मंगलवार, सितंबर 21, 2010

ज़िन्दगी में कुछ न कुछ अच्छा भी होना चाहिए

Best Among Equals दिव्या

दिव्या अजीत कुमार पहली महिला कैडेट बनीं जिनको सबसे बेहतर कैडेट के रूप में चुना गया। 21 वर्षीय दिव्या को ऑफीसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (ओटीए) की पासिंग आउट परेड में थल सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने सॉर्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया । गिरिजेश राव के अनुसार: मुझे उस दिन की प्रतीक्षा रहेगी जब दिव्या अजीत कुमार जनरल बनेंगी।
देखिये आगे क्या होता है फ़िलहाल हम एक बार फ़िर से दिव्या अजीत कुमार को बधाई दे सकते हैं।
साथ ही आशा भी कर सकते हैं कि उनसे प्रेरणा लेकर और भी महिलायें इस सबसे कठिन मानी जानी वाले सेवा में आयेंगी और महिलाओं की बेहतरी के लिये हौसला बढ़ाने वाले उदाहरण पेश करेंगी।

भारत, जम्मू कश्मीर और सिर्फ़ कश्मीर

कश्मीर समस्या के बारे में हम बहुत दिन से सुनते आये हैं और अपने बयान भी जारी करते आये हैं लेकिन कश्मीर , जम्मू कश्मीर और भारत के बारे में साफ़-साफ़ नहीं जानते थे कि मामला क्या है! सिर्फ़ एक एहसास था कि कश्मीर एक समस्या है। रमन कौल ने अपने लेख Kashmir Is Too Small For Azadi में उन्होंने सिलसिलेवार कश्मीर के बारे में जानकारियां दीं जो कम से कम मुझे नहीं थीं। उन्होंने कई बातों के साथ बताया:
१.कश्मीर देश का सबसे उत्तरी इलाका नहीं है।
२.मीडिया और दुनिया के तमाम लोग कश्मीर को जम्मू-कश्मीर बताकर भ्रम फ़ैलाता है। जैसे कि ये:
Headline on CNN about Leh floods: Death toll from Kashmir flooding rises to 112
Correction: Leh is not in Kashmir. There was no flooding in Kashmir.

A Vaishno Devi Pilgrim: I just returned from Kashmir. Things are peaceful there.
Correction: Jammu is not in Kashmir. There is no jehad in Jammu.

A University of Texas Website Article: refers to the 1999 war in Kargil, Kashmir
Correction: Kargil is not in Kashmir. It is in Ladakh province.


३.कश्मीर का क्षेत्रफ़ल जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रफ़ल मात्र १५% है।
४.जम्मू कश्मीर में कश्मीर को छोड़कर बाकी हिस्सों की आबादी मुस्लिम बहुल नहीं है।
अपनी राय व्यक्त करते हुये रमन कौल लिखते हैं:
It is painful to see the violence, the killings, the inconveniences in Kashmir. But why are people getting killed? Is the presence of army in Kashmir the reason, or the consequence of the separatist movement? If the religion inspired protests end in Kashmir, would anyone be hurt? Kashmiri separatists know the answer to this. They know they can stop getting their children killed any day, but then, how will they get Sharia and Nizam-e-Mustafa?

पुनश्च:1. कश्मीर मसले पर कुश ने पिछले माह बेहतरीन चर्चा की थी- कश्मीर...! याद तो है ना? इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये अल्पना वर्मा ने लिखा था-कुश तुममें हिम्मत है, तुममें जज़्बा है.इसे बनाये रखना.
तुमने बहुत सलीके से व्यवस्थित ढंग से सभी पहलुओं को यहाँ रखा है.सच को बाहर लाना बड़ी हिम्मत का काम है क्योंकि आज कल सच भी डर कर छुपा रहता है.आशा है प्रस्तुत तथ्य कई लोगों की आंखों की पट्टी खोल सके.
इसे भी देखें।
2. इस लेख का हिन्दी अनुवाद देखें- कश्मीर बहुत छोटा है आज़ादी के लिए


आलोचक नामवर सिंह, मैनुपुलेटर नामवर सिंह


कल हमारे मास्टरजी का संदेशा आया मोबाइल पर । संदेश में अनुरोध कम आदेश ज्यादा था कि प्रो.जगदीश्वर चतुर्वेदी जी पोस्ट खोया आलोचक मिला सैलीबरेटी नामवर सिंह की चर्चा करूं! मैंने सोचा क्या खास बात है इस पोस्ट में कि गुरुजी इसकी चर्चा का आदेश दे रहे हैं।

मैंने पोस्ट बांची तो देखा प्रो.साहब नामवरजी से रूठे हैं इस बात पर कि नामवरजी अब आलोचना नहीं करते। छोड़ दी है आलोचना अब उन्होंने। आलोचना की जगह नामवरजी आशीर्वाद देते हैं, विमोचन करते हैं! अपने लेख के अंत में उन्होंने इति सिद्धम करते हुये लिखा:
वे अब आलोचना नहीं करते मेनीपुलेशन करते हैं। पर्सुएट करते हैं, फुसलाते हैं। पटाते हैं। इसी चीज को कोई जब उनके साथ भक्त करे तो उसे अपना बना लेते हैं। उन्हें फुसलाना और पटाना पसंद है। साहित्य,विवेक और शिक्षा नहीं है। उनके सामयिक विमर्श का आधार है पर्सुएशन। यह विज्ञापन की कला है। आलोचना की नहीं।


नामवरजी के बारे में ऐसी बातें और भी लोग कहते रहे हैं। उनसे सहमत-असहमत लोग अपने विचार व्यक्त करते रहे हैं। स्व.शैलेश मटियानी जी ने उन पर वर्तमान साहित्य में लेख लिखे थे जिनमें क्या लिखा था यह तो नहीं याद लेकिन उस लेखमाला का शीर्षक था- नयी हिन्दी कहानी का नेवला-नामवर सिंह। उसमें नामवरजी की जमकर ऐसी-तैसी की गयी थी। इसके बाद डा.रामविलास शर्माजी के निधन पर नामवरजी के लेख इतिहास की शव साधना जिसमें उन्होंने स्व.रामविलास शर्माजी की समझ की आलोचना की थी पर कई पत्रिकाओं (पत्रिका कल के लिये का नाम मुझे याद है) में उनके विरोध मे काफ़ी कुछ लिखा गया था।

