गुरुवार, अक्तूबर 16, 2008

पूरा विश्वास उठ चुका है!!!

फुरसतिया जी का हम पर से पूरा विश्वास उठ चुका है. उठ भी जाना चाहिये. ऐसी हरकत बार बार कि अभी चर्चा कर रहे हैं, करते हैं, करेंगे और फिर नहीं कर पायेंगे कब तक कोई झेले. मगर हमारी भी मजबूरी..करें क्या?

पिछले तीन सप्ताह से तो कायदे से टिपिया भी नहीं रहे हैं, जो सामने पड़ गया. टिपिया दिया..और बस!!!
होता है ऐसा फेज भी. हम तो यही मानते हैं कि चलता है.

विवेक के अति आभारी हैं कि फुरसतिया महाराज को रोज चर्चवाने को मना लिए हैं.
अच्छा ही है, हमारे लिए कुछ बचा ही नहीं.

बस, हमारी लवली जी ने अपनी ब्लॉगिंग का एक साल पूरा किया और सबको धन्यवाद दिया, वो बताने के सिवा थोड़ा ही बचा है. न जाने किस भयवश उन्होंने अपनी प्रोफाईल ही अलग कर ली अपने ब्लॉग से और फोटो भी. एक वो कि अच्छी सी फोटो हटा ली और एक हम, कि अपनी नई नई टांके जा रहे हैं.

फिर उनके सिवाय, वकील साहब द्विवेदी साहेब ने अजब ही खुलासा किया. हमारे लिए तो वाकई जानकारी ही के समान थी:

मैं जानता था कि इस वास्तविकता को जान कर कुछ लोगों को दुख होगा। लेकिन यह वास्तविकता है। मैं ने यह कदापि नहीं कहा था कि 65% रिश्ते ऐसे हैं। मैं कह रहा था कि इतने लोग इन रिश्तों को मान्यता देते हैं।

वैसे दिनेशराय द्विवेदी जी हमेशा ही कुछ नया सा संदेश लाते हैं जो विस्मित कर देता है. वो गुणों की खान हैं, अतः बलवान हैं हमारी नजरों में. आपकी आप जानों.

आज जो सबसे सालिड पोस्ट लगी वो थी शिव कुमार मिश्रा जी की. आज उन्होंने साबित कर दिया कि वो हमारे ही अनुज हैं. स्नेहवश आशीष कहने को जी चाहता है. सोचता हूँ कि पास होता तो सर पर हाथ फेर देता और कहता कि वाह!! क्या बात है. क्या दोहे लिखे हैं!!!

आज तो अरूणा राय जी कुछ अलग रंग में ही आईं...और समझिये कि छा गईं. कहती हैं:

जब वे सबसे ज्‍यादा
निश्चिंत और बेपरवाह होते हैं
उसी समय जाने कहां से
आ टपकता है
एक चूजा
भविष्‍यपात की सारी तरकीबें
रखी रह जाती हैं
और कृष्‍णबाहर आ जाता है...
बहुत जबरदस्त प्रस्तुति!!!


मीडिया नारद ने सूचित किया कि आज याने १५ अक्टूबर को माननीत भू.राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम जी की जन्म दिन है मगर कहीं कोई चर्चा नहीं. आज असल संतो की यही हालत है..मगर नकल वाले संत अपने बेटों को कानून से बचा ऐश कर रहे हैं. आप भूलना भी चाह उनका जन्म दिन तो वो भूलने न देंगे.

शब्दों का सफर आज तिल का ताड़ बनाये दे रहा है..वो तो खैर हमेशा ऐसा ही करते हैं. जिस शब्द को हम तिल समझते हैं, उसकी ऐसी व्याख्या करते हैं कि ताड़ ही बन जाता है. अजित भाई को साधुवाद.

