शुक्रवार, अक्तूबर 15, 2010

वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन की कुछ और पोस्टों की चर्चा

वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन में जो लोग आये थे उन्होंने अपने संस्मरण लिखना जारी रखा। प्रवीण पाण्डेय जी ने लिखा था-
इस विषय में मेरी पोस्ट आनी शेष है, वक्तव्यों के देवता तो गांधीजी का आश्रम देखने के बाद ही तैयार हो गयी थी। उनकी कर्मशीलता का चित्रण आज के सामाजिक परिवेश के आधार पर था, ब्लॉगर सम्मेलन से तनिक भी सम्बद्ध न था।
उनकी पोस्ट का इंतजार है। श्रीमती अजित गुप्त जी ने कल लिखा था:
अनूप जी उम्‍दा चर्चा है। मेरी भी शाम को पोस्‍ट आ रही है। बस शाम का ही मुहुर्त्त निकला है।
और उचित मुहूर्त पर उन्होंने अपनी पोस्ट लगाई। वर्धा सम्मेलन के बारे में लिखते हुये उन्होंने लिखा:

अजित गुप्त
साहित्‍य और पत्रकारिता के क्षेत्र में सम्‍मेलन, सेमिनार और कार्यशालाएं नित्‍य प्रति होती हैं लेकिन ब्‍लागिंग के क्षेत्र में विधिवत कार्यशालाओं का प्रारम्‍भ करने का श्रेय श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी को जाता है। अभी हम जैसे कई लोग जो ब्‍लागिंग के क्षेत्र से नए जुड़े हैं, समझ नहीं पाए हैं, ब्‍लागिंग और ब्‍लागर की मानसिकता। कभी एक परिवार सा लगने लगता है तो कभी एकदम ही आभासी दुनिया मात्र। मेरे जैसा व्‍यक्ति जो नदी में डूबकर नहीं चलता बल्कि किनारे ही अपनी धुन में चलता है, के लिए एक नवीन अनुभव था।

आचार संहिता पर अपनी राय जाहिर करते हुये उन्होंने लिखा:
यहाँ बात आचार-संहिता की करनी थी, लेकिन सभी ने किसी भी व्‍यावहारिक या सैद्धान्तिक प्रतिबन्‍धों को नकार दिया। लेकिन हमारे नकारने से तो दुनिया चलती नहीं कि हमने कह दिया कि बिल्‍ली मुझे नहीं देख रही और हम कबूतर की तरह आँख बन्‍द कर बैठ जाएंगे। बिल्‍ली तो आ चुकी है, सायबर कानून भी बन चुके हैं और हम मनमानी के दौर से कहीं दूर जिम्‍मेदारी के दौर तक आ प‍हुंचे हैं। वो बात अलग है कि हमें अभी पता ही नहीं कि कानून का शिकंजा हम पर कस चुका है।
सुरेश चिपलूनकर ने भी अपनी पोस्ट के बारे में सूचना देते हुये बताया:
एक ठो छोटी सी पोस्ट हमहूं ठेल दिये हैं… वर्धा की रिपोर्ट "जरा हट के" :)
उसे पढ़कर कुछ लोग "हट" लेंगे… और कुछ "खिसक" लेंगे… :)
वर्धा की घटनाओं का जिक्र करते हुये सुरेश जी ने बताया:

