शुक्रवार, सितंबर 24, 2010

हम अपने- अपने समय की खिडकियों से झांकते चेहरे है

जावेद अख्तर ने कहा था" मुश्किल हालात में जीना भी एक आर्ट है" ....पर सच पूछिए तो बहुत अच्छे हालात में भी जीना भी एक आर्ट है ....हर कोई यश को नहीं संभाल सकता... .हर कोई सचिन नहीं होता....यश की लालसा का वायरस संक्रामक होता है ......न उम्र देखता है .न डिग्री.... बहुतेरे उम्र दराज विद्वानों को इसकी लपेट में देखा है ....दरअसल हम हिन्दुस्तानी अपने आप में विरोधात्मक चरित्र होते है .....गुप्त दान भी करते है पर चाहते है उसकी प्रशंसा सार्वजनिक की जाये ...कमरे के भीतर बैठकर समाजवाद की बौद्धिक उल्टिया करेगे ओर बाहर रिक्शे वाले से पञ्च रुपये पर लड़ेगे ......स्त्री विमर्श पर एक धांसू कविता लिखते है पर पत्नी के साथ जोइंट अकाउंट रखते है ....ओर उसका डेबिट कार्ड भी ...
लेखक इससे इतर नहीं है .कभी कभी वो भी अपने भीतर चहलकदमी करता है ....अपने आप को खंगालता है ....मनीषा कुलश्रेष्ठ ऐसे ही अपनी डायरी के कुछ पन्ने  सबद पर खोलती है 


 खुद को औरों से अधिक बुद्धिमान दिखाने की इच्छा, चर्चित होने और मरने के बाद याद रखे जाने की चाह जैसी बहुत - सी वजहें होती हैं लिखने के पीछे. शब्दों से ही समाज बदल डालने और लोगों की जिन्दगियों पर असर डालने जैसे कई - कई मुगालते होते हैं लिखने वालों को. मैं इन सारे मुगालतों से थोडा - थोडा ग्रस्त जरूर हूं पर मुझे पता है कि ये गंभीर वजहें नहीं हैं मेरे लिखने की.

अपनी अनवरत, अंतहीन यायावरी के दौरान, जगह – जगह से बटोरे गए सूखे तनों-जड़ों की ही तरह जो भी अनुभव भीतर- बाहर सहेजा, उसी की अस्तव्यस्त पोटली में से हर बार कुछ नया निकाल कर, उन पर ‘प्राईमर’/‘टचवुड’ लगा कर नई कलाकृति में ढालने की प्रवृत्ति ही प्रमुख रही है.

ज़्यादातर लोग अपने आप से बाहर नहीं निकल पाते, केवल अपनी कहानियां लिखना अकसर लोगों को मज़ा देता है. मुझे वह आसान लगता है. खुद को तरह - तरह के आकर्षक रंग पोत कर, निर्दोष बना कर कहानी में बिठा देना आसान कवायद है. वहाँ चुनौती नहीं, असली चुनौती है, दूसरों के भीतर बैठकर लिखना. खास तौर पर दूसरे जेण्डर या बिलकुल दूसरे तबके या दूसरे समाज के व्यक्ति के भीतर घुस कर लिखना. 

पूरा लेख पढ़िए यक़ीनन आप लेखिका की स्वीकारोत्ती में ईमानदारी महसूस करेगी .
  इतने समझदार है कहानी को कहानी की तरह ही पढ़ते है ..ओर यथार्थ  को यथार्थ  की तरह ही भोगते है ....ओर ये चीजे हमें कोई नहीं सिखाता ...अपने आप जाती है....बच्चे अपने बचपन के साल अब खुद तय करने लगे है......
. हथकड़ उसी समय पर  अपने तरीके से  कैमरा रखता है ......आओ शिनचैन लडकियों के शिकार पे चलो .....मुझे ये शीर्षक बड़ा अपील करता है .......वैसे इस  एपिसोड से मेरी वाकिफियत भी है .ओर इस करेक्टर से भी 

मुझे आज के दिनों की तुलना अपने बचपन से नहीं करनी चाहिए. समय के आरोहण ने हमें अलग मक़ाम पर लाकर खड़ा कर दिया है लेकिन जो नुकसान हो रहा है वह द्रुतगामी है और संवेदनशील है.  मैं बाइक पर पीछे बैठे बेटे से पूछता हूँ, छोटे सरकार कभी खेत में हरे सिट्टों को छू कर देखा है ? वह प्रतिप्रश्न करता है, कैसा लगेगा ? मैं चुप कि एक अपराधबोध भीतर कुनमुनाता है. बच्चों को दिये गए लम्बे भाषण याद आते हैं. ये नहीं करना, वो नहीं करना मगर करना क्या ? इसका हमको भी नहीं पता... ऐसे ही सोच भागी चली जा रही थी और दूर तक काले - पीले सिट्टों से झूमते हुए खेत हमारे साथ भाग रहे थे.




प्रत्यक्षा जी   का लिखा  कोर्स की उस किताब को पढने जैसा है जो हर बार पढने में  अपने नए अर्थ खोलती है   मसलन.......
 हमारे दायरे में जितने लोग आये हम उतने उतने भी हुये ,उनके देखे जितने हुये ,उनके देखे के बाहर भी हुये और उनके देखने में खुद को देखते , और भी हुये । तो ऐसे हम हुये कि एक न हुये , जाने कितने हुये
मसलन

होना कितनी तकलीफ को कँधों पर टिकाये घूमना है । सोते हुये सपने देखना है और उससे भी ज़्यादा जागे हुये देखना है ।
या
उसका कुछ कहना लाजिमी नहीं था । सिर्फ सुनना लाजिमी था । शायद सुनना भी नहीं था । सिर्फ होना ज़रूरी था । ठंडी रात में किसी का होना सिर्फ ।

मोरे बचवा होना तो जाने क्या क्या चाहिये था ?
यक़ीनन!!!




इन तमाम ख्यालो ओर सोचो से अलग एक ओर बहस कही चल रही है ......बेमतलब की .....
उसकी आवश्यकता क्यों है .विनीत इस पर रौशनी डालते है ......
आप भी सोचेगें कि इन सिरफिरों को सिनेमा की अच्छी ठरक चढ़ी है। जहां पूरा देश राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मसले पर आनेवाले फैसले को लेकर सुलगने-बुझने की स्थिति में है, सब जगह चौक-चौबंद लगा दिए गए हैं, दूसरी तरफ दिल्ली का हर शख्स बाढ़ और कॉमनवेल्थ की खबरों के बीच डूब-उतर रहा है। ऐसा कैसे हो सकता है कि जब ये देश दो सबसे बड़े मुद्दों के बीच अटक सा गया है, ये लोग उससे मुक्ति सिनेमा में जाकर खोज रहे हैं। जिस सूरजकुंड के रिसॉर्टों के बीच लोग चिल्ल होने आते हैं, वो सिनेमा के पचड़ों को लेकर क्यों चले गए? मौजूदा हालातों से अगर ये पलायन है तो फिर ये योग और आध्यात्म की गोद में गिरने के बजाय सिनेमा के बीच जाकर क्यों गिरे? इसे आप खास तरीके का बनता समाज कहें, तारीखों का संयोग या फिर देश की राजनीति और खेल की तरह ही सिनेमा का भी उतना ही जरुरी करार दिया जाना, ये आप तय करें। फिलहाल…
पर यकीन मानिए सिनेमा के कई एडिक्ट्स है.. जो इन सरफिरो की बात सुनना चाहते है
जयदीप अपना दर्द ओर लिमिटेशन कुछ यूं ब्यान करते है
लेकिन क्या, इस देश में सिर्फ पल्प फिक्शन बनकर रहेगा, क्या लिटरेचर पर कोई फिल्म नहीं बन पाएगी। जिनके पास पैसा है उनके पास स्पिरिट क्यों नहीं है कि कुछ अलग प्रोजेक्ट पर काम करें। रिलांयस के पास पैसा है, इतना बड़ा वेंचर है लेकिन वो चींटी को भी बुरी तरह पीस कर खा जाएंगे। ये बहुत बुरी चीज है इनके पास इतना पैसा है लेकिन सबको पीस डालने की जो प्रवृति हैवो चिंताजनक है।
आगे वे इसे विस्तार देते है
हम कम्पीलिटली कॉलोनियलाइज हैं, पहले हम इतने नहीं थे। ये जो क्रिएटिविटी को लेकर आत्मविश्वास की कमी है, वो हमारे यहां साफ तौर पर दिखाई देती है। कॉलोनियलाइज हैं, हम खुद नहीं बना सकते हैं। एक कॉम्प्लेक्स है कि हम नहीं कर सकते, इसलिए हम कहानियां नहीं दे पाते। जिनके पास पैसे हैं वो हम पर हंसते हैं। जिस तरीके से वो पेश आते हैं बेसिकली वो आपको-हमें गदहे समझते हैं।
 फिर एक ओर "भ्रम 'से वो हमें बाहर  निकालते है

बहुत लोग समझते हैं कि नई फिल्म आ रही है लेकिन ये सिनेमा के दिखाए जाने के तरीके के हिसाब से अलग लग रहा है, कंटेंट के लिहाज से बहुत नया और अलग नहीं है। उस इन्टेक्चुअल कोलोनियलिज्म से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पा रहे हैं
ये बहस बहुत से सवालों को उठाती है ओर वही  जवाब ढूँढने की  कोशिशे करती है ....सफल या असफल   ये नहीं पता   पर  यकीन मानिए गर आप सिनेमा को जीने वाले इन्सान है  आपसे गुजारिश  है इस बहस को  पूरा पढियेगा .....

कुमार मुकुल के परिचय में कुछ यूँ लिखा है ....कुमार मुकुल ने एक आशातीत विकास किया है इन पांच-छ: वर्षों में-संघर्ष बहुत लोग करते हैं पर कवि नहीं हो पाते। रिल्‍के का केदार जी ने अनुवाद किया है-निश्‍चय ही मुकुल ने पढा होगा-तो उनके यहां जो भोलापन है उससे भी कविता लिखी जा सकती है। वे लिखते हैं - ईश्‍वर मैं तुम्‍हारा जलपात्र हूं, मैं टूटूंगा , तो तुम पानी कैसे पीओगे...। तो जो एक विस्‍मयबोध होता है कवियों में वह मुकुल में दिखता है - कुमार के साथ अच्‍छी बात यह है कि - वे किसी टाइप या उद्देश्‍य को लेकर नहीं चलते। उनके यहां ऐसी सहज और लोकतांत्रिक विविधता है-जैसे एक सहज नन्‍हा बच्‍चा। वे इतने सेंसुअस हैं-मसृण। एक डेमो‍क्रेटिक डाइवर्सिटी है इनमें।

उनकी कविताओ का संग्रह इस ब्लॉग पर है ....
मनोविनोदिनी 


खाना खा लिया
कवि महोदय ने
सतरह नदियों के पार से
आता है एक स्‍वर
चैट बाक्‍स पर
छलकता सा
हां
खा लिया...
आपने खाया
हां ... खाया
और क्‍या किया दिन भर आज
आज...
सोया और पढा ... पढा और सोया
खूब..
फिर हंसने का चिन्‍ह आता ह
तैरता सा

और क्‍या किया

और..

माने सीखे तुम के

मतलब...

मतलब ... तू और मैं तुम

हा हा

पागल...

यह क्‍या हुआ

यह दूसरा माने हुआ
तू और मैं का

दूसरा माने

वाह

खूब
हा हा
हा हा हा


 

चलते चलते : जिंदगी के बहुत सारे ऐसे  दिन है   जिन्हें स्पेम करने की इच्छा होती है  .....


   we  salute you, BOY...! Rest in peace...!!


