बुधवार, मई 16, 2007

आप गदहा लेखक नहीं हैं

आज रचना जी ने प्रण किया है कि कोई भी चिट्ठा छूटने न पाये चर्चा से और वो भी पद्य में. हमने सोचा कि यह तो बहुते उत्तम विचार है उत्तम प्रदेश की तरह. तो हमने सारी सत्ता उन्हें सौंप दी यूपी की जनता की तरह. मगर अंत तो देखो, आखिर में हमें आना ही पड़ा. मगर उनकी चर्चा में कोई कमी नहीं निकाल पाये, भले ही जहाँ तक की हो, की बेहतरीन है. उत्तम विचार. पढिये: यह रचना जी हैं, वरिष्ट महिला चिट्ठाकारा:

सबसे पहले करूं प्रणाम,
अब करती चर्चा का काम!
चिट्ठो‍ की मै सैर कराऊं,
इसकी, उसकी बात बताऊं!
दुखी कौन है, खुश है कौन?
कौन है बोला, कौन है मौन?
गीतकार की करते बात,
मुक्तक से करते शुरुवात!

आप की प्रीत ने होके चंदन मुझे इस तरह से छुआ मैं महकने लगा
एक सँवरे हुए स्वप्न का गुलमोहर, फिर ओपलाशों सरीखा दहकने लगा
गंध में डूब मधुमास की इक छुअन मेरे पहलू में आ गुनगुनाने लगी
करके बासंती अंबर के विस्तार को मन पखेरू मेरा अब चहकने लगा


ख्यालो‍ मे सवाल की मार,
यहां लिखे है‍ सत्यविचार!

न तकनीक, न ही कानून,
न ही गा रहे "लिनक्स" के गुण!
उन्मुक जी आज कुछ भटके!
मोक्ष की चिन्ता मे है‍ अटके!!
न इतिहासविद न आलोचक
फ़िर् भी बात की है रोचक!

जहाँ एक ओर विद्वान हैं जो मानते हैं कि हिन्दू धर्म लाखों करोडों वर्ष पुराना है तो वहीं दूसरी ओर के लोग सभी धार्मिक ग्रन्थों को मात्र कल्पना की उडान से अधिक नहीं समझते। मेरी समझ में सत्य इन दोनों रास्तों के कहीं बीच में है पर विडम्बना है इस बीच के रास्ते पर कोई चलना ही नहीं चाहता। यहाँ तक तो ठीक था लेकिन इस अंतर्जाल ने सब गडबड कर दिया है। अब तो हर कोई इतिहासकार बन सकता है, आपकी योग्यता भले ही कुछ भी न हो लेकिन एक वेबसाईट बनाइये और अपना सारा अधकचरा ज्ञान वहाँ पटक दीजिये।


आंख की देखे‍ एक् झलक भर
तीन किस्तो‍ की कथा यहां पर्!

जाने आज क्यों वो सब याद आ रहा है, हमारा घर, उससे बस 3 गलियाँ दूर तुम्हारा घर, मिताली दीदी, तुम, चाचा जी, चाची, माँ, पिता जी, बुआ और भी बाकी सारे भी। और हाँ वो मैथ के सर क्या नाम था. . .हाँ, मिश्रा जी, वो जाने कैसे होंगे। सच पूछो तो ऐसे कितने लोग हैं जिनकी याद आनी चाहिए पर नहीं आती। मिश्रा सर का वो चेहरा तो अभी तक याद है, जब कितनी खुशी से वो पिता जी को बता रहे थे कि मैं मैथ्स में बहुत तेज़ हो गई हूँ और मुझे बी.एस.सी. करनी ही चाहिए, पर पिता जी का कहना था क्या करेगी, इसकी तो शादी की बात भी चल ही रही है।

पुराणिक जी से सीखिये कुछ नये धन्धे,
जानिये सुदर्शन जी कहते है‍ हिदू जिन्हे!

