस्लिम बहुल आबादी होने के कारण उसे अपने भीतर शामिल करने का तर्क ..चूँकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है ...ओर अब जनसँख्या की दृष्टि से शायद मुस्लिम आबादी के मामले में दूसरा बड़ा देश (अगर मै गलत हूँ तो मुझे सही कर दे )इसलिए इस आधार को वो ठुकरा देता है .......
    दुर्भाग्य से पिछले कुछ सालो में अवसाद के केस न केवल वहां की लोकल पोपुलेशन में देखनो में मिले है अपितु सेना के कई जवानो के भीतर भी पाये गये है .तमाम कश्मीरी बुद्दिजीवी ओर कुछ मीडिया कर्मी जब एक एक मौत को रजिस्टर में दर्ज करते है ....अनजाने में वो आंकड़े के जाल में उलझ जाते है ..क्या आपमें से किसी को पिछले तीन दिनों में शहीद हुए पांच जवानो दो मेजर ओर एक कर्नल का नाम ...किस क्षेत्र के है पता है ? नहीं...जब इनके शव इनके परिवार वालो के यहाँ जाते है वे भी यही सोचते है के उनका बेटा व्यर्थ में गया ...देश के किसी हिस्से को उनकी परवाह नहीं है........देशभक्ति महज़ कोरी लफ्फाजी करना या पंद्रह अगस्त पे दो चार गीत गाना भर नहीं है ....ऐसी लिजलिजी देशभक्ति शहीद के परिवारों में एक अजीब सी वित्र्ष्ना इस सिस्टम ओर सरकार के प्रति भरती है .....


    इसे अभी टिपण्णी का केवल एक भाग माना जाए

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  35. कुश के तथ्य... डॉ० अमर एवं डॉ० अनुराग की टिप्पणियाँ....!!

    यह होती है एक सार्थक चर्चा। मैं स्वीकार करती हूँ कि इस संबंध में अखबार और मीडिया से अधिक जानकारी नही है मेरे पास। अतः प्रकरण को हर रोशनी में देखने की कक्षा का काम यह पोस्ट कर रही है।

    मैं अध्ययनरत हूँ आरी रहूँगी।

    अपीलः कभी कभी लगता है कि फज़ूल प्रॉपोगंडा का मंच तो नही हो गया ये ब्लॉगजगत...??? ऐसे कुछ सार्थक मुद्दे ला कर विश्वास बनाये रखा करें....!

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  36. भैरी गुड..भैरी गुड...खुजाओ और खूब खुजवाओ...

    वाह बहुते जोरदार अंगरेजी मारा है..हम तो नतमस्तक
    हुई गवा हूं...हमका भी तनि ई अंगरेजियां सिखाय दो देशी अंगरेजों.

    रिजल्ट ई रहा कि कुल मिलाय के एक पीठ खुजाऊ चर्चा भई।

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  37. भैरी गुड..भैरी गुड...खुजाओ और खूब खुजवाओ...

    वाह बहुते जोरदार अंगरेजी मारा है..हम तो नतमस्तक
    हुई गवा हूं...हमका भी तनि ई अंगरेजियां सिखाय दो देशी अंगरेजों.

    रिजल्ट ई रहा कि कुल मिलाय के एक पीठ खुजाऊ चर्चा भई। लगे रहो भईया...हमार का जात है...

