गुरुवार, अगस्त 25, 2005

क्योंकि चौबेजी आये हैं...

लोग पिक्चरें देख रहे हैं, पिक्चरें जो न करायें। नये-नये अनुभव हो रहे हैं। किसी के कपड़े खराब हो रहे हैं, कोई दस नंबरी बनकर सरकार बनवा रहा है। कोई यहूदियों के खतने देख रहा है, किसी को बचपन की छलिया दुबारा याद आ रही है। अखबार भी बुद्धू बनाने पर तुले हैं। लोग भी खाली कविता लिखने का प्लान बनाकर सोचते हैं कि कविता लिख गई। बात यहीं तक रहती तो कोई बात थी। अब तो लोगों को अंधरे में भी दिख रहा है साफ। हालात यहां तक बिगड़ चुके हैं कि लोग नालायकियों तक को तलाक देने पर तुल गये हैं। वो तो कहो बहुत दिन बाद चौबेजी दिख गये। आते ही शंका-समाधान में जुट गये - कुछ हालात संभले।

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