अजित गुप्त
जो बात अब तक किसी को पता नहीं थी कि श्री अनूप शुक्ल का “पसन्दीदा शब्द” कौन सा है, अब यह राज़ नहीं रहा… वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन के दौरान दो दिनों में अनूप शुक्ल द्वारा 84 बार “हिन्दूवादी ब्लॉगर” शब्द का उच्चारण किया गया, इससे सिद्ध होता है कि यही उनका सबसे प्रिय शब्द है… अतः सभी ब्लॉगर्स से अनुरोध है कि भविष्य में वे अनूप जी को उनके इसी प्रिय शब्द से पुकारें…
सुरेश जी की पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुये विवेक सिंह ने लिखा:
साड्डे नाल रहोगे तो ऐसी ही पोस्ट लिखोगे । मजेदार । इमेज से निकल रहे हो आप । बधाई !
सुरेश जी को वर्धा में कुछ लोगों ने टोका कि वे जितने गुस्से में अपनी फ़ोटो में दिखते हैं सच उसके एकदम अलग है। लोगों की समझाइश का सम्मान करते हुये सुरेश जी ने अपनी पोस्ट लिखते ही अपनी फ़ोटो बदल ली। यह होता है जनभावना का सम्मान और दबाब।

अनीता कुमार जी ने भी जनभावना का सम्मान करते हुये लिखना शुरू किया और अपने संस्मरण लिखे। लिखकर उन्होंने बताया भी :

अजित गुप्त
वर्धा मीट में अनूप जी ने परिवार के सबसे वरिष्ठ सदस्य की तरह स्नेह भरी डांट लगायी, फ़िर से कलम उठाने के लिए प्रेरित किया। अपने परिचय में जब हम ने कुछ ज्यादा कहने से संकोच किया तो उन्हों ने मेरी लिखी एक पोस्ट का जिक्र करते हुए याद दिलाया कि किसी जमाने में हम ठीक ठाक लिख लेते थे और अब भी अगर फ़िर से लिखना शुरु कर दें तो ठीक ठाक लिख ही लेगें। तो अनूप जी ये पोस्ट आप को समर्पित- अच्छी है या बुरी आप की किस्मत्…
अब चूंकि जिसको पोस्ट समर्पित की गयी उसकी खिंचाई का रिवाज है इसलिये उन्होंने परम्परा का निर्वाह करते हुये लिखा:
खूब मजा आया…अनूप जी, जो सबकी मौज लेते रहते है, उनकी कविता जी ने ऐसी मौजिया खबर ली कि उनसे कुछ बोलते न बना।
लेकिन चूंकि खिंचाई का कोटा कविता पूरा कर चुकीं थी इसलिये उन्होंने अपनी राय जाहिर की:
अनूप जी की क्लास लेने का अपना सुख है, विशेषकर यह कि वे सर झुकाए अच्छी बच्चे की तरह डपट सुनते झेलते रहते हैं और कत्तई बुरा नहीं मानते. व्यक्तित्व का यह बड़प्पन बड़ी चीज है. वैसे इस बार आप साथ थीं तो खबर और मौज लेने में कुछ अधिक आनंद आया.

लखनऊ से आये जाकिर अली’रजनीश’ ने अपनी बात कहते हुये खुलासा किया:

अजित गुप्त
अनूप जी से यूँ तो स्टेशन पर ही मुलाकात हो गयी थी, पर न जाने क्यों पूरे सम्मेलन के दौरान वे और उनकी बातों ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। जब भी उनसे बात हुई, जानबूझकर वे डॉ0 अरविंद मिश्र का जिक्र ले ही आए। और जब भी मिश्र जी का नाम आए, वे कोई भी चुटकी लिए बिना न रह सके। अपनी बातों के दौरान उन्होंने कई बार दोहराया कि उनसे चुटकी लेने में उन्हें विशेष आनन्द आता है। अरविंद जी, सुन रहे हैं आप?
अरविन्द मिश्र की कमी तो सच में खल रही थी। दूर बैठकर अपनी प्रतिक्रियायें व्यक्त करने में उनके वक्तव्यों में वो बात नहीं आ रही जो वे वहां मौजूद रहकर कर पाते। हालांकि जाकिर भाई ने काफ़ी कुछ अरविन्द जी की कमी को भरसक दूर करने का प्रयास किया और बताया:
अनूप शुक्ल जी, ब्लॉग जगत के नारीवादी समर्थक ब्लॉगर माने जाते हैं। मेरे दिमाग में यह बात हमेशा गूँजती रहती है। इसलिए मैंने सोचा था कि इस बात का गहराई से अध्ययन किया जाए। और नतीजे सचमुच चौंकाने वाले थे। प्रोग्राम के दो दिनों में मेरी जब भी उनपर नजर पड़ी, वे 75 प्रतिशत से अधिक बार किसी न किसी नारी ब्लॉगर का उत्साह वर्द्धन करते मिले। कार्यक्रम में पहली बार पधारी नवोदित ब्लॉग गायत्री शर्मा, जोकि ब्लॉग पर शोध कार्य भी कर रही है, का उन्होंने विशेष ध्यान रखा।
अरविन्द मिश्र ने इस बात को कहने का सही तरीका बताते हुये लिखा:
शुकुल महराज को एक्सपोज करने की भी जरूरत है क्या ? पहले से ही वे खुल चुके हैं -अभी तो चिट्ठाचर्चा पर नारीय झुकाव वाली पोस्ट आने वाली ही होगी -फोटू शोटू के साथ ...वे एक घोषित नारी सहिष्णु ब्लॉगर हैं !
इस तरह वर्धा सम्मेलन ने अनूप शुक्ल की छवि नारी विरोधी से नारी समर्थक की कर दी। दो साल पहले उन्होंने अपनी छवि के आधार पर लिखा था:
मठाधीश हैं नारि विरोधी
बेवकूफ़ी की बातें करते।
हिन्दी की न कोई डिगरी
बड़े सूरमा बनते फ़िरते॥

अविनाश वाचस्पतिजी ने अपनी बात कहते हुये लिखा:

अजित गुप्त
इसी प्रकार की आपत्तियां, आरोप-प्रत्‍यारोप आदि इस हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग सेमिनार के संबंध में भी ब्‍लॉग पोस्‍टों में नजर आए, जिनसे इस सेमिनार की सार्थकता स्‍वयं सिद्ध हुई है। हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग को इससे बल प्राप्‍त हुआ है। इस दौरान पोस्‍टों में, जो सवाल सबसे अधिक चर्चा में आए, वे ये हैं कि, किन ब्‍लॉगरों को बुलाया गया है, क्‍यों बुलाया गया है, उनका चयन किस आधार पर किया गया है और आचार संहिता की जरूरत ही क्‍या है आदि। इसी संदर्भ में पूर्व में आयोजित इलाहाबाद वाले ब्‍लॉगर सम्‍मेलन की अव्‍यवस्‍थाओं और अनियमितताओं का भी जिक्र किया गया।

इन बातों पर अपनी राय जाहिर करते हुये उन्होंने लिखा:
विचार तो यह होना चाहिए कि एक सुखद शुरूआत हुई है, मुझे नहीं बुलाया गया तो कोई बात नहीं, जिसको बुलाया गया, हैं तो वे भी हिन्‍दी ब्‍लॉगर ही। हम सबमें से ही एक हैं। एक हैं तो नेक भी होंगे, पर हम खुद कितने नेक हैं, यह सोचने की जहमत हम नहीं उठाते हैं। इसकी जगह होता यह है कि मैं तो सबसे धुरंधर ब्‍लॉगर हूं, मेरे बिना ऐसे आयोजन की कोई सार्थकता ही नहीं है, उपयोगिता नहीं है, कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए, इससे बचना होगा और सब्र करना होगा।


इस आयोजन के सूत्रधार रहे सिद्धार्थ त्रिपाठी ने भी अपनी बात कहना शुरू किया:

अजित गुप्त
जब पंचों की यही राय है कि संगोष्ठी सफल रही तो मैं यह क्यों बताऊँ कि ऊपर गिनाये गये किसी भी बिन्दु का अनुपालन ठीक-ठीक नहीं हो पाया? साथ ही कुछ दूसरी कमियाँ भी अपना मुँह लटकाये इधर-उधर ताकती रहीं तो उन्हें चर्चा का विषय मैं क्यों बनाऊँ? …लेकिन एक भारी समस्या है। यह बात लिखकर मैं आफ़त मोल ले रहा हूँ। शुचिता और पारदर्शिता के रखवाले मुझे जीने नहीं देंगे। यदि कमियाँ थीं तो उन्हें सामने आना चाहिए। अनूप जी ने यह कई बार कहा कि सिद्धार्थ अपना नमक खिला-खिलाकर लोगों को सेट कर रहा है। तो क्या मानूँ कि नमक अपना असर कर रहा है? छी-छी मैं भी कैसा अहमक हूँ… अनूप जी की बात पर जा रहा हूँ जो खुले आम यह कहते हुए पाये गये कि आओ एक दूसरे की झूठी तारीफ़ें करें…।
आगे अपनी बात कहते हुये उन्होंने लिखा:
मेरी लाख न्यूनताओं के बावजूद ईश्वर ने मुझसे एक जानदार, शानदार और अविस्मरणीय कार्यक्रम करा दिया तो यह निश्चित रूप से मेरे पूर्व जन्म के सद‌कर्मों का पल रहा होगा जिससे मुझे इस बार अत्यंत सुलझे हुए और सकारात्मक दृ्ष्टि के सम्मानित ब्लॉगर्स के साथ संगोष्ठी के आयोजन का सुअवसर मिला। कुलपति श्री विभूति नारायण राय जी ने बड़ी सहजता से पूरे कार्यक्रम के दौरान मेरी गलतियों को नजर अंदाज कर मेरा हौसला बढ़ाये रखा, पूरा विश्वविद्यालय परिवार मुझे हर प्रकार से सहयोग करता रहा, और ब्लॉगजगत में मेरे शुभेच्छुओं की दुआओं ने ऐसा रंग दिखाया कि कुछ खल शक्तियाँ अपने आप किनारे हो गयीं वर्ना बुलावा तो सबके लिए था। इसे भाग्य न मानूँ तो क्या?

चर्चा जारी रहेगी। तब तक आप वर्धा में आये साथी ब्लॉगरों के फ़ोटो यहां देखें।

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33 टिप्‍पणियां:

  1. अरविन्द जी की बात से सहमति है कि आपको एक्सपोज किये जाने की कौनो जरुरत नहीं है !!
    वैसे भी एक सम्मलेन आपको विरोधी से समर्थक बना दे ...तो आयोजन को सफल ही माना जाना चाहिए !!

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  2. बढियां संकलन और व्यासीय पद की पाद - टिप्पणियाँ !
    मुझसे इतने सशंकित क्यों रह रहे हैं इन दिनों शुकुल जी ....!
    नमक की बात पर मैंने सिद्धार्थ जी के ब्लॉग पर लिखा -यह नमक तो इस देश के करोड़ों गरीब टैक्स पेयर्स के स्वेद बिन्दुओं से निष्कर्षित है ...किसी तनहा शरीर से नहीं ...हम भारतीय भी कितने भोले हैं प्रशंसा में सारी तार्किकता को धूल चटा देते हैं ..
    मगर यह तो स्पष्ट है इस बार लाजिस्टिक्स व्यवस्था विगत सम्मलेन से सीख लेते हुए टनाटन थी ....

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  3. अरविंदजी , शंका करना और सशंकित रहना वैज्ञानिक चेतना संपन्न लोगों के काम हैं। हम तो सहज विश्वासी हैं। हम अपने आपसे सशंकित नहीं रहते तो आपसे क्या खाकर रहेंगे। आपकी तमाम बातों और अंदाजों पर सहज विश्वास है। शुरू से। और वह विश्वास अब तक बना हुआ है। आपने हमेशा मेरे विश्वास की रक्षा की है। इसके लिये मैं आपका आभारी भी हूं।

    मास्टर जी मौज लिये रहो!