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  38. @ Suri ने कहा…


    ऒऎ सुरीवा,
    कित्ती बार समझाया कि जहाँ बड़े बोल रहे हों वहाँ जाकर सुरसुराया न कर ।
    मानता काहे नहीं रे ? मतलब भर की अँग्रेज़ी सीख ले बच्चा... सामने तो आ, तेरे को अँगरेज़्ज़ी सिखाऊँ, मराठी सिखाऊँ, सँस्कृत सिखाऊँ, सिन्धी / मुल्तानी सिखाऊँ, या फिर मिष्टी बाँग्ला सिखाऊँ.. अगर सामने आने का साहस नहीं है सुरसुरिये.. तो अँदर के गोबर को साफ करके अपनी समझदानी का नाप भेज देना, जितना जो भी अटेगा, वह भर दूँगा..
    तू तो कानून का बड़ा ज्ञाता है, क्यों नादानियाँ किया करता है ?
    अपना मेल आई.डी. तूने अँग्रेज़ी में बनाया, एच.टी.एम.एल. कोड पर आधारित गूगल के प्लेटफॉर्म पर आकर हिन्दी में पोंक रहा है ।
    तू भी खुजवा ले.. जो खुज़ला रहा है वह सब खुजलाने की उचित व्यवस्था है, उससे चैन न मिले तो चमड़ी का डॉक्टर भी अपनी टीम में है.. उसे तेरी सेवा में लगा दूँगा । पर यार.. यहाँ या कहीं पर चिराँध न फैला ।
    चेहरे पर रूमाल डाल कर तू कुछ भी कर और करवा सकता है, तेरा चरित्र तो जाहिर हो ही जाता है.. पर अपनी शख़्सियत छुपा लेने का कोई भ्रम न रख । चल फूट.. अब से यहाँ आसपास न दिखना ।
    यह ठेठ हिन्दी न समझ आयी हो तो गूगल ट्राँसलेशन में जाकर झख़ लगा.. पर यूँ गँध न मचा वत्स !

    बोलत हो बच्चा कि, " लगे रहो भईया...हमार का जात है... "
    अउर पूरी दुनिया देखि रही है कि अकेले तुम्हरे जानि केतना कल्लात है !

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  39. पिछली टिप्पणी बड़ी हड़बड़ी में लिख गया था...टंकण-त्रुटियाँ जाहिर हैं।
    अब फिर से आया हूँ...

    अनुराग जी और अमर साब के लिख लेने के बाद शायद कुछ और शेष नहीं रह जाता है कहने को। नेहरु की स्वप्नदृष्टि को मोतियाबंद लग जाने वाला बिम्ब सब कुछ कह देता है वैसे भी। लेकिन क्या पूरी गलती नेहरू की ही थी? अपने लौहपुरूष का योगदान भी तो प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। हैदराबाद के निज़ाम का पाकिस्तान में विलय हो जाने की मंशा को ठुकराना और हरीसिंह के प्रस्ताव को मान लेना...???

    दूसरी बात है कश्मीरी पंडितों का पलायन। जब आतंकवाद का अंकुर फूटा था अस्सी के दशक के आखिरी क्षणों में, उनको पलायन के लिये विवश करने में जितना इस अंकुर का हाथ था उतना ही उस आह्वान का भी जो तात्कालिन राज्यपाल जगमोहन की तरफ से दिया गया था तमाम पंडितों को कि आप कश्मीर खाली करें और आपको कुछ ही दिनों में वापस बुला लिया जायेगा मामला सुलझते ही। वर्ना तो दंगे कहाँ नहीं हुये हैं अपने मुल्क में, क्या हर उन जगहों से माइनोरिटिज ने अपना डेरा-डंडा छोड़ दिया है?

    अब इतिहास के पन्ने पलटने से तो ये आग बुझने से रही। कश्मीर को दरकार है पूरे देश के विश्वास की और अतिरिक्त स्नेह की। आजादी की माँग एक ऐसा भूत है जिसका कोई अस्तित्व न होते हुये भी एक बच्चा उस भूत को मानने लगता है घर-परिवार वालों से सुन-सुन कर।
    अस्सी के दशक की बड़ी हुई पीढी कश्मीर की...ऐसा ही एक बच्चा जो भूत-भूत सुनकर उसके अस्तित्व पर विश्वास करने लगा है।

    उत्तर देंहटाएं
  40. कुश बाबू, आपकी चर्चा पर शायद ध्‍यान न जाता अगर डॉ: अनुराग ने फेसबुक पर लिंक न दिया होता तो। आपने बेहद मेहनत की लोगों की फ्रेंडलिस्‍ट खंगालने और जानकारी हासिल करने में। मैं तो नहीं कर पाती इतना, इसीलिए एक फेसबुक एंट्री पर बात करने के बाद जब मेजर की बात सामने आई तो मैंने मामला साफ कर दिया।
    बाकी आपकी निम्‍नलिखिलत ऑब्‍जर्वेशन पर गदगद हूं, ईश्‍वर यूं ही आप पर क्रपालु रहें।
    शुभकामनाएं,


    शायदा जी की संवेदनशीलता भी इसी का परिणाम लगती है..