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गुरुवार, सितंबर 23, 2010

जहाँ निःशब्द शब्द भी बोलते हैं

आमीर खान की आने वाली फिल्म धोबीघाट को एक समस्या आन पड़ी है और वो ये कि धोबियों की यूनियन को फिल्म के नाम में धोबी नाम का होना पसंद नही आ रहा, अपने अपने लॉजिक देकर कानून की सहायता लेकर फिल्म के नाम से धोबी शब्द हटाने की तैयारी चल रही है। अब सवाल ये है कि धोबी को अगर धोबी नही कहेंगे तो क्या कहेंगे, और अगर धोबी शब्द में पाबंदी लग जाती है तो हिंदी के उस मुहावरे का तो बाजा बज जायेगा, अरे वही धोबी का कुत्ता ना घर का ना घाट का। यही नही रामायण के उस अंश का जिक्र कैसे किया जायेगा जिसमें शायद यही कहा गया है कि सीता के रावण के यहाँ रहने को लेकर एक धोबी के अपनी पत्नी को कुछ कमेंट करते सुनकर राम ने सीता को गर्भावस्था में घर से निकाल दिया था (ऐसा ही कुछ था ना)। सिंगापुर और मलेशिया में इस नाम की सड़क (Dhobi or Dhoby Ghaut ) का क्या होगा? धोबी शब्द को मलय भाषा में डोबी (as dobi means laundry So "kedai dobi" means "laundry shop") के नाम से उपयोग में लाया गया है उसका क्या होगा? ब्रिटानिका एनसाक्लोपिडिया में आये धोबी नट (Semecarpus anacardium) का क्या होगा? अब आप जरूर सोच रहे होंगे आखिर आज की चर्चा में मैं इस शब्द के पीछे क्यों पड़ गया दरअसल इसकी एकमात्र वजह है आज का वो चिट्ठाकार जिसके लिखे की चर्चा आज होने वाली है, उनकी हर पोस्ट में शब्द की खाल निकाली जाती है, अगर यकीन नही आता तो हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फारसी क्या, खुद पढ़ लीजिये -
हास-परिहास, दिल्लगी के अर्थ में हिन्दी में सर्वाधिक जिस शब्द का इस्तेमाल होता है वह है मज़ाक़। मूलत रूप में यह शब्द सेमिटिक भाषा परिवार का है। परिहास-प्रिय व्यक्ति को मज़ाक़िया कहा जाता है और इसका सही रूप है मज़ाक़ियः, जिसका हिन्दी रूप बना मजाकिया। मज़ाक़ शब्द की पैदाइश भी सेमिटिक धातु ज़ौ से हुई है जिससे ज़ौक़ शब्द बना है। ज़ौ से ही जुड़ता है अरबी का मज़ः जिसका अर्थ है ठट्ठा, हास्य आदि। इसका एक अन्य रूप है मज़ाहा। हिन्दी की खूबी है कि हर विदेशज शब्द के साथ उसने ठेठ देसी शब्दयुग्म या समास बनाए हैं जैसे अरबी मज़ाक़ के साथ जुड़कर हंसी-ठट्ठा की तर्ज़ पर हंसी-मजाक बन गया। मजः या मज़ाहा से ही बना है हिन्दी का एक और सर्वाधिक इस्तेमाल होनेवाला शब्द मज़ा है जो आनंद, मनोविनोद, लुत्फ़, ज़ायक़ा, स्वाद, तमाशा जैसे भावों का व्यापक समावेश है। आनंद के साथ ही इसमें दण्ड का भाव भी निहित है जिसकी विवेचना पिछली कड़ी में की जा चुकी है।

देखा आपने कैसे कड़ी से कड़ी जोड़ एक शब्द की खाल उतारने में उतारू हैं हमारे ये चिट्ठाकार, चूँकि इन्हें पहचानना बहुत आसान है इसलिये पहले ही नाम बता दूँ, शब्दों के साथ गुल्ली डंडा खेलने वाले हमारे आज के चिट्ठाकार हैं अजित वडनेरकर जी

जाने कहाँ कहाँ से खोज के लाते हैं एक एक शब्द के पीछे छुपी कहानी और उसके होने ना होने की दास्तॉन -
झांसा शब्द बना है संस्कृत के अध्यासः से जिसका अर्थ है ऊपर बैठना। यह शब्द बना है अधि+आस् के मेल से। अधि संस्कृत का प्रचलित उपसर्ग है और इससे बने शब्द हिन्दी में भी खूब जाने-पहचाने हैं जैसे अधिकार। अधि उपसर्ग में आगे या ऊपर का भाव है। आस् शब्द का अर्थ है बैठना, लेटना, रहना, वास करना आसीन होना आदि। आसन शब्द इसी धातु से निकला है जिसका अर्थ है बैठना, बैठने का स्थान, कुर्सी, सिंहासन, आसंदी वगैरह। इस तरह अध्यासः का अर्थ हुआ ऊपर बैठना।

बकलमखुद नाम के शीर्षक के तहत ये दूसरे साथी चिट्ठेखारों की खुद की बयाँ की गयी आप-बीती को भी अजीतजी शब्दों के सफर का साथी बनाते गये। अनिता जी से शुरू ये सिलसिला अभी चंद्रभूषण जी तक पहुँचा है, इस दौरान १६ साथियों की आप-बीती परोसी गयी।

शब्दों की तलाश को लेकर खुद अजीतजी का कहना है -
शब्द की तलाश दरअसल अपनी जड़ों की तलाश जैसी ही है।शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर भाषा विज्ञानियों का नज़रिया अलग-अलग होता है। मैं न भाषा विज्ञानी हूं और न ही इस विषय का आधिकारिक विद्वान। जिज्ञासावश स्वातःसुखाय जो कुछ खोज रहा हूं, पढ़ रहा हूं, समझ रहा हूं ...उसे आसान भाषा में छोटे-छोटे आलेखों में आप सबसे साझा करने की कोशिश है।

मसखरे की मसखरी को सिर माथे लगाकर पेट पकड़कर सभी लोग हसँते तो हैं लेकिन उनमें से कितने ये जानते हैं मसखरा आखिर आया कहाँ से, और अगर आप भी उनमें से एक हैं तो लीजिये जान लें कहाँ से आया मसखरा -
हिन्दी में मसखरा शब्द अरबी के मस्खर: से बरास्ता फारसी उर्दू होते हुए आया। में अरबी में भी मस्खर: शब्द का निर्माण मूल अरबी लफ्ज मस्ख से हुआ जिसका मतलब है एक किस्म की खराबी जिससे अच्छी भली सूरत का बिगड़ जाना या विकृत हो जाना। यह तो हुई मूल अर्थ की बात । मगर यदि इससे बने मसखरा शब्द की शख्सियत पर जाएं तो अजीबोगरीब अंदाज में रंगों से पुते चेहरे और निराले नैन नक्शों वाले विदूषक की याद आ जाती है। हिन्दी के मसखरा शब्द का अरबी रूप है मस्खरः जिसके मायने हैं हँसोड़, हँसी-ठट्ठे वाला, भांड, विदूषक या नक्काल वगैरह। जाहिर है लोगों को हंसाने के लिए मसखरा अपनी अच्छी-भली शक्ल को बिगाड़ लेता है। मस्ख का यही मतलब मसखरा शब्द को नया अर्थ देता है।

अब पेट खाली हो तो ना हँसा जा सकता है ना रोया और ना ही इन शब्दों की भूलभूलैया में देर तक भटका जा सकता है, इस तरह भटकना मुश्किल हो जाता है उसके लिये जो शब्द की तलाश में निकला हो और उसके लिये भी जो तलाशे गये शब्द के इतिहास की खोज में हो, शायद यही सोच कर अजीत जी खानपान शीर्षक की तरह परोसते रहते हैं जायकेदार व्यंजन वाले शब्द। यानि हिंग लगे ना फिटकरी रंग चोखा ही चोखा और या कह लीजिये सोने पर सुहागा या शायद ये कहना सही रहेगा पूनम का पराँठा और पूरणपोळी की गोली -
परांठा शब्द बना है उपरि+आवर्त से। उपरि यानी ऊपर का और आवर्त यानी चारों और घुमाना। सिर्फ तवे पर बनाई जाने वाली रोटी या परांठे को सेंकने की विधि पर गौर करें। इसे समताप मिलता रहे इसके लिए इसे ऊपर से लगातार घुमा-फिरा कर सेंका जाता है। फुलके की तरह परांठे की दोनो पर्तें नहीं फूलतीं बल्कि सिर्फ ऊपरी परत ही फूलती है। इसका क्रम कुछ यूं रहा उपरि+आवर्त > उपरावटा > परांवठा > परांठा। हिन्दुस्तानी रसोई में दर्जनों तरह के परांठे बनते हैं। सबसे आसान तो सादा परांठा ही होता है। भरवां परांठे भी खूब पसंद किए जाते हैं। सर्वाधिक लोकप्रिय है आलू का परांठा। कुशल गृहिणियां साल भर मौसमी सब्जियों और अन्य पदार्थो की सब्जियों से स्टफ्ड परांठें बनाती रहती हैं। रसोइयों की प्रयोगधर्मिता से परांठों की दुनिया लगातार विस्तार पा रही हैं। दिल्ली के चांदनी चौक क्षेत्र में मुगल दौर से आबाद नानबाइयों का एक बाजार अब परांठोंवाली गली के नाम से ही मशहूर हो गया है।

महाराष्ट्र का प्रसिद्ध व्यंजन है पूरणपोळी। ऐसा कोई तीज त्योहार नहीं जब मराठी माणूस इसकी फरमाईश न करता हो। इडली डोसा जितनी तो नहीं, पर मराठी पकवान के तौर पर इसे भी अखिल भारतीय पहचान मिली हुई है। इसे स्टफ्ड मीठा पराँठा कहा जा सकता है।

पोंछ लीजिये तुरत फुरत, आपके मुँह से टपकती लार दिख रही है मुझे। शब्दों के सफर के बिना हिंदी ब्लोगिंग का सफर हमेशा अधूरा रहेगा। अपने आप में अनोखा, अनूठा और अलग तरह का चिट्ठा है शब्दों का सफर और इस सफर के एक एक कदम के लिये की गयी मेहनत साफ साफ नजर आती है। हिंदी में विशेष रूची रखने वालों और विधार्थियों के लिये शब्दों का सफर इज मस्ट।

अपनी बातः पिछली चर्चा के अंत में दी गयी चार लाईना अपनी नही थी लेकिन हाल हमारे दिल का ही बयाँ हो रहा था, अपनी लिखी लाईना को बताना भला भूल सकते हैं हम। इस बार की शनिवार की चर्चा थोड़ा पहले ही कर दे रहे हैं, कारण नंबर एक आफिस के काम के चलते अगले कुछ दिनों तक समय नही, कारण नंबर २ शुक्रवार और शनिवार के दिन आप लोग हो सकता है टीवी से ही चिपके रहें, कोर्ट से नतीजा जो निकलने वाला है। इसलिये मौज मना, शोर मचा और चिल्ला के बोल - आल इज वैल

अब अगले शनिवार को हाजिर होंगे किसी और साथी के चिट्ठे को लेकर, तब तक के लिये -

हम ऐसे आशिक हैं जो गुलाब को कमल बना देंगे,
उसकी हर अदा पर गजल बना देंगे
अगर वो आ जायेंगे मेरी जिंदगी में,
तो रिलायंस की कसम दिल्ली में भी ताजमहल बना देंगे

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मंगलवार, सितंबर 21, 2010

ज़िन्दगी में कुछ न कुछ अच्छा भी होना चाहिए

Best Among Equals दिव्या

दिव्या अजीत कुमार पहली महिला कैडेट बनीं जिनको सबसे बेहतर कैडेट के रूप में चुना गया। 21 वर्षीय दिव्या को ऑफीसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (ओटीए) की पासिंग आउट परेड में थल सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने सॉर्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया । गिरिजेश राव के अनुसार: मुझे उस दिन की प्रतीक्षा रहेगी जब दिव्या अजीत कुमार जनरल बनेंगी।
देखिये आगे क्या होता है फ़िलहाल हम एक बार फ़िर से दिव्या अजीत कुमार को बधाई दे सकते हैं।
साथ ही आशा भी कर सकते हैं कि उनसे प्रेरणा लेकर और भी महिलायें इस सबसे कठिन मानी जानी वाले सेवा में आयेंगी और महिलाओं की बेहतरी के लिये हौसला बढ़ाने वाले उदाहरण पेश करेंगी।

भारत, जम्मू कश्मीर और सिर्फ़ कश्मीर

कश्मीर समस्या के बारे में हम बहुत दिन से सुनते आये हैं और अपने बयान भी जारी करते आये हैं लेकिन कश्मीर , जम्मू कश्मीर और भारत के बारे में साफ़-साफ़ नहीं जानते थे कि मामला क्या है! सिर्फ़ एक एहसास था कि कश्मीर एक समस्या है। रमन कौल ने अपने लेख Kashmir Is Too Small For Azadi में उन्होंने सिलसिलेवार कश्मीर के बारे में जानकारियां दीं जो कम से कम मुझे नहीं थीं। उन्होंने कई बातों के साथ बताया:
१.कश्मीर देश का सबसे उत्तरी इलाका नहीं है।
२.मीडिया और दुनिया के तमाम लोग कश्मीर को जम्मू-कश्मीर बताकर भ्रम फ़ैलाता है। जैसे कि ये:
Headline on CNN about Leh floods: Death toll from Kashmir flooding rises to 112
Correction: Leh is not in Kashmir. There was no flooding in Kashmir.

