रविवार, अक्तूबर 09, 2005

चिट्ठाचर्चा में उनका श्रीमुख

आज का चिट्ठाचर्चा उनके श्रीमुख की तरह। बतायें कैसा लगा?
  • प्रेमिका के बालिग होने का इंतजार करते करते इतना वक्त बीत गया कि वो एक सिलेंडर बेचने वाले के साथ भाग गई-अपनी ढपली
  • मास्टर्स तो रसायन शास्त्र में कर रही थी मगर किताबें ज्योतिष की पढती थी, मम्मी से छुपा कर मानसी
  • छोटे हो सपने किसी के, उसे हँसी में मत उडाना-कुछ कहना है
  • कम्प्यूटर के जरिए कलाकृतियों के निर्माण की संभावनाएँ अनंत हैंरवि रतलामी
  • अपने तो आगे पीछे सब तरफ से धुआँ निकलने लगता है- नितिन बागला
  • कुछ तो बचपना था, कुछ समझदारी थी /कुछ तो समझ ख़ुदग़र्ज़ी से हारी थी-एक यात्रा
  • हूक उठी दिल में कुछ ऐसी ,दूर क्षितिज तक चलता जाऊं- महावीर शर्मा
  • यहां हिंदी के प्रमुख जालघर दिखते हैं-सारिका सक्सेना
  • हम यहां वैदिक ज्योतिष की बात कर रहे हैं- मानसी
  • तोराजा एक विषेश आदिवासी जन जाति हैसुनील दीपक
  • सृष्टि झूमती है सभी,सर्वथा अकारण/मानव ही पूँछता,
    क्यों जीवन का कारण?- काव्यालय
  • कटुक वचन मत बोल रे-योगब्लाग
  • ओये देशी तेरी ऐसी की तैसी।हम अपने उत्पाद बनाने के बजाए हरे चारागाहों मे जा कर दोयम काम करते रह जाते हैं-ईस्वामी
  • जब औरत आइटम में तब्दील होगी तो उससे व्यवहार का व्याकरण भी उसी तरह बदलेगा।- फुरसतिया
  • शिक्षा के नाम पर बेहूदा प्रयोगों की यह इति-अति है-रविरतलामी
  • ये अपना गुगलवा क्या क्या करेगा?जीतेन्दरजो है,उसका होना सत्य है,/जो नहीं है, उसका न होना सत्य है -
    कविता सागर
  • आँसुओं के मौन में बोलो तभी मानूँ तुम्हें मैं,/खिल उठे मुस्कान में परिचय, तभी जानूँ तुम्हें मैं-कविता सागर
  • भोजपुरिया और भोजपुरी प्रेमी के स्वागत करे के चाहीं-भोजपुरिया
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Posted by अनूप शुक्ला at १०/०९/२००५ ०३:१५:०० अपराह्न

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