    नोट; मैं एक बार फिर कहती हूं कि जैसा लिखा जाए उसे उसी तरह पढ़ना और समझ पाना आज भी आसान नहीं।

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  41. . @ गौतम राजरिशी :
    ONE
    ज़हे किस्मत मेज़र... आपके सवाल का हवाला इत्तेफ़ाक़न मेरे पास मौज़ूद है । यदि कश्मीर विलय के सँधिपत्र पर हस्ताक्षर के समय मौज़ूद ज़नरल सैम मॉनेक शॉ का बयान देखा जाय तो कई बातें स्पष्ट हो जाती हैं ... उन्होंनें अक्षरशः इसे यूँ बयान किया है : Kashmir 1947, Rival Versions of History, by Prem Shankar Jha, Oxford University Press, 1996
    From the political side, Sardar Patel and V P Menon had been dealing with Mahajan and the Maharaja, and the idea was that V.P Menon would get the Accession, I would bring back the military appreciation and report to the government. The troops were already at the airport, ready to be flown in. Air Chief Marshall Elmhurst was the air chief and he had made arrangements for the aircraft from civil and military sources.
    Anyway, we were flown in. We went to Srinagar. We went to the palace. I have never seen such disorganisation in my life. The Maharaja was running about from one room to the other. I have never seen so much jewellery in my life --- pearl necklaces, ruby things, lying in one room; packing here, there, everywhere. There was a convoy of vehicles.
    The Maharaja was coming out of one room, and going into another saying, 'Alright, if India doesn't help, I will go and join my troops and fight out'. I couldn't restrain myself, and said, 'That will raise their morale sir'. Eventually, I also got the military situation from everybody around us, asking what the hell was happening, and discovered that the tribesmen were about seven or nine kilometres from what was then that horrible little airfield.

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  42. @ गौतम राजरिशी :
    TWO
    V P Menon was in the meantime discussing with Mahajan and the Maharaja. Eventually the Maharaja signed the accession papers and we flew back in the Dakota late at night. There were no night facilities, and the people who were helping us to fly back, to light the airfield, were Sheikh Abdullah, Kasimsahib, Sadiqsahib, Bakshi Ghulam Mohammed, D P Dhar with pine torches, and we flew back to Delhi. I can't remember the exact time. It must have been 3 o'clock or 4 o'clock in the morning. At Delhi, the first thing I did was to go and report to Sir Roy Bucher. He said, 'Eh, you, go and shave and clean up. There is a cabinet meeting at 9 o'clock. I will pick you up and take you there.' So I went home, shaved, dressed, etc. and Roy Bucher picked me up, and we went to the cabinet meeting.
    The cabinet meeting was presided by Mountbatten. There was Jawaharlal Nehru, there was Sardar Patel, there was Sardar Baldev Singh. There were other ministers whom I did not know and did not want to know, because I had nothing to do with them. Sardar Baldev Singh I knew because he was the minister for defence, and I knew Sardar Patel, because Patel would insist that V P Menon take me with him to the various states.
    Almost every morning the Sardar would sent for V P, H M Patel and myself. While Maniben (Patel's daughter and de facto secretary) would sit cross-legged with a Parker fountain pen taking notes, Patel would say, 'V P, I want Baroda. Take him with you.' I was the bogeyman. So I got to know the Sardar very well.
    At the morning meeting he handed over the (Accession) thing. Mountbatten turned around and said, ' come on Manekji (He called me Manekji instead of Manekshaw), what is the military situation?' I gave him the military situation, and told him that unless we flew in troops immediately, we would have lost Srinagar, because going by road would take days, and once the tribesmen got to the airport and Srinagar, we couldn't fly troops in. Everything was ready at the airport.
    As usual Nehru talked about the United Nations, Russia, Africa, God almighty, everybody, until Sardar Patel lost his temper. He said, 'Jawaharlal, do you want Kashmir, or do you want to give it away'. He (Nehru) said,' Of course, I want Kashmir (emphasis in original). Then he (Patel) said 'Please give your orders'. And before he could say anything Sardar Patel turned to me and said, 'You have got your orders'.