    रचनाजी आपकी बात का जबाब क्या दिया जाये!

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  4. "हम अपने आपसे सशंकित नहीं रहते तो आपसे क्या खाकर रहेंगे।"
    यह खूब कही अनूप भाई , सशंकित तो अनूप शुक्ल को फुरसतिया से ही रहना चाहिए जो किसी की भी धोती खोलने को हर समय तैयार रहते है ...बचपन में हरकतों के बारे में भी लिख मारो एक दिन ! आपकी हरकतों ( मौज लेने )के बारे में कोई संदेह नहीं गुरुवर ! बस बहुत गंभीर मत हुआ करो !
    जब भी लोग मुझे गाली देते हैं तो आपकी तरफ देखकर शांति महसूस करता हूँ सोंचता हूँ कि अनूप शुक्ल कितना झेलते हैं और बाज नहीं आते तो यह तो कुछ नहीं है !इस विषय पर मैं आपको गुरु मानता हूँ...
    जब भी किसी बात को कहने में झिझक महसूस हो रही हो तो डॉ अरविन्द मिश्र से शक्ति मिलती है हालांकि उनकी धार कुछ ज्यादा तेज है ...
    आप दोनों अपनी अपनी अच्छाइयों बुराइयों के साथ अनुकरणीय और आनंद दायक हैं ..
    शुभकामनायें !

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  5. कहीं पढ़ा था कि सरकारी प्रायोजित कार्यक्रमों मे राष्ट्रिये गान गाना जरुरी होता हैं । क्युकी नैतिकता , एथिक्स पर बात थी सो पूछ लिया । !!

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  6. इस तरह वर्धा सम्मेलन ने अनूप शुक्ल की छवि नारी विरोधी से नारी समर्थक की कर दी।


    ब्लॉग जगत कि रीत हैं कि नारी का विरोध करना होऔर नारी समर्थक भी दिखना हो तो कुछ नारियों को अपने साथ ले कर चलो । उनको सम्मानित और स्नेहमयी और माँ तुल्य कहो वो सक्रियता से ब्लोगिंग करे ना करे उनके ऊपर चर्चा करते रहो , चर्चा केवल चिटठा चर्चा पर ही नहीं होती , चर्चा अपने अपने ब्लॉग पर भी होती हैं । समय असमय वो आप से अनुग्रहित हो कर आप के लिये कमेन्ट भी देगी और अगर आप के आचरण के विरोध मे कोई महिला कुछ लिख देगी तो वो कमेन्ट भी करेगी । एक ब्लॉगर के ब्लॉग पर करीब ८-९ महिला ब्लॉगर के उप्पर आलेख देखे और फिर उनकी एक पोस्ट देखी जिसमे उन्होने कहा था कि उनका ब्लॉग जगत मे किसी महिला के साथ एक असफल प्रेम प्रसंग रहा था । अब पोस्ट तो ख़ैर एक लड़ायी झगड़ा सुल्झाऊ ब्लॉगर हटवा दी पर सोचने कि बात हैं कि अगर उस पोस्ट को उन ८-९ महिला ब्लॉगर को दिखा दिया जाता तो क्या होता । ब्लॉग कि नैतिकता का तकाजा तो यही कहता हैं कि बी सी सी कर देनी चाहिये

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  7. रचना जी हमेशा की तरह फ़ॉर्म मे हैं… :)

    शुकुल जी कोई जवाब नहीं दिये पर मैं देता हूं… कि पूरे कार्यक्रम में कहीं भी राष्ट्रीय गीत या राष्ट्रीय गान का गायन अथवा वादन नहीं हुआ…

    रचना जी की "चिठ्ठा चर्चा में नारी पोस्ट" वाली बात से पूरी सहमति है… :) :) यही सच भी है…। लेकिन चूंकि यह चिठ्ठा चर्चा "व्यक्तिगत पसन्द-नापसन्द"(?) के आधार पर होती है, न कि चिठ्ठों की क्वालिटी और कंटेण्ट के आधार पर… इसलिये हमें शिकायत करने का हक भी नहीं है… :)