A Vaishno Devi Pilgrim: I just returned from Kashmir. Things are peaceful there.
Correction: Jammu is not in Kashmir. There is no jehad in Jammu.

A University of Texas Website Article: refers to the 1999 war in Kargil, Kashmir
Correction: Kargil is not in Kashmir. It is in Ladakh province.


३.कश्मीर का क्षेत्रफ़ल जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रफ़ल मात्र १५% है।
४.जम्मू कश्मीर में कश्मीर को छोड़कर बाकी हिस्सों की आबादी मुस्लिम बहुल नहीं है।
अपनी राय व्यक्त करते हुये रमन कौल लिखते हैं:
It is painful to see the violence, the killings, the inconveniences in Kashmir. But why are people getting killed? Is the presence of army in Kashmir the reason, or the consequence of the separatist movement? If the religion inspired protests end in Kashmir, would anyone be hurt? Kashmiri separatists know the answer to this. They know they can stop getting their children killed any day, but then, how will they get Sharia and Nizam-e-Mustafa?

पुनश्च:1. कश्मीर मसले पर कुश ने पिछले माह बेहतरीन चर्चा की थी- कश्मीर...! याद तो है ना? इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये अल्पना वर्मा ने लिखा था-कुश तुममें हिम्मत है, तुममें जज़्बा है.इसे बनाये रखना.
तुमने बहुत सलीके से व्यवस्थित ढंग से सभी पहलुओं को यहाँ रखा है.सच को बाहर लाना बड़ी हिम्मत का काम है क्योंकि आज कल सच भी डर कर छुपा रहता है.आशा है प्रस्तुत तथ्य कई लोगों की आंखों की पट्टी खोल सके.
इसे भी देखें।
2. इस लेख का हिन्दी अनुवाद देखें- कश्मीर बहुत छोटा है आज़ादी के लिए


आलोचक नामवर सिंह, मैनुपुलेटर नामवर सिंह


कल हमारे मास्टरजी का संदेशा आया मोबाइल पर । संदेश में अनुरोध कम आदेश ज्यादा था कि प्रो.जगदीश्वर चतुर्वेदी जी पोस्ट खोया आलोचक मिला सैलीबरेटी नामवर सिंह की चर्चा करूं! मैंने सोचा क्या खास बात है इस पोस्ट में कि गुरुजी इसकी चर्चा का आदेश दे रहे हैं।

मैंने पोस्ट बांची तो देखा प्रो.साहब नामवरजी से रूठे हैं इस बात पर कि नामवरजी अब आलोचना नहीं करते। छोड़ दी है आलोचना अब उन्होंने। आलोचना की जगह नामवरजी आशीर्वाद देते हैं, विमोचन करते हैं! अपने लेख के अंत में उन्होंने इति सिद्धम करते हुये लिखा:
वे अब आलोचना नहीं करते मेनीपुलेशन करते हैं। पर्सुएट करते हैं, फुसलाते हैं। पटाते हैं। इसी चीज को कोई जब उनके साथ भक्त करे तो उसे अपना बना लेते हैं। उन्हें फुसलाना और पटाना पसंद है। साहित्य,विवेक और शिक्षा नहीं है। उनके सामयिक विमर्श का आधार है पर्सुएशन। यह विज्ञापन की कला है। आलोचना की नहीं।


नामवरजी के बारे में ऐसी बातें और भी लोग कहते रहे हैं। उनसे सहमत-असहमत लोग अपने विचार व्यक्त करते रहे हैं। स्व.शैलेश मटियानी जी ने उन पर वर्तमान साहित्य में लेख लिखे थे जिनमें क्या लिखा था यह तो नहीं याद लेकिन उस लेखमाला का शीर्षक था- नयी हिन्दी कहानी का नेवला-नामवर सिंह। उसमें नामवरजी की जमकर ऐसी-तैसी की गयी थी। इसके बाद डा.रामविलास शर्माजी के निधन पर नामवरजी के लेख इतिहास की शव साधना जिसमें उन्होंने स्व.रामविलास शर्माजी की समझ की आलोचना की थी पर कई पत्रिकाओं (पत्रिका कल के लिये का नाम मुझे याद है) में उनके विरोध मे काफ़ी कुछ लिखा गया था।

लेख पढ़ने से पता चला कि जगदीश्वरजी नामवरजी से इस बात पर असहमत और खफ़ा हैं कि उन्होंने डा.पुरुषोत्तम अग्रवाल की कबीर पर लिखी आलोचना पुस्तक को अपना आशीर्वाद दिया जिसकी तमाम बातों से डा.जगदीश्वर चतुर्वेदी असहमत हैं! उनको इस बात का एहसास है कि उनके तेवर नामवरजी ,जो कि उनके गुरु रहे हैं, के प्रति काफ़ी तीखे हैं:
अभी एक पुराने सहपाठी ने सवाल किया था कि आखिरकार तुम नामवरजी के बारे में इतना तीखा क्यों लिख रहे हो ? मैंने कहा मैं किसी व्यक्तिगत शिकायत के कारण नहीं लिख रहा। वे अहर्निश आलोचना नहीं विज्ञापन कर रहे हैं और आलोचना को नष्ट कर रहे हैं। आलोचना के सम-सामयिक वातावरण को नष्ट कर रहे हैं। ऐसा नहीं है मैं पहलीबार उनके बारे में लिख रहा हूँ। पहले भी लिखा है लेकिन अब यह बेवयुग के लेखन है। नए परिप्रेक्ष्य का लेखन है।

आगे उन्होंने यह भी लिखा
नामवर सिंह ने अब तक जो किया है उसका वस्तुगत आधार पर उनसे हिसाब लेने का वक्त आ गया है। इधर उन्होंने नए सिरे से कबीर के बहाने पुरूषोत्तम अग्रवाल की जिस तरह मार्केटिंग की है उसके विचारधारात्मक आयामों को समझने की जरूरत है।


इससे लगता है कि प्रो.जगदीश्वर जी नामवर की आलोचना की बैलेंस शीट सच्चे मन से आडिट कर रहे हैं! उनको डा.अग्रवाल की कबीर पर लिखी पुस्तक की कुछ स्थापनाओं से असहमति होगी। इसके बावजूद डा.नामवरजी ने उस किताब को अपना आशीर्वाद दे दिया। और साल भर में उसका दूसरा संस्करण भी आ गया। गड़बड़ी यह हुई कि नामवरजी ने प्रो.साहब की किताब का नोटिस नहीं लिया:
मैं बार-बार सोचता था कि एकबार आलोचक नामवर सिंह मेरी दस साल पहले आई स्त्रीवादी आलोचना की किताब ‘स्त्रीवादी साहित्य विमर्श’ को जरूर पढ़ेंगे। लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ कि आलोचक नामवर सिंह ने मेरी किताब नहीं देखी,यह बात दीगर है कि मेरी सारी किताबें अंतर्वस्तु के बल पर ,बिना किसी समीक्षक की सिफारिश या प्रशंसा के लगातार बिक रही हैं और मेरी अधिकांश किताबों की सरकारी खरीद भी नहीं हुई है।
अब बड़े लोगों की बड़ी बातें। क्या पता नामवरजी प्रो.साहब की किताब की चर्चा करते तो शायद उनकी शिकायत इत्ती तीखी न होती। प्रो.चतुर्वेदी के इस लेख पर एक पाठक ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये लिखा है:
आपकी हालत उस बच्चे जैसी है जो अपनी और ध्यान आकर्षित करने के लिए मचलता चीखता चिल्लाता है, अपने कपडे फाड़ता है, कभी कभी तो अपना सर फोड़ डालता है।


नामवर सिंह जी के विकट आलोचक तक उनकी प्रतिभा और अध्ययन का लोहा मानते हैं। वे अगर एक आलोचक से मैनुपुलेटर, पर्सुयेटर हुये तो उसके कारण क्या हैं। हिन्दी का यह विकट आलोचक अपनी प्रतिभा, मेधा और क्षमता के चरम उत्कर्ष के दिनों में सालों बिना नौकरी के रहा। लोगों ने अपनी-अपनी दुकानों के दरवाजे इनके बंद रखे कि कहीं ये आकर उसकी दुकान पर कब्जा न कर ले। तमाम मैनुपुलेशन हुये उनके खिलाफ़! ऐसी विभूति को जब मौका मिलेगा तो वह आलोचना करे न करे मैनुपुलेशन तो करेगा ही। नामवर जी का मानना शायद यह है कि हर हाल में शक्ति अपने हाथ में रहे। शक्ति, सत्ता बनी रहे तो बाकी काम तो होते रहते हैं।

इसीलिये नामवर जी का विभूति राय मसले पर कोई बयान नहीं आया। जब विनीत कुमार लिख रहे थे कि नामवर सिंह सेलिब्रिट्री नहीं रहे। उनकी राय की अब मीडिया को कोई आवश्यकता नहीं (विभूति-छिनाल प्रसंग में पिट गया नामवर का ब्रांड ) शायद उसी समय नामवर जी का नाम ज्ञानपीठ कमेटी के लिये तय हो रहा था, विभूति नारायण राय निकाले जा रहे थे। :)

बुजुर्ग व्यथा कथा

पिछले दिनों बुजुर्गो की समस्याओं को लेकर कुछ बहुत अच्छे लेख लिखे गये। शिखा वार्ष्णेय ने अपने लेख कहां बुढ़ापा ज्यादा में बुज्रुर्गों के बारे में लिखते हुये अपने यहां के बुजुर्गों के हाल की तुलना लंदन के बुजुर्गों से की। वन्दना अवस्थी दुबे ने ऐसी मां की दास्तान बतायी जिसने अपने बेटों को पाल-पोस कर बड़ा किया और उन सबने बुढ़ापे में उनको भीख मांगकर गुजारा करने के लिये छोड़ दिया। रश्मि रविजा ने शिखा वार्ष्णेय की पोस्ट को आगे बढ़ाते हुये पोस्ट लिखी-कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ के... इसमें उन्होंने आज के हालात के बारे में अपनी राय बताई:
पहले संयुक्त परिवार की परम्परा थी. कृषि ही जीवन-यापन का साधन था. जो कि एक सामूहिक प्रयास है. घर के हर सदस्य को अपना योगदान देना पड़ता है.अक्सर जमीन घर के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति के नाम ही होती थी. और वो निर्विवाद रूप से स्वतः ही घर के मुखिया होते थे.इसलिए उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती थी. घरेलू कामों में उनकी पत्नी का वर्चस्व होता था.

पर घर से बाहर जाकर नौकरी करने के चलन के साथ ही संयुक्त परिवार टूटने लगे और रिश्तों में भी विघटन शुरू हो गया. गाँव में बड़े-बूढे अकेले पड़ते गए और बच्चे शहर में बसने लगे. अक्सर शहर में रहनेवाले माता-पिता के भी बच्चे नौकरी के लिए दूसरे शहर चले जाते हैं और जो लोग एक शहर में रहते भी हैं वे भी साथ नहीं रहते. अक्सर बेटे-बहू, माता-पिता के साथ रहना पसंद नहीं करते.या कई बार माता-पिता को ही अपनी स्वतंत्र ज़िन्दगी में एक खलल सा लगता है.