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  43. @ गौतम राजरिशी :
    THREE

    I walked out, and we started flying in troops at about 11 o'clock or 12 o'clock. I think it was the Sikh regiment under Ranjit Rai that was the first lot to be flown in. And then we continued flying troops in. That is all I know about what happened. Then all the fighting took place. I became a brigadier, and became director of military operations and also if you will see the first signal to be signed ordering the cease-fire on 1 January (1949) had been signed by Colonel Manekshaw on behalf of C-in-C India, General Sir Roy Bucher. That must be lying in the Military Operations Directorate.


    जैसा कि टिप्पणी के पहले ही हिस्से में बता दिया था । यह सँदर्भ
    Kashmir 1947, Rival Versions of History, by Prem Shankar Jha, Oxford University Press, 1996 से लिया गया है ।


    और अँत में.. हिन्दी के अप्रत्यक्ष सँरक्षक एवँ अनन्य सेवक श्री सुर्री साहब के लिये यह गूगल ट्राँसलेशन प्रस्तुत है । व्याकरण और वर्तनी सँबधी त्रुटि को कृपया स्वयँ ही सुधार लें । यह देशी अँग्रेज़ आपको अनचाहे ही ऎसा कष्ट न देता.. पर और भी काम हैं ज़माने में.. आपके द्वारा छोड़ी हुई सुर्रीयों को पकड़ने के सिवा ....
    "राजनीतिक पक्ष की ओर से, सरदार पटेल और वी.पी. मेनन महाजन और महाराजा साथ काम कर रहे थे, और विचार यह था कि वी.पी. मेनन परिग्रहण मिल जाएगा, मैं वापस सराहना और सैन्य सरकार को रिपोर्ट लाना होगा. सैनिकों के हवाई अड्डे पर पहले से ही थे, तैयार करने के लिए एयर चीफ मार्शल Elmhurst अंदर भेजा जा एयर चीफ था और वह नागरिक और सैन्य स्रोतों से विमान की व्यवस्था की थी.
    वैसे भी, हम हम श्रीनगर के लिए गया था अंदर भेजा गया था. हम महल में चला गया. मैंने अपने जीवन में ऐसी गड़बड़ी नहीं देखा. महाराजा के बारे में एक कमरे से दूसरे के लिए भाग रहा था. मैं अपने जीवन --- मोती हार, माणिक बातें, एक कमरे में पड़े में इतना आभूषण कभी नहीं देखा है, यहाँ पैकिंग, वहाँ हर जगह. वहाँ वाहनों के एक काफिले पर किया गया था.

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  44. हिन्दी के अप्रत्यक्ष सँरक्षक एवँ अनन्य सेवक श्री सुर्री साहब के लिये यह
    भाग दो

