गुरुवार, सितंबर 23, 2010

जहाँ निःशब्द शब्द भी बोलते हैं

आमीर खान की आने वाली फिल्म धोबीघाट को एक समस्या आन पड़ी है और वो ये कि धोबियों की यूनियन को फिल्म के नाम में धोबी नाम का होना पसंद नही आ रहा, अपने अपने लॉजिक देकर कानून की सहायता लेकर फिल्म के नाम से धोबी शब्द हटाने की तैयारी चल रही है। अब सवाल ये है कि धोबी को अगर धोबी नही कहेंगे तो क्या कहेंगे, और अगर धोबी शब्द में पाबंदी लग जाती है तो हिंदी के उस मुहावरे का तो बाजा बज जायेगा, अरे वही धोबी का कुत्ता ना घर का ना घाट का। यही नही रामायण के उस अंश का जिक्र कैसे किया जायेगा जिसमें शायद यही कहा गया है कि सीता के रावण के यहाँ रहने को लेकर एक धोबी के अपनी पत्नी को कुछ कमेंट करते सुनकर राम ने सीता को गर्भावस्था में घर से निकाल दिया था (ऐसा ही कुछ था ना)। सिंगापुर और मलेशिया में इस नाम की सड़क (Dhobi or Dhoby Ghaut ) का क्या होगा? धोबी शब्द को मलय भाषा में डोबी (as dobi means laundry So "kedai dobi" means "laundry shop") के नाम से उपयोग में लाया गया है उसका क्या होगा? ब्रिटानिका एनसाक्लोपिडिया में आये धोबी नट (Semecarpus anacardium) का क्या होगा? अब आप जरूर सोच रहे होंगे आखिर आज की चर्चा में मैं इस शब्द के पीछे क्यों पड़ गया दरअसल इसकी एकमात्र वजह है आज का वो चिट्ठाकार जिसके लिखे की चर्चा आज होने वाली है, उनकी हर पोस्ट में शब्द की खाल निकाली जाती है, अगर यकीन नही आता तो हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फारसी क्या, खुद पढ़ लीजिये -
हास-परिहास, दिल्लगी के अर्थ में हिन्दी में सर्वाधिक जिस शब्द का इस्तेमाल होता है वह है मज़ाक़। मूलत रूप में यह शब्द सेमिटिक भाषा परिवार का है। परिहास-प्रिय व्यक्ति को मज़ाक़िया कहा जाता है और इसका सही रूप है मज़ाक़ियः, जिसका हिन्दी रूप बना मजाकिया। मज़ाक़ शब्द की पैदाइश भी सेमिटिक धातु ज़ौ से हुई है जिससे ज़ौक़ शब्द बना है। ज़ौ से ही जुड़ता है अरबी का मज़ः जिसका अर्थ है ठट्ठा, हास्य आदि। इसका एक अन्य रूप है मज़ाहा। हिन्दी की खूबी है कि हर विदेशज शब्द के साथ उसने ठेठ देसी शब्दयुग्म या समास बनाए हैं जैसे अरबी मज़ाक़ के साथ जुड़कर हंसी-ठट्ठा की तर्ज़ पर हंसी-मजाक बन गया। मजः या मज़ाहा से ही बना है हिन्दी का एक और सर्वाधिक इस्तेमाल होनेवाला शब्द मज़ा है जो आनंद, मनोविनोद, लुत्फ़, ज़ायक़ा, स्वाद, तमाशा जैसे भावों का व्यापक समावेश है। आनंद के साथ ही इसमें दण्ड का भाव भी निहित है जिसकी विवेचना पिछली कड़ी में की जा चुकी है।

देखा आपने कैसे कड़ी से कड़ी जोड़ एक शब्द की खाल उतारने में उतारू हैं हमारे ये चिट्ठाकार, चूँकि इन्हें पहचानना बहुत आसान है इसलिये पहले ही नाम बता दूँ, शब्दों के साथ गुल्ली डंडा खेलने वाले हमारे आज के चिट्ठाकार हैं अजित वडनेरकर जी