लेख पढ़ने से पता चला कि जगदीश्वरजी नामवरजी से इस बात पर असहमत और खफ़ा हैं कि उन्होंने डा.पुरुषोत्तम अग्रवाल की कबीर पर लिखी आलोचना पुस्तक को अपना आशीर्वाद दिया जिसकी तमाम बातों से डा.जगदीश्वर चतुर्वेदी असहमत हैं! उनको इस बात का एहसास है कि उनके तेवर नामवरजी ,जो कि उनके गुरु रहे हैं, के प्रति काफ़ी तीखे हैं:
अभी एक पुराने सहपाठी ने सवाल किया था कि आखिरकार तुम नामवरजी के बारे में इतना तीखा क्यों लिख रहे हो ? मैंने कहा मैं किसी व्यक्तिगत शिकायत के कारण नहीं लिख रहा। वे अहर्निश आलोचना नहीं विज्ञापन कर रहे हैं और आलोचना को नष्ट कर रहे हैं। आलोचना के सम-सामयिक वातावरण को नष्ट कर रहे हैं। ऐसा नहीं है मैं पहलीबार उनके बारे में लिख रहा हूँ। पहले भी लिखा है लेकिन अब यह बेवयुग के लेखन है। नए परिप्रेक्ष्य का लेखन है।

आगे उन्होंने यह भी लिखा
नामवर सिंह ने अब तक जो किया है उसका वस्तुगत आधार पर उनसे हिसाब लेने का वक्त आ गया है। इधर उन्होंने नए सिरे से कबीर के बहाने पुरूषोत्तम अग्रवाल की जिस तरह मार्केटिंग की है उसके विचारधारात्मक आयामों को समझने की जरूरत है।


इससे लगता है कि प्रो.जगदीश्वर जी नामवर की आलोचना की बैलेंस शीट सच्चे मन से आडिट कर रहे हैं! उनको डा.अग्रवाल की कबीर पर लिखी पुस्तक की कुछ स्थापनाओं से असहमति होगी। इसके बावजूद डा.नामवरजी ने उस किताब को अपना आशीर्वाद दे दिया। और साल भर में उसका दूसरा संस्करण भी आ गया। गड़बड़ी यह हुई कि नामवरजी ने प्रो.साहब की किताब का नोटिस नहीं लिया:
मैं बार-बार सोचता था कि एकबार आलोचक नामवर सिंह मेरी दस साल पहले आई स्त्रीवादी आलोचना की किताब ‘स्त्रीवादी साहित्य विमर्श’ को जरूर पढ़ेंगे। लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ कि आलोचक नामवर सिंह ने मेरी किताब नहीं देखी,यह बात दीगर है कि मेरी सारी किताबें अंतर्वस्तु के बल पर ,बिना किसी समीक्षक की सिफारिश या प्रशंसा के लगातार बिक रही हैं और मेरी अधिकांश किताबों की सरकारी खरीद भी नहीं हुई है।
अब बड़े लोगों की बड़ी बातें। क्या पता नामवरजी प्रो.साहब की किताब की चर्चा करते तो शायद उनकी शिकायत इत्ती तीखी न होती। प्रो.चतुर्वेदी के इस लेख पर एक पाठक ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये लिखा है:
आपकी हालत उस बच्चे जैसी है जो अपनी और ध्यान आकर्षित करने के लिए मचलता चीखता चिल्लाता है, अपने कपडे फाड़ता है, कभी कभी तो अपना सर फोड़ डालता है।


नामवर सिंह जी के विकट आलोचक तक उनकी प्रतिभा और अध्ययन का लोहा मानते हैं। वे अगर एक आलोचक से मैनुपुलेटर, पर्सुयेटर हुये तो उसके कारण क्या हैं। हिन्दी का यह विकट आलोचक अपनी प्रतिभा, मेधा और क्षमता के चरम उत्कर्ष के दिनों में सालों बिना नौकरी के रहा। लोगों ने अपनी-अपनी दुकानों के दरवाजे इनके बंद रखे कि कहीं ये आकर उसकी दुकान पर कब्जा न कर ले। तमाम मैनुपुलेशन हुये उनके खिलाफ़! ऐसी विभूति को जब मौका मिलेगा तो वह आलोचना करे न करे मैनुपुलेशन तो करेगा ही। नामवर जी का मानना शायद यह है कि हर हाल में शक्ति अपने हाथ में रहे। शक्ति, सत्ता बनी रहे तो बाकी काम तो होते रहते हैं।

इसीलिये नामवर जी का विभूति राय मसले पर कोई बयान नहीं आया। जब विनीत कुमार लिख रहे थे कि नामवर सिंह सेलिब्रिट्री नहीं रहे। उनकी राय की अब मीडिया को कोई आवश्यकता नहीं (विभूति-छिनाल प्रसंग में पिट गया नामवर का ब्रांड ) शायद उसी समय नामवर जी का नाम ज्ञानपीठ कमेटी के लिये तय हो रहा था, विभूति नारायण राय निकाले जा रहे थे। :)

बुजुर्ग व्यथा कथा

पिछले दिनों बुजुर्गो की समस्याओं को लेकर कुछ बहुत अच्छे लेख लिखे गये। शिखा वार्ष्णेय ने अपने लेख कहां बुढ़ापा ज्यादा में बुज्रुर्गों के बारे में लिखते हुये अपने यहां के बुजुर्गों के हाल की तुलना लंदन के बुजुर्गों से की। वन्दना अवस्थी दुबे ने ऐसी मां की दास्तान बतायी जिसने अपने बेटों को पाल-पोस कर बड़ा किया और उन सबने बुढ़ापे में उनको भीख मांगकर गुजारा करने के लिये छोड़ दिया। रश्मि रविजा ने शिखा वार्ष्णेय की पोस्ट को आगे बढ़ाते हुये पोस्ट लिखी-कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ के... इसमें उन्होंने आज के हालात के बारे में अपनी राय बताई:
पहले संयुक्त परिवार की परम्परा थी. कृषि ही जीवन-यापन का साधन था. जो कि एक सामूहिक प्रयास है. घर के हर सदस्य को अपना योगदान देना पड़ता है.अक्सर जमीन घर के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति के नाम ही होती थी. और वो निर्विवाद रूप से स्वतः ही घर के मुखिया होते थे.इसलिए उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती थी. घरेलू कामों में उनकी पत्नी का वर्चस्व होता था.

