बुधवार, अप्रैल 04, 2007

ये भी हो ही गया!!!!

कल चर्चा राकेश खंडेलवाल जी करनी थी, नहीं कर पाये. इस न करने पाने से इतना व्यथित हुये कि न कर पाने की ही कथा ही सुनाने लगे कविता, कम्प्यूटर और चर्चा.
फिर उनकी चर्चा उनके अंदाज में करने की १ बटा ८ कोशिश हमने की. कर दी. आज की चर्चा हमें करनी थी मगर रोज रोज क्या करें तो रचना जी को पकड़े कि आज की चर्चा जितनी आप कर पायें कर दिजिये बाकि की हमारे निवेदन किये बगैर संजय कल मध्यान चर्चा में करेंगे जो फुल चर्चा टाईप दिखेगी. बहुत दिन गैर हाजिर रहने का कुछ तो जुरमाना लगता ही है. तो आज की चर्चा अपने अलग अंदाज में लेकर आई हैं रचना जी. हालांकि हमने उनसे वादा किया था कि उनसे बचे चिट्ठे हम कवर कर लेंगे मगर उनकी बेहतरीन चर्चा को आगे बढ़ा पाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं तो आप बस उनको सुनें, आगे देखते हैं.


रचना जी की कलम से:

मित्रों नमस्कार!

कई महिनों की ना-नुकुर के बाद, थोडा आत्म विश्वास लेकर नीलिमा के प्रतिनिधित्व के समर्थन के लिये आपके समक्ष हाजिर हूँ...मेरा ये प्रयास मेरे उन अनजान चिट्ठा-मित्रों को धन्यवाद स्वरूप समर्पित है जिनकी सहायता से मेरे जैसी नितान्त घरेलू जीव एक साल मे यहाँ थोडा सा स्थान बना पाई हूँ ....तो पहले ये दृश्य देखें---

चर्चा की ट्रेन से समीर जी आवाज लगा रहे थे आओ तुम भी कर लो चर्चा!

मैने कहा- यहाँ पहले ही तमाम भीड़ है जगह कहाँ है इस चर्चा के डिब्बे मे? कोई 'महाब्लागर' है तो कोई 'ब्लाग के पितामह', कोई 'तकनीकी विशेषज्ञ' और व्यंजलकार तो कोई 'जुगाडी' कोई गीत सम्राट तो कोई तरकशी तीरंदाज, तो कोई कविराज और आप तो पुरुस्कारों से लदे खड़े ही हैं!

वे बोले- अरे!! कितनी जगह चाहिये तुम्हे? देखो "हम सब भारतीय हैं!" जब तक भीड न हो हमे किसी काम मे मजा ही नही आता है! 'एमएटी' पर तीन लोग और स्कूटर और मोटर साइकिल पर कम से कम चार लोग बैठते हैं और मारुति कार मे छह लोग...

और मै अभी सारे ब्लाग लेखको की लेखन शैली जान भी नही पाई हूँ...उनके लेखन को एक पोस्ट पढकर कैसे जान सकती हूँ?

समीर जी: क्या कहा? एक पोस्ट पढकर समझ नही पाओगी तो क्या दस पोस्ट पढ लोगी तो समझने लगोगी? अपने आप को बहुत समझदार समझती हो? अरे यहाँ लोग तीन तीन साल से एक दूसरे को जानते हैं, फिर भी आपस मे उलझ जाते हैं कभी कभी...

लेकिन आपने मुझे ही क्यूँ चुन लिया?

समीर जी: तुम्हे हमने बिल्कुल "रेन्डमली सेलेक्ट" किया है, भारत मे ऐसे चुनाव भी होते हैं, बिना किसी 'क्राइटेरिया' के!!

लेकिन फिर भी...