अभी कल पड़ोस में शादी हुई, श्रीवास्तवजी के यहां।
बड़ी-बड़ी किरकिरी हुई उनकी, कोई भी रिश्तेदार नहीं पहुंचा। ना साला, ना जीजा, ना बड़ा भाई, ना छोटा भाई।
श्रीवास्तवजी भी नहीं पहुंच पाये थे, किसी रिश्तेदार के परिवार में शादी में।
हर शादी में श्रीवास्तवजी को कोई काम पड़ गया था, सो जब श्रीवास्तवजी के यहां शादी हुई, तो सबने मिलकर श्रीवास्तवजी का काम लगा दिया।
बहुत परेशान थे। उनकी परेशानी में मुझे एक नये धंधे की संभावनाएं नजर आयीं-रिश्तेदार प्रोवाइडिंग सर्विस।



उच्च वर्ण के लोगों द्वारा बनाए गए ऐसे ही जानवरों की समानता के लिए ही बुद्ध ने अपनी पदयात्रा शुरू की थी। उद्देश्य था एक समतामूलक समाज की स्थापना। और फिर एक समय तो ऐसा आया जब भारत के अधिकांश भूभागों पर बौद्ध राजाओं का शासन था। जिसे जे.सी.मिल ने हिंदू काल कहा है उसमे से ज्यादातर बौध्ध्काल ही है और मिल ने जानबूझकर इसे हिंदुकाल कहा जिससे भारत मे यह स्थापित हो सके कि यहाँ पहले तो हिंदू थे और बाद में उन्हें भगाकर मुस्लिम शासक बन गए।

मामले एक नही! है‍ पूरे तीन दर्जन!
हिन्दी हो ललित तो पढने को करे मन!!

इस रचनात्मक आंदोलन से जुड जाईये. आम अंग्रेजी शब्दों के लिये सहज हिन्दी शब्द सुझाईये. हम हर दिन एक नया शब्द आपसे मांगेगे, लेकिन उसका इंतजार किये बिना भी ई-पत्र द्वारा आप पाणिनि को सुझाव भेज सकते हैं. अगली पीढी आपका ऋणी होगी. हिन्दी के प्रचार-प्रसार में यह एक और कदम होगा. – शास्त्री जे सी फिलिप

सारथी जी को हिन्दी सुझाईये,
इन शब्दो‍ के अर्थ बताइये!

Software
Frustration
Netizen
Net-culture
Surfing

अच्छे दिन नही रहे तो बुरे भी नही रहे‍गे

आपने ये कहा है, तो हम भी यही कहे‍गे!!
कही एसा न हो जाये
चमचा महात्म्य कोई गाये !!
क्या ये खजुराहो को उडाये‍गे?
या फ़िर् कान्क्रीट का दरख्त गिराये‍गे??

बड़ी मुश्किल हो गयी है। जिसे देखिये वही खजुराहो, अजंता एलोरा, कोनार्क या फिर काम सूत्र का हवाला दिये जा रहा है। हुसैन का मामला हो या फिर बडौदा के एमएस यूनिवर्सिटी के कला विद्यार्थी चन्‍द्रमोहन की गिरफ्तारी का ... तर्क देने वाले जब देखो, यह बात उठा दे रहे हैं। यह तो हिन्‍दुत्‍ववादियों (हिन्‍दू मजहब मानने वाले नहीं) के गले की फांस बन गया है। भई, उस वक्‍त तो ये शक्तिमान थे नहीं, तो कलाकारों के मन में जो आया, बना डाला। जिंदगी के जो खूबसूरत तजर्बे थे, उनकी अभिव्‍यक्ति अपने कला माध्‍यमों के ज़रिये कर डाली। उनकी नीयत क्‍या थी, वो तो वही जाने लेकिन ये पंगेबाज उस वक्‍त रहते तो यकीन जानिये न तो खजुराहो के कलाकार बचते और न ही वात्स्यायन साहब।

हर तरफ़् अब् यही अफ़साने है‍!
मां के और् भी गीत गुनगुनाने है‍!!

दौर-ए-जुनू मे....

कवियो‍ को भी लग जाता है रोग्!

जिसे लिखना नही आता वो क्या कहता है!
यही कि अब् वो भी कुछ लिखता रहता है!!
रचनाकार लेकर आये है‍'मुझे कुछ याद नही
पढिये हरिसि‍ह जी ने जो कथा कही!

"संभावना व संघर्ष" दोनों में है जबर्दस्त दम
यही तो मानते है ना आप और हम?


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अब रचना जी थक गई. कोई भी थक जायेगा, इतने सारे चिट्ठों की चर्चा करके. तो आगे का कार्य जो थोड़ा सा बचा है रचना जी की नजर में, वो हम करना शुरु करते हैं. अब हम उनकी और हमरे गुरु राकेश भाई की तरह पद्य में करने की काबिलियत नहीं रखते तो गद्य में ही लिखे देते हैं. :) उसमें तो हम हमेशा ही लिखते आये हैं.