ऊपर की तस्वीर वन्दनाजी की पोस्ट से। ये ही वे अम्मा जी हैं जिनको उनके बच्चों ने 85 साल की उमर में घर से बाहर भीख मांगने के लिये छोड़ दिया।

चलते-चलते एक पोस्ट ये देखी जाये -झंडूबाम, वेयो-हेयो, अनजाना..ऐ..ऐ..ऐ.., यानी जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाक़िफ हो गई उसको अब बेवा के माथे की शिक़न तक ले चलो।


मेरी पसंद


बेग़रज़ बेलौस इक रिश्ता भी होना चाहिए
ज़िन्दगी में कुछ न कुछ अच्छा भी होना चाहिए

बोलिए कुछ भी मगर आज़ादी-ए-गुफ़्तार में
लफ़्ज़ पर तहज़ीब का पहरा भी होना चाहिए

ये हक़ीक़त के गुलों पर ख्वाब की कुछ तितलियां
’ऐसा होना चाहिए. वैसा भी होना चाहिए’

हो तो जाती हैं ये आंखें नम किसी भी बात पर
हां मगर पलकों पे इक सपना भी होना चाहिए

दोस्ती के आईने में देख सब शाहिद मगर
मां के आंचल सा कोई पर्दा भी होना चाहिए

शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

आज की तस्वीर

माँ को देख कर अदा जी अपने बचपन में पहुँच गईं....इस समय तीन पीढियां एक साथ रह रहीं हैं...:):)

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सोमवार, सितंबर 20, 2010

सोमवार की चर्चा (२०.०९.२०१०)

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर सोमवार की चर्चा के साथ हाज़िर हूं। इसी सप्ताह हिन्दी दिवस था। तो दिवस को समर्पित करते हुए कुछ विद्वानों के विचार रखते हुए आज की इस चर्चा का शुभारंभ करते हैं।

मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज़्ज़त करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिन्दी की इज़्ज़त न हो, यह मैं नहीं सह सकता। - विनोबा भावे

भारतेंदु और द्विवेदी ने हिन्दी की जड़ें पताल तक पहुँचा दी हैं। उन्हें उखाड़ने का दुस्साहस निश्‍चय ही भूकंप समान होगा। - शिवपूजन सहाय

हिंदी दिवस सरकारी तौर पर हिंदी को राजभाषा (राष्ट्रभाषा नहीं) के रूप में स्वीकार करने की सांविधानिक तिथि। भारत की विभिन्न बोलियों और भाषाओं में भिन्न्ता होने के बावज़ूद एकसूत्रता के तत्व मौज़ूद थे। जिसके रहते वे भारत के राष्ट्रीय एकीकरण में कभी बाधा बन कर नहीं उपस्थित हुईं। उनका घर एक ही था खिड़्कियां कई थीं। हिंदी में इन खिड़कियों के अंतस्संबंधों को परखने तथा क़ायम रखने की क्षमता है। इसीलिए हिंदी हिन्दुस्तान की अस्मिता है। हिंदी है तो हिन्दुस्तान रहेगा। इसके बग़ैर एक विखंडित संस्कृति के सिवा कुछ नहीं बचेगा।

मेरा फोटोजब शब्द मिलते हैं तो आपस में प्रेम और भाईचारा बढता है। कुछ इसी तरह के भाव लेकर साधना वैद जी इसकी परिणति से हमें अवगत करा रही हैं। कहती हैं

भावों की भेल,
आँखों का खेल,
शब्दों का मेल,
प्यार की निशानी है !
होंठों पे गीत,
नैनों में मीत,
पाती में प्रीत,
जोश में जवानी है !

सुदर्शन ने कहा था प्रेम स्वर्गीय शक्ति का जादू है। इसके द्वारा राक्षस भी देवता बन जाता है। वहीं स्वामी विवेकानंद ने कहा था प्रेम असंभव को संभव कर देता है। जगत्‌ के सब रहस्यों का द्वार प्रेम ही है।

मेरा फोटोहाल ही में दिल्ली और जोधपुर में डॉक्टरों की हड़ताल ने लोगो को दहला दिया। एक के बाद एक होती मौतों ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर क्या वजह है कि मौत से दो-दो हाथ करने वाले हाथों ने अपना काम छोड़ दिया है। देर रात आए एक मरीज की मौत हालांकि डॉक्टरों की लापरवाही नहीं थी। पर उत्तेजित परिजनों ने इसके लिए डॉक्टरों को दोषी ठहरा कर उत्पात मचाया। जिसका नतीजा अगले दिन हड़लात थी। रोहित जी जब बोलते हैं तो बिन्दास ही बोलते हैं पर आज बता रहे हैं डॉक्टर बोले तो …. ? 

कुछ सीधे से सवाल उठाते हुए पूछते हैं जब डॉक्टर जानते हैं कि उनकी जरा सी लापरवाही मरीजों की जान ले लेती है, तो क्या उन्हें हड़ताल करनी चाहिए। सरकारी अस्पतालों में गरीब औऱ निम्न मध्यम वर्ग के मरीज ज्यादा आते हैं। ऐसे में उनकी जान से खिलवाड़ क्यों। इतिहास से कुछ तथ्यों का हवाला देते हुए बताते हैं गुलाम भारत में पिछली सदी में एक महान जीव विज्ञानी हुए थे जगदीश चंद्र बसु। जिस कॉलेज में वो पढ़ाते थे, उसमें उनकी तनख्वाह अंग्रेज प्रोफेसरों से कम थी। इस अन्याय के खिलाफ उन्होंने भी विरोध जताया। वो भी एक दो दिन नहीं पूरे दो साल तक।  एक हाथ पर विरोध की काली पट्टी बांधी औऱ बिना तनख्वाह लिए पढ़ाते रहे। हार कर दो साल बाद अंग्रेजी सरकार झुक गई।

डॉक्टरों के अपने तर्क हैं, अपनी मांगे भी। पर इन सब पाटों में पिसता है आम भारतीय नागरिक। जान जाती है गरीब, निम्म औऱ मध्यम वर्ग की। ऐसे में बेबस औऱ लाचार समाज कैसे जानलेवा हड़ताल का समर्थन करे।

मेरा फोटोइसी पोस्ट पर बिहारी (बड़े) भाई कहते हैं “हम त बहुत सा बात कह चुके हैं..इसलिए अभी बस आपके बात से सहमति,असहमति अऊर कहें त बैलेंस बनाते हुए अपना हाज़िरी लगा रहे हैं.” दरअसल उन्हों ने भी एक पोस्ट इस विषय पर लगाई थी। शिर्षक था देवदूत। पढिए यहां।

इस पोस्ट को लगाने का उनका आशय शायद दिव्या जी के पोस्ट से रहा हो। पर पहले यह देखें कि दिव्या जी ने क्या कहा रोहित जी के पोस्ट पर “आज देश को ज़रुरत है एक जागरूक 'परशुराम' की जो अपने फरसे से चिकित्सकों को नेस्तनाबूद कर दे।” यह आक्रोश वाजिब है। डॉक्टरों पर हो रहे आत्याचार और नाइंसाफ़ी से क्षुब्ध होकर उन्होंने एक पोस्ट लगाया था और तमाम प्रश्न किया था। पेशे से डॉक्टर दिव्या जी ने आप डॉक्टर हैं या कसाई शीर्षक से एक पोस्ट लगाई थी। १४७ टिप्पणियों के साथ वहां काफ़ी विचार मंथन हुआ और चर्चा सफ़ल रही।

इस विषय पर अलग-अलग मत हैं। सबके पक्ष में कुछ तर्क, कुछ औचित्य और बहुत दम है।

My Photoअत्याचार की बात चली तो लगे हाथ आपको लिए चलते है शब्दकार पर जहां आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' प्रस्तुत कर रहे हैं सामयिक कविता : मेघ का सन्देश : --------संजीव सलिल'

देख अत्याचार भू पर.
सबल करता निबल ऊपर.
सह न पाती गिरे बिजली-
शांत हो भू-चरण छूकर.

प्रकृति पर भी निर्मम आत्याचार करने से हम बाज नहीं आ रहे। तभी तो तरह-तरह की प्राकृतिक आपदाओं का हमें सामना करना पड़ता है। और अग्र कवि हृदय हो ‘सलिल’ जी जैसा तो शब्दों का कमाल देखिए

तूने लाखों वृक्ष काटे.
खोद गिरि तालाब पाटे.
उगाये कोंक्रीट-जंगल-
मनुज मुझको व्यर्थ डांटे.

‘सलिल’ जी

आपने अपनी कविता में पर्यावरण पर हो रहे अत्याचार को लेकर कुछ जरूरी सवाल खड़े किए हैं। विगत कुछेक दशकों में हमारे पर्यावरण में जितने बदलाव आए हैं उसकी चिंता आपकी कविता में बहुत ही प्रमुख रूप में दिखाई देती है। हमने इस बदले वातावरण में जिस तरह से अपनी प्रकृति का दोहन और शोषण कर डाला है वह आपकी कविता में चिंता का विषय है। तभी तो आपका मेघ कहता है

गगनचारी मेघ हूँ मैं.
मैं न कुंठाग्रस्त हूँ.
सच कहूँ तुम मानवों से
मैं हुआ संत्रस्त हूँ.

मेरा फोटोजब मन संत्रस्त होता है तो उसके कुछ कारण भी होते हैं। ऐसे ही एक कारण पर ध्यान खींच रहे हैं चरैवेति चरैवेति पर अरुणेश मिश्र कहते उन्हें एक छन्द : त्यागने वाले मिले । देखिए इनकी जीवन के सच को बयान करती पंक्तियां।

सुमनोँ को मिला
जहाँ गन्ध पराग
वहाँ कण्टक
मतवाले मिले ।
कितनी बड़ी त्रासदी
है जग मेँ
अपनाकर
त्यागने वाले मिले ।

शब्द सामर्थ्य, भाव-सम्प्रेषण, संगीतात्मकता, लयात्मकता की दृष्टि से कविता अत्युत्तम हैं। जीवन के कटु यथार्थ को चित्रित करती कविता  नए आयाम स्पर्श कर रही है।

मेरा फोटोज़िंदगी के श्वेत पन्नों को न काला कीजिये परिकल्पना पर रवीन्द्र प्रभात की ये ग़ज़ल मेरी पसंद है।


ग़ज़ल
ज़िंदगी के श्वेत पन्नों को न काला कीजिये
आस्तिनों में संभलकर सांप पाला कीजिये।
चंद शोहरत के लिए ईमान अपना बेचकर -
हादसों के साथ खुद को मत उछाला कीजिये।
रोशनी परछाईयों में क़ैद हो जाये अगर -
आत्मा के द्वार से खुद ही उजाला कीजिये।
खोट दिल में हर किसी के यार है थोडी-बहुत
दूसरों के सर नही इल्ज़ाम डाला कीजिये ।
ताकती मासूम आँखें सर्द चूल्हों की तरफ ,
सो न जाये तब तलक पानी उबाला कीजिये।
जब तलक प्रभात जी है घर की कुछ मजबूरियाँ ,
शायरी की बात तब तक आप टाला कीजिये ।

आज बस इतना ही।

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शनिवार, सितंबर 18, 2010

अन्तर्मन् से अनेक मन तक

एक और शनिवार, एक और चर्चा, एक और चिट्ठाकार लेकिन सुस्ती थोड़ा ज्यादा है इसलिये सोचा इंडिया तक का सफर कौन करे यहीं किसी को पकड़ उसकी चर्चा कर देते हैं। आसपास नजर दौड़ायी तो वो अन्तर्मन् पर जाकर अटक गयी, आखिर सबसे पास वही तो था। अन्तर्मन् का मैं शाब्दिक अर्थ ढूँढ रहा था तो एक टिप्पणी या फीडबैक या फोरर्वड कुछ भी कह लीजिये, उस पर नजर गयी, जिसमें कुछ इस तरह से लिखा था -
हृदयेन सत्यम (यजुर्वेद १८-८५) परमात्मा ने ह्रदय से सत्य को जन्म दिया है. यह वही अंतर्मन और वही हृदय है जो सतहों को पलटता हुआ सत्य की तह तक ले जाता है.
अब इतनी तह पलटकर अंदर तक ले जाने की गारंटी तो हम नही देते लेकिन ४-५ मिनट तक पढ़ने लायक पोस्ट शायद दे ही दें। अब फिर आ गया प्रवासी कहना छोड़िये और इस दूसरे प्रवासी की सुनिये जो शीशे की छत के बारे में कुछ बात कर रहा है, एक्सक्यूज मी, कर रही है -
अमरीकी स्टोक कम्पनी सम्बंधित पत्रिका 'वोल स्ट्रीट जर्नल ' में , सन 1986 के मार्च 24 तारीख के अंक में क़ेरोल हाय्मोवीट्ज़ [ Carol Himowitz ] और टीमोथी स्तेल्हार्द्ज़ [ Timothee Steilhardz ] ने सबसे पहली बार एक नया तथा पहले कभी जिसे प्रयोग ना किया गया हो ऐसा शब्द ’द ग्लास सीलिंग’ अपने आलेख में प्रस्तुत करते हुए स्त्रियों की प्रगति में अदृश्य व पारदर्शक व्यवधान होने की बात को उजागर करते हुए यह कोर्पोरेशन में होनेवाले वाकये को खुलकर समझाते हुए ये नया नाम दिया था जिसे मीडिया तथा जनता ने तुरंत अपना लिया और आम भाषा में ' ग्लास सीलिंग 'मुहावरा या शब्द , स्त्री सशक्तिकरण के मुद्दों के साथ सदा के लिए जुड़ गया ।
स्त्री सशक्तिकरण की जानकारी देता काफी अच्छा आलेख है और अगर आपने अभी तक नही पढ़ा तो एक बार जरूर पढ़िये। अमर युगल पात्र श्रृंखला की तहत वो बता रही है वशिष्ठ और अरूंधती के बारे में -
वसिष्‍ठ स्‍वायंभुव मन्‍वंतर में उत्‍पन्‍न हुए ब्रह्मा के दस मानसपुत्रों में से एक हैं। कहते हैं कि वसिष्‍ठ का जन्‍म ब्रह्माजी के प्राणवायु (समान) से हुआ था। ‌वसिष्‍ठ ऋषि का ब्राह्मण वंश सदियों तक अयोध्‍या के सूर्यवंशी राजाओं का पुरोहित पद सँभाले रहा। इनकी दो प‌‌त्नियाँ बताई गई हैं। एक तो दक्ष प्रजापति की कन्‍या ‘उर्जा’ और दूसरी ‘अरुंधती’। अरुंधती कर्दम प्रजापति की नौ कन्‍याओं में से आठवीं गिनी जाती हैं। दक्ष प्रजापति की कन्‍या ‘सती’ से शिव ब्‍याहे थे। इस नाते से वसिष्‍ठ शिव के साढ़ू हुए। दक्ष प्रजापति के यज्ञ के ध्‍वंस के समय शिव ने वसिष्‍ठ का वध किया था। अरुंधती के अलावा ‘शतरूपा’ भी वसिष्‍ठ की पत्‍नी मानी गई हैं। (वे अयोनिसंभवा थीं।)
हो सकता है आप में से कुछ लोग इस कथा से वाकिफ हों, कुछ नही, लेकिन इस आलेख में काफी जानकारी है इनमें से कुछ मुझे भी नही मालूम थी।

