शुक्रवार, दिसंबर 31, 2010

"मी विनायक सेन बोलतो "

पूने के उस सभागार में हेयर ट्रांसप्लां टेशन का अपना पेपर प्रजेंट करने के बाद अपने प्रशंसको के बीच बैठे डॉ मेहता अचानक अपनी तारीफ सुनकर भावुक हो उठे है .".हम सब बहुत बौने लोग है   जिनके आसमान की हदे बहुत छोटी है ..असली लड़ाई तो विनायक ने लड़ी है "....अमेरिका में सेटल्ड रोज लाखो रुपये कमाने वाले उस डॉक्टर के व्यक्तित्व का ये रूप मुझे चौका देता है ....डॉ विनायक सेन उनके सीनियर थे....वे तब भी उनके हीरो थे ...तब अपनी प्रतिभा के कारण.....
उनके गिलास को भरने के बाद मुझमे विनायक सेन को ओर जानने की उत्सुकता है ..पर वे एक ओर गेर पेशेवर स्टेट मेंट देते है ...."अब इस समाज में कोई क्रान्ति संभव नहीं है ..यहाँ कोई बैचेनी स्थायी नहीं रहती " कुछ झुके सर सिर्फ हूम हां करते है ....ओर पेशेवर टिप्स की तलाश में नज़दीक आये कुछ युवा आहिस्ता से उठने लगते है .
कौन है ये विनायक सेन ?जिसको चिकित्सको का एक तबका भी अपने जमीर की आखिरी नस्ल के तौर पे देखता है ....
पच्चीस साल पहले देश के प्रतिष्टित मेडिकल कोलेज से निकलने के बाद वे उस रास्ते को चुनते है जिस पर मै ओर आप अब भी चलने में हिचकते है .....उनका कर्तव्य प्रेमचंद के मन्त्र ओर कफ़न पर "उफ़ " करके ख़तम नहीं होता ......   वे उस  समाज के भीतर उसकी बेहतरी के लिए घुसते है  जिसके पास अपनी  व्यथा कहने के लिए वो भाषा या औजार नहीं है जिससे सभ्य समाज तारतम्य बैठाता है ...या रुक कर समझने की कोशिश करता  है ....तमाम प्रतिकूलताओ ओर सीमायों के बावजूद उनकी प्रतिबद्ता एक अजीब सी जीवटता लिए न केवल कायम रहती है ....बल्कि अपनी  नैतिक स्म्रतियो को बेदखल  नहीं होने देती ....  वे अपनी उस  जिम्मेदारी  का निर्वाह  करते है जिसका बॉस  केवल उनका जमीर है ..........
प्रगतिशीलता के  तमाम बुलडोज़रो के बीच अपनी  बौद्धिक इमानदारी की आँख  न   मुंदने देने वाला इंसान  जो  अपने संशय ईमानदारी से  रखता  है .....  अचानक देशद्रोही कैसे हो गया  ?मेरे लिए ये भी ये यक्ष प्रशन है 
इस देशद्रोह को दिनेश राय  द्रिवेदी डिफाइन करते  है

यदि Sedition का अर्थ देशद्रोह हो तो हमें लोकमान्य तिलक और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के लिए कहना होगा कि वे देशद्रोही थे जिस के लिए उन्हों ने सजाएँ भुगतीं। यह केवल एक शब्द के अनुवाद और प्रयोग का मामला नहीं है। दंड संहिता की जिस धारा के अंतर्गत डॉ. बिनायक सेन को दंडित किया गया है उसे इसी संहिता में परिभाषित किया गया है और इस का हिन्दी पाठ निम्न प्रकार हैं -


धारा 124 क. राजद्रोह 
जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यप्रस्तुति द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करेगा, या पैदा करने का प्रयत्न करेगा, या असंतोष उत्तेजित करेगा या उत्तेजित करने का प्रयत्न करेगा वह आजीवन कारावास से, जिस में जुर्माना भी जोड़ा जा सकेगा या तीन वर्ष तक के कारावास से जिस में जुर्माना जोड़ा जा सकेगा, या जुर्माने से दंडित किया जा सकेगा। 
स्पष्टीकरण-1 'असंतोष' पद के अन्तर्गत अभक्ति और शत्रुता की सभी भावनाएँ आती हैं। 
स्पष्टीकरण-2  घृणा, अवमान या असंतोष उत्तेजित किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना सरकार के कामों के प्रति विधिपूर्ण साधनों द्वारा उन को परिवर्तित कराने की दृष्टि से आक्षेप प्रकट करने वाली टीका-टिप्पणियाँ इस धारा के अधीन अपराध नहीं हैं। 
स्पष्ठीकरण-3  घृणा, अवमान या असंतोष उत्तेजित किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना सरकार की प्रशासनिक या अन्य प्रक्रिया के प्रति आक्षेप प्रकट करने वाली टीका-टिप्पणियाँ इस धारा के अधीन अपराध नहीं हैं।

आंकड़े बताते है इस देश की आबादी २०१५ में शायद सबसे ज्यादा हो जायेगी .आंकड़े ये भी बत्ताते है पिछले कुछ सालो में संसद में मौजूद हमारे सांसदों में करोडपति सांसदों की संख्या में तीस प्रतिशत का इजाफा हुआ है ......आंकड़े याद दिलाते है सात लाख नौकर शाहों के इस देश में देश चलाने वाले नेताओ में तकरीबन कुछ लोग ही ग्रेज्यू वेट है ....आंकड़े भी अजीब होते है ... पर  आंकड़े ये नहीं बताते के   देशभक्ति आनुवंशिक नहीं होती ......लोक संघर्ष ब्लॉग कुछ यूँ बताता है






 देश में जब तमाम सारी अव्यस्थाएं है तो उनके खिलाफ बोलना, आन्दोलन करना, प्रदर्शन करना, भाषण करना आदि लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं हैं लेकिन जब राज्य चाहे तो अपने नागरिक का दमन करने के लिए उसको राज्य के विरुद्ध अपराधी मान कर दण्डित करती है। डॉक्टर बिनायक सेन जल, जंगल, जमीन के लिए लड़ रहे आदिवासी कमजोर तबकों की मदद कर रहे थे और राज्य इजारेदार कंपनियों के लिए किसी न किसी बहाने प्राकृतिक सम्पदा अधिग्रहित करना चाहता है। उसका विरोध करना इजारेदार कंपनियों का विरोध नहीं बल्कि राज्य का विरोध है। इजारेदार कम्पनियां आपका घर, आपकी हवा, आपका पानी, सब कुछ ले लें आप विरोध न करें। यह देश टाटा का है, बिरला का है, अम्बानी का है। इनके मुनाफे में जो भी बाधक होगा वह डॉक्टर बिनायक सेन हो जायेगा।
यही सन्देश भारतीय राज्य, न्याय व्यवस्था ने दिया है।

...कुछ तटस्थताओ  के लिए भी साहस चाहिए ..इस समाज के कई प्रवक्ता है ....कई स्वीकृत कई स्व घोषित .....जो  सिद्धांतो की भी बड़ी तर्क पूर्ण व्याखाए देते है .....यूँ भी    लिज़ लिजी देश भक्ति कभी कभी हमारे आदर्शो को भी धुंधला कर देती है ......विज़न को भी ...




इतिहास तीन स्तरों पर चलता है: पहला, जो सनातन है यानी अपने प्राकृतिक वातावरण के सम्बन्ध में मनुष्य का इतिहास। दूसरा, वह पारंपरिक सामाजिक इतिहास है जो समूह या छोटे समूहों से बनता है। तीसरा इतिहास मनुष्य का न होकर विशिष्ट तौर पर किसी एक मनुष्य का होता है। दूसरे शब्दों में, इतिहास प्रकृति की ताकतों, समाज के ढांचे और व्यक्तियों की भूमिकाओं से गढ़ा जाता है। यह सूत्रीकरण फ्रेंच चिंतकों द्वारा दिया गया है जो मानते हैं कि यह मॉडल ही सम्पूर्ण इतिहास का मॉडल है। सम्पूर्ण इतिहास की संरचना में आदिवासियों के तुलनात्मक संदर्भों को बेहतर ढंग से व्यवस्थित किया जा सकता है। मसलन, भारत और अमेरिका के आदिवासियों में आंशिक समानता इसलिए है क्योंकि दोनों देशों में शासक वर्ग द्वारा जतलाए गए अधिकारों के संदर्भ में इनकी सामाजिक व्यवस्था और अनुक्रम तुलनात्मक रहे हैं। यदि योरोपीय औपनिवेशिक ताकतों ने अमेरिकी नेटिवों पर अपना धर्म थोपा, तो भारत में मौर्य साम्राज्य की राजसत्ता ने शाही गांवों के श्रमिकों शिविरों में रहने वाले आदिवासियों के साथ भी तकरीबन यही किया।

हाशिया एक विस्तृत लेख लिखता है ...जिसके हर पहलु को गंभीरता से पढने की आवश्यकता  है



.बैरंग भी अपनी प्रतिक्रिया देता है  ...ये कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं है


डॉ सेन का जुर्म यह रहा कि उन्होने आदिवासियों के लिये काम करते हुए उनके अधिकारों की बात की, उन पर हो रहे जुल्मों का जिक्र किया। उन्होने हिंसा का हमेशा सख्त विरोध किया चाहे वह माओवादियों की हो या सरकारी बलों की! डॉ सेन पुलिस और पुलिस समर्थित गुटों द्वारा व्यापक पैमाने पर किये जा रहे भूमि-हरण, प्रताड़नाओं, बलात्कारों, हत्याओं को मीडिया की रोशनी मे लाये; पीडित तबके के लिये कानूनी लड़ाई मे शामिल हुए। उनका अपराध यह रहा कि वो उस ’पीपुल’स यूनियन फ़ॉर पब्लिक लिबर्टीज’ की छत्तीसगढ़ शाखा के सचिव रहे, जिसने मीडिया मे ’सलवा-जुडुम’ के सरकार-प्रायोजित  अत्याचारों को सबसे पहले बेनकाब किया।

   इतने गुनाह सरकार की नजर मे आपको कुसूरवार बनाने के लिये काफ़ी है। फिर तो औपचारिकता बाकी रह जाती है। इस लोकतांत्रिक देश की पुलिस ने पहले उन्हे बिना स्पष्ट आरोपों के महीनो जबरन हिरासत मे रखा। फिर कानूनी कार्यवाही का शातिर जाल बुना गया। सरकार तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी किसी हिंसात्मक गतिविधि मे संलग्नता को प्रमाणित नही कर पायी। सरकार के पास उनके माओवादियों से संबंध का कोई स्पष्ट साक्ष्य नही दे पायी। पुलिस का उनके खिलाफ़ सबसे संगीन आरोप यह था कि जेलबंद माओवादी कार्यकर्ता नरायन सान्याल के ख़तों को दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाने का काम उन्होने किया। मगर इस आरोप के पक्ष मे कोई तथ्यपरक सबूत पुलिस नही दे पायी। उनके खिलाफ़ बनाये केस की हास्यास्पदता का स्तर एक उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि सरकारी वकील अदालत मे उन पर यह आरोप लगाता है कि उनकी पत्नी इलिना सेन का ईमेल-व्यवहार ’आइ एस आइ’ से हुआ था। मगर बाद मे अदालत को पता चलता है कि यह आइ एस आइ कोई ’पाकिस्तानी एजेंसी’ नही वरन दिल्ली का सामाजिक-शोध संस्थान ’इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट’ था। फ़र्जी सबूतों और अप्रामाणिक आरोपों के द्वारा ही सही मगर पुलिस के द्वारा उनको शिकंजे मे लेने के पीछे अहम्‌ वजह यह थी कि उनके पास तमाम पुलिसिया ज्यादतियों और फ़र्जी इन्काउंटर्स की तथ्यपरक जानकारियां थी जो सत्ता के लिये शर्म का सबब बन सकती थी। 

उत्सव धर्मी इस समाज  में साल के आखिरी दिन उम्मीदों  ओर आशयो से इतर बिनायक सेन पर लिखना पढना शायद अजीब लगे पर उनकी मौजूदगी किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है ....ओर अपने भीतर सिमटे इस  समाज  के लिए भी .....वैचारिक असहमतिया ..उम्र कैद की हक़दार नहीं होती.....
सच मानिए आप शायद असहमत हो........पर वे मुझ ओर आपसे कई ज्यादा बड़े देशभक्त है 





चाहूँगा कोई भी प्रतिक्रिया या विचार  रखते वक़्त इस चर्चा ओर टिप्पणियों पर भी  नज़र डाले .....
अरुंधति.....क्रान्ति....नक्सल वाद .आदिवासी ओर वेंटीलेटर पे ये देश

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मंगलवार, दिसंबर 28, 2010

नव वर्ष आ !