समीर जी:देखो अन्तर्जाल अमर होने की जगह है. मौके के का फायदा उठाओ वरना 'शब्दों के भूचाल' और 'विचारों के बवंडर' मे कहाँ गुम हो जाओगी पता भी नही चलेगा!जाओ नारद वाले रास्ते से जाना और जो दिखे उसका वर्णन ऐसा करना कि चर्चा पढने वाला उस पोस्ट को पढे, जिसकी चर्चा तुमने की है..और हाँ जो दिखे उतना ही बताना..समीक्षा जैसा नही लगना चाहिये. आज तुम्हे हम अपने 'चर्चाकार पास' पर लिये चलते हैं...हर हफ्ते आना हो तो बताना, देबाशीष से कहकर नया पास बनवा देंगे..ठीक है..

कोशिश करती हूँ---

आईये रजनी जी के साथ बसन्त की ताजगी से शुरुआत करें और फिर नयी तकनीक से सन्देश ले लें शैलेश जी से.

ग्लोबल वार्मिंग पर विश्व में चर्चा चल रही है...वन प्रबन्धन मे जन भागिदारी के बारे मे जाने...

एक्‍टर से एक्टिविस्‍ट हुए इरफान से मुलाकात:


तीसरी बीड़ी सुलगाकर ज़ेमाल मियां मुझे कंप्‍यूटरों के बीच और आगे ले गए. अनुभवी गाईड वाला लेक्‍चर बदस्‍तूर जारी रहा- नये ब्‍लॉग्‍स से अलग काम के बाकी बिलाग भी हमने क्‍लेम कर लिया है जिनका सोसायटी और ज़माने में कोई रोल था. तुम्‍हारे अज़दक में भी कोई उपयोगिता, थोड़ी सामाजिकता होती तो बच्‍चे उसको लौटाल लाते.. मगर तुम अकेले नहीं थे.. तुम्‍हारी तरह ढेरों लोग बिलाग को खिलौना बनाकर खेलते रहे.. खास तौर पर कनपुरिया, उड़नतश्‍तरिया, अनामदसिया.. बुरा मानने की बात नहीं, बच्‍चा.. There is nothing personal about it. Everyone here is working in a wider interest. For History. For betterment of the world, of our planet!



प्रमोद सिंह के उक्त कथन के बाद भी मोहिन्दर जी को नाउम्मीदी सता रही है..

प्रियदर्शन जी एक पते की बात बता रहे हैं कि भ्रष्टाचार कैसा दिखता हैऔर वर्षा की नजर से देखे जिन्दगी और पावर मे है कितना दम है ये जानिये-


कुछ लोग यह कहते हैं कि लंबे निवेश के लिए बढि़या स्‍टॉक कौन सा है। मेरी राय में सबसे सुरक्षित और बेहतर स्‍टॉक एनटीपीसी है, जिसमें शेयर निवेश की जानकारी न रखने वाला भी निवेश कर सकता है। हां, यह जरुर है कि यह शेयर रोज रोज की घटबढ़ से खासा प्रभावित नहीं होता लेकिन टूटता भी नहीं है।


अहा! ये तो कमाल हो गया इस सूची मे मै भी! जिसके टॉप पर है उड़न तश्तरी. जीतू 'भाई' नारद की कथा सुना रहे हैं कृपया "रिसर्चर" और "रिपोर्टर" ध्यान से सुने!!