    अब तो दसियों चर्चाएं शुरु हो चुकी हैं… कोई चर्चाकार यदि हमारे चिठ्ठे की चर्चा कर दे तो कौन सा नोबेल पुरस्कार मिल जायेगा, और यदि चर्चा ना करे तब भी हम कंगाल तो होने वाले नहीं… :)

    खैर फ़िलहाल फ़ोकस वर्धा पर ही रखा जाये… कल ही गाँधीवादी पार्टी ने एक घांदीवादी की रैली के लिये छोटा सा चन्दा एकत्रित किया है… और ये दोनों "वादी" सेवाग्राम जायेंगे… निश्चित ही बापू की आत्मा को शान्ति मिलेगी, कांग्रेस को वे "जहाँ" पहुँचाना चाहते थे, पहुँच चुकी है।

    ब्लॉगर सम्मेलन के बाद सोनिया की रैली, वाकई वर्धा की भूमि महान है… :)

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  8. अनूप जी, आपसे यह हमारी पहली ही मुलाकात थी, इसके पहले हम आपसे बिल्‍कुल भी परिचित नहीं थे। जैसा कि मैंने लिखा भी है कि हम किनारे पर चलने वाले लोग हैं। इस ब्‍लाग जगत में अभी अनजान ही हैं, बस एक कमजोरी स्‍वयं में दिखायी देती है कि जब कोई शैतान सा चरित्र सामने आ जाता है तो उसे जानने की ईच्‍छा हो जाती है, इसी कारण सबसे उच्‍छृंखल छात्र ही हमें पसन्‍द करने लगते थे। आपकी फाकामस्‍ती के पीछे का राज क्‍या है, इसकी अवश्‍य उत्‍सुकता रही। और भी कई पात्र थे जिनके बारे में जानने की उत्‍सुकता ने जन्‍म दिया। शायद यही जानने और समझने की प्रक्रिया से ही ब्‍लोगिंग की दिशा तय हो। आपके पास हमारी फोटोज हो तो कृपया मेल करें।

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  9. शनिवार को आ रही है पोस्ट, आप सब व्यक्तित्वों को समेटने में समय लग रहा था।

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  10. बढिया चर्चा लिख के इस शानदार चर्चा का महत्व कम नहीं करूंगी. सिद्धार्थ जी सचमुच धन्यवाद के पात्र हैं,जीवट वाले भी जो इतने बड़े और विवाद-सम्भाव्य सम्मेलन का आयोजन कर सके. और हां, आक्षेपों को बर्दाश्त करने की जो क्षमता आपमें दिखती है, ईश्वर उसे बनाये रक्खे. अभी तो चारों तरफ़ घूम-घूम के वर्धा-आधारित पोस्टें पढना है, पढ रही हूं. बहुत दिनों के बाद पठनीय सामग्री मिली है. आभार.

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  11. ‘ वे सर झुकाए अच्छे बच्चे की तरह डपट सुनते झेलते रहते हैं और कत्तई बुरा नहीं मानते.’
    अरे कविताजी, जो मौज करते हैं मस्त रहते हैं वो क्या डपट से प्रभावित होंगे!

    ‘चिट्ठाचर्चा पर नारीय झुकाव वाली पोस्ट आने वाली ही होगी’
    मिश्रा जी, नारीय या नारकीय :)

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  12. मास्टर जी मौज लिये रहो!

    आपसे सीखने का अ-सफल प्रयास !
    (.......अभी तक किसी ने मौज के चक्कर में गाली नहीं दी ना ?

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  13. उत्तम प्रस्तुति
    जित देखूँ तित अनूप
    आज एक आईना खरीदता हूँ

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  14. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  15. वैसे समझने की बात यह है कि कौन नारीवादी है या नहीं इसे लेकर नीचा दिखाने या उठापटक करने की जरूरत क्या है. जिस से नारियों को समस्या होगी उस से वे स्वयं कन्नी काट लेंगी..