नमस्कार मित्रों!

आज के कुछ पोस्ट ने इतना प्रभावित किया कि एक और चिट्ठा चर्चा प्रस्तुत करने का लोभ संवरण नहीं कर सका।

My Photoएक ब्लॉग है नीलाभ का मोर्चा इस पर Hirawal Morcha प्रस्तुत करते हैं देशान्तर के तहत कवि  जीवनानन्द दास का जीवन परिचय और उनकी कुछ रचनाएं।

बांग्ला कविता में जीवनानन्द दास का महत्व है और रहेगा। उनकी कविता तीव्र अन्तर्विरोधों और समाज से सामंजस्य न बैठा पाने की कविता है। अपने चारों ओर के समाज की पतनशीलता से विमुख हो करजीवनानन्द दास ने या तो धुर बंगाल के ग्रामीण परिवेश में शरण ली या फिर हिन्दुस्तान, मिस्र, असीरिया और बैबिलौन के धूसरअतीत में। इसीलिए उनकी कविता में आक्रोश की जगह अवसाद का पुट अधिक गहरा है। वे बेहतर समाज की इच्छा तो करते हैं,पर उसकी राहों का सन्धान करने की जद्दोजहद उनकी कविता में नहीं है। इसीलिए सरसरी नज़र से पढ़ने वाले को ऐसा महसूस होसकता है कि उनकी कविता पलायन की कविता है; लेकिन उनकी कविता में मनुष्य और उसके सुख-दुख, हर्ष-विषाद की निरन्तरउपस्थिति इस बात को झुठलाती है और उसे यों ही ख़ारिज नहीं किया जा सकता। इस अर्थ में उनकी कविता की प्रासंगिकता बनीरहेगी। "एक अद्भुत अँधेरा" जैसी कविता तो मानो आज का दस्तावेज़ है।

एक अद्भुत अँधेरा
एक अद्भुत अँधेरा आया है इस पृथ्वी पर आज,
जो सबसे ज़्यादा अन्धे हैं आज वे ही देखते हैं उसे।
जिनके हृदय में कोई प्रेम नहीं, प्रीति नहीं,
करुणा की नहीं कोई हलचल
उनके सुपरामर्श के बिना भी पृथ्वी आज है अचल।

जिन्हें मनुष्य में गहरी आस्था है आज भी,
आज भी जिनके पास स्वाभाविक लगती है
कला या साधना अथवा परम्परा या महत सत्य,
सियार और गिद्ध का भोज

My Photoकिसी भी विषय को डोरोथी कुछ अलग अंदाज़ में सोचती हैं और फिर उनकी लेखनी एक सशक्त कविता लेकर हाज़िर हो जाती है। बीतना एक साल का भी उनकी सोच और लेखनी का कमाल है। कवयित्री कहती है

काल की दहलीज पर ठिठका हुआ ये साल
बुझते मन से देख रहा है उस भीड़ को जो
घक्का मुक्की करते गुजर रही है सामने से
उसे अजनबी आंखों से घूरते
बड़ी ही हड़बड़ी और जल्दबाजी में.

कवयित्री का विचार या मनःस्थिति इस कविता में अधिक कौशल के साथ व्‍यक्‍त होती है। भाषा, भाव, और विचार का निर्वाह उनकी विशिष्‍ट काव्‍य क्ष‍मता का परिचायक है।

बिछुड़ने का दर्द समेटे
ढूंढता है इस वक्त
कोई ऐसा दिल
जो सहेजेगा
उस की यादों को
और करेगा ढेरों बातें
उसके बारे में
धुधलाने या गुमने
न देगा उसे
या उसकी यादों को।

इसे पढ़कर ऐसा लगा मानों कवयित्री की अनुभूति, सोच, स्मृति और स्‍वप्‍न सब मिलकर काव्‍य का रूप धारण कर लिया हो।

आखर कलश पर कुछ ग़ज़लें- श्रद्धा जैन की प्रस्तुत की गई है। वैसे तीनों ही ग़ज़लें बहुत अच्छी हैं, आपके विचारार्थ एक यहां पेश कर रहा हूं, बिना कुछ विशेष टिप्पणी के।

हश्र औरों का समझ कर जो संभल जाते हैं
वो ही तूफ़ानों से बचते हैं, निकल जाते हैं
मैं जो हँसती हूँ तो ये सोचने लगते हैं सभी
ख़्वाब किस-किस के हक़ीक़त में बदल जाते हैं
ज़िंदगी, मौत, जुदाई और मिलन एक जगह
एक ही रात में कितने दिए जल जाते हैं
आदत अब हो गई तन्हाई में जीने की मुझे
उनके आने की ख़बर से भी दहल जाते हैं
हमको ज़ख़्मों की नुमाइश का कोई शौक नहीं
कैसे ग़ज़लों में मगर आप ही ढल जाते हैं

शिवकुमार मिश्र ने एक बहुत ही मज़ेदार पोस्ट लगाई है, सिंगिंग रिअलिटी-शो ला रा लप्पा ला का फिनाले। एक बेहद रोचक अंदाज़ में, जिसके वे सिद्धहस्त तो हैं ही, शिव जी ने इस पोस्ट को कल न्यूज दैट मैटर्स नॉट के लिए लिखी थी आज हमारे लिए फिर से लिखी है। उनके इतनी मेहनत करने का राज भी इसी पोस्ट में है कि विख्यात मेंटोर और कुख्यात गायक श्री दलेर मेंहदी ने उनसे कहा; "रब्ब राखां पुत्तर. चक दे फटे. जिन्दा रह पुत्तर." बस वो दुगुने उत्साह से जुट गए और कहते हैं कल मुंबई में हुआ ला रा लप्पा ला नामक सिंगिंग रिअलिटी शो का फायनल तमाम अस्वाभाविक घटनाओं के लिए वर्षों तक याद किया जाएगा. ज़ीहाँ टीवी द्वारा आयोजित इस टैलेंट हंट के फिनाले में शुरुआत ही अच्छी नहीं रही. कार्यक्रम में अथिति के रूप में आये अक्षय कुमार अपनी कार से उतरकर पैदल चलते हुए अपनी सीट तक गए. उनके ऐसा करने से निराश तमाम दर्शकों ने यह कहते हुए हंगामा शुरू कर दिया कि उन्हें ठग लिया गया. अपनी बात को स्पष्ट करते हुए इन लोगों ने बताया कि उन्हें आशा थी कि अक्षय कुमार ज़ी उड़ते हुए, कूदते हुए या फिर तार के सहारे आसमान से उतरेंगे और उनके ऐसा नहीं करने की वजह से इन दर्शकों का पैसा वसूल नहीं हुआ.

पेट पकड़कर हंसने के लिए बाक़ी के अंश शिव जी से ही सुनिए।

My Photoकंचन सिंह चौहान जी की प्रस्तुति   गया साल.. एक नज़र और आने वाले की शुभकामना....! बीत रहे साल के लेखाजोखा के साथ-साथ आने वाली साल के पैग़ाम भी लेकर आई है। बताती हैं, “वर्ष भी कुछ अजीब सा ही रहा...! पारिवारिक रूप से बेहद खराब....! साहित्यिक उपलब्धियों की दृष्टि से काफी अच्छा...!” उनके इस मिश्रित अनुभवों वाले साल के इस संस्मरण के साथ एक ग़ज़ल भी है,

किसे कब हँसाये, किसे कब रुलाये,
ना जाने नया साल क्या गुल खिलाये।

रहम वीणापाणि का इतना हुआ है,
के हम भी अदीबों के संग बैठ पाए

लिहाफों, ज़ुराबों में ठिठुरे इधर हम,
उधर कोई छप्पर की लकड़ी जलाये।
इस वर्ष की अंतिम पोस्ट...! नव वर्ष खूब सारा उत्साह, उपलब्धियाँ, मानसिक शांति और प्रेम ले कर आये सबके जीवने में, इस शुभकामना के साथ, मिलते हैं एक नवीन दशक में।

Rangnath Singh मिर्ज़ा ग़ालिब के जन्म दिन पर उन्हें याद करते एक पोस्ट लिखी है गालिब जो मर गया है तो हर शायर-दिल उदास है कहते हैं ‘आज गालिब का जन्मदिन है। 'जन्मदिन की बधाई' की जो अंतरध्वनि है वह गालिब के फलसफा-ए-जिंदगी का विपर्यय ही रचती है। गालिब ने कभी चाहा था कि -

रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो।

हम-सुखन कोई न हो और हम-जबाँ कोई न हो।।

आगे कहते हैं ‘गालिब जैसे शायर को आज भी कुछ खास तरह के लोग ही याद कर रहे हैं। गालिब के ही तर्ज पे कहें तो गालिब जो मर गया है तो हर शायर-दिल उदास है.....

लेता नहीं मेरे दिल-ए-आवारा की खबर।

अब तक वह जानता है कि मेरे ही पास है।।

हर इक मकान को है मकीं से शरअ असद।

मजनूँ जो मर गया है,तो जंगल उदास है।।

दालान पर रंजन जी के है CNN - IBN अवार्ड समारोह !! यह एक बहुत सुलझी और सशक्त कलम से लिखा गया संस्मरण है जो लाइव कमेंट्री की तरह सारे दृष्य को आंखों के सामने साकर कर देता है।

लॉबी में खडा था - राजदीप से मुलाकात हुई - ब्लैक कलर के बंद गला में 'गजब के स्मार्ट दिख रहे थे ! स्वभाव से शर्मीला हूँ सो थोड़ी देर बाद आकाश को फोन किया और वो मुझे 'दरबार हौल में पहले से निर्धारित एक टेबल पर् बैठा दिए ! चुप चाप ! थोड़ी दूर पर् थे - 'कुमार  मंगलम बिरला - अपने दादा जी और दादी जी के साथ ' सभी से मिल जुल रहे थे ! धीरे - धीरे  सभी गेस्ट पहुँचाने लगे - वो सभी लोग थे - जिनको आज तक हम जैसे लोग सिर्फ 'अखबार और टी वी ' में ही दिखते थे ! प्रणव मुखर्जी , नितिन गडकरी , सुशील मोदी , ज्योतिराजे सिंधिया , रवि शंकर प्रसाद , विजय त्रिवेदी , सर मेघ्नंद देसाई , "सुधांशु मित्तल" और मालूम नहीं कितने लोग .....हम तो अपने टेबल पर् ऐसे बैठे थे - जैसे इन लोगों से रोज ही मुलाक़ात होती हो .....;)

रंजन जी की लेखनी के साथ-साथ उनकी हाजिर जवाबी भी काफ़ी प्रभावित करती है

नितीश को इन्डियन ऑफ द इन्डियन का अवार्ड मिला - मेरे बगल में एक विदेशी और बेहद ख़ूबसूरत - शालीन  महिला बैठी थीं - जब नितीश को अवार्ड मिला तो - खुशी से आंसू आ गए - यह सम्मान - सभी बिहारी के लिये था ! हम तो कुर्सी से खडा हो गया - सबसे देर तक ताली बजाया - विदेशी महिला ने मुझसे पूछा - ये कौन हैं ? मैंने बोला - अगला 'प्रधानमंत्री' :))

मेरा फोटोऔर अंत में राजेन्द्र स्वर्णकार जी के साथ हम भी कह रहे हैं नव वर्ष आ ! 

 

New Year 2011 - Animated Wallpapers

... नव वर्ष आ ...

ले नया हर्ष

नव वर्ष   !

आजा तू मुरली की तान लिये ' !

अधरों पर मीठी मुस्कान लिये ' !

विगत में जो आहत हुएक्षत हुए ,

उन्हीं कंठ हृदयों में गान लिये ' !