    महाराजा एक कमरे से बाहर आ रहा था, और एक और कहा, 'ठीक है, यदि भारत की मदद नहीं करता में जा रहा है, मैं जाकर अपनी सेना में शामिल हो जाएगा और बाहर लड़ाई'. मैं खुद को रोक नहीं है, और कहा, 'यह उनका मनोबल' सर उठाएंगे सकता है. आखिरकार, मैं भी हमारे आसपास हर किसी से सैन्य स्थिति है, पूछ नरक क्या हो रहा था, और पता चला कि आदिवासियों फिर क्या है कि भयानक छोटे से हवाई अड्डे गया था के बारे में सात या नौ किलोमीटर की दूरी पर थे.
    वी.पी. मेनन महाजन और महाराजा के साथ चर्चा के बीच में था. अंततः महाराजा परिग्रहण के कागजात पर हस्ताक्षर किए हैं और हम डकोटा में वापस देर रात में उड़ान भरी. कोई रात सुविधाएं थे, और लोग हैं, जो हमें मदद कर रहे थे वापस करने के लिए उड़ान, हवाई क्षेत्र रोशनी करने के लिए, पाइन मशालों के साथ शेख अब्दुल्ला Kasimsahib, Sadiqsahib, बख्शी गुलाम मोहम्मद, डी पी धार थे, और हम दिल्ली के लिए वापस उड़ गया. मैं सही समय याद नहीं है. यह 3 बजे गया होगा या 4 बजे सुबह में. दिल्ली में पहली बात मैं नहीं था जाने के लिए और सर रॉय Bucher रिपोर्ट करने के लिए किया गया था. 'उन्होंने कहा, ' अरे, तुम, जाओ और दाढ़ी और साफ. वहाँ 9 बजे कैबिनेट की बैठक है. मैं तुम्हें लेने जाएगा और तुम वहाँ ले चलो. तो मैं घर चला गया, मुंडा, कपड़े, आदि और रॉय Bucher मुझे उठाया, और हम कैबिनेट की बैठक में गया.
    कैबिनेट की बैठक माउंटबेटन की अध्यक्षता में किया गया था. वहाँ जवाहर लाल नेहरू था, वहाँ सरदार पटेल था, वहाँ सरदार बलदेव सिंह था. वहाँ अन्य मंत्रियों जिसे मैं जानता हूँ और नहीं चाहता था पता नहीं था, क्योंकि मैं उनके साथ कुछ नहीं करना पड़ा था. सरदार बलदेव सिंह मैं क्योंकि वह रक्षा के लिए मंत्री थे जानता था, और मुझे पता था कि सरदार पटेल, क्योंकि पटेल का कहना है कि वी.पी. मेनन उसके साथ मुझे विभिन्न राज्यों में ले जाओ.
    लगभग हर सुबह सरदार VP, एचएम पटेल और खुद के लिए भेजा जाएगा. जबकि Maniben (पटेल की बेटी और वास्तविक सचिव) बैठते थे पार पार्कर एक फव्वारा नोट लेने कलम से पैर पटेल कहते हैं, 'वी.पी. होता है, मैं बड़ौदा चाहते हैं. उसे अपने साथ ले जाओ. ' मैं हौवा खड़ा किया गया था. तो मैं सरदार बहुत अच्छी तरह से पता है.
    सुबह की बैठक में वह अधिक (परिग्रहण हाथ) बात. माउंटबेटन के चारों ओर बदल दिया और कहा Manekji चलो (वह मुझे बुलाया, 'मानेकशॉ के बजाय Manekji), जो सैन्य स्थिति है?' मैं उसे सैन्य स्थिति दिया और उनसे कहा कि जब तक हम सेना में तुरंत उड़ान भरी, हम श्रीनगर खो दिया होता, क्योंकि सड़क मार्ग से जा रहे दिन लगेंगे, और एक बार आदिवासियों और श्रीनगर हवाई अड्डे के लिए मिला है, हम सेना में उड़ नहीं सकता सब कुछ. हवाई अड्डे पर तैयार था.
    हमेशा की तरह नेहरू संयुक्त राष्ट्र, रूस, अफ्रीका, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, सब के बारे में बात की थी, जब तक कि सरदार पटेल ने अपना आपा खो दिया. उन्होंने कहा कि जवाहर लाल, ', क्या आप कश्मीर, या आप के लिए इसे दूर दे' करना चाहते हैं करना चाहते हैं. वह (नेहरू) ने कहा, बेशक, 'मैं कश्मीर के मूल में (जोर) चाहता हूँ. फिर उसने कहा (पटेल) 'कृपया दे अपने आदेश. और इससे पहले कि वह कुछ भी कह सकते हैं कि सरदार पटेल ने मुझे दिया और कहा, 'तुम मिल गया है अपने आदेश.

    मैं बाहर चला गया, और हम के बारे में 11 बजे से 12 बजे सैनिकों में उड़ान शुरू कर दिया. मुझे लगता है कि रंजीत राय के तहत सिख रेजिमेंट कि पहले अंदर प्रवाहित हो और फिर हम अंदर सैनिकों उड़ान को जारी रखा है कि सभी के बारे में मैं क्या हुआ पता है बहुत से किया गया था. तब सब लड़ जगह ले ली. मैं एक ब्रिगेडियर बन गया, और सैन्य अभियानों के निदेशक और यह भी अगर आप पहले संकेत देखेंगे हो गया 1 जनवरी (1949) पर संघर्ष विराम आदेश पर हस्ताक्षर किया था कर्नल मानेकशॉ द्वारा की ओर से हस्ताक्षर किए गए सी सी के भारत में, जनरल साहब रॉय Bucher. कि सैन्य संचालन निदेशालय में झूठ बोल रही होगी."