हिन्दी लिखने के लिए भी काफी तकलीफ़ें थी, कोई कुछ प्रयोग करता था कोई कुछ। मैने तख्ती चुना, हालांकि कुछ दिक्कतें थी, लेकिन फिर भी काम चल जाता था। अच्छा प्रोग्राम था, बस कोई भी एक यूनिकोड फोन्ट चाहिए होता था इसको, विन्डोज के हर तरह के वर्जन पर चलता था। इस बीच रमण कौल ने आनलाइन टूल यूनिनागिरी विकसित किया, जिसमे पहले हिन्दी,कश्मीरी फिर गुरमुखी(पंजाबी) और अन्य भाषाएं विकसित की गयी। रमण के पेज पर सारे एडीटर्स का लिंक है, जरुर देखिएगा। इधर ईस्वामी ने हग टूल विकसित किया (इसने नाम भी किसी विशेष जगह पर बैठकर सोचा होगा) फिर उस टूल को वर्डप्रेस मे डाला गया। ईस्वामी भी काफी जुगाड़ी बन्दा है, लेकिन सबसे भिड़ता बहुत जल्दी है, बस किसी ने लाल कपड़ा दिखाया नही कि टक्कर मारने को उतावला हो जाता है। वैसे भी इसका सांड प्रेम किसी से छिपा नही है। इसने भी काफी रातें काली की और हिन्दी के लिए टूल बनाया, ब्लॉग नाद के प्रोजेक्ट के लिए काफी काम किया इसने। बाद मे ईस्वामी के इस टूल मे आशीष ने इसमे वर्तनी जाँच (Spell checker) लगाया था। मैने शुरुवात तख्ती से जरुर की थी, लेकिन बाराहा के आने के बाद तो पूरा नज़ारा ही बदल गया.



यहाँ पढिये छठी पुतली रविभामा की कथा.

अभय जी 'स्त्री' पर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के विचार के हिन्दी अनुवाद की पहली किस्त लेकर हाजिर हैं और हम उनकी अगली किस्तों के लिये उनके निवेदन को मानते हुए धर्य से इन्तजार करेंगे!


क्योंकि स्त्री की भूमिका मिट्टी की ग्रहणशील, समावेशी भूमिका है जो न केवल पेड़ को बढने में मदद देती है बल्कि उसकी वृद्धि की सीमायें भी तय करती है। जीवन के जीवट के लिये पेड़ अपनी शाखाएं ऊपर की दिशा में सभी ओर फैलाता है मगर उसके सारे गहरे बन्धन ज़मीन के नीचे मिट्टी में जकड़े हुये छिपे हुए हैं और उसे जीने में सहायक होते हैं। हमारी सभ्यता के भी अपने समावेशी तत्व चौड़े, गहरे और स्थिर होने चाहिये। केवल वृद्धि नहीं, वृद्धि का एक समन्वय होना चाहिये। सिर्फ़ सुर नहीं ताल भी होना चाहिये। ताल कोई बाधा नहीं है, ये वैसे ही जैसे नदी के किनारे होते हैं, वो धारा को सततशील बनाते हैं वरना वह दलदल के अनियतता में खो जायेगी। ये लय है ताल है, जो संसार की गति को रोकती नहीं बल्कि उसे एक सत्य और सौन्दर्य प्रदान करती है।


चोला बदलते खबरिया चैनल से चिन्तित हैं सन्जीत जी.

अभय जी के इतने अच्छे लेख के बाद फिर दिखी उनकी अनाम टिप्पणी के लिये व्यथा
और अब आप नेता राम लुभाया को जाने.

कमल जी जानकारी दे रहें हैं एक नये डॉन की-


खुन सा एक अरबपति है। विश्‍व के प्रमुख माफियाओं, तस्‍करों के साथ वह अपने 'गोल्‍डन ट्रायंगल' नामक जंगल से संपर्क में रहता है। अलग-अलग अंतरराष्‍ट्रीय भाषाओं के जानकार खुन सा की फोन डायरी में पांच नंबर हैं और ये पांचों विश्‍व के ड्रग साम्राज्‍य के मुख्‍य संचालक हैं। खुन सा छिपने के लिए जंगलों में नहीं रहता, अपितु गहरे जंगलों में उसकी विशाल जमीन पर दुनिया भर के लिए पर्याप्‍त हेरोइन का उत्‍पादन होता है, प्रक्रिया होती है। इसके अलावा अन्‍य नशीली दवांए तैयार की जाती है। खुन सा यदा-कदा ही दिखाई देता है लेकिन उसके तहत 20 हजार आधुनिक शस्‍त्रधारी मारफाड कमांडो की टुकड़ी है। यह टुकड़ी उत्‍पादन प्रक्रिया या नशीले पदार्थों की जंगल में खेती भी करती है। कई साल पहले जॉन गूनस्‍टोन नामक पत्रकार कड़ी मेहनत और कितनी ही सिफारिशों के बाद खुन सा के साम्राज्‍य में जा पाया।



-----------यहाँ पर रचना जी की चर्चा खत्म होती है-------------

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अब उड़न तश्तरी की कलम...