' कर अंधेरों में दीपक जला !

मुरझाये मुखड़ों पर कलियां खिला !

युगों से भटकती है विरहन बनी  ;

मनुजता को फिर से मनुज से मिला !

सुदामा की कुटिया महल में बदल !

हर इक कैक्टस को कमल में बदल !

मरोड़े गए शब्दों की सुन व्यथा ;

उन्हें गीत में और ग़ज़ल में बदल !

कुछ पल तू अपने क़दम रोक ले !

आने से पहले ज़रा सोच ले !

ज़माने को तुमसे बहुत आस है !

नदी को समंदर को भी प्यास है !

नये वर्ष ! हर मन को विश्वास दे !

तोहफ़ा सभी को कोई ख़ास दे !

जन जन प्रसन्नचित हो आठों प्रहर !

भय भूख़ आतंक से मुक्त कर !

स्वागत है , मुस्कुराता हुआ !

संताप जग के मिटाता हुआ  !!

नव वर्ष मुस्कुराता हुआ  !!!

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सोमवार, दिसंबर 27, 2010

सोमवार २७.१२.२०१० की चर्चा

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर हाज़िर हूं चिट्ठा चर्चा के साथ।

जब नया-नया ब्लॉगर बना था तो कुछ पता ही नहीं था कि ब्लॉगिंग क्या होती है। वो तो जी-मेल का एक अकाउंट था उसे ही खोल कर मेल पढ रहा था और कुछ गूगल का प्रचार टाइप का था जिसे टीपता गया मेरा ब्लोग तैयार, वरना उन दिनों मैं समझता था कि यह बड़े लोगों की चीज़ है जैसे अमिताभ, आडवाणी आदि।

ब्लोग तो खुल गया पर कोई पढने न आवे। तो बड़ी कुफ़्त हुई कि इसे कोई पढता क्यों नहीं है। बाद में जाना कि ब्लॉग-एग्रीगेटर नाम की कोई चीज़ होती है, और फिर उसके बारे में, उसके योगदान के बारे में भी जाना।

फिर तो खोज-खाज के एग्रीगेटर तक भी पहुंचा। उनदिनों के दोनों एग्रीगेटर चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी पर पंजीकरण हुआ, लगा कारू का खजाना मिल गया। धीरे-धीरे कुछ लोग आने शुरु हुए।

आज दोनों एग्रीगेटर नहीं हैं। पुराने ब्लॉगर तो एक-दूसरे से मिल-मिलाकर बातचीत कर लेते होंगे पर नए ब्लॉगर की क्या दशा-दुर्दशा होती होगी भगवान जाने। साथ ही चिट्ठाजगत द्वारा नए पंजीकृत हुए ब्लॉगरों की जानकारी भी मिल जाया करती थी। पर अब तो नए ब्लॉग के बारे में पता भी नहीं चलता।

मैंने यह बात एक पोस्ट में टिप्पणी देते हुए कही थी, आज इस मंच से पुनः कहना चाहूंगा कि जो स्थापित, श्रेष्ठ और सीनियर ब्लॉगर हैं वे ज़्यादा नहीं तो सप्ताह में एक दिन नए ब्लॉगर को दें, उनकी हौसला-आफ़ज़ाई करें। इससे न सिर्फ़ उनका मनोबल बढेगा बल्कि मार्गदर्शन भी होगा।

तो आइए आज की चर्चा शुरु करें
 मेरा फोटोबहुत दिनों के बाद दिखे अंतरजाल पर डॉ. मनोज मिश्र। अरे वही  मा पलायनम ! वाले। सोचा धर लाऊं। लगता है इतने दिनों बाहर बैठ कर कुछ विचार मंथन कर रहे थे। हम भ्रष्टन के और सब भ्रष्ट हमारे ....... पोस्ट द्वारा कहते हैं ‘यह बीत रहा साल तो घोटालों और महाभ्रष्टों की भेंट चढ़ गया।’ बात चुनावों की ओर ले जाते हुए कहते हैं सामाजिक परिवर्तन के नाम पर चुनावों में भ्रष्टाचार की जो गंगा बही है , अफ़सोस है इसकी चर्चा मीडिया के राष्ट्रीय पन्नों पर तो छोड़िये ,आंचलिक पन्नों पर भी नहीं हुई।

मैं तो बस इतना ही कहूंगा कि

सारा जीवन अस्‍त-व्‍यस्‍त है

जिसको देखो वही त्रस्‍त है ।

जलती लू सी फिर उम्‍मीदें

मगर सियासी हवा मस्‍त है ।

मैं ऐसा दिखता हूं...आपबीती... पर निखिल आनन्द गिरि एक बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति प्रस्तुत करते हैं। वे एक ज़रूरी कवि हैं – अपने समय व परिवेश का नया पाठ बनाने, समकालीन मनुष्य के संकटों को पहचानने तथा संवेदना की बची हुई धरती को तलाशने के कारण। उनकी कविता बनमानुस...हमें सोचने पर मज़बूर कर देती है, क्योंकि यह कविता मौजूदा यथार्थ का सामना करने की कोशिश का नतीजा है।

एक दुनिया है समझदार लोगों की,
होशियार लोगों की,
खूब होशियार.....
वो एक दिन शिकार पर आए
और हमें जानवर समझ लिया...
पहले उन्होंने हमें मारा,
खूब मारा,
फिर ज़बान पर कोयला रख दिया,
खूब गरम...
एक बीवी थी जिसके पास शरीर था,
उन्होंने शरीर को नोंचा,
खूब नोचा...
जब तक हांफकर ढेर नहीं हो गए,
हमारे घर के दालानों में....

इस कविता पर हमें बस इतना कहना है,

किन लफ़्ज़ों में इतनी कड़वी, इतनी कसैली बात लिखूं

शेर की मैं तहज़ीब निभाऊं या अपने हालात लिखूं

मेरा फोटोएक आलसी का चिठ्ठा पर गिरिजेश राव ने पुरुष की तरह एक कहानी लिखी है क्योंकि उनका कहना है, ‘मुझे स्त्री मन की कोई समझ नहीं है।’ हमारी साधारण समझ पर उन्होंने एक असाधारण कहानी रची है।

दोनों अपने अपने ब्लॉग पर प्रेम की कहानियाँ लिखते थे। जब वह लिखता तो लड़के की तरह ही लिखता था - अपनी देखी हर खूबसूरत समझदार लड़की से कुछ कुछ चुरा कर एक सुन्दरी को गढ़ता और आह भरते सोचते हुए लिख देता कि काश! उसे कोई लड़की अपनी जैसी मिली होती तो पूरे संसार को आसमान पर टाँग आता और धरा पर सब कुछ फिर से शुरू करता - मनु और श्रद्धा! आगे तो आप ब्लोग पर ही पढें।

यह कहानी हृदय फलक पर गहरी छाप छोड़ती है। एक स्‍त्री का अस्तित्‍व अपने अतीत, वर्तमान और भविष्‍य से जूझता हुआ खुद को ढूंढता रहता है। स्मृतियों और वर्तमान के अनुभव एक-दूसरे के सामने आ खड़े होते हैं तो लिखना रोक कर आईने में खुद को निहारती। चेहरे की लकीरों को निगाहों से मसल कर सलवटों को भूल जाती। उसे अपने बच्चे की सुध भी आती।

इस कहानी पर मुझे तो बस इतना कहना है,

क़तरे में दरिया होता है, दरिया भी प्यासा होता है,

मैं होता हूं वो होता है, बाक़ी सब धोखा होता है!

My Photoएक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर में अंतर समझना है तो स्वास्थ्य-सबके लिए पर कुमार राधारमण की पोस्ट ज़रूर पढें। मॉडर्न मेडिसिन के अलावा एक्युपंक्चर और एक्युप्रेशर भी इलाज का बेहतरीन तरीका हो सकते हैं। इनमें बेशक इलाज में ज्यादा वक्त लगता है, लेकिन कोई साइड इफेक्ट नहीं होता। हमारे देश में ये सिस्टम बहुत चलन में नहीं हैं लेकिन चीन में ज्यादातर इन्हीं के जरिए इलाज किया जाता है। हालांकि अब ये तरीके अपने यहां भी इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं।

एक्युपंक्चर पॉइंट्स के साथ मिलाकर योग किया जाए तो एक्यु योग कहलाता है। जैसे कि एक्युपंक्चर या प्रेशर से शुगर के मरीज के स्प्लीन (तिल्ली) या पैंक्रियाज पॉइंट को जगाया जाता है और साथ में शलभासन कराया जाता है, जोकि स्प्लीन या पैंक्रियाज के लिए फायदेमंद है। अस्थमा में फेफड़ों के पॉइंट्स को दबाने के अलावा प्राणायाम कराया जाता है। अगर मरीज को योग और एक्युप्रेशर पॉइंट, दोनों की जानकारी हो तो अच्छा है।

ये एक ऐसी विधा है जो अभी उतनी प्रचलित नहीं है, पर मुझे बस ये कहना है कि

ख़ुश्बू के बिखरने में ज़रा देर लगेगी

मौसम अभी फूलों के बदन बांधे हुये है।

My Photoबड़े लोग अपनी चलाते हैं, वे बदमिजाज होते हैं – अजित गुप्‍ता जी का कहना है अजित गुप्‍ता का कोना पर । कहती हैं,

“हम दोहरी जिन्‍दगी जी रहे हैं। एक तरफ अपने संस्‍कारों से लड़ रहे हैं जो हमारे अन्‍दर कूट-कूटकर भरे हैं और दूसरी तरफ उस पीढ़ी को अनावश्‍यक परेशान कर रहे हैं जिसने छोटे और बड़े का भेद मिटा दिया है।”

कुछ अच्छी सीख देती इस पोस्ट में वे कहती हैं,

“यहाँ ब्‍लाग जगत में हम जैसे लोग भी आ जुटे हैं। अपने बड़े होने का नाजायज फायदा उठाते रहते हैं और लोगों को टोकाटोकी कर देते हैं। किसी की भी रचना पर टिप्‍पणी कर देते हैं कि यह ठीक नहीं है, वह ठीक नहीं है। इसे ऐसे सुधार लो उसे वैसे सुधार लो। कहने का तात्‍पर्य यह है कि हम जैसे लोग अपनी राय का टोकरा लेकर ही बैठे रहते हैं।”

इस मुझे तो बस इतना कहना है,

चाहकर इसलिए सच कह नहीं पाया

सचकहा जिससे भी सच को सह नहीं पाया

धूल में तिनका मिला है बस इसी कारण

दूर तक वह संग हवा के बह नहीं पाया ।

My Photopragyan-vigyan पर Dr.J.P.Tiwari हमेशा कुछ अलग और नया प्रस्तुत करते हैं। इस बार वो लेकर आए हैं राम के निवेदन का निहितार्थ (भाग-२)

कहते हैं

एक सत्संग में 'सेतुबंध' की चर्चा और चित्रण करते हुए कथावाचक बता रहे थे वानर - रीछ शिलाखंड ला-लाकर नल और नील को दे रहे थे. और वे दोनों उन शिला खण्डों पर राम -राम लिख कर सेतु का निर्माण कर रहे थे. तत्क्षण ही मन-मष्तिष्क में राम द्वारा 'रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग' की स्थापना का उद्देश्य कौंध गया, और वह उद्देश्य था -'धर्म को विज्ञान से जोड़ने का' . राम तो स्वयं ही विज्ञान रूप हैं - "सोई सच्चिदानंद घन रामा / अज विज्ञानं रूप बल धामा //".

डॉक्टर तिवारी का मानना है ‘आत्मा और शरीर का भेद, आत्मा की अजरता - अमरता के सिद्धांत को जानकर ही समाजद्रोही, संविधानद्रोही, प्रकृति द्रोही  और संस्कृतिद्रोही से लोहा लिया जा सकता है. सामाजिक और राष्ट्रीय हित के कार्य भी अध्यात्म और विज्ञान के सामंजस्यपूर्ण मेल से ही किया जाना श्रेयष्कर होता है। अध्यात्म जिसकी व्याख्या चरित्र सिद्धांत, पाप-पुण्य से करता है. विज्ञान उसी को 'द्रव्यमान सिद्धांत' से.