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  45. खोजी पत्रकार की तरह तमाम स्रोत/सूत्र खंगाल कर एक विषय-चित्र व चित्र के पीछे का चित्र सामने रख कर आपने चिट्ठा-चर्चा के विमर्श स्तर को एक नया आयाम दिया है..जो भविष्य मे भी किसी विषय को रखते समय एक बेंचमार्क की तरह देखा जायेगा..टिप्पणियों की वैचारिक सांद्रता इसी कड़ी को आगे बढ़ाती चलती है..और कई तथ्य व लिंक आगे के लिये भी सहेज लिये जाने वाले लगते हैं..चर्चाकार व टिप्पणीकार सार्थक विमर्श के लिये बधाई के पात्र हैं..पढ़ रहा हूँ पूरा और इसे आगे भी पढ़ा जाता रहेगा..

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  46. डा० अमर साब को नमन,

    सुर्री साब की खातिर की गयी इस अतिरिक्त मेहनत पे बरबस ठहाका लगा कर हँस पड़ा। आपकी पहली फटकार के बाद वो वैसे ही नहीं आने वाले थे यहाँ। खैर...

    प्रेम शंकर झा के इस शोध से मैं परिचित न था{...और विगत दो चार सालों से कश्मीर से संबधित तमाम शोध पढ़ डालने का भ्रम पाले हुये था :-)}। इसको उपलब्ध कराने का दिल से शुक्रिया। ढ़ूंढ़ता हूँ इसका प्रिंटेड वर्जन।

    किंतु मेरा सवाल दूसरे मंतव्य से था। विभाजन के वक्त जिन राज्यों को छूट दी गयी थी भारत अथवा पाकिस्तान में मिल जाने की, उनमें हैदराबाद निज़ाम के शासन में और कश्मीर हरीसिंह के शासन में मुख्य थे। निज़ाम ने जब पाकिस्तान से विलय की मंशा जाहिर की तो लौहपुरूष ने जबरन ये कहकर विलय करवाया भारत में कि राजा तो माइनोरिटी कम्युनिटी का और अधिकतम जनसंख्या हैदराबाद की हिंदुओं की है। कश्मीर के हरीसिंह ने जब शुरूआत में स्वतंत्र रहने की जिद ठानी और बाद में कबाइलियों के अतिक्रमण से घबड़ा कर भारत से मदद की अपील की तो उस समय ये लाजिक क्यों नहीं अपनाया गया? यहाँ भी राजा माइनोरिटी कम्युनिटी से था। कश्मीरी पंडितों से कहीं ज्यादा जनसंख्या मुस्लिमों की थी।

    गलतियां तो शर्तियां हमारे इतिहास से हुईं हैं। ऊपर डा० अनुराग साब का ये कहना कि पाकिस्तान बार-बार यूएन रिजिल्युशन की बात करता है, तो घोषणा प्लेबिसाइट की हमारे ही सुप्रिमो द्वारा की गयी थी खुलेआम और बाद में नकारते रहे हम।

    कश्मीर को लेकर महज दो व्यक्ति विशेष के खास सेंटिमेंट्स जुड़े थे, जिसका खामियाजा जाने कितनी पीढ़ियां चुका रही हैं और अभी जाने कितनी और चुकायेंगी।

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  47. अब यूं कायरों की तरह बैठेंगे तो यही होगा न. नेता लोगों को, पाकिस्तान के दबा कर बैठे कश्मीर के हिस्से दिखाई नहीं देते ! उल्टे भारतीय कश्मीर को हथियाने के हथकंडे से बचाव करते दिखते आए हैं हम. offense is the best defense.. यही कर रहा है पाकिस्तान और सफाइयां देते हम घूम रहे हैं... हास्यास्पद है हमारी स्थिति और हमारी प्रतिक्रिया.