जाने कहाँ कहाँ से खोज के लाते हैं एक एक शब्द के पीछे छुपी कहानी और उसके होने ना होने की दास्तॉन -
झांसा शब्द बना है संस्कृत के अध्यासः से जिसका अर्थ है ऊपर बैठना। यह शब्द बना है अधि+आस् के मेल से। अधि संस्कृत का प्रचलित उपसर्ग है और इससे बने शब्द हिन्दी में भी खूब जाने-पहचाने हैं जैसे अधिकार। अधि उपसर्ग में आगे या ऊपर का भाव है। आस् शब्द का अर्थ है बैठना, लेटना, रहना, वास करना आसीन होना आदि। आसन शब्द इसी धातु से निकला है जिसका अर्थ है बैठना, बैठने का स्थान, कुर्सी, सिंहासन, आसंदी वगैरह। इस तरह अध्यासः का अर्थ हुआ ऊपर बैठना।

बकलमखुद नाम के शीर्षक के तहत ये दूसरे साथी चिट्ठेखारों की खुद की बयाँ की गयी आप-बीती को भी अजीतजी शब्दों के सफर का साथी बनाते गये। अनिता जी से शुरू ये सिलसिला अभी चंद्रभूषण जी तक पहुँचा है, इस दौरान १६ साथियों की आप-बीती परोसी गयी।

शब्दों की तलाश को लेकर खुद अजीतजी का कहना है -
शब्द की तलाश दरअसल अपनी जड़ों की तलाश जैसी ही है।शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर भाषा विज्ञानियों का नज़रिया अलग-अलग होता है। मैं न भाषा विज्ञानी हूं और न ही इस विषय का आधिकारिक विद्वान। जिज्ञासावश स्वातःसुखाय जो कुछ खोज रहा हूं, पढ़ रहा हूं, समझ रहा हूं ...उसे आसान भाषा में छोटे-छोटे आलेखों में आप सबसे साझा करने की कोशिश है।

मसखरे की मसखरी को सिर माथे लगाकर पेट पकड़कर सभी लोग हसँते तो हैं लेकिन उनमें से कितने ये जानते हैं मसखरा आखिर आया कहाँ से, और अगर आप भी उनमें से एक हैं तो लीजिये जान लें कहाँ से आया मसखरा -
हिन्दी में मसखरा शब्द अरबी के मस्खर: से बरास्ता फारसी उर्दू होते हुए आया। में अरबी में भी मस्खर: शब्द का निर्माण मूल अरबी लफ्ज मस्ख से हुआ जिसका मतलब है एक किस्म की खराबी जिससे अच्छी भली सूरत का बिगड़ जाना या विकृत हो जाना। यह तो हुई मूल अर्थ की बात । मगर यदि इससे बने मसखरा शब्द की शख्सियत पर जाएं तो अजीबोगरीब अंदाज में रंगों से पुते चेहरे और निराले नैन नक्शों वाले विदूषक की याद आ जाती है। हिन्दी के मसखरा शब्द का अरबी रूप है मस्खरः जिसके मायने हैं हँसोड़, हँसी-ठट्ठे वाला, भांड, विदूषक या नक्काल वगैरह। जाहिर है लोगों को हंसाने के लिए मसखरा अपनी अच्छी-भली शक्ल को बिगाड़ लेता है। मस्ख का यही मतलब मसखरा शब्द को नया अर्थ देता है।