विस्तृत जानकारी के लिए इस आलेख को पढें। हम तो बस यही कहेंगे कि,

हरि अनंत हरि कथा अनंता ।

कहहिं सुनाहिं बाहुबिधि सब संता ।।

आज बस इतना ही। छोटी ही सही, चर्चा की एक अंतराल के बाद शुरुआत की है आगे नियमित रहने की कोशिश रहेगी। फिर मिलेंगे। तब तक के लिए ..

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शनिवार, दिसंबर 25, 2010

आज हम एक उतावले समय में जी रहे हैं

आज 25 दिसंबर है। क्रिसमस का त्योहार मनाया जा रहा है दुनिया भर में। पूरा यूरोप कुड़कुड़ा रहा है मारे बर्फ़ानी माहौल के। जिधर देखो उधर बर्फ़ नजर आ रही है। सड़क पर बर्फ़, छतों पर बर्फ़, गाड़ियों पर बर्फ़, हवाई जहाजों पर। जिधर देखो उधर बर्फ़। काश इस बर्फ़ को संजों कर रखा जा सकता और फ़िर गर्मी के मौसम में निकाल दिया जाता थोक के भाव।

बहरहाल सभी को क्रिसमस की शुभकामनायें देते हुये मामला आगे बढ़ाते हैं। आइये आप भी साथ चलिये न! लेकिन चलने के पहले आप ये समाचार देख लीजिये। शिखा वार्ष्णेय की इस रपट में उन्होंने बताया है कि कैसी बदहाली का माहौल है लंदन के एयरपोर्ट पर इस कड़क समय में। हुलिया बिगड़ गया है कस्टमर सेवाओं का। एयरपोर्ट किसी रेलवे प्लेटफ़ार्म सरीखा लग रहा है। आगे क्या बतायें आप खुदै देख लीजिये उनकी रपट में।

अपने देश के लोगों की एक फ़ुल टाइम अदा है अपने अतीत पर गर्व करने की। लाल्टू जी ने इस पर अपनी राय बताते हुये लिखा:
कई बार मुझे लगता है कि काश हम एक महान संस्कृति महान देश कहलाने के दबाव से मुक्त हो पाते तो सचमुच हमारा ध्यान हमारी कमियों की ओर जाता और अपनी ऊर्जा महानता के नाम पर सीना पीटने के या विरोध की आवाज़ से डरने के बजाय बेहतर समाज और देश के निर्माण में लगा पाते. पर ऐसा होता तो लोगों को बेवकूफ बना कर देश को लूट रहे महान लोगों की क्या हस्ती रहती!


ऐसे ही घूमते हुये अनुराग वत्स के ब्लॉग सबद पर जाना हुआ। हिन्दी के वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण ने साहित्य अकादमी द्वारा महत्तर-सदस्यता पर्दान किया जाने के अवसर पर २० दिसंबर को जो स्वीकृति वकतव्य दिया उसको यहां पोस्ट किया गया है। कुंवर नारायण जी को इस वर्ष का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया है। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा:
आज हम एक उतावले समय में जी रहे हैं. इस ज़ल्दबाज़ी में असंयम और बौखलाहट है. जो हम चाहते हैं, उसे तुरत झपट लेने की आपाधापी. यह हड़बड़ी भी एक तरह की हिंसा है -- लड़भिड़ कर किसी तरह से आगे निकल जाने की होड़. यह बेसब्री हमारे अन्दर कुंठा और अधीरज को भड़काती है -- उस अनुशासन को नहीं जिसका लक्ष्य महान-कुछ को प्राप्त करना होता है. मेरी एक कोशिश जहां अपने समय को ठीक-ठीक समझ सकने की रही है वहीं उसे स्वस्थ और स्थाई जीवनमूल्यों से जोड़ने की भी.

खुदा झूठ न बुलवाये कुंवर नारायण की यह बात पढ़ते हुये मुझे अपनी एक अनगढ़ तुकबंदी याद आ गयी:
ये दुनिया बड़ी तेज चलती है ,
बस जीने के खातिर मरती है।

पता नहीं कहां पहुंचेगी ,
वहां पहुंचकर क्या कर लेगी ।

बस तनातनी है, बड़ा तनाव है,
जितना भर लो, उतना अभाव है।


आगे कुंवर नारायण जी ने यह भी कहा:
''बाजारवाद'' और ''उपभोक्तावाद'' आज का कटु यथार्थ है जो हमारे रहन-सहन, रीति-रिवाजों, आपसी संबंधों और सांस्कृतिक चेतना को कई स्तरों पर तेज़ी से बदल रहा है. हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती इस समय तमाम विकल्पों में से सही रास्ते चुन सकने की है. शायद इसीलिए इस समय को ''द्विविधाओं'' और ''संदेहों'' का समय कहना ज़्यादा ठीक लगता है.

आज समय कैसा चल रहा है यह बोधिसत्व की कविता में देखिये:
घरे-घरे दौपदी, दुस्सासन घरे-घरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

गली-गली कुरुक्षेत्र, मरघट दरे-दरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

देस भा अंधेर नगर, राजा चौपट का करे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

सीता भई लंकेस्वरी, राम रोवें अरे-अरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

पूजा मतलब पूजा उपाध्याय जिनको मैं डा.पूजा कहता हूं उनकी गजब की अभिव्यक्ति के कारण को जब भी पढ़ता हूं तो लगता क्या लिखती हैं ये, कैसे लिखती हैं। तुम्हारे आने का कौन सा मौसम है जान? का एक अंश:
घर पर हूँ और सोच रही हूँ कि आज के सूचना और टेक्नोलोजी के ज़माने में ऐसा कैसे मुमकिन है कि कहीं तुम मुझे ढूंढ ना पाओ. जिस जमाने में ये सब कुछ नहीं था तब भी तुम मुझे ढूंढ निकालते थे...याद है वो नए साल का सरप्राइज जब तुम हॉस्टल की दीवारें फांद कर बस मुझसे मिलने आये थे एक लम्हे के लिए बस. वो लिफ्ट में जब तुमने कहा था 'किस मी' तुम्हें याद है कि चलती लिफ्ट के वो भागते सेकंड्स जब भी याद करती हूँ हमेशा स्लो मोशन में चलते हैं.
कहा भी न जाये रहा भी न जाये का शायद इसी को कहते हैं जब पूजा लिखती हैं:
बहुत साल हो गए जान...अफ़सोस कि मैं एक स्त्री हूँ इसलिए ये नहीं कह सकती...कि जान मैंने सात पैग व्हिस्की पी है, दो डब्बे सिगरेट फूंकी है और तब जा के कहने की हिम्मत कर पायी हूँ...काश कि ऐसा होता मेरी जान. पर मैंने कोई नशा नहीं किया है...तुम्हारी याद को ताउम्र जीते हुए, आज इस सांझ में तुम्हारी आँखों में आँखें डाल कर कहना चाहती हूँ 'मुझे लगता है मुझे तुमसे प्यार हो गया है जान...काश तुम सामने होते तो तुम्हारे होठों को चूम सकती'.

अरुण रॉय की कविता का अंश देखिये। आगे आपका खुद मन होगा पढ़ने के लिये:
छीलते हुए मटर
गृहणियां बनाती हैं
योजनायें
कुछ छोटी, कुछ लम्बी
कुछ आज ही की तो कुछ वर्षों बाद की
पीढी दर पीढी घूम आती हैं
इस दौरान.

अपनी एक पोस्ट में अजित गुप्ता जी ने बताया लघु कहानी क्या है, कैसे लिखें:
लघुकथा में वर्णन की गुंजाइश नहीं है, जैसे चुटकुले में नहीं होती, सीधी ही केन्द्रित बात कहनी होती है। कहानी विधा में उपन्‍यास और कहानी के बाद लघुकथा प्रचलन में आयी है। उपन्‍यास में सामाजिक परिदृश्‍य विस्‍तार लिए होता है ज‍बकि कहानी में व्‍यक्ति, चरित्र, घटना जैसा कोई भी एक बिन्‍दु केन्द्रित विषय रहता है जिसमें वर्णन की प्रधानता भी रहती है लेकिन लघुकथा में दर्शन प्रमुख रहता है। लघुकथा का प्रारम्‍भ किसी व्‍यक्ति के चरित्र या घटना से होता है लेकिन अन्‍त पलट जाता है और अधिकतर सुखान्‍त होता है।



आज नीरज बसलियाल ने बताया कि कहानी कैसे लिखें:
लिखना एक ऑपरेशन जैसा है | ऑपरेशन थियेटर, एक परिवेश जो एक पूरी दुनिया है , आप अपनी कहानियाँ इसी परिवेश से तो चुराते हो | कभी गए हो वहाँ अन्दर ? गौर किया है कि वहाँ अन्दर जाने पर डर ख़त्म हो जाता है, लेकिन राहत मिले ऐसा भी नहीं |

लेकिन आप तो ब्लॉग लिखते हैं न! आप सोच रहे होगे कि कोई यह तो बताये ब्लॉग कैसे लिखा जाता है। तो देखिये ऐसे लिखा जाता है ब्लॉग :
लिखने का मजा तो यार तो तब है जब ऐसे लगे कि आमने-सामने बैठ के बतिया रहे हैं। अबे-तबे भी हो रही है और अरे-अरे, ऐसे नहीं-वैसे नहीं भी।

कोई तरतीब नहीं। एकदम बेतरतीब। मूड की बात। जैसे कोसी नदी। आज इधर कल किनारा बदल के सौ मील दूर। आज इधर डुबा रही हैं, अगले साल उधर मरणजाल डाल रही हैं। आदमी पानी के बीच पानी के लिये तरस रहा है। जल बिच मैन पियासा।


लेकिन लफ़ड़ा यह है कि ब्लॉग में लोग बेहतरीन और कालजयी लिखने के चक्कर में फ़ंस जाते हैं। अच्छा लिखने की चाहना माया है ब्लॉगिंग की राह में। देखिये:
लब्बो-लुआब यह कि अच्छा और धांसू च फ़ांसू लिखने का मोह ब्लागिंग की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है। ये साजिश है उन लोगों द्वारा फ़ैलाई हुयी जो ब्लाग का विकास होते देख जलते हैं और बात-बात पर कहते हैं ब्लाग में स्तरीय लेखन नहीं हो रहा है। इस साजिश से बचने के लिये चौकन्ना रहना होगा। जैसा मन में आये वैसा ठेल दीजिये। लेख लिखें तो ठेल दें, कविता लिखें तो पेल दें।


ब्लॉगिंग में तात्कालिकता का बहुत महत्व है। ज्यादा सोच-समझकर लिखने में यही होता है फ़िर कि टापिक हाथ से निकल जाता है। हाथ आती है केवल मन पछितैहे अवसर बीते वाली मुद्रा।

अब देखिये उधर प्याज महंगा हुआ इधर शिव कुमार मिश्र ने पोस्ट ठेल दी और कह डाला:
आज उतनी भी मयस्सर न किचेन-खाने में
जितनी झोले से गिरा करती थी आने-जाने में
काजल कुमार ने भी कार्टून बना डाला। इसके बाद ही प्याज की कीमतें कुछ तो औकात में आ ही गयीं और टापिक हाथ से निकल गया। इसलिये हे संतजनों जो मन कह डालिये। आगे आने वाला समय न जाने कौन की करवट बैठे।

और अंत में


  • डा.अमर कुमार चकाचक और टिचन्न होने की राह में हैं। पिछ्ली चर्चा में उनक टिप्पणी थी:
    Wah Anup Ji, goya Dr. amar kumar na huye...Chittha-Havaldar ho gaye !
    Mauj le lo, guru.. main aspataliya se bhi Charcha par nazar rakhe huye hoon !
    Shabhi Shubhchitakon ko mere parivar ki taraph se Dhanyavad.
    Gyan ji ko sasharir dekha, pasand karne yogya hain !
    Bye Bye karne ki stage mein TaTa kyon jata ? Sangam hi sahi..Lekin surya dakhsinayan hain, so..Lautaya ja raha hoon.
    Rachna ji, Aaj Roman mein likhte huye bahut bura lag raha hai.. aapko bura nahin lagata ?:)