    अपना अपना पौरुष दिखाने का अखाड़ा अपने अपने घर में रहे तो बेहतर है.

    कौन क्या है, इसकी खबर सबको है. महिलाओं को भी. इतनी अंधी नहीं हैं वे, कि संदिग्धों के बाँटे सर्टिफिकेट देखकर तय करने की बाट जोह रही हों . और न वे इतनी मूर्ख हैं कि पहचानती न हों कि कौन किस दृष्टि से किसे / उन्हें देखता है. जो ऐसा नहीं जानती हैं या बिना जाने किसी के बहकावे में आ जाती हैं, वे स्वयं कुछ समय बाद अपनी गलती का दुष्परिणाम भोगती हैं. इस लिए यह निर्णय महिलाओं पर ही छोड़ दिया जाए तो बड़ा पौरुषपूर्ण कार्य होगा.

    .

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  16. जब शुरू शुरू में इन्टरनैट पर चैट का फ़ैशन चला था तो चैटरूम में कुछ जमूरे आते थे जिन्हें हम attention seekers कहते थे...
    आह, वे हिन्दी ब्लागिंगग में भी हैं.
    बहरहाल... चर्चा पढ़वाने के लिए धन्यवाद.

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  17. बड़ा मासूम सा सवाल है कि ये बी सी सी क्या होता है? मुझे भी ऐसे कई संक्षिप्ताक्षर आते हैं मगर बात अश्लील हो जायेगी ..
    प्रेम करना कोई गुनाह है क्या ..मुझे तो कई महिला(और पुरुष भी ) ब्लागरों से प्रेम है और मैं जानता हूँ उन्हें भी मुझसे प्रेम है .....और यह एक अनिर्वचनीय अनुभव है ...प्रेम को परिभाषित मत करो यह एक बचकानी आदत है ....हाँ प्रेम का अनिवार्य तत्व है विश्वास ..जब तक यह है प्रेम अक्षुण है .....न जाने वे कैसे लोग है जिन्हें जीवन भर प्रेम नहीं मिलता ..हे ईश्वर दयालु हो उन पर ..
    अनूप जी क्षमा करेगें मगर .विषयांतर मैंने नहीं किया ......

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  18. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  19. सतीश जी आप सही कह रहे हैं अनूप जी की सहनशक्ति अनुकरणीय है।
    कविता जी शतप्रतिशित सही कह रही हैं कि कौन नारी विरोधी है और कौन नारी समर्थक, अगर ये निर्णय नारियों पर ही छोड़ दिया जाए तो अच्छा है,भगवान ने इतनी तो अक्ल दे कर ही भेजा है हमें। कविता जी अनूप की क्लास लेने में आप का साथ देने में हमें भी बहुत आनंद आया वो भी इस लिए कि वो अपनी सहनशीलता का परिचय देते हुए सिर्फ़ मुस्कुरा देते थे।
    वैसे इस ब्लोगजगत में क्या पुरुषों के व्यक्तित्व की पहचान सिर्फ़ नारी विरोधी/नारी समर्थक तक ही सीमित रह गयी है? क्या हम सब का व्यक्तित्व इससे कहीं ज्यादा आयाम लिए हुए नहीं है?

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  20. बी सी सी bcc means blind carbon copy where the mail is sent without showing the email address

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  21. @ चिठ्ठा चर्चा "व्यक्तिगत पसन्द-नापसन्द"(?) के आधार पर होती है, न कि चिठ्ठों की क्वालिटी और कंटेण्ट के आधार पर
    चर्चाकारों .... सुन लो... सुन लो ...