पर घर से बाहर जाकर नौकरी करने के चलन के साथ ही संयुक्त परिवार टूटने लगे और रिश्तों में भी विघटन शुरू हो गया. गाँव में बड़े-बूढे अकेले पड़ते गए और बच्चे शहर में बसने लगे. अक्सर शहर में रहनेवाले माता-पिता के भी बच्चे नौकरी के लिए दूसरे शहर चले जाते हैं और जो लोग एक शहर में रहते भी हैं वे भी साथ नहीं रहते. अक्सर बेटे-बहू, माता-पिता के साथ रहना पसंद नहीं करते.या कई बार माता-पिता को ही अपनी स्वतंत्र ज़िन्दगी में एक खलल सा लगता है.

ऊपर की तस्वीर वन्दनाजी की पोस्ट से। ये ही वे अम्मा जी हैं जिनको उनके बच्चों ने 85 साल की उमर में घर से बाहर भीख मांगने के लिये छोड़ दिया।

चलते-चलते एक पोस्ट ये देखी जाये -झंडूबाम, वेयो-हेयो, अनजाना..ऐ..ऐ..ऐ.., यानी जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाक़िफ हो गई उसको अब बेवा के माथे की शिक़न तक ले चलो।


मेरी पसंद


बेग़रज़ बेलौस इक रिश्ता भी होना चाहिए
ज़िन्दगी में कुछ न कुछ अच्छा भी होना चाहिए

बोलिए कुछ भी मगर आज़ादी-ए-गुफ़्तार में
लफ़्ज़ पर तहज़ीब का पहरा भी होना चाहिए

ये हक़ीक़त के गुलों पर ख्वाब की कुछ तितलियां
’ऐसा होना चाहिए. वैसा भी होना चाहिए’

हो तो जाती हैं ये आंखें नम किसी भी बात पर
हां मगर पलकों पे इक सपना भी होना चाहिए

दोस्ती के आईने में देख सब शाहिद मगर
मां के आंचल सा कोई पर्दा भी होना चाहिए

शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

आज की तस्वीर

माँ को देख कर अदा जी अपने बचपन में पहुँच गईं....इस समय तीन पीढियां एक साथ रह रहीं हैं...:):)

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26 टिप्‍पणियां:

  1. आदेश :-) का मान रखने का शुक्रिया !

    नए परिप्रेक्ष्य का लेखन है।


    ...अभी मौन! ...लौट कर आते हैं !

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  2. बहुत बढ़िया चर्चा है
    नमन है दिव्या अजीत कुमार जैसी लड़्कियों को और हर उस भारतीय को जो किसी भी तरह से ईमानदारी के साथ अपने देश की सेवा में लगा है,
    कश्मीर के विषय पर क्या कहा जाए किसी शायर ने लिखा है कि

    ग़ैर मुम्किन है कि हालात की गुत्थी सुलझे
    अहल ए दानिश ने बहुत सोच के उल्झाई है

    लेकिन कल एक ऐतिहासिक क़दम उठाया गया पार्टी और धर्म से ऊपर उठ कर ,बातचीत के रास्ते खुलते नज़र आते हैं तो एक उम्मीद जागती है ,कल भी हमारे देश के शीर्ष नेताओं ने एक उम्मीद जगाई है
    अल्लाह करे हमारे देश में हर ओर शान्ति ही व्याप्त हो ,आमीन
    नामवर सिंह जी को मैं ने ज़्यादा पढ़ा नहीं है सो मैं कुछ कह पाने में असमर्थ हूं

    आप की पसंद तो अच्छी ही होती है
    बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल है

    बोलिए कुछ भी मगर आज़ादी-ए-गुफ़्तार में
    लफ़्ज़ पर तहज़ीब का पहरा भी होना चाहिए

    बेहतरीन और हासिल ए ग़ज़ल शेर है
    शाहिद साहब मुबारकबाद के हक़दार हैं
    धन्यवाद इस उम्दा चर्चा और ख़ूबसूरत ग़ज़ल पढ़वाने के लिये

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  3. ये है चर्चा... अनुपजी आप निरंतरता बनाए रखिये..

    थैंक्स.

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  4. बहुत सुंदर चर्चा। इन दिनों हम खुद अनियमित हैं, लेकिन रंजन जी के निरंतरता के आग्रह में स्‍वर मिलाने की इच्‍छा जरूर हो रही है।

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  5. आदरणीय अनूप जी शायद पिछली बार कश्मीर मुद्दे पर हुई बहस पर मैंने लद्दाख का सन्दर्भ दिया था ......पर
    सबसे पहले वीर संघवी का लेख हिन्दुस्तान अखबार में २० सितम्बर को पढ़े....उसमे कई काबिले गौर बाते है ..ठीक वैसी जैसी आप ओर हम सोचते है .....