विश्वास मानिये, मैं हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था कि रचना जी की बेहतरीन चर्चा को आगे बढ़ाऊँ मगर छूटे हुये चिट्ठों की संख्या देख मन नहीं माना.

उफ्फ!! कैसे छोड दूँ पीयूष का पियक्क्ड़ों से पंगा या फिर राजेश चेतन जी का साप्ताहिक कालम, वो भी इस चुनाव के महौल में.

कैसे छोड़ दूँ हमारे ई-स्वामी का झन्नाटेदार प्रश्न करता लेख: देसी क्रिकेट प्रशंसक या स्यापाग्रस्त रुदालियाँ:


मेरा क्रिकेट का स्यापा करने वालों से सवाल है की हमारी संस्कृति में खेल-कूद और व्यायाम पर कितना ज़ोर है? जिस देश में कोई खेल खेलना ही समय की बर्बादी माना जाता हो, बच्चे बस्तों के बोझ तले दबे रहते हों उस देश में किसी खेल को व्यवसाय बनाना क्या कम जोखिम का काम है? गरीब देश की भ्रष्ट सरकारें प्रतिव्यक्ति २ पैसे से भी कम खर्च करती हो खेल-कूद पर, ३० प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा के नीचे हो, वहां कितने चैंपियन बनेंगे और कैसे? हम किस गणित से उम्मीद करते है की हमारे खिलाडी विश्वस्तरीय होंगे?


न भई, हम नहीं छोड़ पायेंगे वो भी तब जब हमारे शुऐब भाई रात के खेल और दोस्त के बिछोह से दुखी हों और पूनम मिश्रा जी भोर भ्रमण की सरगम छेड़ रही हों और दोपहर की कैफी आज़मी साहब की नज़्म हो.

छोड़ तो देता मगर बेजी का आग्रह कैसे छोड़ दूँ. रवि भाई विश्व प्रसिद्ध चुटकुले सुनाते हों और प्रतीक फिटनेस का उपाय बतायें, तो कैसे चला जाऊँ.

जानते हैं लोग कि बीच में भाग सकता हूँ तो पंकज भी लुभाने का अलग ही तरीका ले आये पांडा के लिये पोर्न फिल्म और संजय भाई अपने सर सारा चर्चा का बोझ पड़ता देख कहने लगे कि दूसरे के सर फोड़ो ठीकरा, यह आसान है.

क्या कोई महाशक्ति के संवेदनशील हृदय की छोड़ सकता है या उनके विभाग में हुये पुरुस्कार वितरण के दौरान हुई मजेदार घटना की चित्रमय जानकारी.

वैसे भी हम काहे जायें जब ज्ञानदत्त पांडे जी राम राम कह कर भी नहीं गये और सोमेश शरद जोशी की उपदेश-कथाएँ सुना रहे हों.

आशीष कहते रहें कि जी हाँ मुझे कोई हक नहीं है सपने देखने का और अरुणिमा जी इतनी उम्दा गज़ल सुनायें कि उस महफिल में जाना क्या ..... ठीक है नहीं जायेंगे!!

अब किसी को शिकायत हो तो हुआ करे. हम तो नहीं जायेंगे उस महफिल. बस यहीं से लौट जायेंगे. अब बाकि संजय भाई जानें और उनके कॉफी के कप.