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  22. बहुत मज़ेदार चर्चा है अनूप जी ,
    आप के मस्तमौला और सहनशील बने रहने की आदत की दाद देनी पड़ेगी
    कविता जी और अनिता जी से सहमत हूं ,
    मैं जानना चाहती हूं कि हमें केवल एक ब्लॉगर के नज़रिये से क्यों नहीं देखा जाता ,पुरुष और महिला ब्लॉगर्स के ख़ानों में क्यों बांटा जाता है ?

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  23. इस्मत ज़ैदी जी आपने बात तो सौ टके खरी की है पर देख लीजिए ...आप सच का विरोध सहने के लिए भी तैयार तो हैं न :)

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  24. wardha se sambandhit sabhi charchayein aaj aaram se baithkar padhi , aapne to badhiya puri shrinkhla hi banaa di, ye gud raha....

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  25. संजीत बैठ कर क्युं पढ़ीं खड़े हो कर पढ़ते तो और जल्दी पढ़ीं जातीं…:)

    काजल कुमार जी आप किस सच की बात कर डरा रहे हैं जरा इस मंदबुद्धी को भी तो समझाइए

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  26. सभी ब्लॉगरों के विचारों का बेहतर प्रस्तुतिकरण पर यहाँ मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगी कि आखिर क्यों हम ब्लॉगर एक दूसरे की टाँग खीचकर या उस पर चुटकियाँ लेकर वाहवाही पाना की कवायद में रहते हैं, क्यों नहीं हम इन सभी से ऊपर उठकर सत्य का विवेचन करते हैं? आयोजन में क्या अच्छा था। उस पर हमारी नजर कम गई पर कौन क्या कर रहा था। उस पर हम सभी ने बहुत पोस्टे डाल दी। यह मेरे व्यक्तिगत विचार है। अगर किसी को इस पढ़कर बुरा लगे तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ।

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  27. एक्टिव इंडिया टीवी चैनल' द्वारा दिखाए जा रहे प्रोमो. के सन्दर्भ में उनके द्वारा प्रेषित SMS

    " Watch Exclusive interview with Dr. Kavita Vachaknavee and Blog-seminar @ MGIHU, Wardha on ACTIVE INDIA TV CHANNEL on 27th Oct. 7AM, 9AM, 7 PM, & 11.30PM"

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  28. HINDI BLOGGING MEIN BHI AJEEB TAMASHE CHAL RAHI HAI..MAHATMA GANDHI ANTARRASHTRIYA HINDI VISHWAVIDYALAYA , WARDHA KE BLOG PER ENGLISH KI EK POST PER PRITI SAGAR NE EK COMMENT POST KI HAI…AISA LAGA KI POST KO SABSE JYADA PRITI SAGAR NE HI SAMJHA..PER SACHHAI YE HAI KI PRITI SAGAR NA TO EK LINE BHI ENGLISH LIKH SAKTI HAIN AUR NA HI BOL SAKTI HAIN…BINA KISI LITERARY CREATIVE WORK KE PRITI SAGAR KO UNIVERSITY KI WEBSITE PER LITERARY WRITER BANA DIYA GAYA…PRITI SAGAR NE SUNITA NAAM KI EK NON EXHISTING EMPLOYEE KE NAAM PER HINDI UNIVERSITY KA EK FAKE ICARD BANWAYA AUR US ICARD PER SIM BHI LE LIYA…IS MAAMLE MEIN CBI AUR CENTRAL VIGILECE COMMISSION KI ENQUIRY CHAL RAHI HAI.. MEDIA KE LOGON KE PAAS SAARE DOCUMETS HAI AUR JALDI HI YEH HINDI UNIVERSITY WARDHA KA YAH SCANDAL NATIONAL MEDIA MEIN HIT KAREGA….AISE FRAUD BLOGGERS SE NA TO HINDI BLOGGING KA BHALA HOGA , NA TECHNOLOGY KA AUR NA HI DESH KA…KYUNKI GANDI MACHLI KI BADBOO SE POORA TAALAB HI BADBOODAAR HO JAATA HAI

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