अमेरिका के न्यूजर्सी प्रान्त में छोटा भारत यानि एडिसन में बड़ती भारतीयों की संख्या को लेकर टाईम्स पर एक आलेख छपा था, इसी आलेख के संदर्भ में इन्होंने एक पोस्ट लिखी थी - मृण्मय तन, कंचन सा मन, जिसकी शुरूआत कुछ इस तरह थी -
इंसान अपनी जड़ों से जुडा रहता है । दरख्तों की तरह। कभी पुश्तैनी घरौंदे उजाड़ दिए जाते हैं तो कभी ज़िंदगी के कारवाँ में चलते हुए पुरानी बस्ती को छोड़ लोग नये ठिकाने तलाशते हुए, आगे बढ़ लेते हैं नतीज़न , कोई दूसरा ठिकाना आबाद होता है और नई माटी में फिर कोई अंकुर धरती की पनाह में पनपने लगता है ।

यह सृष्टि का क्रम है और ये अबाध गति से चलता आ रहा है। बंजारे आज भी इसी तरह जीते हैं पर सभ्य मनुष्य स्थायी होने की क़शमक़श में अपनी तमाम ज़िंदगी गुज़ार देते हैं । कुछ सफल होते हैं कुछ असफल !

हम अकसर देखते हैं कि इंसानी कौम का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने पुराने ठिकानों को छोड़ कर कहीं दूर बस गया है । शायद आपके पुरखे भी किसी दूर के प्रांत से चलकर कहीं और आबाद हुए होंगें और यह सिलसिला, पीढी दर पीढी कहानी में नये सोपान जोड़ता चला आ रहा है । चला जा रहा है । फिर, हम ये पूछें - अपने आप से कि हर मुल्क, हर कौम, या हर इंसान किस ज़मीन के टुकड़े को अपना कहे ? क्या जहाँ हमने जनम लिया वही हमारा घर, हमारा मुल्क, हमारा प्रांत या हमारा देश, सदा सदा के लिए हमारा स्थायी ठिकाना कहलायेगा ?
अमेरिका का इतिहास गवाह है कि यहाँ रह रहे सभी लोग प्रवासी है वो जो अपने को अमेरिकी समझते और कहते हैं और वो भी जो उसकी तैयारी में हैं। मूल निवासी जिन्हें रेड इंडियन कहा जाता था और है विलुप्त होने की कगार में हैं, ऐसे में किसी सदियों पहले आये एक प्रवासी का कुछ दशक पहले आये प्रवासियों के लिये कुछ कहना उसके भीतर पल रही असुरक्षा ही बयाँ करता है।

इससे पहले मैं आगे कुछ और चर्चा करूँ मैं आप को बता दूँ की आप हमारी आज की चिट्ठाकारा से पीढ़ी दर पीढ़ी दो चार हो सकते हैं और ऐसा लगता है यही शायद इनकी पहली हिंदी पोस्ट भी थी और इनके बारे में इनकी परम मित्र डाक्टर मृदुल कीर्ति जी का कुछ ये कहना है - लावण्य मयी शैली में विषय-वस्तु का दर्पण बन जाना और तथ्य को पाठक की हथेली पर देना, यह उनकी लेखन प्रवणता है. सामाजिक, भौगोलिक, सामयिक समस्याओं के प्रति संवेदन शीलता और समीकरण के प्रति सजग और चिंतित भी है. हर विषय पर गहरी पकड़ है. सचित्र तथ्यों को प्रमाणित करना उनकी शोध वृति का परिचायक है. यात्रा वृतांत तो ऐसे सजीव लिखे है कि हम वहीं की सैर करने लगते हैं.

आध्यात्मिक पक्ष, संवेदनात्मक पक्ष के सामायिक समीकरण के समय अंतर्मन से इनके वैचारिक परमाणु अपने पिता पंडित नरेन्द्र शर्मा से जा मिलते हैं, जो स्वयं काव्य जगत के हस्ताक्षर है. पत्थर के कोहिनूर ने केवल अहंता, द्वेष और विकार दिए हैं, लावण्या के अंतर्मन ने हमें सत्विचारों का नूर दिया है.
अब हम इससे अच्छा आज की चिट्ठाकारा लावण्या शाह जी के लिये कुछ नही लिख सकते इसलिये इसे ही हमारा कहा समझ के संतोष कर लीजिये। अब चूँकि उपर दी गयी टिप्पणी आध्यात्मिकता की बातों की ओर ज्यादा झुकी है इसलिये थोड़ा ॐ नमो भगवते महादुर्गायेय नम: की बात भी कर लेते हैं -
सजा आरती सात सुहागिन ,
तेरे दर्शन को आतीं ,
माता , तेरी पूजा , अर्चना कर ,
भक्ति निर्मल पातीं !
दीपक , कुम कुम - अक्षत ले कर ,
तेरी महिमा गातीं ,
माँ दुर्गा तेरे दरसन कर के ,
वर , सुहाग का पातीं !
वैलेंटाईन डे पर लावण्याजी ने एक पोस्ट लिखी थी - आखिर ये मुहब्बत है क्या बला, इसमें १ नही २ नहि बल्कि १४ शेर भी दिये हैं, एक लाईन नमूने की -
"इश्क नाज़ुक है बेहद , अक्ल का बोझ , उठा नहीं सकता ."

और अब अंत में, लावण्या जी के पिताश्री पंडित नरेन्द्र शर्मा जी की लिखी कुछ पक्तियाँ -
विस्तार है अपार.. प्रजा दोनो पार.. करे हाहाकार...
निशब्द सदा ,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ?
नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई,
निर्लज्ज भाव से , बहती हो क्यूँ ?

इतिहास की पुकार, करे हुंकार,
ओ गंगा की धार, निर्बल जन को, सबल संग्रामी,
गमग्रोग्रामी,बनाती नहीँ हो क्यूँ ?

विस्तार है अपार ..प्रजा दोनो पार..करे हाहाकार ...
निशब्द सदा,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ?
नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई,
निर्ल्लज्ज भाव से, बहती हो क्यूँ ?
इस गीत को भूपेन्द्र हजारिका की आवाज में पूरा सुनने या देखने के लिये यहाँ क्लिक कीजिये और मन्ना दा की आवाज में पंडित नरेन्द्र शर्मा जी का लिखा नाच रे मयूरा आप यहाँ सुन सकते हैं

बात कलेवर कीः लावण्या जी के ब्लोग में भी बेकार का तामझाम तो नही है लेकिन मुझे लगता है कि उन्हें एक अच्छे टेंपलेट का उपयोग करना चाहिये और कभी कभी जो वो पोस्ट के लिये अलग अलग रंग लाल-नीले का प्रयोग करती हैं बजाये उसके अगर एक ही काले रंग का प्रयोग करें तो शायद पढ़ने के लिये ज्यादा आसान हो जायेगा। और ना जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि वो सारी पोस्ट बोल्ड करके लिखती हैं और अगर ऐसा है तो उन्हें पोस्ट नार्मल फोंट में लिखकर जरूरी वाक्यों को ही बोल्ड करना चाहिये। ये मरे व्यक्तिगत विचार हैं और वो अपने ब्लोग को अपने ढंग से चलाने और लिखने के लिये उतनी स्वतंत्र हैं जितना कि मैं अपने ब्लोग के लिये।

अपनी बातः आज अपनी बात के लिये ज्यादा कुछ है नही लेकिन इतना जरूर पूछना चाहूँगा कि अगर आप को बात कलेवर की तहत चिट्ठाकारों के ब्लोग के लिये मेरे कमेंट पसंद नही तो जरूर बताईये जिससे मुझे इस पर बात करने और ना करने के लिये डिसाईड करने में मदद मिलेगी।

अगले शनिवार फिर मुलाकात होगी, एक नये चिट्ठाकार के साथ, एक नयी चर्चा के साथ, तब तक के लिये -

पूरी बोतल ना सही, एक जाम तो हो जाय
मिलना ना सही, दुआ सलाम तो हो जाय
जिनकी याद में हम बीमार बैठे हैं
उन्हें बुखार ना सही, जुकाम तो हो जाय

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सोमवार, सितंबर 13, 2010

सोमवार (१३.०९.२०१०) की चर्चा

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार सोमवार की चर्चा के साथ एक बार फिर हाज़िर हूं।

downloadसरोकार पर arun c roy ने लगा रखी है सीढियां!  ये बैसाखी नहीं है। यह वो माध्यम है जिस के द्वारा कवि कहता है

सीढ़ियों की पीठ पर
चढ़ कर
पहुँच जाते हैं लोग
कहाँ से कहाँ

गुलज़ार साहब फरमा गए हैं कि वहाँ तक सीढी नहीं रास्ते पहुँचते हैं...कई मोड़ों से गुजरकर!! यह कवि भी कुछ इसी तरह के भाव प्रस्तुत करते हुए कहता है,

धैर्य का
दूसरा नाम होती हैं
सीढियां
जो मंजिल तक तो
पहुचाती हैं
लेकिन
हिस्सा नहीं बन पाती
मंजिल तक पहुँचने की ख़ुशी का

अरुण जी बहुत सटीक बात रख दी है आपने सीढियो मे माध्यम से। आप एक समर्थ सर्जक हैं। आपके संकल्‍प और चयन की क्षमता से आपकी रचनाधर्मिता ओत-प्रोत है।

My Photoक्वचिदन्यतोअपि..........! पर Arvind Mishra जी ने एक बड़ा ही सामयिक प्रश्‍न खड़ा किया है। पूछते हैं ये क्या हुआ ? कब हुआ ?? जब हुआ तब हुआ ?? कुछ न पूछो! अपनी बात को रखते हुए कहते हैं, “कितने नए ब्लॉगर आये और टिप्पणी रूपी  प्रोत्साहन के अभाव में दम तोड़ गए -कोई मर्सिया भी नहीं हुआ!” ये एक बात हुई। दूसरी तरफ़ यह भी कहते हैं कि, “लोग या तो ब्लॉग पढना कम कर रहे हैं या फिर ईमानदारी से टिप्पणियाँ न देकर पक्षपात कर रहे हैं!”

अरविंद जी कि इन बातों पर ज़रा ग़ौर कीजिए,

“जीवन में कुछ संतुलन और उत्तरदायित्व बोध तो रखना ही होगा नहीं तो यह जीवन कितना निरर्थक ,निस्तेज सा ही नहीं हो जाएगा ...?”

अरविन्द जी की कुछ बातों से असहमति की गुंजाइश न के बराबर है, जैसे, “आपसे  कोई ब्लाग खुद को पूरा पढवा ले ..तब वह टिप्पणी डिजर्व कर जाता है!”