आज आलोक जी जैसे व्यंग्यकार और हर बात आराम से हजम कर जाने वाले हमारे मित्र भी भावुक हो लिए:

सर आपको कैसा फील हो रहा है-वह टीवी रिपोर्टर फिर एक बदहवास बाप से पूछ रही है।

यह सुनकर मुझे जो फील हो रहा है, वह बताने योग्य नहीं है क्योंकि वह छपनीय नहीं है।


आज उनका हृदय बोला जो मुझमें धड़का एक अपनापा सा लगता है इस शख्स से..शायद सबको लगता हो.

अभी तो बस इतना ही...बाकी देखी जायेगी. फुरसतिया जी तो आने ही वाले हैं फिर से.

एक निवेदन, भाई विवेक, आप मेरा वाला दिन ले लो...बड़ी मुश्किलें चल रही हैं..और फिर अब चार हफ्ते में भारत भी निकलना है. ये ज्यादा भारी लफड़ा है.

अंत में:

forcc

बायें से दायें:

घनश्याम गुप्ता जी, रजनी भार्गव जी, अनूप भार्गव जी, राकेश जी, समीर लाल...राकेश जी किताब ’अंधेरी रात का सूरज’ के विमोचन के अवसर पर.

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17 टिप्‍पणियां:

  1. यही कि फोटू में आप सचमुच काफी तगडे दिख दे रहे हैं -यह मन और तन का रिश्ता इतना विलोमानुपाती क्यों होता है समीर जी ?

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  2. आपने मुझे अपनी कुर्सी पर बिठाने योग्य समझा . कैसे आभार प्रकट करूँ ? पर कुछ मजबूरियाँ है . आशा है माफ करेंगे .आप कहें तो हमारे गुरु जी( श्री शिवकुमार मिश्रा जी ) से सब मिलकर रिक्वेस्ट कर लेते हैं . प्रतिभा का सदुपयोग नहीं हो पा रहा है . अनूप जी के एक लाइना की तरह उनके डेढ सौ ग्राम के दोहे जरूर हिट होंगे .

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  3. फाईनली ये बच्चा क्लास में आ ही गया, बस अब ऐसे ही आते रहिये। मैं भी किस से कह रहा हूँ जो कुछ हफ्तों में ही छुट्टी जाने वाला है। बरहाल तब तक २-३ बार की चर्चा तो बनती है। बाकि चर्चा के लिये आलोकजी की ट्रेडमार्क कापी कर देता हूँ - क्या केने क्या केने

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  4. भारत आ रहें हैं इसलिए छूट मांग रहें हैं..नहीं चलेगा..!! चिठ्ठा चर्चा आपके नजरिये से भी पढने की तमन्ना बहुत लोगों को है. पहले दिन में इतना तो चलेगा पर आगे चर्चा का आकार और वजन दोनों बढाइये. तब न क्षुधा मिटेगी

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  5. भारत आइये... बाकी तो अनुपजी संभाल ही लेंगे :-)

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  6. अब कारण समझ में आया, वरना हम यह सोचे बैठे थी शायद समीर जी ने अपनी लिस्ट की एडिटिंग की है और उसमें बाहर हो जाने वालों में मय कुछ के हम भी हों।
    भारतभ्रमण सुखद फलदायी हो - की शुभकामनाएँ।

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  7. सुखद चर्चा, सब पर भारी लग रहे है :)

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  8. समीर भाई ! काफी समय से आपकी कविता नही पढी . लेखन भी कम मिलता है पढने को !

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  9. अब चार हफ्ते में भारत भी निकलना है. ये ज्यादा भारी लफड़ा है.

    मेरी समझदानी तनिक छोटी है, समीर भाई..
    लफ़ड़ा बोले तो ?

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  10. हो सकता है यह उधर के लिए लफड़ा हो। इधर तो बड़ी खबर है।

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  11. is baar bhaarat aaney par kewal phone karke naa tarkaaye varna achcha nahin hoga !!!!! isae khaali peeli dhamkii mat samjhiiyaegaa

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