विनय पत्रिका में बोधिसत्व जी लाये हैं अपनी निराला जी पा लिखी एक बहुत बेहतरीन कविता:

जितना नहीं मरा था मैं
भूख और प्यास से
उससे कहीं ज्यादा मरा था मैं
अपनों के उपहास से ।

जरुर पढ़े यहाँ पर .

अब जब हम खुद को गदहा लेखक घोषित कर चुके हैं तो उस आलेख पर अभी भी जारी टिप्पणी महायज्ञ में भाई पंगेबाज अरुण जी दो बार आहूति डाल गये. बस फिर क्या था, गदहों ने आकर उनको घेर लिया है और कल मिटिंग के लिये बुलवाया है. काकेश भी साथ जायेंगे, ऐसी सूचना मिली है. इसी लिये काकेश नें आज कुछ नहीं लिखा.वहीं जाने की तैयारी में सज रहे हैं. :)

बात करामात में विशेष सोशल इंजीनियरिंग का सच: ज्ञानेन्द्र दद्दा से प्रेरणा लेकर लिख रहे हैं और बिना किसी से प्रेरणा लिये महाशक्ति प्रमेन्द्र बता रहे हैं कि बेहतरीन टेनिस प्लेयर किम क्लाइस्टर्स पर क्या गुजरी और अब उनका क्या प्लान है. यह होता है बड़ी जगह पहचान रखने का नतीजा, अंदर की खबर लाये हैं जो किसी को नहीं मालूम थी. साधुवाद प्रमेन्द्र को. जब पढ़ लो तो पढ़ने का आभार व्यक्त करने के लिये आपको मुफ्त दिखायेंगे हमारे महाशक्ति स्पाईडर मेन ३ .

गद्य गद्य-काहे बोर हो रहे हो भाई. लो सुनो दो दो बेहतरीन मुक्तक मालायें: एक तो भाई परमजीत बाली जी से और एक हमारे गीत सम्राट और मेरे गुरु राकेश खंडेलवाल जी से. दिव्याभ भाई तो खैर जब भी लिखते हैं, ऐसा लिखते हैं कि हम बिछ बिछ जाते हैं. भाई की लेखनी है ही ऐसी गजब की. तो उन्हें पढ़ें डिवाईन इंडिया पर...तू ही मेरी प्रतीक्षा है . कविताओं में हाशिया पर देखिये राजेश जोशी जी की एक से एक रचनायें

अब वापस, वाह मनी ने बताया कि फिलिप्स कार्बन ब्लैक में पैसा ही पैसा . मगर अपना संयम बनाये रखना भाई, उतना ही खेलो या अटकाओ कि डूब जाये तो उबर पाओ. मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि कमल भाई को भी इस तरह की कोई चेतावनी हर पोस्ट के साथ लगाना चाहिये ताकि लोग भ्रमित न हो जायें. :) मात्र मेरी सोच है बाकि कमल भाई जानकारी अच्छी दे रहे हैं और ब्लॉग में साईड में फोटू भी, हा हा!!!.

आज हमारे भतीजे जी उत्कर्ष महाराज की भी छुट्टी शुरु हो गई. अब वो आपको रोज चुटकुले सुनाया करेंगे. आज भी सुनाया है. अरे भाई जाओ और बालक का उत्साह बढ़ाओ. आज के इस परेशान जमाने में इससे बड़ी कौन सी समाज सेवा हो सकती है कि कोई आपके चेहरे पर मुस्कान ले आये. आप मुस्करायें. बच्चे को क्या चाहिये, बस आपका उत्साहवर्धन. जरुर करें. मेरा निवेदन है. भले ही उसके चाचा पंकज को टोना टोटका जादू मंतर पर न टिपियाओ, चलेगा. वो तो टिप्पणी प्रूफ हो चुका है. :)

अभय भाई निर्मल आनन्द पर बिल्लू भाग ३ ले आये हैं-कहानी सही जा रही है और हर बार कुछ प्रश्न छोड़ जाती है अगली कड़ी के लिये. पढ़िये. सुषमा कौल जी टेलिग्राफिक पोस्टों का दौर चालू है, यह एक समाचार माना जाये.

अनिल रघुराज जी से सुनिये जिसकी जितनी संख्या भारी और खैरात या हिस्सेदारी, क्या देंगी बहनजी . दोनों ही विचारोत्तेजक लेख है मगर हमारे पास तो जबाब नहीं है. आप लोग देखें, हम थोड़े दूर देश में रहते हैं न!!