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12 टिप्‍पणियां:

  1. भीड़ भीड़ हां भीड़ लगी है गलियों में चौराहों पर
    जिधर निकलिये अक्सर कंधे, छिल जाते हैं राहों पर
    लेकिन जो जुड़ गये यहाँ पर चिट्ठों की चर्चा करने
    उन सबको कर अलग भीड़ से, रखते हम सर आँखों पर

    असमंजस में हूँ,किस किस को मैं धन्यवाद के शब्द लिखूँ
    उड़नतश्तरी को लिख दूँ या रचनाजी को वाह लिखूँ
    फ़ुरसतियाजी, रवि रतलामी, जीतू भाई सब अनुपम
    देबूदा को सोच रहा हूँ,करते हुए प्रणाम लिखूँ

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  2. रचना जी को भी चिट्ठा-चर्चा करते देख अच्छा लगा।

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  3. संजय बेंगाणीअप्रैल 04, 2007 8:59 am

    स्वागत है, रचनाजी.
    भीड़ में आपको कहाँ परेशानी है, जब समीरलालजी अपनी आधी सीट दे रहे हैं. आपतो उतनी जगह में अराम से समा जाएंगी :)

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  4. अरे भले ही रचना जी को लालाजी ने रेंडमली सलेक्ट किया हो, पर च्योइस तो फर्स्ट क्लास है.


    लगता ही नही कि यह उनकी पहली चर्चा है. भई डेबु तो धमाकेदार रहा है, अब धोनी की तरह दनादन चालु रहें बस फोर्म खराब ना करें... :)


    बाकि इस फोर्म से तो कईयों के पसीने निकलने वाले हैं...

    वैसे अगर तारीफ में अति लग रही हो तो निम्बु पानी पी लें.. ताजगी आएगी और एक नई चर्चा के लिए आप फिट हो जाएंगी.


    वैसे वास्तव में रचनाजी को चर्चा करते देख सुखद अनुभव हुआ. :) धन्यवाद.

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  5. बहुत खूब! रचनाजी को चर्चा करते देख बहुत अच्छा लगा। समीरजी को बधाई कि वे रचना जी का उत्साह बढ़ाते हुये उनको इस मंच तक ले ही आये। अब समीरजी के चर्चा साथी के रूप में रचनाजी का दिन बुधवार पक्का! देबाशीष ने दायीं तरफ़ जो 'लेटेस्ट'ब्लाग पोस्ट की लिस्ट लगाई वह अच्छी है। समीरजी को कल के टाप ब्लाग में चुने जाने की बधाई! रचनाजी भी टीम में थीं इसलिये उनको भी। नीलिमाजी अब अकेली नहीं रहीं। एक और सहेली मिलीं उनको इसलिये उनको भी बधाई!

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  6. रचना जी बहुत बहुत बधाई

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  7. रचना जी लगता है कि अब तो 33% प्रतिशत वाली कामना फलीभूत हो ही जाएगी;)

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  8. सोचा सबके साथ फारमल तारीफ तो कर ही दूँ रचना जी की इतनी बेहतरीन चर्चा के लिये, वैसे तो चर्चा के दौरान कर ही दी थी, फिर भी टिप्पणी की बात अलग है. :)

    अब परमानेन्ट पास बनवा ही देते हैं बुधवार की चर्चा का!

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  9. बड़ी खुशी की बात है कि रचना जी भी आज से इस चर्चा में शामिल हो गईं । बधाई !

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  10. सभी का धन्यवाद..लेकिन शुरुवात ही ठीक रही बस.चर्चा और ठीक से की जानी चाहिये थी.अगली बार कोशिश करूँगी.

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  11. रचना जी, यदि आपको खुद ऐसा अहसास हो रहा है कि चर्चा और ठीक से की जानी चाहिए तो यह श्रेष्ठ चर्चाकार होने का परिचायक है। अपने भीतर सतत असंतोष का भाव ही हमें बेहतर लेखन के लिए प्रेरित करता रहता है। चर्चाकारों की टीम में शामिल होने पर बधाई! आपका हार्दिक स्वागत है।

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  12. पहली बार रचना जी को चर्चा मे देख बहुत ख़ुशी हुई और आजकी ये चर्चा भी बढिया रही

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नोट- चर्चा में अक्सर स्पैम टिप्पणियों की अधिकता से मोडरेशन लगाया जा सकता है और टिपण्णी प्रकशित होने में विलम्ब भी हो सकता है।

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