    इसके पहले आपको बता दें कि अपने बुजुर्गवार चंद्रमौलेश्वरजी भी आपरेशन थियेटर से निकलकर घर वालों की निगरानी में हैं। उन्होंने कल अमरकुमार जी के माध्यम से बताया:
    Dr. Amar ji, hum ek hi kashti ke sawar hain, sab thik ho jayega. sheghra swasth laabh kar laut aayiye iss dangal mein. mujhe bhi bura lag raha hai roman mein likhne ka par kya karen, baraha ne dhokha de diya :)


    मेरा दुआ है कि दोनों सितारे जल्दी जल्दी स्वास्थ्य लाभ करें और ठसक के साथ जियें।


  • जिन साथियों को ब्लॉगपोस्टें देखने में परेशानी हो रही है वे हिन्दीब्लॉगजगत में जायें। काफ़ी पोस्टें वहां संकलित रहती हैं। काम चल जायेगा। बाकी जिनको पढ़ना है उनको खोजने के लिये गूगल बाबा की शरण लें।


  • बकिया फ़िर कभी अभी निकलना है एक पिकनिक के लिये। आप भी मजे करिये। क्रिसमस मुबारक।

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    शुक्रवार, दिसंबर 24, 2010

    लड़कियाँ, अपने आप में एक मुक्कमिल जहाँ होती हैं

    कई दिनों से ब्लॉग पढ़ना कम हो गया। लिखना तो औरौ कम। आज भी यही हुआ। एकाध पोस्टें बांची और लोटपोट तहाकर धरने वाले थे कि किसी पोस्ट में अपनी लक्ष्मीबाई कंचन की पोस्ट दिख गई! कल किसी ने इसकी तारीफ़ भी की थी। सोचा इसे भी देख लिया जाये। देखा तो पढ़ भी गये। पढ़ने के बाद कुछ लिखने की सोचते रहे लेकिन डा.अनुराग की बात को दोहराने के अलावा और कुछ लिख न पाये। डा.अनुराग ने कंचन की इस पोस्ट पर टिप्पणी करते हुये लिखा:
    तुम जब अपनों के बारे में लिखती है .....तब शायद अपनी बेस्ट फॉर्म में होती है ...बतोर राइटर !!!


    कंचन की अपनी मां के बारे में लिखी इस पोस्ट से किसी एक अंश को चुनना संभव नहीं है। इस पोस्ट पर अपनी बात कहते हुये नीरज गोस्वामी लिखते हैं:
    एक एक शब्द रुक रुक कर पढ़ना पढ़ा है...एक साथ पढ़ ही नहीं पाए हम तो...सब माएं लगता है एक जैसी ही होती हैं...इस भावपूर्ण लेख के लिए क्या कहूँ? प्रशंशा के लिए उचित शब्द मिले तो फिर लौटूंगा...अभी जो मिल रहे हैं वो बहुत हलके लग रहे हैं...
    मुस्कुराती रहो....लिखती रहो...ऐसा लेखन विरलों को ही नसीब होता है...


    अपने मां के बारे में लिखने के बाद अपनी बात खतम करते हुये जब कंचन ने यह लिखा तो लगा कि शायद यही कहने के लिये उसने पूरा ताना-बाना बुना है:
    पता नही ये उम्र थी या बच्चों का प्रेम...! जो अब उन्हे ठीक से नाराज़ भी नही होने देती। वो अपने सारे बच्चों के स्वभाव के साथ एड्जस्ट करने की कोशिश कर रही है शायद ...!

    और बच्चे ये जानते हैं की हमारे अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है...! कल से बहुत बुरा लग रहा है...! अम्मा के नाराज़ हो जाने जितना ही...!

    कि वो ठीक से नाराज़ क्यों नहीं हुई...?



    वो ठीक से नाराज क्यों नहीं हुई? पढ़कर अंसार कंबरी की कविता (हालांकि भाव अलग हैं दोनों स्थितियों में) याद आ गयी-
    पढ़ सको तो मेरे मन की भाषा पढ़ो
    मौन रहने से अच्छा है झुंझला पड़ो।

    कंचन की पोस्ट के पहले दो दिन पहले आराधना की पोस्ट पढ़ी थी! अपनी अम्मा को याद करते हुये आराधना ने जो पोस्ट लिखी है वह उनके अद्बुत लेखन का उदाहरण है। उनकी मां उनसे बचपन में बिछुड़ गयी थीं। पिताजी कुछ साल पहले! अपने अम्मा-बाबूजी के बारे में को आत्मीय संस्मरण आराधना ने लिखे हैं वे अद्भुत हैं। ऐसे सहज, आत्मीय संस्मरण बहुत कम पढ़े हैं मैंने। अपनी अम्मा को याद करते हुये उन्होंने लिखा:
    आज रुककर सोचती हूँ कि ये बातें तब समझ में आ गयी होतीं, तो शायद मुझे इस तरह पछताना नहीं पड़ता. हाँ, मैं छोटी थी, पर इतनी ज्यादा छोटी भी नहीं थी कि ये बातें ना समझ सकती. ये अपराधबोध मुझे अब भी सताता है कि मैंने अम्मा को कभी वो सम्मान नहीं दिया, जिसकी वो हकदार थीं. मैं हमेशा अपने में ही रहती थी. अम्मा के पास जाने से कतराती थी. उनके आख़िरी दिनों में मैंने कभी उनके पास बैठने की ज़रूरत नहीं समझी, कभी नहीं पूछा कि उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं, कि वो कुछ कहना तो नहीं चाहती हैं, और अब ये अपराधबोध मुझे सताता रहता है, ये ग्लानि मुझे परेशान करती रहती है. शायद मेरी ये सज़ा है कि मैं ज़िंदगी भर इस पछतावे में जीती रहूँ.


    पिछले दिनों आराधना से जे एन यू में मिलना हुआ। उनके एक चित्र पर लोगों के कमेंट देखिये और जिसके अंत में अनीता कुमार ने लिखा:
    प्रशांत और अराधना ने सारे कमैंट्स हथिया लिये ,बाकियों का क्या, वो सोच रहे होंगे काश हम भी मोटे होते कम से कम लोगों की नजर तो पड़ती ,अब तो कोई कुछ कह ही नहीं रहा…।वैसे अराधना मोटी तो नहीं लग रही, न ही गलफ़ुल्ली।प्रशांत चश्मा बदलवाने का समय आ गया


    डा.आराधना के लेखन और उनकी कविताओं पर विस्तार से फ़िर कभी।

    डा.अमर कुमार के बारे में जैसा पिछली पोस्ट में डा.अनुराग ने बताया था कि उनका कैंसर का आपरेशन हुआ है और वे इलाहाबाद के कमला नेहरू कैंसर इंस्टीट्यूट में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं। वे जब इलाहाबाद गये थे तो एक दिन उन्होंने मुझसे ज्ञानजी का नम्बर लिया था। फ़िर मैंने जब उनको फ़ोन किया तो उनके बेटे से पता चला कि उनका आपरेशन होना है। आपरेशन होने के बाद उनकी पंडिताइन से उनका हाल-चाल लिया तो उन्होंने बताया कि सब कुछ ठीक से हो गया। समय रहते पता चल गया और तुरंत आपरेशन हो गया। आज उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी करने पर पता चला कि आज अभी उनके टांके कट रहे हैं और चार-पांच दिन बाद उनकी अस्पताल से छुट्टी हो जाने की संभावना है। आशा है कि वे जल्दी ही हमारे साथ होंगे।

    डा.अमर कुमार अपनी टिप्पणियों में मुखर होते रहे हैं। ब्लॉगिंग में माडरेशन के सख्त खिलाफ़त करने वाले डा.अमर कुमार ने कुछ नायाब पोस्टें लिखी हैं। अपने बारे में बयान जारी करते हुये डा.साहब के काफ़ी विद कुश में कहा :
    अपने को अभी तक डिस्कवर करने की मश्शकत में हूँ, बड़ा दुरूह है अभी कुछ बताना । एक छोटे उनींदे शहर के चिकित्सक को यहाँ से आकाश का जितना भी टुकड़ा दिख पाता है, उसी के कुछ रंग साझी करने की तलब यहाँ मेरे मौज़ूद होने का सबब है । साहित्य मेरा व्यसन है और संवेदनायें मेरी पूँजी ! कुल मिला कर एक बेचैन आत्मा... और कुछ ?


    उनके बारे में मेरा कहना था:
    डा.अमर कुमार ने एक ही लेख नारी – नितम्बों तक की अंतर्यात्रा उनके लेखन को यादगार बताने के लिये काफ़ी है। लेकिन लफ़ड़ा यह है कि उन्होंने ऐसे लेख कम लिखे। ब्लागरों से लफ़ड़ों की जसदेव सिंह टाइप शानदार कमेंट्री काफ़ी की। रात को दो-तीन बजे के बीच पोस्ट लिखने वाले डा.अमर कुमार गजब के टिप्पणीकार हैं। कभी मुंह देखी टिप्पणी नहीं करते। सच को सच कहने का हमेशा प्रयास करते हैं । अब यह अलग बात है कि अक्सर यह पता लगाना मुश्किल हो जाता कि डा.अमर कुमार कह क्या रहे हैं। ऐसे में सच अबूझा रह जाता है। खासकर चिट्ठाचर्चा के मामले में उनके रहते यह खतरा कम रह जाता है कि इसका नोटिस नहीं लिया जा रहा। वे हमेशा चर्चाकारों की क्लास लिया करते हैं।

    लिखना उनका नियमित रूप से अनियमित है। एच.टी.एम.एल. सीखकर अपने ब्लाग को जिस तरह इतना खूबसूरत बनाये हैं उससे तो लगता है कि उनके अन्दर एक खूबसूरत स्त्री की सौन्दर्य चेतना विद्यमान है जो उनसे उनके ब्लाग निरंतर श्रंगार करवाती रहती है।

    डा.अमर कुमार की उपस्थिति ब्लाग जगत के लिये जरूरी उपस्थिति है!


    डा.अमर कुमार के लेख का एक अंश देखिये:
    मेरे हिंदी आचार्य जी, जिनको हमलोग अचार-जी भी पुकारते थे, पंडित सुंदरलाल शुक्ला ( यहाँ भी एक शुक्ला ! ) ने मुझमें साहित्यकार का कीड़ा होने की संभावनायें देख कर, इतना रगड़ना इतना रगड़ना आरंभ कर दिया कि आज तक इंगला-पिंगला, मात्रा-पाई, साठिका-बत्तीसा के इर्द गिर्द जाने से भी भय होता है । निराला की ‘ अबे सुन बे गुलाब ‘जैसी अतुकांत में भी वह ऎसा तुक ढु़ढ़वाते कि मुझे धूप में मुर्गा बन कर पीठ पर दो दो गुम्मे वहन करना कुछ अधिक सहल लगता । बाद में तो खूब जली हुई, झावाँ बनी तीन चार ईंटें मैं स्वयं ही चुन कर, क्लास के छप्पर के पीछे एक गुप्त कोने में रखता था । ये ईंटें हल्की हुआ करती हैं, और घर पर गृहकार्य करने में समय खराब न कर उतने समय तक मुर्गा बने रहने का अभ्यास मैं पर्याप्त रूप से कर चुका था, सो कोई वांदाइच नहीं के भाव से नाम पुकारे जाने पर लपक कर दोनों हाथ में गुम्मे लेकर उपस्थित हो जाता । ज़ेब में साप्ताहिक हिन्दुस्तान का एक बड़ा पन्ना मोड़कर रखता, जिसे बिछा कर कोनों को पैर के अंगूठे से दबाकर मुर्गा बन जाता, और झुका हुआ पढ़ता रहता । अब बताइये ब्लागर पर ऎसी साहित्यसाधना कितने जनों ने की होगी ?