    आपके बारे में मैं नहीं जानता, लेकिन जब मैं मीडिया, खासकर विदेशी मीडिया में कश्मीरी अलगाववादियों को बार-बार अपना दृष्टिकोण रखते देखता हूं, तो मुझे गहरी थकान और निराशा महसूस होती है। भारत के ज्यादातर लोग अब तक अलगाववादियों के आरोपों से अवगत हो चुके हैं, जैसे वर्ष 1947 में कश्मीर का विलय संदेहास्पद था, अनेक वर्षों तक कश्मीर के चुनावों में धांधली होती रही, हिंदू भारत में कश्मीर एक मुस्लिम बहुल सूबा है और सेना ने घाटी में आतंक का राज कायम कर रखा है।
    यह पूरी सोच कश्मीर के बारे में भारतीयों के अहसास को हास्यास्पद बनाती है यानी यह साफ करती है कि हम एक हिंदू बहुल मुल्क हैं, जिसने ताकत के बल पर कश्मीर पर काबिज रहने की कसम खा रखी है। पिछले कुछ वर्षों से लगातार प्रस्तुत किए जा रहे इस दृष्टिकोण से मुझे अब खीझ होने लगी है, सिर्फ इसीलिए नहीं कि यह सरासर गलत है, बल्कि इसलिए भी कि यह जिस भारत की तस्वीर उकेरता है, उसे मैं नहीं पहचानता और यह भारतीयों का ऐसा नजरिया पेश करता है, जो हम रखते ही नहीं। मेरी निगाह में कश्मीर को लेकर आम भारतीय की सोच हिंदू राष्ट्रवाद या भारतीय साम्राज्यवाद से संचालित नहीं होती। सच तो यह है कि जब भी कश्मीर हमारी सोच का हिस्सा बनता है, हमारे भीतर भावनाएं उमड़ आती हैं। देश की बहुसंख्य आबादी कश्मीर समस्या और कश्मीरी आतंकियों की मांगों को लेकर काफी चिंतित है। वह परेशान है कि आखिर कश्मीरी हमसे इतनी नफरत क्यों करते हैं? और वह क्या है, जो वे वास्तव में चाहते हैं?

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  6. continue....
    अलगाववादियों की सोच के एक पहलू को हम समझ सकते हैं। हम यह मानते हैं कि एक ऐसे सूबे में जीना वाकई नारकीय है, जहां लगातार फौज की मौजूदगी बनी हुई है, नागरिकों को पुलिस की बेमतलब जांच से अक्सर गुजरना पड़ता है और कफ्यरू एक नियमित घटना बन गई है। हम में से ज्यादातर लोग वहां की मानवाधिकार हनन की कहानियों से आहत हैं। यकीनन उनमें से कुछ कहानियां सच्ची भी होंगी।
    लेकिन इसके साथ ही हम में से ज्यादातर लोगों का यही तर्क होगा कि घाटी में फौज की मौजूदगी भारत के खिलाफ हिंसक विद्रोह की ही परिणति है। वर्ष 1989 तक कश्मीर में इतनी तादाद में सेना की उपस्थिति नहीं थी। सेना वहां तभी गई, जब हिंसक घटनाएं बढ़ने लगीं, अनेक महत्वपूर्ण नेताओं की हत्याएं कर दी गईं, अपहरण रोजमर्रा का हिस्सा बन गया और सीमा पार से जिहादियों का जमावड़ा घाटी में लगने लगा।
    हिंसा हिंसा को जन्म देती है। यदि आप भारत राष्ट्र के खिलाफ जंग का ऐलान करते हैं, तो आपको अपने पेट में गुदगुदी करने देने के लिए देश यों ही नहीं छोड़ देगा। यह स्वाभाविक है कि अपनी प्रभुसत्ता और कानून का राज्य कायम करने के लिए वह कार्रवाई करेगा। कश्मीर से सेना को लौटते देखकर ज्यादातर भारतीयों को खुशी ही होगी। भारतीय सेनाओं को कोई शौक नहीं है कि वे वहां अपनी जान जोखिम में डालें, लेकिन जब कभी भी हम घाटी में फौज की संख्या में कटौती और आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट (एएफएसपीए) में संशोधन की बात करते हैं, वहां हिंसक घटनाएं बढ़ जाती हैं। वहां इस बात का कोई सुबूत नहीं मिलता कि सेना की उपस्थिति में कटौती के अनुपात में हिंसा में भी कमी आएगी। यदि वहां से सेना की वापसी हो जाए, तो क्या अलगाववादी यह कहेंगे कि उन्होंने भारत की संप्रभुता को स्वीकार कर लिया है? मुझे ऐसा नहीं लगता। कश्मीर में फौज की मौजूदगी अफसोसनाक है, लेकिन यह मुख्य मुद्दा नहीं है।
    हमारे नजरिये से कश्मीर घाटी में अलगाववादी भावना इसलिए भी विस्मयकारी है कि आम कश्मीरी को वे तमाम हक हासिल हैं, जो दूसरे अन्य भारतीयों को मिले हैं, सिवाय इसके कि देश शायद कश्मीर पर कहीं अधिक धन खर्च करता है। देश का प्रति व्यक्ति व्यय दिल्ली वालों के मुकाबले कश्मीरियों पर बहुत ज्यादा है। इसके अलावा कश्मीरियों को शेष भारतीयों की तरह बराबरी के सांविधानिक अधिकार हासिल हैं। यदि आप यह दलील मान भी लें कि अतीत में हुए कुछ चुनावों में धांधली हुई, तो पिछले अनेक वर्षों में हुए चुनावों के बारे में आप ऐसा नहीं कह सकते। पीडीपी सरकार का चुनाव वैध तरीके से हुआ था। इसी तरह मौजूदा सरकार भी निष्पक्ष चुनावों के जरिये चुनकर आई है। फिर अनुच्छेद-370 जैसे अनेक विशेषाधिकार भी कश्मीरियों को ही मिले हैं, शेष भारतीयों को नहीं। हमने कश्मीर के विलय के समय की परिस्थितियों के मद्देनजर इसे इसलिए कुबूल किया था कि शायद 1947 के बाद भी कुछ अलगाववादी भावनाएं कायम थीं।
    निस्संदेह, हमें तमिलनाडु, नगालैंड, पंजाब आदि समेत देश के दूसरे इलाकों में भी अलगाववादी आंदोलनों का सामना करना पड़ा, लेकिन हर मामले में हमने स्थानीय जन-आकांक्षाओं को पूरा किया और अलगाववादी सोच पर विजय हासिल की, लेकिन कश्मीर?
    हमारी तमाम बेहतर कोशिशों के बावजूद कश्मीरियों की नई पीढ़ी, जो 1947 के बंटवारे के कई वर्षों बाद पैदा हुई है, हमसे लगातार अलग होने की मांग कर रही है।
    हमारे लिए सबसे अधिक रहस्यपूर्ण यही बात है कि हम यह जानते ही नहीं कि कश्मीरी क्या चाहते हैं? आखिर संतुलित दिमाग वाला कौन व्यक्ति आज के संकटग्रस्त पाकिस्तान के साथ कश्मीर का विलय चाहेगा? कुछ कश्मीरी कहते हैं कि वे भारत और पाकिस्तान दोनों से अलग होना चाहते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि एक आजाद कश्मीर भारत और पाकिस्तान की मदद के बिना पंद्रह मिनट भी खड़ा नहीं रह सकता।