ब्लॉग विचार विमर्श के माध्यम हैं ,चर्चा परिचर्चा के फोरम हैं -यह ब्लागों  की मूल प्रकृति है -यदि हम इस मुक्त चिंतन प्रवाह और उसकी विचार सरणियों को बंद कर रहे हैं तो समझिये सरस्वती का अपमान सा कुछ कर रहे हैं - सिर धुन गिरा लाग पछताना जैसा ही ...!

अरविंद जी से सहमत होते हुए उनको उद्धृत करते हुए इसे मैं अपनी बात भी बताता हूं और आपसे भी जानना चाहता हूं कि आपके विचार क्या हैं, इस मामले में

“ब्लॉग पर लिखते जाना और टिप्पणी का आप्शन बंद कर देना किसी तानाशाही से कम नहीं है ..संवाद का गला घोटना है ...उस देश में जहाँ संवादों का एक भरा पूरा इतिहास पुराण रहा है ...गिनाऊ क्या ? परशुराम -लक्ष्मण संवाद ,अंगद -रावण संवाद ,हनुमान रावण संवाद ----संवादों पर पहरा मत लगाओ हे  मित्रों .....इतिहास को जानो पहचानो ......”

वेल, एक और संवाद मैं जोड़ देता हूं, चिठियाना-टिपियाना संवाद!

(इस पर पहरा क्यों???????)

 

My Photoबात को यहीं से आगे बढाते हुए उन्हें, जिनकी बातों ने अरविंद जी को पोस्ट लिखने को प्रेरित किया, एक शे’र पेश कर रहा हूँ।

कुछ अपने गिरेबां में भी झांक कर देखो
और अपनी गलतियों को तोलो कभी कभी

ये मेरे शे’र नहीं हैं, पर मेरे भी हैं। कुछ शे’र जब बहुत अच्छा लगते हैं तो सबके हो जाते हैं। अब देखिए ना Mahendra's Blog पर Mahendra Arya की पूरी ग़ज़ल अंतर की ग्रंथियों को खोलो कभी कभी! ही इतनी अच्छी है कि इसे अपनी ग़ज़ल कहने का दिल कर रहा है। ग़ज़ल पर आने के पहले उनकी बात पर आता हूं। कल किसी पोस्ट पर पढा था " मिच्छामी दुक्कड़म "! इसका अर्थ तब मुझे नहीं पता था। महेन्द्र जी इसका अर्थ बताते हुए कहते हैं,

“जैन समाज में एक बहुत अच्छी प्रथा है . वर्ष में एक दिन सभी एक दूसरे से मिल कर हाथ जोड़ कर कहते हैं - " मिच्छामी दुक्कड़म " . इस का अर्थ होता है की इस पूरे वर्ष में मेरे किसी भी कार्य या वचन से जाने या अनजाने रूप से आपका दिल दुख हो तो मुझे क्षमा करें . इसी भावना पर आधारित है मेरी ये नयी ग़जल .”

कितनी अच्छी प्रथा है। आज मैं भी आप सबों से कहता हूं, " मिच्छामी दुक्कड़म "   पर एक हम हैं, कि साल भर सबका दिल दुखाने का सुख लूटते रहते हैं। और ऐसे में सबसे आह्वान है महेन्द्र जी के स्वर में,

मन को उलट पलट के टटोलो कभी कभी
अंतर की ग्रंथियों को खोलो कभी कभी
कुछ घाव छोटे छोटे नासूर बन न जाये
मरहम लगाके प्यार की धो लो कभी कभी

महेन्द्र जी उम्दा शब्द चयन, बिलकुल पानी की धार की तरह बह रही है आपकी ग़ज़ल!

बातों पे खाक डालो जो चुभ गयी थी दिल में
कुछ जायका बदल के बोलो कभी कभी

पर यहां तो कई हैं जो कहते कि अब तुम हमसे न बोलो अभी-अभी।

महेन्द्र जी का एक शे’र

मन भर ही जाए जो गर अंतर की वेदना से
कहीं बैठ कर अकेले रो लो कभी कभी

महेन्द्र जी आपकी ये ग़ज़ल सादगी के अंदाज में ताना मारती है.......  और साथ ही कभी अनुरोध और विनती भी करती है तो कभी सांत्‍वना के स्‍वर भी। आप की इस ग़ज़ल में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं। अच्छी ग़ज़ल, जो दिल के साथ-साथ दिमाग़ में भी जगह बनाती है।

My Photo१४ सितंबर हमारे देश में हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर को समर्पित एक पोस्ट हृदय पुष्प पर राकेश कौशिक प्रस्तुत कर रहे हैं बिंदी!

स्वर-व्यंजन ही नहीं मात्र यह भारत माँ की बिंदी है।
तोड़ी कितनी बार बिखेरी फिर भी अब तक जिंदी है।।
मातृभूमि नीचे कर आँखें पीट रही है अपना मांथा।
लगता है हो गई बाबरी देख-देख अपनों की भाषा।
हिमगिर भी गंभीर हो गया चिंतित है कुछ बोल न पाता।
देख रहा टकटकी लगाए खंडित होती अपनी आशा।
गुमसुम सरिता का जल कहता मुझको भी अब मौन सुहाता।
निज भाषा  को मान नही तो कैसे गाऊं कल-कल गाथा।

वाकई लाजवाब!!!! पूरा इतिहास याद दिला दिया अपने तो! शब्दों का चयन और भाषा सब कुछ बहुत अच्छा लगा और सर्वोपरि तो देश भक्ति और भाषा भक्ति की भावना!!

मेरा फोटोउच्चारण पर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 700 वे पुष्प समर्पित करते हुए कहते हैं “700 वाँ पुष्प” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)!

“भारत माँ के मधुर रक्त को,
कौन राक्षस चाट रहा?”

आज देश में उथल-पुथल क्यों,
क्यों हैं भारतवासी आरत?
कहाँ खो गया रामराज्य,
और गाँधी के सपनों का भारत?
आओ मिलकर आज विचारें,
कैसी यह मजबूरी है?
शान्ति वाटिका के सुमनों के,
उर में कैसी दूरी है?
क्यों भारत में बन्धु-बन्धु के,
लहू का आज बना प्यासा?
कहाँ खो गयी कर्णधार की,
मधु रस में भीगी भाषा?

कविता विचारोतेजक और आंतरिक करूणा से भरी है और हृदय फलक पर गहरी छाप छोड़ती है।

मेरा फोटोये अद्भुत है। अनोखा है। जो रचना रवीन्द्र पर रचना दीक्षित प्रस्तुत कर रही हैं। शीर्षक मिलन बिल्कुल सटीक है, क्योंकि इस ऐंग्लो-हिन्दी कविता में हिन्दी और अंग्रेज़ी का बहुत सुंदर मिलन प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

ढूंढा तुझे बहुत, ऑंखें हुई न चार

बुझ गये मन के दीप,

मन मंदिर भी हुआ char..

क्या क्या विघ्न पार करके

अब पहुंची हूँ तेरे par .........

मेरे मन की डोर आ लगी है

आज तेरे door .....से

मिल गया है संकेत मुझे

कुछ मेरी ओर से कुछ तेरी ore....से

आप एक समर्थ सर्जक हैं। सुंदर प्रयोग.. भाषा की सीमा से परे जाकर अच्छी कविता!

आखर कलश पर नरेन्द्र व्यास प्रस्तुत कर रहे हैं नासिरा शर्मा की कहानी- हथेली में पोखर!

यहाँ से वहाँ तक मकानों के जंगल फैले हुए थे। जो घने सायेदार पुराने दरख्त थे, वे कॉलोनी के नक्शे ने पहले ही काटकर खत्म कर दिए थे। हल्की धूप के बादल घरों को घेरे रहते, जिसमें रेत और सीमेंट के कण मिले होते। बाजार दूर था। मजदूरों की जरूरत के मुताबिक जो चाय की झुग्गी ओर इकलौता ढाबा वजूद में आया था, उसका अब कोई निशान बाकी नहीं रह गया था। लोगों ने बसना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे सारे घर बस गए थे। चहल-पहल ने माहौल बदल दिया था। मिलना-मिलाना भी शुरू हो गया और कुछ दूरअंदेश लोगों ने मिलकर एक कमेटी भी बना ली थी, ताकि बाकी बची सहूलियतों की प्राप्ति में आसानी हो।

आकाश में मूसलाधार बारिश हो रही थी, जो पोखर में गिरकर बताशे फोड रही थी। घर के कच्चे आँगन में चुसनी आम से भरी बालटी के सामने काजल व केसर आम चूस रहे थे। घर भरा है। माँ-पिताजी, चाचा-चाची, दादा-दादी और उसकी दोनो बहनें...अतीत और वर्तमान गड्डमड्ड हो चुका था। वह एक साथ बच्चा और मर्द दोनों की शक्ल में नजर आ रहा था। गाँव का वह घर कभी शहर जैसा लगता और शहर का घर कभी गाँव जैसा। सुख की अनुभूति से कैलाश के रोम-रोम में आराम की कैफियत भरदी थी। उसके हाथों में फैलाव अब दोनों छोरों को छू रहे थे।

इस कहानी पर राजेश जी का कहना है नासिरा जी ने बहुत सहजता से पानी की गहराती समस्‍या और गांव और शहर के बीच फैलती खाई की तरफ इशारा कर दिया है। वे कहानी के अंत में हमें ऐसे मोड़ पर छोड़ देती हैं कि हमें खुद तय करना है कि आखिर कैलाश ने निर्णय क्‍या किया होगा। जब हम तय करेंगे तो उसमें हमारा सोच भी होगा ही। कहानी की सफलता इसमें ही है।

मेरा फोटो''कौन कहता है कि आसमाँ में छेद हो नहीं सकता..'' ये कहना है मसि-कागद पर दीपक 'मशाल' का। कहते हैं आदमी की तरह चलता कुत्ता और तुम्हें मेरी याद भी नहीं आती.. हुँह..----------------->>>दीपक मशाल। इस शीर्षक से आपको तो पता चल ही गया ही होगा कि इस पोस्ट में दो बाते हैं। एक है आदमी की तरह चलता कुत्ता है। ये ५ मिनट ४२ सेकेंड का विडिओ है। आप ज़रूर देखें, बांध कर रख देता है यह। कुदरत का अद्भुत करिश्मा।

और दूसरा है एक कविता।

उस याद की बिल्लौरी आँखें

हो जातीं उदास

और मुझे आता कुछ तरस सा

उसके हाल पर, बेचारगी पर

तब ताज़ी हवा के नाम पर खोल देता मैं खिड़कियाँ

खोल देता दरवाज़े सारे

इस पोस्ट पर वीणा जी कहती हैं बहुत सुंदर कविता है और वीडियो भी। हिम्मत नहीं हारने वालों की ही जीत होती है...!!

मेरा फोटोपरिकल्पना पर रवीन्द्र प्रभात बता रहें हैं प्रेम तकलीफ है .....पर आदमी बनने के लिए जरुरी है तकलीफ से गुजरना ....! कहते हैं

शुरू की जानी चाहिए मृत्यु से
जीवन की बात
समझना चाहिए
ज़िंदगी को एक छोटा सा सफ़र
बगैर भ्रम को पाले हुए जीना हो तो.....

आखिरी मुलाक़ात के साथ दे गयी थी मुझे
भावनाओं की पोटली में बांधकर , कि-
" बाबू !
प्रेम तकलीफ है .....पर आदमी बनने के लिए
जरुरी है तकलीफ से गुजरना ....!"

