सोमवार, अक्तूबर 15, 2012

जैंजीबार के संस्मरण




काफ़ी दिन से सोच रहा था कि चिट्ठाचर्चा की जाये। कभी कुछ अच्छा / रोचक पढ़ता तो मन करता कि इसके बारे में लिखा जाये लेकिन कायदे से लिखने की इच्छा सब गुड़ गोबर कर देती। सच कहें तो मुझे लगता है कि अच्छा लिखने के चक्कर में पोस्ट स्थगित करने की भावना  ब्लॉगिंग की दुश्मन है।  दुश्मनी -ए-चिट्ठाकारी। अभी फ़ेसबुक पथ पर टहल रहे थे तो देखा कि जीतेंन्द्र चौधरी ने नये ब्लॉगरों को टिप्स देते हुये लिखा है:
विभिन्न ब्लॉग के बारे में जानने के लिए कम से कम किसी एक ब्लॉग संकलक (Blog Aggregator) पर जरूर जाएँ, साथ ही प्रतिदिन चिट्ठों पर की गयी चिट्ठा चर्चा को भी अवश्य पढ़ें। चिट्ठा चर्चा को तो आपको अपना होम पेज ही बना देना चाहिए।
अब संकलक  तो रहे नहीं। न ही जीतू की सलाह पर कोई अमल करने वाला है। लेकिन मन किया कि कभी-कभी चर्चा करने का काम तो करना चाहिये। अपने सुकून के लिये।

आज अपन की छुट्टी थी। पितृविसर्जन अमावस्या । आज के बदले कल हम काम कर चुके हैं। सो आज सुबह से कई दिनों की स्थगित की हुई पोस्टें पढ़ने का काम किये। उनमें सबसे पहले पढ़ी फ़िल्म आलोचक विद्यार्थी चटर्जी की  के लिखे  अफ़्रीका के द्वीप जैंजीबार के यात्रा संस्मरण। जैंजीबार का  यात्रा संस्मरण छह साल बाद लिखा गया। इसका अनुवाद  अभिषेक श्रीवास्तव ने किया है। अनुवाद दस  किस्तों में    जनपथ पर प्रकाशित हुआ है। पहली किस्त में विषय प्रवर्तन । दूसरी किस्त में वे जैंजीबार की उत्पत्ति  के बारे में बताते हैं:
किंवदंती यह है कि इस दुनिया-जहान को बनाने के बाद अल्लाह ने अपनी रचना को वक्त निकाल कर गौर से देखा। रचना इतनी खूबसूरत बन पड़ी थी कि खुशी में अल्लाह की आंख से आंसू की एक बूंद छलक गई। जैंजि़बार के लोगों का मानना है कि यह ईश्वरीय अश्रुकण जहां गिरा, वहीं पर उनका जज़ीरा समुद्र में से बाहर निकल आया।
जैंजीबार में विविध धर्म/सम्प्रदायों के लोगों के रहने की बात बताते हुये प्रो. चटर्जी अपनी बात कहते हैं:
एकरूपता दरअसल इस अर्थ में एक अपराध से कम नहीं होती जो भावनाओं की ज़मीन को बंजर बना देती है। इसके बरक्स विविधता एक ऐसा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व है जिसके सावधानी से बरते जाने पर उसके फल जादुई आभा लिए हो सकते हैं जिनमें असीमित गुंजाइशों के बीज हों।
 (यहां ऊपर की यह तस्वीर कला को समर्पित चित्रकार जॉन डी सिल्‍वा की है)

