शुक्रवार, अक्तूबर 19, 2012

टीवी न खोलने की हिदायत के बीच चर्चा

सबेरे-सबेरे चाय पीते हुये लैपटाप खोल के बैठे तो याद आया कि कल बेचैन पांडे जी की एक ठो कविता बांचने से रह गयी थी। सोचा आज ही निपटा दें। देखा तो हिदायत थी टी वी मत खोलना । पांडेजी कहिन थे कि टीवी खोलते ही भ्रष्टाचार, बलात्कार, हाहाकार दिखेगा। हम फ़ौरन खोले टीवी। एन.डी.टी.वी. खोले। उसकी दस खबरें थीं:
  1. पवार को बचा रहे हैं केजरीवाल-वाई पी सिंह
  2. केजरीवाल का सिंह के आरोपों से इन्कार
  3.  वाई.पी.सिंह ने लगाये पवार पर आरोप
  4. पवार परिवार को कौड़ियों के मोल जमीन
  5. पवार परिवार का आरोपों से इंकार
  6. टैजर आईलैंड में दिग्विजय सिंह पर आरोप
  7. दिग्विजय सिंह का आरोपों से इंकार
  8. बदायूं में अधिकारी को जिंदा जलाने की कोशिश
  9. रेलवे कर्मचारियों को 78 दिन का बोनस
  10. चंडीगढ़ में एस.पी.सिटी एक लाख की घूस लेते हुये गिरफ़्तार।
 अब बताइये भला इन रोजमर्रा की खबरों में  भ्रष्टाचार, बलात्कार, हाहाकार  दिख रहा है कहीं। इसीलिये कहा गया है कवि कल्पनालोक में जीते हैं। हम अगर पांडेजी की बात मानकर टी.वी. न खोलते तो गये थे काम से। ये दस सूचनायें पता न चल पातीं।

वाई.पी.सिंह को लगता है मीडिया अपना नया हीरो बनाना चाहती है कुछेक दिन के लिये। आखिरी की तीन घटनायें इस बात की तरफ़ इशारा करती हैं कि नौकरी में समूह में ही रहने में बरक्कत है। एस.पी.सिटी अपने जूनियर से घूस ले रहा था। उसको पुलिस ने पकड़ लिया। क्या इसे एक अधिकारी की निजता में उल्लंघन नहीं कहा जाना चाहिये। अधिकारियों पर उनके रोजमर्रा के काम करने में अड़चने लगायीं जायेंगी तो वे भला परफ़ार्म कैसे करेंगे।

दूसरे के इलाके में दखल देने का एक और नमूना देखिये । कवि अमित कुमार श्रीवास्तव की कल्पनायें क्या हैं:
मेरा फोटोकदम मेरे ,
आहट तेरी ,
नींदे तेरी,
ख़्वाब मेरे ,
इतनी ख्वाहिश बस |
मतलब देखिये कवि  के पास इत्ते इफ़रात ख्बाब हैं  कि  दूसरे की नींद में धर देना चाहता है। अगले की नींद न हो गयी कोई स्विस बैंक हो गयी। इनके ख्बाब न हुये इफ़रात पैसा हो गया जिसे कहीं धर देना है।

ऐसे ही एक और कविमना  शख्सियत  के के बयान देखिये:
My Photoमैं पागल होती जा रही हूँ. पागल दो तरह के होते हैं...एक चीखने चिल्लाने और सामान तोड़ने वाले...एक चुप रह कर दुनिया को नकार देने वाले...मुझे लगता है मैं दूसरी तरह की होती जा रही हूँ. ये कैसी दुनिया मेरे अन्दर पनाह पा रही है कि सब कुछ धीमा होता जा रहा है...सिजोफ्रेनिक...बाईपोलर...सनसाइन जेमिनी. खुद के लिए अबूझ होती जा रही हूँ, सवाल पूछते पूछते जुबान थकती जा रही है. वो ठीक कहता था...मैं मासोकिस्ट ही हूँ शायद. सारी आफत ये है कि खुद को खुद से ही सुलझाना पड़ता है. इसमें आपकी कोई मदद नहीं कर सकता है. उसपर मैं तो और भी जिद्दी की बला हूँ. नोर्मल सा डेंटिस्ट के पास भी जाना होता है तो बहादुर बन कर अकेली जाती हूँ. एकला चलो रे...
देश में सब लोग घपले/घोटाले की खबरें देखने में बिजी हैं। ऐसे में एक मिसिर जी हैं जो प्रधानमंत्री जी की चिंताओं की चिंता कर रहे हैं।  चिंता का नमूना आप भी देखिये:
"अरे एक मसला कितने दिन बहस-प्रेमी जनता को बिजी रखेगा? और नया मसला खड़ा नहीं करेंगे तो जनता को भी नहीं लगेगा कि सरकार काम कर रही है। वहीँ फिनांस मिनिस्टर को देखो, उन्होंने ऍफ़ डी आई का मसला खड़ा करके कुछ तो राहत पंहुचाई। एडुकेशन मिनिस्टर पिछली बार आकाश टैबलेट के साथ दिखे थे। कितना पुराना मामला है। टैबलेट फेल हो गया, इम्प्रूव्ड आकाश आने का समय हो गया लेकिन एक भी नई फोटो दिखाई नहीं दी उनकी।" 
अभी-अभी खबर मिली है कि इन सब चिंताओं से भी बड़ी एक चिंता और  सामने आ कर खड़ी हो गयी है। पता चला है कि भारत के क्रिकेट खिलाड़ी चल नहीं पा रहे हैं। कोई भी खिलाड़ी न टिक पा रहा है।न चल पा रहा है। अब मीडिया वालों से कोई पूछे कि दोनों शिकायतों का मतलब क्या है भाई। एक तरफ़ कहते हो टिको। दूसरी तरफ़ कहते हो टिको।