अब पेट खाली हो तो ना हँसा जा सकता है ना रोया और ना ही इन शब्दों की भूलभूलैया में देर तक भटका जा सकता है, इस तरह भटकना मुश्किल हो जाता है उसके लिये जो शब्द की तलाश में निकला हो और उसके लिये भी जो तलाशे गये शब्द के इतिहास की खोज में हो, शायद यही सोच कर अजीत जी खानपान शीर्षक की तरह परोसते रहते हैं जायकेदार व्यंजन वाले शब्द। यानि हिंग लगे ना फिटकरी रंग चोखा ही चोखा और या कह लीजिये सोने पर सुहागा या शायद ये कहना सही रहेगा पूनम का पराँठा और पूरणपोळी की गोली -
परांठा शब्द बना है उपरि+आवर्त से। उपरि यानी ऊपर का और आवर्त यानी चारों और घुमाना। सिर्फ तवे पर बनाई जाने वाली रोटी या परांठे को सेंकने की विधि पर गौर करें। इसे समताप मिलता रहे इसके लिए इसे ऊपर से लगातार घुमा-फिरा कर सेंका जाता है। फुलके की तरह परांठे की दोनो पर्तें नहीं फूलतीं बल्कि सिर्फ ऊपरी परत ही फूलती है। इसका क्रम कुछ यूं रहा उपरि+आवर्त > उपरावटा > परांवठा > परांठा। हिन्दुस्तानी रसोई में दर्जनों तरह के परांठे बनते हैं। सबसे आसान तो सादा परांठा ही होता है। भरवां परांठे भी खूब पसंद किए जाते हैं। सर्वाधिक लोकप्रिय है आलू का परांठा। कुशल गृहिणियां साल भर मौसमी सब्जियों और अन्य पदार्थो की सब्जियों से स्टफ्ड परांठें बनाती रहती हैं। रसोइयों की प्रयोगधर्मिता से परांठों की दुनिया लगातार विस्तार पा रही हैं। दिल्ली के चांदनी चौक क्षेत्र में मुगल दौर से आबाद नानबाइयों का एक बाजार अब परांठोंवाली गली के नाम से ही मशहूर हो गया है।

महाराष्ट्र का प्रसिद्ध व्यंजन है पूरणपोळी। ऐसा कोई तीज त्योहार नहीं जब मराठी माणूस इसकी फरमाईश न करता हो। इडली डोसा जितनी तो नहीं, पर मराठी पकवान के तौर पर इसे भी अखिल भारतीय पहचान मिली हुई है। इसे स्टफ्ड मीठा पराँठा कहा जा सकता है।

पोंछ लीजिये तुरत फुरत, आपके मुँह से टपकती लार दिख रही है मुझे। शब्दों के सफर के बिना हिंदी ब्लोगिंग का सफर हमेशा अधूरा रहेगा। अपने आप में अनोखा, अनूठा और अलग तरह का चिट्ठा है शब्दों का सफर और इस सफर के एक एक कदम के लिये की गयी मेहनत साफ साफ नजर आती है। हिंदी में विशेष रूची रखने वालों और विधार्थियों के लिये शब्दों का सफर इज मस्ट।

अपनी बातः पिछली चर्चा के अंत में दी गयी चार लाईना अपनी नही थी लेकिन हाल हमारे दिल का ही बयाँ हो रहा था, अपनी लिखी लाईना को बताना भला भूल सकते हैं हम। इस बार की शनिवार की चर्चा थोड़ा पहले ही कर दे रहे हैं, कारण नंबर एक आफिस के काम के चलते अगले कुछ दिनों तक समय नही, कारण नंबर २ शुक्रवार और शनिवार के दिन आप लोग हो सकता है टीवी से ही चिपके रहें, कोर्ट से नतीजा जो निकलने वाला है। इसलिये मौज मना, शोर मचा और चिल्ला के बोल - आल इज वैल

अब अगले शनिवार को हाजिर होंगे किसी और साथी के चिट्ठे को लेकर, तब तक के लिये -

हम ऐसे आशिक हैं जो गुलाब को कमल बना देंगे,
उसकी हर अदा पर गजल बना देंगे
अगर वो आ जायेंगे मेरी जिंदगी में,
तो रिलायंस की कसम दिल्ली में भी ताजमहल बना देंगे