    डा.अमर कुमार जल्द ही हमारे बीच फ़िर होंगे यह मुझे आशा है। विश्वास है। उनके स्वास्थ्य के लिये मंगलकामनायें।

    इस बीच हिन्दी के लोकप्रिय कवि, कथाकार उदयप्रकाश जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। देर से, बहुत देर मिला लेकिन एकदम दुरस्त मिला। उनके बारे में लिखते हुये विनीतकुमार का लेख देखिये! कबाड़खाने पर भी उनके बारे में लिखा
    लेख-सत्ता,शोर बचे न बचे ! शब्द ज़रूर बचेगा देखिये। इस लेख में उदय प्रकाश के बारे में लिखते हुये संजय पटेल लिखते हैं:
    उदयप्रकाश ने मुखरता से कहा कि कविता,संगीत,कहानी,उपन्यास,चित्रकारी,फ़ोटोग्राफ़ी और शिल्पकला का आपस में एक रूहानी रिश्ता है और जो लेखक,कवि या कलाकार इन रिश्तों की गंध से अपरिचित है वह कभी क़ामयाब नहीं हो सकता. उदयप्रकाश ने कहा कि पाठक के ह्रदय में जगह बनाना सबसे मुश्किल काम है क्योंकि वह बड़ी परीक्षा लेकर स्वीकृति देता है. उन्होंने इस बात पर खेद जताया कि पूरा बाज़ार एक भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा है. सच आज गुम है. दु:ख यह है कि भ्रष्टाचार अब बेफ़िक्र होकर सत्ता के गलियारों की सैर कर रहा है. उन्होंने कहा कि तस्वीर तब बदल सकती है जब नागरिक बैख़ौफ़ होकर आवाज़ उठाए. उदयप्रकाश ने कहा कि फ़्रांस के राष्ट्रपति सरकोज़ी कॉरपोरेट्स के साथ एक कप कॉफ़ी पीते हैं तो उन्हें माफ़ी मांगनी पड़ती है जबकि हमारे यहाँ की राजनीति में क्या क्या नहीं होता फ़िर भी सब बेशरम से घूमते हैं.उदयप्रकाश साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिलने से प्रसन्न भी थे और संतुष्ट भी. तीन दशक से ज़्यादा समय से क़लम चला रहे इस घूमंतु लेखक से बात करना वैसा ही सुक़ून देता है जैसा ठिठुरन देती ठंड में धूप का आसरा मिल जाना.


    उदयप्रकाश का ब्लॉग यहां देखें।

    फ़िलहाल इतना ही। बाकी फ़िर कभी।

    अपडेट बजरिये ज्ञानजी:

    डाक्टर अमर कुमार बहुत ठीक से ठीक हो रहे हैं। बोलने की मनाही है, जो शायद कुछ महीने चले (बकौल उनके)। बाकी, बतैर सम्प्रेषक वे कलम कापी ले कर भिड़े थे। और बोलने बाले से बेहतर अभिव्यक्त कर पा रहे थे।
    पूरा परिवार बहुत सज्जन था। डाक्टर साहब समेत।

    मेरी पसन्द


    लड़कियाँ,
    तितली सी होती है
    जहाँ रहती है रंग भरती हैं
    चाहे चौराहे हो या गलियाँ
    फ़ुदकती रहती हैं आंगन में
    धमाचौकड़ी करती चिडियों सी

    लड़कियाँ,
    टुईयाँ सी होती है
    दिन भर बस बोलती रहती हैं
    पतंग सी होती हैं
    जब तक डोर से बंधी होती हैं
    डोलती रहती हैं इधर उधर
    फ़िर उतर आती हैं हौले से

    लड़कियाँ,
    खुश्बू की तरह होती हैं
    जहाँ रहती हैं महकती रहती है
    उधार की तरह होती हैं
    जब तक रह्ती हैं घर भरा लगता है
    वरना खाली ज़ेब सा

    लड़्कियाँ,
    सुबह के ख्वाब सी होती हैं
    जी चाहता हैं आँखों में बसी रहे
    हरदम और लुभाती रहे
    मुस्कुराहट सी होती हैं
    सजी रह्ती हैं होठों पर

    लड़कियाँ
    आँसूओं की तरह होती हैं
    बसी रहती हैं पलकों में
    जरा सा कुछ हुआ नही की छलक पड़ती हैं
    सड़कों पर दौड़ती जिन्दगी होती हैं
    वो शायद घर से बाहर नही निकले तो
    बेरंगी हो जाये हैं दुनियाँ
    या रंग ही गुम हो जाये
    लड़कियाँ,
    अपने आप में
    एक मुक्कमिल जहाँ होती हैं

    मुकेश कुमार तिवारी

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    बुधवार, दिसंबर 22, 2010

    यहां वहां से उठाकर रखे कुछ अधूरे पूरे सफ्हे


    शब्द शब्द होते है ...उन्हें किसी लिबास की आवश्यकता क्यों......न किसी नेमप्लेट की.......कभी कभी उन्हें गर यूं ही उधेड़ कर सामने रखा जाए तो......
    .
    (एक)

    हर दिन की तरह, अल्सुबह की नरमी आँखों में भारती रही, दोपहर का सूरज चटकता रहा और सुरमई शाम का जाता उजाला स्वाद बन जीभ पर तैरता रहा.. जिस बीच कई दिनों से खुद से लापता रहने के बाद मौसम के चेहरे पर खुशियाँ तलाशने में जुटना और इस कवायद में एक स्वप्निल जगह का बनना और ठहर जाना.. सब कुछ के बावजूद खुद को पा लेने वाले अपने ही अंदाज़ में. लेकिन खुद को पाना कभी खुद से लापता रहने वाली लुका छिपी के बीच वाली जगह में अभिवादन और खेद सहित लौटी - लौटाई गयी इच्छाएं ठूस-ठूस कर एक नुकीले तार में पिरोकर टांग दी गयी थी... मजबूत, कमज़ोर, छोटी, बड़ी, इस या उस तरह की.. अब यदि उनमे से किसी एक इच्छा को उतार कर निकलना फिर टटोलने का मन हो तो बाकी को भी उतारना और फिर उन्ही रास्तों, पतझड़ी मौसम की उदासियों की तरह गुज़ारना होता, सच के झूट में तब्दील होता एक पहाड़.. जहाँ तक हांफते हुए दौड़ना, पहुंचना फिर लौटना.. सांसो की आवा-जाही के साथ तार से बिंधी इच्छाओं को उतारना- संवारना... एक कातर नज़र डालना और पलटकर फिर टांग देना



    (दो)
    क्या किया जाना है?
    आवेदनपत्र भरो
    और नत्थी करो बायोडाटा

    जीवन कितना भी बड़ा हो
    बायोडाटा छोटे ही अच्छे माने जाते हैं.

    स्पष्ट, बढ़िया, चुनिन्दा तथ्यों को लिखने का रिवाज़ है
    लैंडस्केपों की जगह ले लेते हैं पते
    लड़खड़ाती स्मृति ने रास्ता बनाना होता है ठोस तारीख़ों के लिए.

    अपने सारे प्रेमों में से सिर्फ़ विवाह का ज़िक्र करो
    और अपने बच्चों में से सिर्फ़ उनका जो पैदा हुए

    (तीन)

    आज लिखने बैठा तो कुछ प्रश्न मन में आये - मैं क्यों लिखे जा रहा हूँ? 
    बाउ के बहाने पूर्वी उत्तरप्रदेश के एक निहायत ही उपेक्षित ग्रामक्षेत्र की भूली बिसरी गाथाओं की कथामाला हो या सम्भावनाओं की समाप्ति के कई वर्षों के बाद बीते युग में भटकता प्रेम के तंतुओं की दुबारा बुनाई करता मनु हो, मैं क्यों लिखे जा रहा हूँ? 
    मैं वर्तमान पर कहानियाँ क्यों नहीं लिख रहा?
    अंतिम प्रश्न - जाने कितनों ने ऐसे विषयों पर लिख मारा होगा, तुम कौन सा नया कालजयी तीर चला रहे हो?  
    उत्तर भी आये हैं - तुम इसलिए लिख रहे हो कि लिखे बिना रह ही नहीं सकते। कभी वर्तमान पर भी लिखने लगोगे। कहानियाँ समाप्त कहाँ होती हैं?


    लिखते हुए सोचा बस है, तुम और इंटेलेक्चुअल हो गई होगी। आयु, परिवेश, सहचर और बच्चों के प्रभाव तुम पर पड़े होंगे क्या? इसे पढ़ोगी भी? पत्र है यह? कहाँ अटके हो मनु? – यह सब तुम्हारे मन में आएँगे क्या? 

    कभी कभी बहक किसी को भीतर तक हिला जाती है। दादा! बहकने वालों को पता ही नहीं होता और दूसरों के रास्ते खो जाते हैं... 

    (चार)
    साँसें बारीक काटकर
    भर लें आ
    सौ सीसियों में..
    "ऊँची ऊँचाई" पर जब
    हाँफने लगें रिश्ते
    तो
    उड़ेलना होगा
    फटे फेफड़ों में
    इन्हीं सीसियों को

    होमियोपैथी की खुराक
    देर-सबेर असर तो करेगी हीं!!


    (पांच )
    बाँध लो कस के सीट बेल्ट अपनी
    रास्ते में बहुत ही मिलते हैं
    तेज झटके एस्टेरॉयड से,
    देख लो बस यहीं से बैठे हुए
    दूर से तुम शनी के वो छल्ले
    अगर छू दोगी उन्हें तुम जानां
    उनकी औकात बस रह जायेगी
    एक मामूली बूम रिंग जितनी,
    बहुत तारीक़* सी सुरंगें हैं
    आगे जा कर ब्लैक होलों की
    डर लगे गर..मुझे पकड़ लेना,
    ध्यान देना कहीं इसी ज़ानिब
    एक आवाज़ का ज़जीरा है
    पिछले साल के उस झगडे में
    तुमने दी थीं जो गालियाँ मुझको
    सब सुनाऊंगा, झेंप जाओगी,
    ये ‘स्टॉप’ पहले आसमां का है,
    सात आसमानों के सात स्टॉप होते हैं,
    ये जो नेब्युला* देखती हो ना
    ये हामिला सी लगती है
    एक तारे का जन्म होगा अब,
    बहुत ही दूर निकल आये हैं
    चलो अब लौट ही चलें वापस
    जिया सालों की ये जो दूरी है
    चंद मिनटों में तय हो जाती है
    खयाली कार से अगर जाओ,
    अब तो वापिस ही लौट आये हैं
    ज़रा देखो न सफर में अपने
    चाँद भी जम गया है शीशों पर
    ज़रा ठहरो एक घडी तुम भी
    ज़रा ये वाइपर चलाने दो.... !

    (छह )









    (सात )


    विकिलीक्‍स जैसा कुछ करने के लिए मंशा चाहिए। वह हमारी नहीं है। हम किसी भी सच्‍चाई से ज्‍यादा खुद से प्‍यार करते हैं – यह सच है। और विकिलीक्‍स माध्‍यमों (प्रिंट, ध्‍वनि, टीवी, वेब) का मसला नहीं है – वह सच्‍चाई से कुर्बान हो जाने की हद तक प्‍यार करने का मसला है। ये जिद जब किसी में आएगी, तो वह किसी भी माध्‍यम का इस्‍तेमाल करके विकिलीक्‍स जैसा काम कर जाएगा।
    हमारे यहां और हमारे पड़ोस में कई सारी ऐसी चीजें हैं, जिसके दस्‍तावेजों को खोजा जाना चाहिए। बल्तिस्‍तान का मसला, कश्‍मीर पर सियासी फायदों से जुड़े रहस्‍य, मणिपुर को लेकर सरकारी पॉलिसी, युद्धों में आदेशों की फाइलें, गुजरात, 26/11… हमारे सामने किसी का भी पूरा सच मौजूद नहीं है। हमारे टेलीविजन सरकारी जबान को ही सच मानते हैं और जो सूत्रों से जानते हैं, उनमें विस्‍मयादिबोधक चिन्‍ह लगाते हैं। अपनी तरह से सच तक पहुंचने की जहमत नहीं उठाते।
    एक बात यह भी है कि हम गरीब देश हैं और हमारे यहां अपनी दिलचस्पियों के साथ वयस्‍क होने की इजाजत नहीं है। हम दूसरों की उम्‍मीदों के हमदम होते हैं और हमारी ख्‍वाहिशों का कोई मददगार नहीं होता। हम हिंदी पढ़ते-पढ़ते साइंस पढ़ने लगते हैं। पत्रकारिता करते करते पीआर करने लगते हैं और आंदोलन करते करते संसद खोजने लगते हैं। ऐसे में कौन बनेगा जूलियन असांजे, एक अजीब सवाल है और फिलहाल तो विकल्‍प गिनाने के नाम पर दूर दूर तक कोई प्रतीक भी नहीं है।