लेकिन एक बात समझ में नहीं आती कि खिलाड़ी जब चल नहीं पाते तो दौड़ने-भागने वाला खेल खेलने के लिये उनको चुना काहे के लिये जाता है।

मेरी पसंद
सुनीता सनाढ्य पाण्डेय
वह फटी फ़्राक वाली लड़की
जो उठाए  अपने सर पर
प्लास्टिक का चमकता हुआ खिलौना टेंट-हाउस 
चली जा रही है
अपने खस्ता हाल टेंट  को
जिसे वह अपना घर कहती है

कल इसे बेचने की कोशिश करेगी
ठीक उसी तरह जैसे आज उसने 
टेडी बियर बेचा था
कार मे बैठे अपने हम-उम्र के पापा को

बात दस  रुपये  की खातिर नहीं बन पा रही थी
फिर बनी ,वह हारी 
जीत कार वाले अंकल की ही हुई
भूख से रोते छोटे भाई का
चेहरा जो देख लिया था उस लड़की ने.....


और अंत में
अब क्या लिखें। देश के बारे में कुछ चिंता करने का मन था। लेकिन अब जाना है दफ़्तर। सो चलते हैं। तब तक आप संभाल लो देश के हाल। ठीक है न!

नीचे की फोटो उन्हीं बेचैन पांडेय जी के ब्लॉग से जिनकी बात से बात शुरु हुई थी।  फ़ोटो विवरण उधरिच पाइयेगा।


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11 टिप्‍पणियां:

  1. यह बात अच्छी लगी | सपनों का भी लॉकर / बैंक होना चाहिए | जमा कर दो फिर दुगने तिगुने होकर मिल जाएँ | वैसे ऐसे बैंक होते हैं जो बस माँ के मन में होते हैं | एक तिल के लड्डू का सपना संजोते थे दो मिल जाया करते थे | पैरों में दर्द होता तब पैरों के साथ साथ सर में भी तेल मालिश हो जाया करती थी | सपनों के , इच्छाओं के , भावनाओं के बैंक होते हैं माओं के मन | बस एक बार जमा कर भूल जाएँ और ब्याज पर ब्याज लेते रहे |

    सुनीता पाण्डेय जी की कविता अच्छी लगी |

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  2. इस सलाहकारी चर्चा के बीच हिदायतों को भी ग़ौर फ़रमाया! :)

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  3. तब तक आप संभाल लो देश के हाल। ठीक है न!

    जल्दी लौट के आना , अपन के पास फालतू टैम् नहीं है !

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  4. charchakar kuch 'chinta' pathkon pe chor sakte hain.............

    pranam.

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  5. अरे इसीलिए कहे होंगे कि टीवी न खोलियेगा, खैर खोल लिया तो कोई बात नहीं, हम तो इसी सब लफड़ों से बचने के लिए केबल का कनेक्शन ही नहीं ले रहे, कौन लफड़ा पाले :)

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  6. टी वी खोलने की टाइमिंग गलत हो गई .
    चैनल सर्फिंग भी नहीं न किया .
    फिर काहे बेचैन को दोस देते हैं भाई . :)

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  7. आज आपकी पसंद पढ़कर आँखें नम हो गईं। कभी ऐसे एहसास बहुत रूलाते हैं। एक बार बच्चों को मेले में गुब्बारे बेचते हुए देखकर मैने भी लिखा था...

    भूखे बेच रहे थे दाना
    प्यासे बेच रहे थे पानी
    सूनी आँखें, हरी चुड़ियाँ
    सपने बेच रहे थे ग्यानी

    बच्चों ने बेचे गुब्बार मेले मे।
    लाए थे वो चाँद-सितारे ठेले में।

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  8. हाँ, आज आपकी पसंद देखकर हम भी दुखी हो गए. टिफिन पहुँचाते भूखे बच्चे को एक दिन मेरे दोस्त ने एक बिस्किट का पैकेट दिया था, जिसे उसने सूखे होंठ पर जबान फेरते हुए जेब में रख लिया, शायद ऐसी ही अपनी किसी छोटी बहन को देने के लिए.

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