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21 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  2. हम ऐसे आशिक हैं जो गुलाब को कमल बना देंगे,
    उसकी हर अदा पर गजल बना देंगे
    अगर वो आ जायेंगे मेरी जिंदगी में,
    तो रिलायंस की कसम दिल्ली में भी ताजमहल बना देंगे

    तरूण भाई, यदि ताजमहल मेरा रहता तो इस शेर पर न्‍योछावर कर देता। लेकिन अफसोस कि उसे मैंने नहीं बनाया, और दोहरा अफसोस कि मुझे गजल लिखना भी नहीं आता। नहीं तो आपकी इस अदा पर कम-से-कम एक गजल तो बना ही डालता।

    आपकी कलम.. मेरा मतलब कीबोर्ड.. से शब्‍दों के महारथी की चर्चा बहुत अच्‍छी लगी। अजित वडनेरकर जी का ब्‍लॉग निस्‍संदेह हिन्‍दी के सर्वोत्‍तम ब्‍लॉगों में है।

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  3. बहुत सुन्दर चर्चा ! बधाई एवं शुभकामनाएं !

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  4. `धोबी नाम का होना पसंद नही आ रहा,...'
    अब कुत्ते और गधे को भी बैन कर देना चाहिए :)

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  5. तरुण भाई,
    बहुत आभार इस चर्चा में शब्दों का सफर को शामिल करने के लिए।
    इन दिनों किताब में व्यस्त था, सो वक्त रहते इसे नहीं देख नहीं पाया। अनूपजी लिंक न भेजते तो शायद और वक्त लगता।

    एक बात बता दूं, शब्दों का सफर मेरी नितांत व्यक्तिगत खब्त है, ऐसा मैं मानता था, मगर इसकी विशाल पाठक संख्या इसे चाहनेवालों का स्नेह देखकर ऐसा लगता नहीं।
    हम सब इस सफर के खब्ती हैं।
    आप सबको बधाई खब्तियों:)

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  6. अपना ज्ञानवर्धन को हम जाते ही रहते हैं शब्दों के सफ़र पर...
    सचमुच ,अजीत भाई जो कर रहे हैं,वह हिन्दी साहित्य में मील का पत्थर है...
    साहित्य की बहुत बड़ी सेवा कर रहे हैं वे...उनके विषय में जो भी कहा जाय बहुत थोडा होगा..

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  7. अजित जी को हमारी भी राम राम पहुँचे ।

    घर बैठे कर लें सफर, जाना पडे न दूर ।
    शब्दों के इस सफर में , रोचकता भरपूर ॥
    रोचकता भरपूर, ज्ञान के बीज बो रहे ।
    शब्दों के सम्बन्ध देख हम चकित हो रहे ॥
    विवेक सिंह यों कहें, अजित जी कमाल करते ।
    शब्द-समुद्र विशाल बीच स्वच्छ्न्द विचरते ||

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  8. हिंदी के एक बेहतरीन ब्लाग पर बेहतरीन चर्चा।

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  9. secondry......

    poor resposnse on rich article......

    are...sabdon ke sanshah.....sahitya ke sartaz...
    hindi ke hoonkar bharnewale bhaieeyon....bahno...
    sun rahe ho....yahan charcha ho rahi blogwood ke
    "beez" blog ke.....(kshma sahit)

    sadar.

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  10. वैसे हमारा ज्यादा फेवरेट बकलम खुद है

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  11. अजित वडनेरकर जी का ब्‍लॉग निस्‍संदेह हिन्‍दी के सर्वोत्‍तम ब्‍लॉगों में है।