    चलते चलते-
    चिठ्ठा चर्चा के एक बेहद गंभीर पाठक फिलहाल गले के केंसर के ओपरेशन के बाद   अस्पताल में है ...अपने जीवट व्यक्तित्व ओर लगभग निडर स्वभाव के मुताबिक उन्होंने केंसर से भी दो दो हाथ कर  लिये है.....उन्हें अच्छी फिल्मे देखने का बेहद शौंक है ....उनके स्वास्थ्य की बेहतर शुभ कामनायो सहित .......विश्व सिनेमा की एक बेहतरीन फिल्म  का एक द्रश्य डॉ अमर कुमार के वास्ते




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    सोमवार, दिसंबर 13, 2010

    सोमवार (१३.१२.२०१०) की चर्चा

    नमस्कार मित्रों! मैं मनोज कुमार एक बार फिर हाज़िर हूं सोमवार की चर्चा के साथ। कुछ दिन के अंतराल के बाद आया हूं। ऐसी कोई खास व्यस्तता न होते हुए भी कुछ ऐसा होता गया कि इस मंच से चर्चा करने का समय निकाल नहीं पाया।

    मेरा फोटोआज की चर्चा शुरु करते हैं संजय ग्रोवर जी के एक नए ब्लॉग सरल की डायरी से। इस पर इन्होंने एक कथा पोस्ट की है जिसका शीर्षक है सारांश-2 .. एक व्यंग्य कथा के ज़रिए संजय जी व्यवस्था के विकृत चहरे को अपने कलम की साधना से उकेरने का बेहतर प्रयास किया  है। कहानी का एक अंस है

    बाहर हवा जिस तरफ़ बह रही है, सारे फूल-पत्ते-धूल-धक्कड़ और इंसान उसी दिशा में उड़ रहे हैं। पड़ोसी जो गुण्डों के चलते रोहिनी से कटे-कटे रहते थे, अब गुण्डों के होते रोहिनी के साथ आ खड़े होते हैं। रोहिनी और सोनी, गुण्डों के साथ मिलकर नारी-मुक्ति की लड़ाई को आगे बढ़ातीं हैं। विष्णु आज-कल हर शाम गुण्डों के लिए फूल लाता है।

    सारांश -२ हिला देने वाली 'कथा 'है। आंधी के साथ निर्जीव बस्तुएं बहती हैं --सूखे .निर्जीव पत्ते और धूल . .संवेदनाएं जब , जिन लोगों की मर जाती हैं ऐसी ही आंधी की प्रतीक्षा करते हैं। संजय ग्रोवर की कहानी से गुज़रना एकदम नए अनुभव से गुज़रना है क्योंकि इसमें यथार्थ इकहरा नहीं है, बल्कि यहां आज के जटिलतम यथार्थ को उघाड़ते अनेक स्तर हैं।

    कुमार राधारमण पेश कर रहे हैं एक बेहद ज़रूरी आलेख प्लास्टिक से ज्यादा खतरनाक है तंबाकू! हालाकि सुप्रीम कोर्ट ने गुटखा और पान मसाला की प्लास्टिक पाउच में बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का फैसला सुनाया है। फैसला स्वागत योग्य है लेकिन इससे तंबाकू के उपयोग, उससे होने वाली स्वास्थ्य हानि और ब़ढ़ते खतरनाक रोगों में कोई कमी आ जाएगी ऐसा नहीं लगता।

    तंबाकू के ब़ढ़ते खतरे और जानलेवा दुष्प्रभावों के बावजूद इससे निपटने की हमारी तैयारी इतनी लचर है कि हम अपनी मौत को देख तो सकते हैं लेकिन उसे टालने की कोशिश नहीं कर सकते। यह मानवीय इतिहास की एक त्रासद घटना ही कही जाएगी कि कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका की सक्रियता के बावजूद स्थिति नहीं संभल रही। क्या तंबाकू के खिलाफ इस जंग में हमें हमारी नीयत ठीक करने की जरूरत नहीं है?

    तम्बाकू धीमे जहर के रूप में समाज के सभी वर्ग के लोगों को प्रभावित कर रहा है। तम्बाकू के लिए जनजागरण में मीडिया के साथ ब्लॉगजगत की भी अहम भूमिका हो सकती है। और इसमें राधारमण जी आपने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है इस पोस्ट को लगा कर।

    आज की सच्चाई पर एक लडकी के मनोभावों को दर्शाती सुन्दर रचना पेश की है एक बेफिक्र दिखने वाली लड़की अरुण चन्द्र रॉय ने।

    वह जोमेरा फोटो

    ३०  वर्षीया लड़की

    हाथ में कॉफ़ी का मग लिए

    किसी बड़े कारपोरेट हाउस के

    दफ्तर की बालकनी की रेलिंग से

    टिकी है बेफिक्री से

    वास्तव में

    नहीं है उतनी बेफिक्र

    जितनी रही है दिख .

    भय की कई कई परतें

    मस्तिष्क पर जमी हुई हैं

    जिनमे देश के आर्थिक विकास के आकड़ो से जुड़े

    उसके अपने लक्ष्य हैं
    जिन्हें पूरा नहीं किये जाने पर

    वही होना है जो होता है

    आम घर की चाहरदीवारी में

    एक भय है

    उन अनचाहे स्पर्शों का

    जो होता है

    हर बैठक के बाद होने वाले 'हाई टी' के साथ

    वह बचना चाहती है उनसे

    जैसे बचती हैं घरेलू औरते आज भी

    एक भय

    परछाई की तरह

    करता है उसका पीछा

    लाख सफाई देने पर भी कि

    नहीं है उसका किसी से

    कोई अफेयर

    तमाम भय के बीच

    जब सूख जाते हैं उसके ओठ

    एक ब्रांडेड लिप-ग्लोस का लेप चढ़ा

    तैयार हो जाती है वह

    एक और मीटिंग के लिए

    उतनी ही बेफिक्री से.

    वास्तव में

    जितनी बेफिक्र नहीं है वह.

    बहुत ही यथार्थवादी कविता है.....चेहरे के अंदर का छुपा कशमकश बयाँ करती हुई ...जिनसे लोंग या तो सचमुच अनभिज्ञ होते हैं या दिखावा करते हैं...जान कर भी ना जानने का..

    इस कविता का उत्कर्ष ही यही है कि यह जीवन के ऐसे प्रसंगों से उपजी है जो निहायत गुपचुप ढंग से हमारे आसपास सघन हैं लेकिन हमारे तई उनकी कोई सचेत संज्ञा नहीं बनती। आपने उन प्रसंगों को चेतना की मुख्य धारा में लाकर पाठकों से उनका जुड़ाव स्थापित किया है। नारी मन की गहराई, उसका अन्तर्द्वन्द्व, नारी उत्पीडन, मान-अपमान में समान भावुक मन की उमंगे, संवेदनशीलता, सहिष्णुता आदि पर काव्य में अभिव्यक्ति दी गई है, जो कि वस्तुतः सुलझी हुई वैचारिकता की प्रतीक है।

    दोस्त ! प्रेम के लिये वर्ग दृष्टि ज़रूरी है शरद कोकास जी की कविता है जो इस भूमिका के साथ शुरु होती है

    प्रेम में सोचने पर भी प्रतिबन्ध..? ऐसा तो कभी देखा न था ..और उस पर संस्कारों की दुहाई ..। और उसका साथ देती हुई पुरानी विचारधारा ..कि प्रेम करो तो अपने वर्ग के भीतर करो.. । लेकिन ऐसा कभी हुआ है ? ठीक है , प्यार के बारे में सोचने पर प्रतिबन्ध है, विद्रोह के बारे में सोचने पर तो नहीं । फिर वह विद्रोह आदिम संस्कारों के खिलाफ हो , दमन के खिलाफ हो या अपनी स्थितियों के खिलाफ़ ..।  देखिये " झील से प्यार करते हुए " कविता श्रंखला की अंतिम कविता में यह कवि क्या कह रहा है ...

     मेरा फोटो

    मैं झील की मनाही के बावज़ूद

    सोचता हूँ उसके बारे में

    और सोचता रहूंगा

    उस वक़्त तक

    जब तक झील

    नदी बनकर नहीं बहेगी

    और बग़ावत नहीं करेगी

    आदिम संस्कारों के खिलाफ ।

    इस कविता को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि जीवन को उसकी विस्‍तृति में बूझने का यत्‍न करने वाले कवि हैं। जो मिल जाए, उसे ही पर्याप्‍त मान लेने वाले न तो दुनिया के व्‍याख्‍याता होते हैं और न ही दुनिया बदलने वाले। दुनिया वे बदलते हैं जो सच को उसके सम्‍पूर्ण तीखेपन के साथ महसूस करते हैं और उसे बदलने का साहस भी रखते हैं।

    Devendra Gehlod ने जख़ीरा पर प्रस्तुत किया है शेख इब्राहीम "ज़ौक"- परिचय

    खाकानी-ए-हिंद शेख इब्राहीम "ज़ौक" सन १७८९ ई. में दिल्ली के एक गरीब सिपाही शेख मुह्ब्ब्द रमजान के घर पैदा हुए | १९ साल कि उम्र में आपने बादशाह अकबर के दरबार में एक कसीदा सुनाया | इस कसीदे का पहला शेर यह है-

    जब कि सरतानो-अहद मेहर का ठहरा मसकन,

    आबो-ए-लोला हुए नखो-नुमाए-गुलशन |

    ग़ालिब भी ज़ौक कि शायरी के प्रसंशक थे बस उन्हें ज़ौक कि बादशाह से निकटता पसंद नहीं थी

    कहते है 'ज़ौक' आज जहा से गुजार गया,

    क्या खूब आदमी था खुदा मग्फारत करे |

    आज बस इतना ही। फिर मिलेंगे।

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    बुधवार, दिसंबर 08, 2010

    माचिस एक आग का घर है.....जिसमें बावन सिपाही रह्ते हैं.

    लिखते रहना एक अच्छी जिद है ....किताबी पन्नो के बरक्स कंप्यूटर भी बड़ी  सहूलियत से किसी   भी वक़्त अपने स्क्रीन पर बहुत कुछ अच्छा लिखा दिखा सकता है .टेक्नो लोजी ने  पाठको को न केवल बढाया है ..अलबत्ता परस्पर संवाद की एक गुंजाइश को पुख्ता भी किया है...संस्मरण लिखना दरअसल अपने तजुरबो को आज में देखना है ....एक अच्छा  संस्मरण  लिखने वाला  संस्मरणों  की  न केवल अंगुली पकड़ कर चलता है ... बल्कि हमें भी उन गलियों के भीतर ले चलता है ..नवीन नैथानी जी  ने लिखो यहाँ वहां पर ऐसे कई यादो को दोहराना शुरू किया है ....शीर्षक  ब्लॉग से ली गयी कुछ पंक्तियों से लिया गया है

    खैर एक रोज दर्द साह्ब के साथ अजब वाकया पेश आया. वे टिप-टाप मे बैठे थे कि दो महिलायें एक सूर्ख गुलाब लिये दर्द साहब को पूछती चली आयीं.थोडा सकुचाते ,कुछ हिचकिचाते हुए उन्होंने वह गुलाब कुबूल किया - मेज के किनारे रखा और प्रदीप गुप्ता को उधार की चाय का आर्डर दिया.दर्द साहब सूर्ख गुलाब का सबब समझ नहीं पा रहे थे .तभी वहां हरजीत का आगमन हुआ.उसने मंजर देखा , प्रदीप गुप्ता से कुछ बात की और फिर उस सार्वजनिक पोस्टर -स्थल से अवधेश की पैरोडी हटाकर एक नया शे’र चस्पां कर दिया
    शराबो- जाम के इस दर्जः वो करीब हुए
    जो दर्द भोगपुरी थे गटर-नसीब हुए
    इसे पढ़्कर दर्द भोगपुरी ने ,जाहिर है, राहत की सांस ली

    कुछ ऐसी ही बैचेनियो को एक केलिडोस्कोप में हथकड़ रखता है .....इस  बैचेनी में याद आते कुछ किरदार  भी है ....यहाँ नेरेटर संस्मरण  का हिस्सा भी बनता है ...उसके फ्लो में .हस्तक्षेप नहीं करता ...मसलन


    दो महीने तक मैं रोज शाम को उनके पास जाता था. वे मुझसे पंजा, पांव, आँख, भोहें, कोहनी जैसे शरीर के अंग बनवाते रहे. उन्होंने अगले पायदान पर मुझे एक किताब दी जिसमें सब नंगे स्केच थे. उनको देखना और फिर उन पर काम करना बेहद मुश्किल था. मैं तब तक नौवीं कक्षा में आ चुका था और मेरी जिज्ञासाएं चरम पर थी. मैंने कुछ और महीने फिगर पर काम किया. वे मुझसे खुश तो होते लेकिन मुझमे ऐसी प्रतिभा नहीं देख पाए थे कि मेरे जैसा शिष्य पाकर खुद को भाग्यशाली समझ सकें. एक दिन मैंने कहा "मुझसे पेंसिलें खो जाती है शायद मुझे इनसे प्यार नहीं है." उन्होंने पीक से मुंह हल्का करके कहा "बेटा ये राज बब्बर फाइन आर्ट में मेरा क्लासफेलो था, इसने लिखित पर्चे नक़ल करके पास किये है मगर देखना एक दिन फिर से ये पेन्सिल जरुर पकड़ेगा."

