एक पोस्ट पर चर्चा कई बार हुई है पर आज हम एक चिट्ठाकार पर चर्चा करना चाहते हैं। गजब खब्ती चिट्ठाकार है ये। वन कैननॉट ड्रेग हीम टू... ब्लडी कीचड़ आव चिट्ठाकारी, अगला वही रहेगा जो है पर यू कान्ट ड्राइव हीम अवे आइदर ... अगला बना रहेगा। आप टिपियाए या नहीं, पढें या नहीं (समझ पाएं या नहीं)यानि चिट्ठाकार परमोद बाबू।

आज की उनकी पोस्ट कुल जमा दो लाइन की पोस्ट है... पूरी की पेरी दे देते हैं-
जीवन के ट्रैफिक में मैं कहीं उलझा रह गया था, मौका अभय बाबू ने मार लिया था, मेरे देखने का छींका आज टूटा, उसी मीठी जलेबी का एक छोटा सा मजमून है.
अपने दूसरे ब्लॉग सिलेमा पर उन्होंने घोर गैर सेंसेश्नल फिल्म दाएं या बाएं की एक समीक्षा पेश की है, अभय पहले ही इस फिल्म पर लिख चुके हैं पर प्रमोद की समीक्षा उसमें कुछ जोड़ती ही है।
फ़िल्म देखने के बाद इस अहसास की खुशी होती है कि बतौर माध्यम सिनेमा अब भी अपने देश में एक संभावना है, और वह फ़िल्मकार के हित में सिर्फ़ यही दिखाने का जरिया नहीं कि वह कितना स्मार्ट है, या जिन जड़ों से आया है उसकी कितनी स्मार्ट, एक्ज़ॉटिक पैकेजिंग करने का उसने हूनर हासिल कर लिया है. बेला ने अपनी पहाड़ी पृष्ठभूमि और स्थानीयता को जो सिनेमाई अरमान और ऊंचाइयां दी हैं, उसके लिए जितनी भी उनकी तारीफ़ की जाए, कम है. भयानक शर्म की बात है कि फ़िल्म के तैयार होने के एक साल बाद भी फ़िल्म के निर्माता सुनील दोषी उसे रिलीज़ करने की दिशा में कोई भी कदम उठाते नहीं दिख रहे. इस दो कौड़िया आचरण पर कोई उनसे जवाब तलब करेगा? मीडिया, कुछ करे
हमने आज परमोद बाबू को चर्चा के लिए चुना उसकी वजह केवल यही पोस्ट नहीं है वरन शायद खुद परमोद बाबू हैं। लोग जब अकेले या ऐसोसिएशनों के बूते जगह बनाने और न बना पाने या कम बना पाने पर हिटत्व के नुस्खे लिखने पर उतारू हों तो ऐसे में प्रमोद का ब्लॉग व्यक्तित्व हैरान करता है। प्रमोद विरक्त ब्लॉगर नहीं हैं उनका आर्काइव खंगालने से सहज ही पता चलता है कि वे निरंतर लिखते रहने वाले ब्लॉगर हैं तथा एकाध किसी दुर्लभ प्रसंग को छोड़ दें तो ऐसा कोई अवसर याद नहीं पड़ता जहॉं वे किसी वाद विवाद संवाद में पड़े हों। टिप्पणियों का समीरानंद कभी उनकी पिछवाड़े नहीं बहा (यहॉं तक कि शायद यही ब्लॉग है जिस पर टिप्पणी करना खुद समीर तक भूल जाते हैं :)) पर मजाल है इससे प्रमोद के लिखने की शैली पर बित्ता भर फर्क पड़ता हो।
प्रमोद के लेखन की खास बात उनका परी तरह प्रोफेशनल किस्म की शैली तथा उनका डरा देने की हद तक बहुपठ होना तथा वाइडली ट्रैवल्ड होना है। हमें तो वे कठिन ब्लॉगिंग के प्रेत नजर आते हैं। खैर चर्चा के लिए सलाह देते हैं कि उनकी चंद सीरिज पर नजर डालें मसलन पतनशील साहित्य की उनकी खिड़की में एक न दो पूरी दो सौ तेरह पोस्टें हैं हर एक को पढ़ना एक तकलीफदेह यात्रा से गुजरना है। इसी सीरिज ने बाद में पतनशीन औरतों वाले लेखन को प्रेरित किया था जो हिन्दी ब्लॉगिंग की ऐसी विरासत है कि संस्कृति के गदाधारियों का आज तक उसके सपने आते होंगे। भर भर घर से एक हिस्सा-
चार दिनों से बंद हूं तंग हूं अलग बात है, सच्चाई यह है ग़लत शादी की तरह यह घर हमेशा से मेरी जान खाती रही है. पूछो क्यों हमारे हिस्से आई तो हरामख़ोर का चेहरा उतर जाता है! अबे, किसी और के गले जाकर नहीं बंध सकती थी, समूचे चॉल में ‘कथा’ के नसीर की तरह एक हमीं शरीफ़ मिले कि अपने मोह में उलझाकर हमारे कृशकाय पर लतरकुमारी होकर लटक लीं? चलो, एक मर्तबे हर किसी से ग़लती होती है, हमसे भी हुई हमने भाव दे दिया मगर बेहयाकुमारी अबतक लटकी हो?
ऐसा नहीं कि प्रमोद किसी कोकून में दबे- छिपे लेखन करते हैं, खुद ब्लॉगिंग पर उन्होंने 166 पोस्टें लिखी हैं जो काम के लिंक्स व चिंतन से भरी हैं।
इन सबके अलावा प्रमोद के स्केच ... ओह गॉड हाउ टैंलेंटेड दिस हाफ बाल्ड मैन इज...



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