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  12. .
    अजित भाई की बात ही निराली है, और रहेगी, बल्कि रहनी भी चाहिये ।
    ब्लॉगजगत में कुछेक लोग ही इसकी बेहूदी सरगर्मियों से अलग रह कर अपना काम एक समर्पण, एक मिशन की तरह करते जाते हैं, मैं अजित भाई को इनमें सर्वोपरि रखता हूँ । शायद यह अजित भाई ख़ुद भी न जानते हों कि, मैं उनसे एक गहरा सम्बन्ध रखता हूँ, ईर्ष्या का सम्बन्ध ! उनका लगन मुझे इसके लिये बाध्य करता है ।
    एक ख़ास ब्लॉगर की ख़ास तरह ही चर्चा कुछ अलग टिप्पणी डिज़र्व करती है, पर ऊपर sanjay जी की टिप्पणी थोड़ा विचलित करती है.. वह कहते हैं ना कि, लिखें फ़ारसी बाँचैं बुड़बक
    बराय पाकिले लफजे शबे बरोज आरन्द ।
    कि मुर्ग माहीओ बाशन्द ख़ुफता ऊ बेदार ॥

    वह अपनी रातें शब्द-मँथन में ग़ुज़ारते हैं, जबकि दुनिया बेख़बर सोयी होती है । अजित भाई कुछ इसी तरह के शब्दकार हैं !

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  13. इस शेर का अर्थ मैं बाद में बता दूँगा,
    अबहिन तो एहिका ऍप्रूव कर दिन्हौ माडरेटर जी !

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  14. @GURUWAR AMAR..

    लिखें फ़ारसी बाँचैं बुड़बक - matlab..padhnewala budbak..

    बराय पाकिले लफजे शबे बरोज आरन्द ।
    कि मुर्ग माहीओ बाशन्द ख़ुफता ऊ बेदार ॥-bhavarth ? please

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  15. @ sanjay

    इसमें ऎसा कुछ व्यक्तिगत नहीं है, झा जी ।
    ’ हरिऔध ’ जी की वैदेही वनवास की प्रस्तावला में उनके द्वारा उद्धृत यह शेर पढ़ा था । अच्छा लगा, यहाँ बाँट लिया !
    [ अब यह न पूछियेगा कि पढ़ने की ज़रूरत ही क्या थी :) ]
    आप इसको अच्छी पोस्ट और अच्छे लेखकों के आलेख पर पाठकों की अनुपस्थिति की दृष्टि से देख सकते हैं । इसका सीधा अर्थ है..
    "एक सुन्दर शब्द बैठाने की जुगत में शब्दकार उस रात को जागकर दिन में परिणत कर देता है,
    जिसमें कि पक्षी से मछली तक बेखबर पड़े सोते रहते हैं'
    ( मन को बहलाने के लिये इसे आप अजित भाई की लगन ( उनके लफ़्ज़ों में ख़ब्त ! ) से जोड़ कर भी देख लें, तो भी वह बुरा न मानेंगे । कृपया मुझे गुरुवर न कहें, मैं आजीवन विद्यार्थी बने रहने में विश्वास रखता हूँ )

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  16. @dr.amar...

    apne meri jigyasa lekar prastoot hue...isse apke prati shradha aur badhi...

    कृपया मुझे गुरुवर न कहें, मैं आजीवन विद्यार्थी बने रहने में विश्वास रखता हूँ )...besak aap taoomra bidyarthi bane rahen
    ....lekin ...jo aap se kuch sikh raha ho o' aapko apna guru mane ... ye koi buri baat nahi...haan sambandh/sambodhan koi jor se nahi banta .... ye man se manne ... aur pyar se bolne
    par aap hi ho jata hai....

    tarunaee me ek baysk dost ka aisa prabhav para .. ke oonhe gurdev kahna suru kar diya ... terah saal ho gaye hame ek doosre ki khabar nahi....so ye ghar khali tha....aapke prati guru ka bhav bana aur likh diya....hame to bas appka sneh chahiye .... sambodhan....aap jaisa chahen....

    agar kuch galt lage baccha samaj maf ka denge.

    hardik pranam.

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  17. shabdon ko har sin\mt se dekhne ke shaukin hi nahin junoon walre wadnerkar ji ki har tippani dainik bhaskar main to padhi magar blog main bhi padh kar achha laga

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