    तो फिर क्यों कश्मीरी दिशाहीन बगावत के रूप में अपने भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं?
    मैं नहीं मानता कि ज्यादातर भारतीय इस सवाल का उत्तर जानते होंगे, लेकिन हमें आशंका है कि इस जवाब का संबंध धर्म से है। जम्मू-कश्मीर के तीन भूभाग हैं और सभी को केंद्र से एक ही तरह की मदद मिलती है, लेकिन केवल घाटी ही ऐसा भूभाग है, जहां कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद सिर्फ मुस्लिम ही रहते हैं और वहीं से अलगाववाद की सर्वाधिक आवाजें उठती हैं। कश्मीरी अलगाववादियों की एक इस्लामी भविष्य की इस तलाश ने देश के दूसरे इलाकों के मुसलमानों से दूर कर दिया है, जिन्होंने देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बखूबी स्वीकार कर लिया है। वे कश्मीरी सहधर्मियों की राजनीतिक मांग के प्रति कोई लगाव नहीं महसूस नहीं करते, लेकिन चूंकि कश्मीरी अलगाववाद इस्लामी दर्शन से संचालित हो रहा है, यह भारत के लिए काफी चुनौतीपूर्ण है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. इसके आलावा दैनिक जागरण में एक लेख पढ़िए .....जो लद्दाख ओर जम्मू ओर कश्मीर को पूरे परिपेक्ष्य में देखता है ... (लेखक भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं)


    पिछले सप्ताह मैं सिंधु नदी के पावन तट पर लेह के एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में सम्मिलित हुआ, जिसमें लद्दाख के महत्वपूर्ण बौद्ध-मुस्लिम नेता एवं कार्यकर्ता राजनाथ सिंह की उपस्थिति में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। यह लद्दाख के अग्निधर्मा नेता जिनका वहां के शाही परिवार से गहरा संबंध है, थुप्स्तान छेवांग की अग्रणी भूमिका और नितिन गडकरी से उनकी वार्ता के कारण संभव हुआ। थुप्स्तान अस्सी के दशक के युवा बौद्ध नेता रहे, जिनके नेतृत्व में लद्दाख उफन उठा था और उस तीखे युवा आंदोलन के कारण अंतत: लेह को स्वायत्तशासी पर्वतीय परिषद मिली थी। उसे भी कांग्रेस-नेशनल कांफ्रेंस गठजोड़ ने कभी अच्छी तरह नहीं चलने दिया। अधिकारों में कटौती, बौद्ध युवाओं को लिखित परीक्षा उत्तीर्ण करने पर भी कश्मीर प्रशासन सेवा में नहीं लेना, लद्दाख के विकास में अरुचि इस सेक्युलर शासन के कुछ ऐसे कार्य रहे कि वहां के प्रमुख नेताओं ने लद्दाख के लिए केंद्र शासित प्रदेश बनाने की मांग की। सभी ने अपने-अपने दल छोड़कर मोर्चा बनाया और थुप्स्तान छेवांग इस मोर्चे के टिकट पर लद्दाख के सांसद चुने गए। अब छेवांग सहित पर्वतीय परिषद के सत्ताधारी पार्षद भाजपा में शामिल हो गए हैं। जम्मू और लेह जोड़ा जाए तो जम्मू-कश्मीर प्रांत का 80 प्रतिशत भाग ऐसा सामने आएगा जो राष्ट्रवादी शक्तियों के साथ खड़ा दिखता है और शेष 20 प्रतिशत कश्मीर घाटी में जो मुट्ठीभर राष्ट्रद्रोही पाकिस्तानपरस्त तत्व हैं उनको चुनौती देता है। यह प्रांत सिर्फ घाटी के कुछ लोगों के कारण अलगाववाद का बंधक क्यों बनने दिया जाना चाहिए? क्या यह जरूरी नहीं कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल जम्मू-कश्मीर के तीसरे महत्वपूर्ण भाग लद्दाख भी जाए और वहां के युवाओं तथा विभिन्न संगठनों के नेताओं से मिले। श्रीनगर में आज तक जो भी सरकार कायम हुई, अनिवार्यत: उसके मुख्यमंत्री घाटी के कश्मीरी मुस्लिम ही रहे-केवल एक गुलाम नबी आजाद को छोड़कर, जो जम्मू क्षेत्र से थे और इस कारण कांग्रेस के भीतर से ही उनका विरोध भी हुआ था। इसके बावजूद कश्मीर के अलगाववादी तत्व दिल्ली के सेक्युलर मीडिया का सहारा लेकर इस प्रकार का वातावरण बनाते हैं, मानो वे ही संपूर्ण जम्मू-कश्मीर का प्रतिनिधित्व करते हों। आश्चर्य की बात यह है कि भारत सरकार जम्मू-कश्मीर के अलगाववादियों को विदेश जाकर भारत के विरुद्ध षड्यंत्र करने का भी मौका देती है। पिछले वर्ष कश्मीर के अलगाववादी नेता चीन गए और उन्होंने कश्मीर समाधान के लिए चीन का दखल आमंत्रित किया, उसके बाद से ही चीन का कश्मीर के संबंध में नजरिया अधिक आक्रामक हुआ।