    पूरी पोस्ट पढियेगा ....ओर इस नेरेशन में डूब जाइयेगा........

    सागर अप्रत्याशित लेखक है ....थोड़े विद्रोही तेवर वाले कवि......उनकी कविता मुझे कई बार हतप्रभ करती है .....नंगे यथार्थ से उन्हें रोमानटीसाइज़ उनका फेवरेट शगल है ....उनकी कई प्रतिक्रियाये कई रेखाचित्रो के सामान्तर चलती है .कई बार आगे फलांग जाती है ...बतोर कवि .वे मुझे कभी हड़बड़ी में नहीं दिखते ... उनकी बैचेनिया बनी रहे ....
    मसलन अपनी कविता  पिता : मुंह फेरे हुए एक स्कूटर 
    में वे कुछ यूँ दिखते है



    आओ ग्लास में उडेलें थोड़ी सी शराब
    कि अब तो तुम्हारे शर्ट भी मुझको होने लगे हैं, जूते भी 
    कि पड़ोस का बच्चा मुझे अंकल कह बुलाने लगा है 

    तुम खोलो ना राज़ 
    कि किस लोहे ने तुम्हारी तर्जनी खायी थी
    कि दादी के बाद वो कौन है जीवित गवाह
    जिसने तुम्हें हँसते देखा था आखिरी बार
    (अब तुम्हारा गिरेबान पकड़ कर पूछता हूँ)
    बाकी साल तो रहने दिया 
    पर मुंह फेरने से पहले यह तो बता दो
    कि पचहत्तर, चौरासी, इक्यानवे, सत्तानवे और निन्यानवे में कौन - कौन सा इंजन तुमपे गुज़रा ?

    आओ ग्लास में उडेलें थोड़ी सी शराब
    और करें बातें ऐसी कि जिससे खौल कर गिर जाए शराब.

    क ओर कवि निखिल आनंद गिरि भी अपनी विशिष्ट  मौलिकता के संग  संबंधो के कई   जटिल व्याकरणों पर अपनी माइक्रोस्कोप धरते  है ....ओर  आहिस्ता से आदमी के भीतर सेंध लगाते है .उनकी कविता "रात चाँद ओर आलपिन '..ऐसे एक शोट का क्लोज़ अप लेती है 
     इस कविता को पढ़ते हुए  आप जान जाते है ....स्त्री को समझने का एक चौकन्नापन उनके भीतर मौजूद है ......


    अभी बाक़ी हैं रात के कई पहर,
    अभी नहीं आया है सही वक्त
    थकान के साथ नींद में बतियाने का....
    उसने बर्तन रख दिए हैं किचन में,
    धो-पोंछ कर...
    (आ रही है आवाज़....)
    अब वो मां के घुटनों पर करेगी मालिश,
    जब तक मां को नींद न आ जाए..
    अच्छी बहू को मारनी पड़ती हैं इच्छाएं...
    चांदनी रातों में भी...
    कमरे में दो बार पढ़ा जा चुका है अखबार....
    उफ्फ! ये चांदनी, तन्हाई और ऊब...
    पत्नी आती है दबे पांव,
    कि कहीं सो न गए हों परमेश्वर...
    पति सोया नहीं है,
    तिरछी आंखों से कर रहा है इंतज़ार,
    कि चांदनी भर जाएगी बांहों में....
    थोड़ी देर में..
    वो मुंह से पसीना पोंछती है,
    खोलती है जूड़े के पेंच,
    एक आलपिन फंस गई है कहीं,
    वो जैसे-तैसे छुड़ाती है सब गांठें
    और देखती है पति सो चुका है..
    अब चुभी है आलपिन चांदनी में...
    ये रात दर्द से बिलबिला उठी है....
    सुबह जब अलार्म से उठेगा पति,
    और पत्नी बनाकर लाएगी चाय,
    रखेगी बैग में टिफिन (और उम्मीद)
    एक मुस्कुराहट का भी वक्त नहीं होगा...
    फिर भी, उसे रुकना है एक पल को,
    इसलिए नहीं कि निहार रही है पत्नी,
    खुल गए हैं फीते, चौखट पर..
    वो झुंझला कर बांधेगा जूते...
    और पत्नी को देखे बगैर,
    भाग जाएगा धुआं फांकने..
    आप कहते हैं शादी स्वर्ग है...
    मैं कहता हूं जूता ज़रूरी है...
    और रात में आलपिन...





    किशोर .......वे रचनात्मक निर्वासन  की देहरी पर नहीं बैठते ..लिखकर अपने आप को एक्सटेंड करते है ..हिंदी ब्लॉग में उन जैसे लेखको की  उपस्थिति को मै आवश्यक मानता हूँ ..जिनके विम्ब उनके भीतरी शोर को ख़ामोशी से अभिव्यक्त  करते है

     चौराहा भीड़ से ऊबा हुआ था. चिल्लपों से थक कर उसने अपने कानों में घने बाल उगा लिए थे. वह किसी स्थिर व्हेल मछली की तरह था. सम्भव है कि उसे सब रास्तों का सच मालूम हो गया था और वह सन्यस्थ जीवन जी रहा था. इस सन्यास में देह को कष्ट दिये जाने का भाव नहीं दिखाई पड़ता था. कई बार ऐसा लगता था कि चौराहा वलय में घूर्णन कर रहे मसखरों और कमसिन लड़कियों की कलाबाजियां देखने जैसा जीवन जी रहा था. उसको किसी नवीन और अप्रत्याशित घटना की आशा नहीं थी. सीढ़ियों को अपनी ओर आते देख कर भी कौतुहल नहीं जगा.

    चौराहे ने एक लम्बी साँस भरी और खुद का पेट सीने में छुपा लिया. चौराहों और सीढ़ियों का भी सदियों पुराना रिश्ता था. चौराहों के माथे को खुजाने के लिए कनखजूरे इन्हीं सीढ़ियों पर चढ़ कर आया करते थे.
    चौराहे ने पीपल की ओर देखा. पीपल ने दलदल के पानी सोखू युक्लीप्टिस पेड़ों की ओर देखा. युक्लीप्टिस ने कौवों के पांखों में खुजली की. कौवों ने देखा कि बिना सीढ़ियों की छतें बहुत सुरक्षित दिखने लगी थी. मुंडेरों तक पहुँचने के लिए अब आदमी को आदमी के ऊपर खड़ा होना होगा.


    हते है भीड़ की स्मरण शक्ति कम होती है .ओर भारतीय समाज एक भीड़ जैसा ही है ....हम अपने जमीर के मैले होने का अक्सर जिक्र करते है पर उसे दुरस्त करने का प्रयास नहीं.....हम दरअसल अपनी सहूलियत से असूलो को चुनने वाले समाज की ओर बढ़ रहे है ....जहाँ विरोध सैदान्तिक नहीं होता है ...व्यक्ति ओर उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को देख कर तय किया जाता है ....राडिया टेप काण्ड ओर विकिलीक्स के खुलासे आहिस्ता आहिस्ता धुंधले पड़ने लगेगे ... सच के भी कई मुगालते होते है .....प्रसून वाजपेयी उन्ही मुगालतो पर बात करते है

    असल में राडिया के फोन टैप से सामने आये सच ने पहली बार बडा सवाल यही खड़ा किया है कि अपराध का पैमाना देश में होना क्या चाहिये। लोकतंत्र का चौथा खम्भा, जिसकी पहचान ही ईमानदारी और भरोसे पर टिकी है उसके एथिक्स क्या बदल चुके हैं। या फिर विकास की जो अर्थव्यवस्था कल तक करोड़ों का सवाल खड़ा करती थी अगर अब वह सूचना तकनालाजी , खनन या स्पेक्ट्रम के जरीये अरबो-खरबो का खेल सिर्फ एक कागज के एनओसी के जरीये हो जाता है तो क्या लाईसेंस से आगे महालाइसेंस का यह दौर है। लेकिन इन सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस तमाम सवालो पर फैसला लेगा कौन। लोकतंत्र के आइने में यह कहा जा सकता है कि न्यायपालिका और संसद दोनो को मिलकर कर यह फैसला लेना होगा। लेकिन इसी दौर में जरा भ्रष्टाचार के सवाल पर न्यायापालिका और संसद की स्थिति देखें। देश के सीवीसी पर सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल उठाया कि भ्रष्टाचार का कोई आरोपी भ्रष्टाचार पर नकेल कसने वाले पद सीवीसी पर कैसे नियुक्त हो सकता है। तब एटार्नी जनरल का जबाव यही आया कि ऐसे में तो न्यायधिशो की नियुक्ति पर भी सवाल उठ सकते हैं। क्योकि ऐसे किसी को खोजना मुश्किल है जिसका दामन पूरी तरह पाक-साफ हो। वही संसद में 198 सांसद ऐसे हैं, जिनपर भ्रष्टाचार के आरोप बकायदा दर्ज हैं और देश के विधानसभाओ में 2198 विधायक ऐसे हैं, जो भ्रष्टाचार के आरोपी हैं। जबकि छह राज्यो के मुख्यमंत्री और तीन प्रमुख पार्टियो के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और मायावती ऐसी हैं, जिन पर आय से ज्यादा संपत्ति का मामला चल रहा है। वहीं लोकतंत्र के आईने में इन सब पर फैसला लेने में मदद एक भूमिका मीडिया की भी है। लेकिन मीडिया निगरानी की जगह अगर सत्ता और कारपोरेट के बीच फिक्सर की भूमिका में आ जाये या फिर अपनी अपनी जरुरत के मुताबिक अपना अपना लाभ बनाने में लग जाये तो सवाल खड़ा कहां होगा कि निगरानी भी कही सौदेबाजी के दायरे में नहीं आ गई। यानी लोकतंत्र के खम्भे ही अपनी भूमिका की सौदेबाजी करने में जुट जाये और इस सौदेबाजी को ही मुख्यधारा मान लिया जाये तो क्या होगा।



    चलते चलते .

    मारी नैतिक  बैचेनी अपनी लक्ष्मण रेखा बड़ी चतुराई से चुनती है .....हम उन्ही  बहसों को हाईलाईट करते बुद्धिजीवियों के तर्कों को सुनते है जिन पर सार्वजानिक सहमति बन सके ...सवाल फफूंद लगे इस लोकतंत्र पर रेग्मार्क कर साफ़ करने का नहीं ....सवाल ये भी है के क्या कर्तव्यो को याद दिलाने की जिम्मेवारी इस देश में सिर्फ कोर्ट की है ?
    क्या हम वाकई एक आदर्श विहीन समाज की ओर बढ़ रहे है ....? सोच कर देखिये




    हम सभी को आत्म निरीक्षण की आवश्यकता है ....मीडिया को ही नहीं...आखिर समाज के विकास की भागेदारी सामूहिक ही होती है ..

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