जैंजीबार की कलात्मक/सांस्कृतिक गतिविधियों की जानकारी के बाद जैंजीबार के समाज के बारे में जानकारी देते हुये वे  पूर्वी अफ्रीका की महानतम जीवित सांगीतिक विरासत बी.किडूडे से परिचय कराते हैं:
वे अतीत और वर्तमान, परंपरा और आधुनिकता का ऐसा संगम हैं जो आपके भीतर सिहरन पैदा करती हैं। मैं जब उस नाइट क्लब में घुसा, और आश्चर्यजनक रूप से मुझसे प्रवेश शुल्क नहीं मांगा गया, तो मैंने देखा कि एक माइक के सामने रोशनी के एक टुकड़े के बीच वे धीरे-धीरे हिल रही थीं। उनका सिर ढंका था और देह पर एक रंगीन कपड़ा लिपटा था। बाएं हाथ में उनके एक सिगरेट थी और दाएं हाथ में बियर का छोटा ग्लास। जैंजि़बार के विशिष्ट संगीत तारब का प्रतिनिधित्व करने वाली किडूडे गा रही थीं, नाच रही थीं और बीच-बीच में सिगरेट का एक कश खींच ले रही थीं या बियर गटक ले रही थीं। एक मौके पर तो वे मंच से नीचे दर्शकों के बीच उतर आईं और भीड़ में शामिल हो गईं। उनका आत्मविश्वास और उनकी कला का जादू ऐसा मंत्रमुग्ध करने वाला था कि वे वहां मौजूद किसी को भी कुछ भी करने को सहर्ष तैयार कर सकती थीं। 
ऊपर की चित्र बी.किडूडे का है। वे 99 बरस की उमर में जिंदा हैं। उनसे संबंधित यह वीडियो देखिये। संस्मरण की छठी  और सातवी किस्त में जैंजीबार के शहीद माखन सिंह के बारे में जानकारी है। महान योद्धा माखन सिंह केनिया की आज़ादी और मजदूर वर्ग कोसंगठित करने के लिए ने जीवनपर्यंत संघर्ष किया था। आठवी किस्त में जैंजीबार के व्यापार, पहनावे, रीति-रिवाज, त्योहार की झलक दिखलाई गयी है। पहनावे  के बारे में वे बताते  हैं:
अफ्रीकी स्त्रियों और पुरुषों के बीच ढीले-ढाले रंगीन कपड़ों या आकर्षक जूते-चप्पलों के साथ और रंगीन चश्मों के साथ मेल खाने वाले कपड़ों का चलन है। यहां तक कि जैंजि़बार का सबसे गरीब आदमी भी जानता है कि अपने इस विशिष्ट परिधान में वह सबसे बेहतर कैसे दिख सकता है। शुक्रवार की नमाज के वक्त आप उन्हें देखिए तो वे अपने सबसे अच्छे कपड़ों में आपको मिलेंगे। हफ्ते के बाकी दिन भी, खासकर नमाज के वक्त वे इतने ही खूबसूरत दिखते हैं, लेकिन ऐसा नहीं कि सिर्फ मस्जिद या उसके आस-पड़ोस में वे बन-ठन कर निकलते हैं। बाज़ारों में, सड़कों पर और समुद्र के पास वे आपको अपने सबसे बेहतरीन परिधानों में दिख जाएंगे। गरीबों को आप उनकी कातर नजरों से पहचान सकते हैं, लेकिन उनकी चाल-ढाल और दूसरी शारीरिक भंगिमाओं में भी एक स्वाभाविक आकर्षण होता है।
(ऊपर का चित्र रंगीन अफ़्रीकी शर्ट पहने हुये नेल्सन मंडेला का।)

पारंपरिक नववर्ष या वाका कोगवा’ (Mwaka Kogwaका आगमन मनाने के लिए जैंजि़बार का सबसे रोमांचक पारंपरिक कर्मकाण्ड किया जाता है। हम यहां एक ऐसे कर्मकाण्ड के गवाह बने जो जितना खूबसूरत था उतना ही अधिक भयावह। आसपास के गांवों के ढेर सारे पुरुष अपने दुश्मन गांवों के पुरुषों को केले के तने से बेरहमी से पीटे जा रहे थे। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि पिछले साल अधूरी रह गई शिकायतों और शिकवों से निजात पाई जा सके। एक ओर जहां पुरुष एक-दूसरे पर सनक की हद तक हमलावर थे, वहीं स्थानीय महिलाएं साथ जुटकर गीत गा रही थीं और नृत्य  कर रही थीं। प्रो.चटर्जी लिखते हैं:
वे लोग जो गीत गा रहे हैं, उसके बोल इतने भद्दे हैं जिनका अनुवाद किया जाना संभव नहीं।  बाद में एक स्थानीय व्यक्ति से मुझे पता चला कि नववर्ष की रात कोई भी पुरुष गांव की किसी भी महिला के साथ परस्पर सहमति से संभोग कर सकता है। यह यहां एक परंपरा का हिस्सा था जिस पर गांव के बुजुर्गों समेत गांव के किसी को भी कोई एतराज नहीं होता।
(चर्चा की शुरआत का चित्र  ’वाका कोगवा’ का  है। संबंधित वीडियो यहां देखें)

संस्मरण की नवी किस्त में प्रो.चटर्जी ने जैंजीबार में जन्में प्रख्यात छायाकार मोहम्मदअमीन के बारे में जानकारी दी है। वेबताते हैं:



 अमीन अग्रणी छायाकार थे। अफ्रीका और उससे बाहर उन्होंने हर बड़ी घटना को अपने लेंस में कैद किया। प्रताड़ना के बावजूद बगैर झुके, बमों और गोलियों की दहशत में साहस से डटे हुए और अपनी बाईं बांह गंवा कर भी उन्होंने अपना काम नहीं छोड़ा जिसके चलते वे सर्वश्रेष्ठ सर्वकालिक फोटो पत्रकार कहलाए। उनके समकालीन उन पर नाज़ भी करते और उनसे रश्क भी खाते थे। 


प्रो. चटर्जी  आगे बताते  हैं:

मोहम्मद अमीन का सबसे यादगार काम इथोपिया में 1984 में आए विनाशक अकाल का कवरेज है जिसके माध्यम से उन्होंने समूची दुनिया को बीसवीं सदी के सबसे बड़े दानकर्म से लिए प्रेरित किया। इस विनाश से प्रभावित लाखों लोगों के लिए अंतरराष्ट्रीय सरोकार निर्मित करने में उन्होंने प्रेरणा और उत्प्रेरक दोनों का ही काम किया। उनकी रिपोर्टिंग ने संपन्न देशों को शर्मसार किया, उन्हें कार्रवाई को बाध्य किया और इस तरह से एक देश विनाशकारी अकाल के मुंह से बाहर आ सका। एक धमाके में वे (मो) अपना बायां बाजू गंवा बैठे। इसके बावजूद उनके उत्साह में कमी नहीं आई। वे कृत्रिम बांह का इस्तेमाल करने वाले दुनिया के पहले फोटोग्राफर बने।

 इस पोस्ट में मोहम्मद अमीन से जुड़ी  कड़िया हैं जिससे उनके काम का अन्दाजा होता है।  आखिरी किस्त में जैंजीबार के बर्बर अतीत, जेल से जुड़े वीडियो और जैंजीबार की अन्य झलकियां हैं। जैंजीबार की यात्रा संस्मरण लिखने के लिये प्रो.विद्यार्थी चटर्जी का आभार और उसे अनुवाद करके हम तक पहुंचाने के लिये अभिषेक श्रीवास्तव का शुक्रिया।  नीचे जैजीबार का एक चित्र ।



 आज के लिये फ़िलहाल इतना ही। दस पोस्टों की चर्चा हो गयी आज ।  बाकी फ़िर कभी देखा जायेगा।

मेरी पसंद
सुनीता सनाढ्य पाण्डेय"अरे माटीमिले ठीक से झाड़ू लगा
अरे ***,सुनता है कि नहीं?
ज़ोर ही नहीं है क्या हाथ पाँव मे तेरे
*****, एक सपाटा दूँगी अभी
ठीक से काम कर"

रोज़ सुबह मेहतरानी के ये बोल 
कानों मे पड़ते हैं मेरे
लड़का सड़क की सफाई करता है
वह कचरा-गाड़ी खींचती है
एक भी वाक्य बिना गाली के नहीं
हर गाली बद-दुआ से भरी

आश्चर्य तब हुआ जब ये जाना
वह लड़का कोई उसका नौकर नहीं बल्कि
उसका अपना ही बेटा है
पति शराबी है...राह ना भटक जाये बेटा भी
इसलिए यह भाषा अपनाती है

सोच रही हूँ जाने आगे क्या लिखा है
मेहतरानी के भविष्य में.....

सुनीता सनाढ्य पाण्डेय

आज की तस्वीर



ये तस्वीर देवेंद्र पाण्डेय की ब्लॉग पोस्ट  से।


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11 टिप्‍पणियां:

  1. सच कहें तो मुझे लगता है कि अच्छा लिखने के चक्कर में पोस्ट स्थगित करने की भावना ब्लॉगिंग की दुश्मन है।
    ताज्जुब है मैं भी यही कल दिन भर सोचता रहा -आखिर रात गए एक पोस्ट ठेल ही दी :-) अच्छी या बुरी कोई फर्क नहीं ....
    आश्चर्यों का आश्चर्य -मैं भी कल यादों के जजीरे जैसा ही बहुत देर तक सोचता रहा ...आखिर यह हो क्या रहा है ?
    वेव्लेंक्थ के ऐसे टकराव?

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    1. पोस्ट ठेल के आपने पुण्य का काम किया। बधाई!

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  2. ओह, तो इसी के बारे में उस दिन बता रहे थे आप. मैंने सोचा था कि कोई पुस्तक होगी. खैर, पढ़ती हूँ किसी दिन इत्मीनान से. लेकिन कहीं इत्मीनान से पढ़ने के चक्कर में रह ही न जाय :)

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    1. हां रह जाने की आशंका ही सच साबित होती दीखती है।

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  3. चर्चा में इतने सारे लिंक्स जी का जंजाल बन जाते हैं .
    इतना भी क्या सोचना की सोच सोच कर मूसला जड़ को झकड़ा जड़ बना दिया जाये . :)

    आप बहुत अच्छा लिखते हैं . लेकिन इतना अच्छा भी kyon लिखते हैं ?

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    1. खराब लिखने का अभ्यास करते हैं। :)

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  4. बढ़िया संस्मरण लग रहा है, पूरा पढ़ना पड़ेगा। कविता जोरदार है। सादगी से दलित विमर्श के लिए आमंत्रित करता है। चित्र पसंद आया..जानकर खुशी हुई।..आभार।

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  5. दुश्मनी -ए-चिट्ठाकारी
    ई बड़ी समस्या है जी.
    ईका कौनो समाधान !!

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    1. ईका समाधान यही है कि जो मन में आये वो लिख दिया जाये।

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  6. kafi dana pani hai.......samya nikal kar padhtoon hoon sare.........
    kshavi sare bahut achhe hain.......aur pasand to dbl pasand hai.....


    pranam.

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