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  8. continue...
    संप्रग सरकार यह भूल गई है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर के पत्थरबाज भारतीय सेना और सरकार को बदनाम करने में सफल हो रहे हैं। कश्मीर के अलगाववादी यह प्रचार कर रहे हैं कि आठ लाख से अधिक भारतीय सैनिक कश्मीरी युवाओं पर जुल्म ढा रहे हैं, जबकि सच यह है कि भारतीय सेना की तैनाती सरहद पर है और कश्मीर का स्थानीय मसला जम्मू-कश्मीर पुलिस के हवाले है। केवल विशेष परिस्थिति में सीआरपीएफ को तैनात किया जाता है, सेना के विशेषाधिकार कम किए जाने संबंधी बयान इस प्रकार दिए जा रहे हैं मानो इन सैनिक वहां अत्याचार कर रहे हों। --

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  9. सबसे ज्वलंत मुद्दा कश्मीर का है... पिछली बार कुश ने इस पर चर्चा की थी... नक्सली हिंसा फिलहाल backdrop में चला गया है... यह नासूर अब वहां बिजनेस बन कर फैला है... परसों की पढ़ा पत्थरबाजों ने कबूला की उन्हें इसके रोजाना ८०० रुपये मिलते हैं.. और इनमें जो लीड करता है वो ज्यादा इनाम पाते हैं...

    हिंदुस्तान का एक लेख देखें ... अभी २४ का इंतज़ार भी कीजिये

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  10. हमहूँ टिपियाइ का ?
    तनि क्लिनिक से लौटि के आयी, तबे तईं ओरखो !

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  11. कश्मीर से जुड़े कई संदर्भो को ध्यान देना जरूरी है ...तमाम पहलुओ को.......


    सबसे महत्व पूर्ण बात ये है के अलग वादी नेता जिस जनमत संग्रह को बार बार बीच में लाते है ....वो वर्तमान हालातो में इसलिए निरस्त हो गया है क्यूंकि पाकिस्तान ने अपने कब्जे वाले कश्मीर में तमाम किस्म के अनिधिकृत व्यक्तियों को बसा दिया है .....ओर कश्मीर क्षेत्र से कश्मीरी पंडितो का पलायन हो गया है .....
    .क्या पाकिस्तान जनमत संग्रह करवाने से पहले अपने कब्जे किये हुए कश्मीर को छोड़ना चाहेगा क्यूंकि ये तो उस वक़्त यू एन की भी शर्त थी .....
    तीन महीने पहले सुचारू रूप से चलते कश्मीर में जिसमे स्कूल कोलेज खुल रहे थे ...पर्यटक जा रहे थे ....प्री पेड़ मोबाइल सर्विस लाने की बात थी ....विभिन्न विषयों की कोंफ्रेस तक आयोजित की जा रही थी जिसमे मेडिकल ओर दूसरे क्षेत्र भी है .......दूसरे देशो से पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने के लिए ओर सर्विसिस की बात चीत जारी थी .....सेना के कटौती वार्ता में भी सरकार गंभीर थी ......ऐसा अचानक क्या हुआ ? क्या वर्तमान सरकार से नाराज विपक्षी दल जान बूझ कर कुछ देखते हुए भी अनजान बने रहे ....ओर परिस्थितियों को बिगड़ने दिया क्यूंकि इससे उनकी राजनैतिक लाभ निहित थे ?ऐसे कौनसे लोग है जो घाटी के सामान्य होने से निराश थे ?
    क्या दूसरे नेता जो स्थानीय है ....अपने राजनैतिक लाभ हित से ऊपर किसी प्रदेश की शांति ओर उसके आगे बढ़ने में वाकई हिस्सेदारी करना चाहते है .....

    क्या देश के किसी भी प्रान्त में जब अशांति इस तरह से फैलेगी तो वहां के स्थानीय नेताओ की कोई जिम्मेदारी या भागेदारी नहीं रहेगी ?
    क्यों वहां के नेता उन पीडितो के घर नहीं गए या उन्हें सांत्वना नहीं दी जो वाकई इस हिंसा के निर्दोष शिकार है ?
    क्यों नहीं वहां के अलगवादी नेता बातचीत को तैयार नहीं .होते...क्यों वे मुख्यधारा में आकर चुनाव नहीं लड़ते ओर सत्ता को संभाल कर उस हिस्से को बेहतर बनाने के प्रयास करते क्यों वे सत्ता संभल कर उसे इस तरह बनाना नहीं चाहते जैसा वे सो काल्ड आज़ादी लेने के बाद उसे बनाना चाहते है ...
    क्या पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हालात से वे आँख मूंदे हुए है ?
    क्या हमें किसी भी राज्य को सिर्फ इसलिए अलग होने की छूट देनी चाहिए क्यूंकि वहां एक धर्म विशेष आबादी का बाहुल्य है ?
    क्यों नहीं कोई भी अलगवादी नेता कश्मीरी पंडितो के पुनः निवास की बात करता है ?क्या इससे ये जाहिर होता है के कश्मीर की आम जनता का भी इसमें मौन समर्थन है ?
    क्यों नहीं कश्मीर के लोग.....मीडिया . उस वक़्त इस तरह के जलूसो में सामने आये जब कश्मीरी पंडितो ....औरतो के साथ बलात्कार हुआ था .बच्चो को निर्ममता से क़त्ल किया गया था .?
    यदि एक अनियंत्रित भीड़ आप पर पत्थर फेंकती है ....लगातार आपकी आँखों के आगे राष्ट्रिय संपाति को नुकसान पहुंचाती है आप क्या करेगे ?
    आपके साथी के नाक की हड्डी या आंख फूटी है ....हेलमेट तोड़ते हुए..... ...पथ्थरो की लगातार बारिश से ......आप क्या करेगे .....
    क्या पोलिस या सैनिक कश्मीर की जनता ओर सरकार के बीच पिसे हुए नहीं है ? आप कितने घंटे किसी बनकर में रह सकते है जो ८* ६ का हो...ओर आस पास नफरत से जूझती आँखे ......क्या सेना या ......सी आर पी ऍफ़ का हम जब चाहे इस्तेमाल करे जब चाहे हांक दे ......क्यों किसी मनो रोग विशेषग की तैनाती नहीं होती सेना के साथ .....क्या उनका मनोबल या उनकी मनो दशा पे कोई फर्क नहीं पड़ता .....आपको क्या लगता है क्या उन्हें कोई विशेष ट्रेनिंग दी जाती है ?
    दंगो ओर दूसरी अव्यवस्था को नियंत्रित करने की जिम्मेवारी राज्य सरकार की पोलिस की है .वो क्यों इसमें ढील देती है ....क्या जानबूझ कर ......?
    ......अब तक कुल जमा कितनी एक. के ४७ वहां से जब्त हुई है
    क्यों गिलानी या दूसरे नेताओ के पोते ओर बेटे दूसरे देशो में शिक्षा पा रहे है