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  48. कुश बेहतरीन चर्चा जो एक बार भी विषय से नही भटकी और ना ही जिसको तमाम लिंकों से पाटा गया।

    अमेरिकी फुटबाल में दो टीम आपस में भीड़ती है, लेकिन टीम की परफोर्मेंस और उसकी हार-जीत मैदान में एक दूसरे के सिर से सिर टकराने वाले खिलाड़ियों के प्रदर्शन में कम निर्भर करती है। खेल का असली पासा चलता है मैदान से बाहर बैठा कोच। यहाँ फर्क इतना है कि फुटबाल है काश्मीर, एक तरफ है पुलिस और फौजी, दूसरी तरफ है बहलाये फुसलाये गये बुद्धिहीन लोग। एक टीम के कोच हैं वोटों के लालची नेता और दूसरी टीम के कोच हैं कुछ धार्मिक उन्मादी और दोगले नेता। और हम, हम हैं कुर्सियों पर चिपकी खेल प्रेमी जनता जो कभी अपनी टीम की जीत पर तालियाँ बजाने लगती है तो कभी हार पर झुँझलाने और तिलमिलाने।

    किसी भी खेल को जितने का सिर्फ एक ही नुकसा है - औफेंस इज द बेस्ट डिफेंस, कोई भी मैच उठा के देख लें चाहे वो मैदान में खेला जा रहा हो या गया हो या फिर सीमाओं के आर-पार, जीत हमेशा उसी की हुई है जो औफेंस इज द बेस्ट डिफेंस के फार्मुले के साथ खेलने उतरी हो।

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  49. मेरी संवेदनायें कहीं मर तो नही चुकी, बस कभी कभी ताज्जुब कर लेता हूँ इस बात पर कि काश्मीर में मरे या मारे गये बच्चे और अफगानिस्तान में मारे जा रहे बच्चों में तो फर्क नही किया जा रहा। ईरान में किसी महिला को एक छोटे से कसूर पे पत्थर से मारने की सजा ज्यादा बर्बर है या दुनिया के किसी कोने में किसी मासूम के साथ की गयी जबरदस्ती।

    कई बार ये भी समझ नही पाता कि भीड़ में गोली चलाने से ज्यादा लोग मरते हैं या किसी सोशियल नेटवर्क की साईट में अफवाह फैलाने से। समय से पहले कोई भी मरे दुख होता है और अगर वो बच्चा हो तो कुछ ज्यादा लेकिन जब संवेदना को नमक मिर्च के साथ व्यक्त किया जाता है तो सिवाय आक्रोश के कुछ नही कर सकता।

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  50. प्रबुद्ध जनों के विचार पढ़कर कोलाहल में और उफान ही आया है.. डा. अमर कुमार जी की टिपण्णी की अंतिम पंक्तियों का अनुमान मुझे पहले से ही था और इसे स्वीकार करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं लगती.. दरअसल मैं आहत था हमारी संवेदनाओ के साथ खेले जाने से.. कुछ लोगो द्वारा हमारी भावनाओ के साथ खिलवाड़ बड़े प्रायोजित तरीके से किया जा रहा है.. हम उन लोगो के साथ मिलकर देश की सेना को गाली दे रहे है जिन लोगो का काम ही सेना को गाली देना है..

    जो लिंक्स मैंने दिए है वहां से कई रास्ते खुलते है.. दरअसल सभी लिंक्स को समेट पाना बहुत ही मुश्किल है इसलिए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे चंद रास्ते भर देना ही मेरा मकसद था जो लगभग पूरा भी हुआ.. कश्मीर पर चर्चा एक पोस्ट में करना संभव ही नहीं.. कश्मीर के महाराजा के फैसले से यहाँ तक पहुंचना बड़ा मुश्किल काम है..

    तमाम बाते जो इन टिप्पणियों और लिंक्स के मार्फ़त पता चली ये शायद तब की घटनाये है जब मेरे लिए स्कूल का होमवर्क बड़ा मसला था.. इतनी उम्र भी नहीं मेरी कि इन मुद्दों पर बात कर सकु तो समझना चाहता था देखना चाहता था करीब से कि आखिर मामला क्या है.. बाते बहुत सी है.. घटनाओ को देखने का नजरिया एक ही नहीं है.. कई ऐसी बाते है जो हमें झकझोर के रख देती है.. पर नकारात्मक एजेंडा लेकर चलने वाले लोगो द्वारा भावनात्मक रूप से हमारा छले जाना ही मुझे गलत लगा इसीलिए सिर्फ उन्ही बिन्दुओ पर मैंने अपनी बात की.. कश्मीर को यक़ीनन यही नहीं छोड़ा जा सकता.. कई सारे रास्ते और खुले है और उनसे भी गुज़ारना है.. शायद दोबारा एक चर्चा में उनका भी जिक्र करू..