यह चकित करती प्रेम कविता है। यह प्रेम ठेठ जमीनी अंदाज में हैं भावावेग से भरी कविता। बहुत सारी दिक्‍कतों के बीच यह प्रेम ही है जो रोशनी बनकर उम्‍मीद की राह बनाता है।

My Photoभाषा,शिक्षा और रोज़गार पर शिक्षामित्र कहते हैं हिन्दी का पाया आज भी मजबूत! कहते हैं अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार के बहाने राजभाषा हिन्दी को उखाड़ने की तमाम कोशिशों के बावजूद हिन्दी आज भी समाज में पूरी मजबूती के साथ ख़ड़ी है। स्कूलों की शुरुआती प़ढ़ाई से लेकर उच्चतम स्तर की व्यावसायिक प़ढ़ाई तक में अंग्रेजी का बोलबाला बनाए रखने के सारे हथकंडे भी जनभाषा हिन्दी को नहीं डिगा सके हैं। आज भी हिन्दी देश की सबसे ब़ड़ी संपर्क भाषा है।

ये तथ्य "नईदुनिया" द्वारा हिन्दी दिवस के मौके पर कराए गए विशेष सर्वे में सामने आए हैं। राजधानी दिल्ली सहित हिन्दी भाषी आठ राज्यों में किए गए इस सर्वे के नतीजे बताते हैं कि सिर्फ ३४ प्रतिशत लोग ही मानते हैं कि हिन्दी की हैसियत कम हो रही है। यह भी राय सामने आई कि हिन्दी दिवस या हिन्दी पखवाड़ा जैसे आयोजन हिन्दी के प्रचार प्रसार में मददगार साबित होते हैं।

बहुत अच्छा आलेख है यह। हर वर्ष हिंदी दिवस के अवसर पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करके सरकारी विभा़ग अपने को भाषा और संचार की मुख्य धारा से जोड़ता है। सरकारी संस्थाओं का ज्यों-ज्यों आम जनता से संपर्क बढ़ता जाएगा त्यों-त्यों उन पर हिंदी का दबाव भी बढ़ता जाएगा। जैसे-जैसे आम जनता की पहुंच प्रशासन के गलियारों में बनती जाएगी हिंदी के लिए अपने आप जगह बनती जाएगी। हिंदी क्षेत्र पर अगर बाजार का दबाव है तो बाजार पर भी हिंदी की जबर्दस्त दबाव है। आज बाजार हिंदी की अनदेखी कर ही नहीं सकता।

अनूप जी ने एक जगह कहा था अपनी पोस्ट अगर लगे कि चर्चा में शामिल किया जाए तो उसकी भी चर्चा करनी चाहिए। इस सप्ताह हमने दो पोस्टें डाली है।

(१) मनोज पर फ़ुरसत में … अमृता प्रीतम जी की आत्मकथा “अक्षरों के साये”

(२) राजभाषा हिन्दी पर साहित्यकार - दुष्यंत कुमार

 

बस। अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे।

 

चलते-चलते आप सबों से कहता हूं, " मिच्छामी दुक्कड़म "! 

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शनिवार, सितंबर 11, 2010

गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है

हमारे आज के चिट्ठाकार आफिस के लिये देरी होने पर अपनी बैटर हॉफ को शायद यही कहते होंगे, 'गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है, तुम हो कि खाने में मेरी, देर करती ही जा रही है'। ओके ओके, ये सब मेरा गड़ा हुआ है लेकिन आपने पहचान लिया ना आज किस की बात कर रहे हैं। इनके चिट्ठे मैं तब से पढ़ता आया हूँ जब से इनका स्टेशन पब्लिक के लिये ओपन हुआ था। मुझे याद है, इन्होंने आते ही शांति के आदी हो चुके हिंदी ब्लोग जगत में थोड़ी हलचल मचा दी थी।

उन्होंने तब लिखा था, शायद पहली पोस्ट थी -
अवसाद से ग्रस्त होना, न पहले बडी बात थी, न अब है. हर आदमी कभी न कभी इस दुनिया के पचडे में फंस कर अपनी नींद और चैन खोता है. फिर अपने अखबार उसकी मदद को आते हैं. रोज छपने वाली – ‘गला रेत कर/स्ल्फास की मदद से/फांसी लगा कर मौतों की खबरें’ उसे प्रेरणा देती हैं. वह जीवन को खतम कर आवसाद से बचने का शॉर्ट कट बुनने लगता है.

आधे भरे गिलास को आधा खाली कहने वाले लोगों को गिलास को आधा भरा कहने के लिये मंत्र की शक्ति का ज्ञान दे रहे थे जिनके नाम में खुद <इतनी जल्दी बताना ठीक नही, अभी खुद अनुमान लगा लीजिये>।

लेकिन मैं बात कर रहा था शांत पड़े तालाब में पड़ने वाले पत्थर की जिसका नाम था ‘अहो रूपम – अहो ध्वनि’, चमगादड और हिन्दी के चिट्ठे, और उसकी पहली गुँज कुछ ऐसी थी -
सो हिन्दी के चिट्ठाकार चमगादडों की प्रजाति बागबाग हो कर फल फूल रही है. कल तक जो अखबार-पत्रिकाओं में छपास के लिये परेशान रहते थे, वे आज इंटरनेट पर फोकट में छप ले रहे हैं. अब छपास के स्थान पर रोग 'पढ़ास' का हो गया है. कितने लोग ब्लॉग पढ रहे हैं, यह नापने के लिये चिट्ठाकारों ने अपने ब्लॉग पर काउंटर भी चिपका रखे हैं.

दूध में कितना ही ऊफान क्यों ना आ रहा हो, आँच कम करने में या बंद करने में वो शांत हो ही जाता है, चमगादड़ों की प्रजाति में उठा उफान भी शांत हो गया और ये भी उसी प्रजाति में शामिल हो गये और आज भी ये गेस्ट आर्टिस्ट की तरह यदा कदा चिपकाते रहते हैं अपना चिट्ठा। वो गीत सुना है ना आपने, हमीं से मोहब्बत, हमीं से लड़ाई, अरे मार डाला दुहाई दुहाई बस कुछ ऐसा ही हाल हिंदी ब्लोगजगत में मिलता था (अभी का पता नही) इसीलिये जब कुछ समय की तू-तू मैं-मैं के बाद इन्होंने राम राम की तो कई लोग पहुँच गये ये कहने - अभी ना जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नही। हमारे इन द्ददा ने गीत को सुना, समझा और आज भी टिके हैं।

भारत में ना जाने कितने टल्लू भरे पड़े हुए हैं अब आप सोचेंगे ये टल्लू कौन? अरे वही जो पी पाकर इस हालत में भी नही रहते कि गा सकें - मैं टल्ली, मैं टल्ली। एक ऐसे ही टल्लू की कही ये बात पढ़कर मुझे एक पुराने विज्ञापन कि चंद लाईनें याद आ गयी, जो कुछ ऐसी थी - आप माँग कर खाते हैं (गुटका, तंबाकू), आप माँग कर पीते हैं (सिगरेट, दारू) तो माँग कर पढ़ क्यों नही सकते (किताब, शिक्षा)। और अब टल्लू की भी सुन लीजिये -
भाइ, एठ्ठे रुपिया द। राजस्री खाई, बहुत टाइम भवा। एठ्ठे अऊर होइ त तोहरे बदे भी लियाई (भाई, एक रुपया देना। राजश्री (गुटखा की एक ब्राण्ड) खानी है, बहुत समय हुआ है खाये। एक रुपया और हो तो तुम्हारे लिये भी लाऊं!)।
अमीर आदमी इन सब का सेवन ऐश करने के लिये करता है और गरीब शायद बरबाद होने के लिये, सरल आदमी की सरल जिंदगी सरल शब्दों में बयाँ की हमारे इन बुजुर्ग ब्लोगर ने लेकिन क्या वाकई में वो इतनी सरल है जितनी दिखती है?

रामदेविया शर्त लगा कर कह सकता हूँ कि इनकी फोटोग्राफी बहुत खराब है, हाथ कगंन को आरसी क्या, पढे लिखे को ___ __ -
अपनी पूअर फोटोग्राफी पर खीझ हुई। बोकरिया नन्दी के पैर पर पैर सटाये उनके माथे से टटका चढ़ाया बेलपत्र चबा रही थी। पर जब तक मैं कैमरा सेट करता वह उतरने की मुद्रा में आ चुकी थी!
उनकी रामदेविया शर्त की सुन राहुल सिंह को कहना पड़ा - आपने तो मेरी कोकाकोलीय श्रद्धा का ढक्‍कन ही खोल दिया.

रामदेविया शर्त और कोकाकोलिया श्रद्धा की कसम इस तरह के निठल्ले हम बिल्कुल नही हैं जैसा उन्होंने लिखा है -
पढ़ा कि कई उच्च मध्य वर्ग की महिलायें स्कूल में मास्टरानियों के पद पर हैं। पर स्कूल नहीं जातीं। अपना हस्ताक्षर कर तनख्वाह उठाती हैं। घर में अपने बच्चों को क्या जीवन मूल्य देती होंगी!?

दफ्तर के बाबू और रेलवे के इन्स्पेक्टर जिन्हें मैं जानता हूं; काम करना जानते ही नहीं। पर सरकारी अनुशासनात्मक कार्यवाई की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि वे बच निकलते हैं। पूरी पेंशन के साथ, बाइज्जत।

छोटे आदमी, छोटे संतोष, छोटे सुख। ये सुख स्थाई भाव के साथ मन में निवास क्यों नहीं करते जी! मन में कुछ है जो छोटाई को सम भाव से लेना नहीं चाहता। वह कुटिया में रहना चाहता है – पर एयरकण्डीशनर लगा कर!
छोटे आदमी, छोटे संतोष, छोटे सुख, छोटे से लेख में कितनी बड़ी बात कही है शायद इसी छोटे सुख की तलाश में जगह जगह आश्रम खुल गये हैं एयरकंडीशन लगा कर।

इनकी पोस्ट पढकर आपको एक बात तो माननी पड़ेगी कि कम शब्दों में ये बहुत कुछ कह जाते हैं, ऊपर दिये गये सैंपल (लिंक) इसके उदाहरण हैं। टिप्पणीरूपी प्रोटीन शुरूआती दिनों में इन्हें भी बहुत कम नसीब होता था और शायद ये इनके लेखन और धैर्य का फल है जो आजकल इसका प्रचुर मात्रा में सेवन कर रहे हैं।
आज का गीतः इनको फिल्में देखे जमाना हो गया है लेकिन भारतीय संगीत पसंद है बगैर शोर शराबे वाले, इसलिये आज विमलजी की ठुमरी की दुकान से इनके और आपके लिये पेश है - अतीत होते हमारे लोकगीत!, जाकर सुनिये और लोक गीतों का मजा लीजिये, सिर्फ तीसरा गीत (रोपनी) ही काम कर रहा है शायद।।

छोटू सपेरे की मोनी अगर देखी नही है तो देख आईये और बीन भी सुनकर आईये, इसका जिक्र इसलिये भी कर रहा हूँ कि ज्ञान दद्दा, (जी हाँ यही हैं हमारे आज के चिट्ठाकार यानि ज्ञानदत्त पांडे) अपने आसपास घट रही घटना और लोगों को बड़ी आत्मीयता ये अपनी ब्लोग में जगह देते हैं, फिर चाहे वो कोई पगली हो या छोटू सपेरा हो या उनका चपरासी या अवसाद में घिरने वाला उनका कोई परिचित और मुझे उनकी ये बात बहुत अच्छी लगती है। कितना दर्द है दुनियां में। भगवान नें हमें कितना आराम से रखा है, और फिर भी हम असंतुष्ट हैं। ये मेरी नही दद्दा की ही कही बात है जो पगली को देखकर उन्होंने लिखी थी।

हमने अभी थोड़ा पहले कहा था कि इनकी फोटोग्राफी में थोड़ा लोचा है लेकिन गंगा किनारे से रविवार को दी गयी इस रपट को देखकर हम अपनी कही बात वापस ले रहे हैं।

बात कलेवर कीः अब अंत में थोड़ा इनके चिट्ठे की रंगरोगन और साजसज्जा पर भी थोड़ा दो शब्द कह दिये जायें। अभी तक जिक्र में आये ब्लोगर की तरह इनका चिट्ठा भी व्यर्थ की ताम झाम को दूर से ही सलाम किये हुए है। पुराने प्रविष्ठियों को आसानी से पढ़ा जा सकता है। कुल मिलाकर साफ सुथरा और छोटी छोटी पोस्टों से सजा आकर्षक चिट्ठा है।

अपनी बातः पिछली चर्चा में काजल भाई का कहना था कि क्षमा करें उन्हें चर्चा समझ नही आयी। अब व्यवहारिक नजरिये से देखा जाय तो क्षमा माँगने का हक हमारा बनता है। लेकिन कोई बात नही, काजल भाई ये सब फ्रीकवेंसी का लफड़ा है, कई बार फ्रीकवेंसी में कुछ लोचा हो जाने से कई चीजें और बातें समझ नही आती। कई लोगों को मैट्रिक्स और हाल में ही रीलिज हुई इंसेप्सशन कतई समझ नही आयी। हमें खुद मैट्रिक्स २-३ बार देखनी पड़ी समझने के लिये। इसलिये 'टैंशन लेने का नही, देने का', अब कोई बता सकता है ये किस फिल्म का डॉयलॉग है। और 'समझ समझ के समझ को समझो, समझ समझना भी एक समझ है', इसमें कौन सा अलंकार?