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  12. आखिर में एक बात .....अब जबकि उत्तर प्रदेश का एक बड़ा हिस्सा .....उतराखंड बाढ़ के प्रकोप से जूझ रहे है ......लोग अपने ऑफिसों ओर बच्चे स्कूल जा रहे है ........मीडिया बार बार एक खास तारीख याद दिला कर अपने चौथे खम्भे होने की भूमिका निभा रहा है .....

    अजीम मेरा दोस्त पिछले तीन साल से नॉएडा में है उसके बारे में मैंने एक बार पहले भी लिखा है ......
    .जिस तरह मै गुजरात को होस्टल के उस छोटे से समूह से याद नही रखता जो मुझे या मेरे दोस्तों को 'नॉर्थ इंडियन "होने की वजह से परेशान करता था ,वो भी अपनी तकलीफों ओर कडवाहटो को अपनी पीठ पर लेकर नही घूमता वो पांचो वक़्त नमाज नही पढता ठीक वैसे ही जैसे मुझे मन्दिर गये ज़माना हुआ ,उसे भी इमाम बुखारी से उतनी ही नफरत है जितनी मुझे तोगडिया से ..वो भी सैयद शाहबुद्दीन या हाजी अख़लाक़ के बोलने पर उतना ही बैचैन होता है जितना मै राज ठाकरे के ,ना उसके चेहरे पर गज भर की दाढ़ी है ओर न मेरे सर पे चोटी ....
    हफ्ते भर की मेहनत के बाद एक छुट्टी वाला दिन ....दो वक़्त की रोटी ... बस यही मेरी उसकी ख्वाहिशे है.....


    सो हमें बख्श दीजिये प्लीज़

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  13. आपकी चर्चा तो हमेशा ही निराली होती है .
    बढ़िया चर्चा रही.आभार.

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  14. charcha kae liyae shukriyaa
    muddo mae vivdhtaa charcha ko nayaa aayaam daeti haen

    translition ka kuch karey please comment box kae liyae

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  15. पिछले दो दिन से मन व्यग्र था कश्मीर समस्या की जमीनी सच्चाई जानने को...
    आपका बात छेड़ने के लिए और डाक्टर साहब का विषय को विस्तार देने के लिए दिल से आभार !!!

    अभी तो बातें अंतस में जंग छेड़े हुए हैं,इसलिए इसपर टिपण्णी करना संभव नहीं......

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  16. रंजना जी की टिप्पणी को मेरी राय भी माना जाये.
    शाहिद साहब की रचनाओं पर आपकी नज़र देर से पड़ी, चलिए पड़ी तो.बढिया चर्चा.

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  17. Best Among Equals दिव्या : YE RACHNAJI KE LIYE

    भारत, जम्मू कश्मीर और सिर्फ़ कश्मीर : KUSH BHAI KA LEKH
    NAHI MILA...
    अजीम मेरा दोस्त पिछले तीन साल से नॉएडा में है उसके बारे में मैंने एक बार पहले भी लिखा है ......
    .जिस तरह मै गुजरात को होस्टल के उस छोटे से समूह से याद नही रखता जो मुझे या मेरे दोस्तों को 'नॉर्थ इंडियन "होने की वजह से परेशान करता था ,वो भी अपनी तकलीफों ओर कडवाहटो को अपनी पीठ पर लेकर नही घूमता वो पांचो वक़्त नमाज नही पढता ठीक वैसे ही जैसे मुझे मन्दिर गये ज़माना हुआ ,उसे भी इमाम बुखारी से उतनी ही नफरत है जितनी मुझे तोगडिया से ..वो भी सैयद शाहबुद्दीन या हाजी अख़लाक़ के बोलने पर उतना ही बैचैन होता है जितना मै राज ठाकरे के ,ना उसके चेहरे पर गज भर की दाढ़ी है ओर न मेरे सर पे चोटी ....
    हफ्ते भर की मेहनत के बाद एक छुट्टी वाला दिन ....दो वक़्त की रोटी ... बस यही मेरी उसकी ख्वाहिशे है.....

    सो हमें बख्श दीजिये प्लीज़

    आलोचक नामवर सिंह, मैनुपुलेटर नामवर सिंह :DONO GYAB HAIN

    बुजुर्ग व्यथा कथा : AISI KATHA NAHI SUNNA...KYON RULATE HO BHAIJEE...

    मेरी पसंद : AAPKI PASAND...HUMSUM KI PASAND...

    आज की तस्वीर : BHOOT-VARTMAN-BHAVISHYA KI EKATHHA
    TASVIR...SWAKSH EVAM SUNHDAR TASVIR.

    A U R AB HAMARI BAAT: ANOOP CHARCHA

    SADAR PRANAM.

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  18. नमन है दिव्या अजीत कुमार जैसी लड़्कियों को!