    शायदा जी ने बहुत अच्छी बात कही "दरअसल जो लिखा गया है वो उसी सन्दर्भ में पढ़ा नहीं जाता.. " मैं भी यही कहूँगा...

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  51. @ फ़ुरसतिया जी उर्फ़ फ़ुरफ़ुरिया जी अऊर डा. अमर कुमार

    हमारे कमेंट छापो तो लोग समझे कि आपने क्या गुल गपाडा किया है? अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनके काहे राजी होते हो? बहस करनी हो तो हमरे कमेंटवा छापो.

    captcha भी लगा दिये हो? अच्छा किये हो कुरकुरिया फ़ुरफ़ुरिया जी

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  52. वैसे सय्यद सलाउद्दीन नाम के एक शख्स ने जो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से एक यूनाईटिड जिहाद नाम की एक संस्था चलाते है लोगो को सडको पे आने का एलान किया है .....दुर्भाग्य से एक सच ओर भी है के जिस लड़के की मौत से ये सारा बवाल हुआ है उसकी मौत टियर गेस के शेल से हिट होने के बाद हुई थी

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  53. पहले ही बता दूँ कि मै कश्मीर के बारे में समाचारें अखबारें में जो
    पढा है उतना ही या उससे भी कम जानती हूँ पर चर्चा में कुछ मुद्दों पर ध्यान धिलाना चाहती हूँ ।
    गलतियाँ हमसे भी बहुत हुई हैं । जिसका अलगाव वादियों ने फायदा उठाया है । केन्द्र सरकार ने क्यूं नही वहाँ उद्य़ोग धंदे शुरू किये । लोग अगर रोटी रोजी पाते तो इतना बवाल नही होता । 1983 त।क स्थिति इतनी बुरी नही थी बल्कि अच्छी ही थी हम तब कश्मीर घूमने गये थे । सारे स्थानीय लोगों का हमें भरपूर सहयोग मिला था । इतना कि हमें वैष्णो देवी के दर्शन कराने जो पिठ्ठू ले गया था वही हमें वैष्णो देवी से संबंधित कहानियाँ सुना रहा था । कहना न होगा कि वह मुसलमान था और ुसने हमे दिल्ली चिठ्ठी भी भेजी जोहम तो पढ नही पाये पर पठवाने से पता चला कि उसने हमें वहाँ दुबारा आने का अनुरोध किया है । भूखे पेट को कोई भी बरगला सकता है ।

    उन्हें यह सच स्वीकार करवाने की पहल होनी चाहिये, कि स्वतंत्र कश्मीर को अपना अस्तित्व बनाये रखन कठिन होगा, अँततः उन्हें भारत या पाकिस्तान के बचे-खुचे हिस्से के साथ ही रहना होगा । एक भूमि से घिरा देश जिसके दो बडे दुष्मन ()दोनों तरफ हों वह कैसे बचा रह सकता है । जो लोग पाकिस्तान में मिलना चाहते हैं उन्हें यह भी दिखाना होगा कि आजाद कश्मीर (गुलाम कश्मीर ) में मुसलमानों की हालत कैसी है । शिक्षा, आमदनी, रोजगार के अवसरों का इसमें तुलनात्मक विश्लेषण हो ।
    और खाली कश्मीर दे देनेसे यह समस्या सुलझेगी नही फिर तो उंगली पकडाते ही पहुँचा पकडने वाली स्थिति हो सकती है ।

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  54. bahut hi dil ko andar tak jhakjhor dene baali bishay bastu hai kaashmeer, in tipptiyo ko padha to sochaa kuc likhu par samayaabhab ke kaaran likh naa paayaa, kintu is bishay par likhane ke vaayade ke saath .................. jai hind jia kaashmer

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