बरसाती रिमझिम का संस्मरण सुन लें प्रमोद भाई से और हनुमान जी काहे वापस नहीं आये, जानने के लिये लक्ष्मी गुप्त जी का आलेख हरि अनंत हरि कथा अनंता पढ़ें. बड़ी रोचक कथा है. अब चलते चलते इसे काहे छोडे दे रहे हैं: धर्म के नाम पर फिर बवाल मचने के प्रयास जिसे लाये हैं शब्द लेख सारथी. बढ़िया है. :)

अब चलते हैं. आज प्रयास रहा कि कोई न छूटे हमेशा कि तरह. अगर कोई छूटा हो तो रचना जी गल्ती. अगर कोई कवरेज से खुश हुआ, तो धन्यवाद के लिये मैं हाजिर हूँ, मैने ही रचना जी को कहा था कि आपको कवर जरुर कर लें. अब चलें राम राम. वैसे चिट्ठों की संख्या बढ़ती जा रही है. हर रोज दो चर्चा की जरुरत है. आगे आओ न चिट्ठाकारों. बनो न चर्चाकार, आप तो बेहतरीन लिखते हैं, यहाँ भी लिखो न!!!

सूचना: मुक्तक माहोत्सव चालू है, यहां देखिये

टिप्पणी दें ताकि रचना जी अपनी चर्चा जारी रखें. :)

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9 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत दिन बाद चिट्ठे इतनी मात्रा में आये चर्चा में। रचनाजी अपने अंग्रेजी ब्लाग में बड़ी अच्छी प्रवाहमयी रचनायें लिखतीं रहीं अब यहां हिंदी में भी चर्चा के बहाने उसके दर्शन हो रहे हैं। अच्छा लगा। समीरजी की क्या तारीफ़ करें? वे तो सिद्ध गद्य (गदहा) लेख हैं! :) रचना-समीर चर्चाकार जोड़ी को बधाई!

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  2. वाह समीर भाई यह भी खूब रही,.क्या आप डर गये है? आप आज लिख रहे है की सभी लेखक गदहा नही है,पगेंबाज जी को आदत है पगां लेने की,...आप फ़िक्र ना करें हम सब आपके साथ है,..वैसे रचना जी ने बहुत ही सुन्दर चिट्ठा-चर्चा की थी आपने भी उसमे आकर और सुंदर रूप दे दिया,..धन्यवाद,..
    सुनीता(शानू)

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  3. अरे वाह,

    आज तो हमारा चिटठा भी चरचा मे आ गया,
    बहुत बढिया चरचा किये है, ऐसे ही चालू रखे |

    साभार,
    नीरज

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  4. क्या जुग्ल बन्दी है! वाह वाह.
    सुन्दर.

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  5. हाँ जी हम तो गये ही थे मीटिंग में ..बताते हैं क्या क्या हुआ ...लेकिन आपकी चर्चा अच्छी रही.शायद कोई ना छूटा होगा आज.

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  6. चर्चा तो आप कर दिए हमार चिट्ठे की, मगर बहुत परेशान हूं कि कोई टिपियाने नहीं आता.
    कोई फालतू टाइप मिले, तो हमारे चिट्ठे पर भेज दीजिएगा.

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  7. झक्‍कास चर्चा थी । बधाई


    चिठ्ठाचर्चा पर काफी दिनों बाद अपने आप को देख कर अच्‍छा लगा धन्‍यवाद

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  8. रचना की चर्चा है, सुन्दर रचनाओं का बहा समीर
    चिट्ठों की बातें हैं कोई पंगा ले कोई गंभीर
    मालकौंस से शुरू हुआ है राग भैरवी तक आ पहुंचा
    अब ऐसी चर्चा पढ़ने को होता है मन और अधीर

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  9. @ अनूप जी, सुनिता जी, नीरज जी, सन्जय भाई, का्केश जी, प्रमेन्द्र बहुत धन्यवाद!

    @ राकेश जी, इस पद्यमयी टिप्पणी के लिये खास शुक्रिया....आपकी चर्चा से ही प्रेरणा लेकर मैने कोशिश की है.

    @ पन्कज जी,
    //कोई टिपियाने नहीं आता.
    कोई फालतू टाइप मिले, तो हमारे चिट्ठे पर भेज दीजिएगा. //

    कोई फ़ालतू टाइप का टिपियाता नही है..:)

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