याद है चर्चा के इस सीजन (पारी) में, हमने नये प्रयोग की बात की थी, अपनी पुरानी चर्चाओं पर नजर डाली तो पता चला कि इससे पहले भी हम मार्च- अप्रैल २००९ में ३ चिट्ठाकार को सलटा चुके हैं एक और अनेक के तहत और वो थे - हिमाँशु, कृषि वाले अशोक, और हमारे हम-क्षेत्र महेन; आज का मिलाकर सलट चुके चिट्ठाकारों की संख्या पहुँची ६। अब देखना ये है कि चर्चा की इस ईनिंग में कितनों का नंबर आता है क्योंकि हमारी चर्चा का आँकड़ा सटॉक मार्केट की तरह डांवाडोल किस्म का रहा है।

अनजाने ही पिछली से पिछली चर्चा में कुछ हो गया था जो हमें बहुत देर बाद समझा, लोगों के अलग अलग तरीके से समझाने के बाद। गल्तियाँ किसी से भी कभी भी हो सकती है इसलिये राई का पहाड़, तिल का ताड़ और ओस का समुद्र (ये हमारी दी गयी उपमा है) बनाने में कोई फायदा नही ये सिर्फ समय की बरबादी से ज्यादा कुछ नही। डॉक्टर गल्ती से मरीज के पेट में कैंची जैसी चीज भूल जाते हैं ये तो महज एक क्लिक था। इसलिये बीति ताही बिसार दे, आगे की सुध लेईऐतिहासिक टिप्पणी के बाद रेगुलर टिप्पणी जिस तरह शुरू हुई है, आशा है उसी तरह ऐतिहासिक चर्चा के बाद रेगुलर चर्चा भी शुरू हो जायेगी। छः साल की ब्लोगिंग में एक बात जरूर समझ आ गयी है कि उम्र और परिपक्वत्ता का आपस में कोई संबन्ध नही इसलिये गलत थे वो जो कहते थे परिपक्वत्ता उम्र के साथ आती है। ये सब भारी भरकम बातें छोड़िये और हमारा लिखा ये ताजा ताजा शेर सुनिये -

दुश्मनी जब भी करें, जमकर करनी चाहिये
दोस्ती की गुंजाईश लेकिन, हरवक्त रहनी चाहिये


अब आप दाद दें ना दें, हम तो सुनाकर ये गये वो गये।


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सोमवार, सितंबर 06, 2010

सोमवार (०६.०९.२०१०) की चर्चा

नमस्कार मित्रों!

हिन्दी का वार्षिक उत्सव आ रहा है। पूरे देश में १४ सितंबर को यह पर्व मनाया जाएगा, जिसे हिन्दी दिवस भी कहते हैं। वैसे तो एक फ़ैशन सा हो गया है कि हर दिवस पर हम कह देते हैं ये नहीं हुआ, वो नहीं हुआ। इस दिवस पर भी कह देंगे, ढेर सारे लोग, फिर सितंबर १४, हिन्दी दिवस की वर्षगांठ। फिर भाषण, फिर प्रतियोगिताएं, फिर कुछ लोगों के अख़बारो पत्रिकाओं में आलेख, कुछ वादे, कुछ घोषणाएं, कुछ नारे, हिन्दी का विकास हो रहा है, सरकारी काम काज में हिन्दी की प्रगति हुई है, हिन्दी तेज़ी से आगे बढ़ रही है, या फिर हिन्दी की कब प्रगति होगी, कब तक यह फ़िर्फ़ १४ सितंबर के अनुष्ठानों तक सिमटी-सिकुड़ी रहेगी, आदि-आदि।

अधिकांश, हिन्दी के उत्थान में सहयोग दे ना दें, रोने का राग ज़रूर अलापेंगे। ऐसे महौल में कम-से-कम हम हिन्दी ब्लॉगर्स तो फ़ख़्र से कह सकते हैं कि हम हिन्दी में ब्लॉगिंग कर हिन्दी के उत्थान के प्रति सच्चे मयनों में समर्पित और संगठित हैं।

अखिलेश शुक्ल

“वर्तमान समय में हिंदी में जितना लेखन हो रहा है उतना आज से 20 वर्ष पूर्व नहीं था।” ये कहना है अखिलेश शुक्ल जी का। सृजन गाथा पर हिंदी लेखन में प्रतिबद्धताएँ आलेख द्वारा वे अपनी बात रखते हुए कहते हैं,

“आइए 14 सितम्बर हिंदी दिवस से पूर्व हम अपने पूर्वाग्रह त्यागकर यह संकल्प लें की उच्च गुणवत्तायुक्त लेखन करेंगे। जिससे हिंदी संयुक्त राष्ट्र संघ में वह सम्मान पा सके जिसकी वह हक़दार है। तभी हिंदी में सृजनात्मक लेखन सार्थक होगा व इसके साथ उचित न्याय हो सकेगा।”

ऐसे ही किसी संकल्प, स्वप्रेरणा और उत्साह से हम हिन्दी और देश का भला कर सकेंगे। केवल आलोचना कर देने से, कमियां गिना देने से,हम क्या हित करते हैं हिन्दी का,यह भी सोचने की बात है। ऐसे में मुझे गाना “इतनी शक्ति हमें देना दाता” की ये पंक्त्यां बरबस स्मारण हो आती हैं,

हम न सोचें मिला क्या है हमको,

हम ते सोचें किया क्या है अर्पण”

रविवार को सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णण का जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया गया। ज़ाहिर है कि इस दिन को समर्पित कई पोस्ट भी आए ब्लॉग जगत में। जिन तक मैं जा पाया, उन्हें यहां देने की कोशिश करूंगा इस समर्पण के साथ कि इनमें से भी कई इस बात को बोलने से नहीं भूले होंगे कि आज के शिक्षक वो शिक्षक नहीं रह गए, या फिर आज के छात्र वो छात्र नहीं रह गए। हम गुरु के क़र्ज़ को कभी नहीं उतार सकते। अगर की बोर्ड पर हमारी उंगलियां चल रही हैं, अगर हम उनसे कुछ सार्थक लिख रहें हैं, तो निश्चय ही किसी ना किसी गुरु का आशीर्वाद रहा है हम पर!

१.गुरु बिनु ज्ञान कहाँ जग माही.... ravindra.prabhat@gmail.com (रवीन्द्र प्रभात) Sun Sep 05 07:59:00 IST 2010 (परिकल्पना)

२.शिक्षा का स्तर ---------कल और आज ? rosered8flower@gmail.com (वन्दना) Sun Sep 05 10:32:00 IST 2010 (ज़िन्दगी…एक

३. शिक्षक दिवस ....कुछ दिल से ... mukhiya.jee@gmail.com (रंजन) Sun Sep 05 00:54:00 IST 2010 (दालान)

४. ब्लॉगजगत के सभी गुरुजनों को सादर नमन ....शुभकामनाएं........ noreply@blogger.com (Archana) Sun Sep 05

५.HAPPY TEACHER'S DAY. rdkamboj@gmail.com (सहज साहित्य) Sun Sep 05 16:01:00 IST 2010 (सहज साहित्य)

६. मैं मास्‍टर नहीं हूं

७. "शिक्षकों का सम्मान-एक रपट" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक") शब्दों का दंगल पर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

८. गुरू दिवस शुरुआत हिंदी लेखन से पर अंकुर द्विवेदी

९. बारह लाख शिक्षकों की कमी से जूझ रहा है देश भाषा,शिक्षा और रोज़गार पर शिक्षामित्र

१०. अपनी प्यारी टीचर के लिए - मौलश्री पर Aparna Manoj Bhatnagar

११. शिक्षक दिवस पर ई-मेलीय गुरु मन्त्र Alag sa पर Gagan Sharma, Kuchh Alag sa

१२. गुरु-शिष्य की बदलती परम्परा (शिक्षक दिवस पर विशेष) उत्सव के रंग by Akanksha~आकांक्षा

१३. पाँच सितम्बर-शिक्षक का अभिनन्दन” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”) from उच्चारण by डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

१४. “शिक्षक-दिवस” - शिक्षक का सम्मान या अपमान? सम्वेदना के स्वर पर

१५. मैंने भी मनाया शिक्षक-दिवस पाखी की दुनिया पर Akshita (Pakhi)

१६ अर्चना जी के स्वर में शिक्षक दिवस पर गीत और पवन चन्दन जी के साथ मेरी जुगलबंदी------>>>दीपक मशाल

मसि-कागद पर  दीपक 'मशाल'

१७. नमन् भाषा,शिक्षा और रोज़गार पर शिक्षामित्र

इन सबके बीच  तनहा फ़लक पर त्रिपुरारि कुमार शर्मा दिखा रहे हैं आधा बिस्कुट! इस बिस्कुट का स्वाद पारिवारिक रिश्तों की चाशनी से सना है।

हथेलियों पर चीटियाँ रस चाट रही है
कलाई पर अब भी मेरे राखी है
निकल गया दांत में फसा मांस का टुकडा
वक्त के मुँह में  बिस्कुट नहीं है
'आधा बिस्कुट' है मेरे हाथ में अब भी
यही 'आधा बिस्कुट' मेरा जीवन है।

यह कविता तरल संवेदनाओं से रची गई है। जो दिल से पढ़ने की अपेक्षा रखती है।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने पर चला बिहारी ब्लॉगर बनने (सलिल जी) एक बहुत ही मर्मस्पर्शी कविता पेश करते हैं विवेक शर्मा, भिखारी और भिखारी का ताजमहल!!

मेरा फोटोभिखारी का ताजमहल

पोटली में लगे पैबंद हैं दौलत मेरी.

तेरी ये ज़िद थी इसे सिल के ही दम लेगी तू!

बूढ़ी आँखों से दिखाई तुझे कम देता था

सुई कितनी दफा उंगली में चुभी थी तेरी

उंगलियों से तेरी कितनी दफा बहा था ख़ून.

कौन सा इसमें ख़ज़ाना था गिरा जाता था

कौन सी दुनिया की दौलत थी लुटी जाती थी.

आज जब तू नहीं दुनिया में तो आता है ख़याल

दौलत-ए-दो-जहाँ से बढके पोटली है मेरी

संगेमरमर की नहीं यादगार, क्या ग़म है

सोई पैबंद के पीछे मेरी मुमताज़ महल.

पोटली में लगे पैबंद हैं दौलत मेरी.

आपकी कविता पढ़ने पर ऐसा लगा कि आप बहुत सूक्ष्मता से एक अलग धरातल पर चीज़ों को देखते हैं। इस कविता में बहुत बेहतर, बहुत गहरे स्तर पर एक बहुत ही छुपी हुई करुणा और गम्भीरता है। इस कविता की कोई बात अंदर ऐसी चुभ गई है कि उसकी टीस अभी तक महसूस कर रहा हूं।

My Open Space पर Rachana जी प्रस्तुत कर रहीं हैं रंग बिरंगी चूडिया! 

My Photoदुल्हन बन
तुम संग चली
बाबुल की हवा
पिया के अंगना बही
खन-खन चूडिया
फिर बजने लगी!
जब पिया भये परदेस
और आवे ना कोई सन्देश
चूडिया की गूँज
लावे है नयनो में बूँद!
रंग बिरंगी चूडिया
मिटाए दिलो की है दूरियाँ!

यह कविता तरल संवेदनाओं के कारण आत्‍मीय लगती है!

My Photoजाने क्या मैंने कही पर नरहरि पटेल बता रहे हैं ध्यान से सुनना भी एक साधना है। सच हम या तो सुनते ही नहीं, या सुनाना ही नहीं चाहते, या अग्र सुनें तो ध्यान से तो बिल्कुल ही नहीं। कहते हैं दरअसल, जब ध्यान से सुना शब्द अर्थ लेता है तभी वह सार्थक होता है। शब्द पक्का बनकर हरकत में आता है और मन के आदेश में आकर तन की इन्द्रियों से क्रिया करवाता है। जब तक कानों में पड़ा शब्द मन स्वीकार नहीं करता, तन हरकत नहीं करता। अनसुना करने की लगातार क्रिया मनन शक्ति को बोथरा कर देती है।

सच तो यह है कि श्रद्धा से सुना शब्द ही धारण होता है। अच्छी बात सुनने के लिए कान सदा खुले रखो। "सुनो सब की, पर करो मन की' इस कहावत का अर्थ कभी नकारात्मक मत लो। सही सुना हुआ शब्द मन को भायेगा ही। जिस बात में सबका भला हो उसकी कभी अनसुनी मत करो। जिस बात से सबका कल्याण हो, ज़रूर सुनो।

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