    इस चर्चा में आवश्यकता से ज़्यादा लंबाई दी गई है आलोचक की आलोचना में। पिछले २५ वर्षों के उनके योगदान की चर्चा भी कर लेते तो आलेख लिखने वाले का अलेख और चर्चाकार की चर्चा संतुलित लगती।

    दूरदर्शन देखने वाले कम ही हैं, इसी लिए नहीं दिखता लोगों को कि वो एक मात्र साहित्यकार हैं जो निरंतर (हर शनिवार सुबह) साहित्य की चर्चा करते हैं।

    प्रसंग से मेल न भी खाता हो तो भी कहना चाहूंगा कि अमिताभ अगर ठंडा-ठंडा कूल-कूल (तेल) बेचते हैं, तो अपने बेटे के बेटे की ऐक्टिंग भी करते हैं।

    तो यदि नामवर सिंह जी कुछ अन्य क्षेत्रों में भी अपना योगदान दे रहे हैं तो यह प्रशंसा की बात है, न कि आलोचना की।

    पुरुषोत्तम अग्रवाल की कबीर पर केन्द्रित किताब "अकथ कहानी प्रेम की" एक ऐसी किताब है जो हमें अपने सांस्कृतिक अतीत और वर्तमान के टकराव के बारे में सोचने के लिए मज़बूर करती है।

    दरसल शिक्षा के सता पर काबिज़ होनी की लड़ाई में लगता है दो ग्रुप बने-ठने हैं, और दोनों एक-दूसरे पर निसाना साधते रहते हैं।

    अन्य विषय पर अन्य टिप्पणियों में इतना कुछ कहा जा चुका है कि कहने को कुछ नहीं है।

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  19. कश्मीर पर बेहद जानकारीपूर्ण लेख का लिंक देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद.

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  20. `मेरी अधिकांश किताबों की सरकारी खरीद भी नहीं हुई है'

    लगता है प्रो. चतुर्वेदी जी उतने इनफ़्लुएंशल नहीं हैं जो सरकार को किताबें बेच सकें, इसलिए नामवर जी को थ्री इडीयट्स के चतुर की तरह चमत्कारी नामवर को बलात्कारी बता रहे हैं :)

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  21. वाह! ये है *’मेरे लेवल’ की चर्चा।

    नामवर सिंह जी के बारे में और जानने को मिला.. कश्मीर पर ये लेख काफ़ी अनसुलझे सवालों को और उलझाता है.. बुजुर्ग व्यथा कथायें आँखो पर पडे चश्मों को हटाती हैं

    मुझे याद है कुश ने मुझे कहा था कि
    "घटनाये सही या गलत नहीं होती.. नजरिया होता है.. इसी पर कहूँगा अपनी बात.. जल्दी में नहीं निपटाना चाहता"
    और उसके बाद उसकी वो खतरा चर्चा आयी थी..

    कलम के सिपाहियों की कलमों को इधर उधर भटकते देख रहा हूँ.. बेहतरीन चर्चा है अनूप जी..
    मोबाईल नं० हमको भी दे दीजियेगा तो हम भी अपनी अनर्गल पोस्ट्स की चर्चा करवाने के लिये एसएमएस भेज दिया करेंगे..

    *मेरा लेवल = मेंटोस लेवल जो दिमाग की बत्ती जला दे

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  22. और दिव्या अजीत कुमार जी को बधाई... ये खबर पढकर लगा कि सब कुछ गलत ही नहीं हो रहा है.. कुछ कुछ समाचार अच्छे भी हैं..

    ऑफ़ द टॉपिक:
    कश्मीर में दिल्ली से एक टीम गयी है जो जबरिया उनके घर जाकर जाकर चाय पी रही है.. कॉमनवेल्थ गेम नजदीक आ रहे हैं और रामजन्म भूमि - बाबरी मस्जिद विवाद पर रिजल्ट भी...

    कभी कभी इन घटनाओं की टाईमिंग्स देखकर मुझे लगता है कि जैसे सब एक फ़िल्म है.. सब कुछ सेट है.. सब कुछ प्लान्ड है.. और हम सिर्फ़ ये सब देखने के लिये बने हैं.. मैट्रिक्स मूवी के जैसे हम किसी प्रोग्राम का हिस्सा है.. बस इसके ऊपर और कुछ नहीं

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  23. दिव्या अजीत कुमार जी को बधाई !
    बाकी गुरुवर नामवर सिंह पर जगदीश्वर जी की कथनी की बात है वह हिन्दी जगत की उसी प्रवृत्ति की पोषक है जिसमें स्वस्थ आलोचना नदारद है और वाग्जाल की व्यापक सृष्टि है ! जिस मीडिया धर्म को रेखांकित कर रहे हैं , उनका विरोध भी उसी मीडिया धर्म का सबसे बड़ा अकादमिक नमूना बनता दिखता है ! 'पिट गई ब्रांड' और 'घंटा आलोचक' जैसी शब्दावली और इसके प्रयोक्ता में इतनी दृढ़ता नहीं है कि गुरुवर के आलोचना कर्म की 'आलोचना' जैसा कुछ प्रस्तुत कर सके |

    पुरुषोत्तम अग्रवाल सर की जिस किताब का जिक्र किया गया है , उससे अपनी असहमतियों को किताब के लोकार्पण के दौरान गुरुवर ने बेबाकी के साथ रख दी थी | किताब की यत्किंच सकारात्मकता को उन्होंने लक्षित किया , तो इसमें मार्केताइज़ जैसा क्या हो गया ? अग्रवाल जी से चार वर्ष तक क्लास-रूम में पढ़ा हूँ , और यह सदैव पाया हूँ कि हममें किसी बात पर 'जिरह करने' की प्रवृत्ति का विकास सर के अध्यापन के माध्यम से हुआ | यह संवाद-धर्मी प्रवृत्ति उनकी पुस्तक में भी है और यह स्वागतयोग्य है |

    आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में कहूँ तो विरोधियों के विरोध में 'चिलम न पाने की खुन्नस' का ही दर्शन होता है , अपेक्षित आलोचनायोग्य तथ्यपरकता का नहीं !

    आभार !

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  24. बहुत बढ़िया प्रस्तुति .......

    यहाँ भी आये एवं कुछ कहे :-
    समझे गायत्री मन्त्र का सही अर्थ

    उत्तर देंहटाएं

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