गुरुवार, दिसंबर 02, 2010

चिट्ठाचर्चा को राशन की दुकान मत बनाइये

ब्लॉगिंग करने को फ़िर मन आया कई दिनों के बाद
पोस्टों पर बेमतलब टिपियाया कई दिनों के बाद
भाईचारे का भभ्भड़ देखा फ़िर कई दिनों के बाद
टिप्पणियों से खिल गयीं बांछे फ़िर कई दिनों के बाद।

यहां-वहां लड़-भिड़कर आया वो कई दिनों के बाद
भैया जी ने बेमतलब समझाया कई दिनों के बाद
नखरेवाली के नक्शे देखे फ़िर कई दिनों के बाद
बिना बात सबको हड़काया फ़िर कई दिनों के बाद । फ़ुरसतिया

चिट्ठाचर्चा बहुत दिन से नहीं हुई। इस बीच कई सा्थियों ने आग्रह भी किया करने का। विनीत कुमार ने कहा -चिट्ठाचर्चा को क्या आपने राशन की दुकान बना दिया दिया है कि महीने में सिर्फ़ एक ही दिन खुले। उधर हमारे डा. अमर कुमार ने चर्चाकारों को अभय दान देते हुये लिखा:
मेरे प्रिय चर्चाकारों, आप सब जहाँ कहीं भी हो, कृपया लौट आओ..
अब कोई तुम्हें उलाहना न देगा, यहाँ तक की मैं भी कुछ नहीं कहूँगा ।
कम से कम अपना कुशल मँगल देने तो आ ही सकते हो,
माना कि, इधर ढँग का कुछ भी नहीं लिखा जा रहा है,
लेकिन, चर्चाकार तो वही जो बिना विषय अपनी उड़ावै


इस बीच कानपुर के डा.पवन कुमार मिश्र ने भी कानपुर ब्लागर्स एसोसियेशन की शुरुआत और फ़िर एक हड़बड़िया मुलाकात करके लिखने का क्रम तोड़ने में भूमिका अदा की।

इस बीच देखा कि ब्लॉग जगत में तमाम परिवर्तन आये हैं। सतीश सक्सेना जी ने भाईचारे, इंसानियत और देशभक्ति के बाद सांप्रदायिक सद्भाव का काम भी हाथ में लिया और इस पर अच्छी पोस्टें लिखनी शुरू की हैं। उन्होंने जब भारत मां के मुस्लिम बच्चों के बारे में लिखा तो मुझे लगा आगे कभी भारत मां के पारसी, सिख, इसाई बच्चों से भी परिचय करायेंगे लेकिन वे तेलियार चले गये वहां तल्ख हो गये और फ़िर टिप्पणी के विवसता की बात करते हुये फ़ाइनली जवानी की बात करने लगे।

इस बीच मासूम जी ने अमन की बात करनी शुरू की और कुछ बेहतरीन लोगों की रचनायें अपने ब्लॉग पर पोस्ट की। जैसे देखिये इस्मत जी ने लिखा:

चंद हैं फ़ितना परस्ती की यहां ज़िंदा मिसाल
कहते कुछ हैं ,करते कुछ ,मक़सद कुछ इन का और है


इसके बाद के पैगाम आप यहां देख सकते हैं।

सतीश सक्सेना जी ने मासूम भाई सुझाया कि वे अनूप शुक्ला से भी अमन का पैगाम लिखवा लें। मुझे लगा कि शायद सतीश जी अमन में हमारे मसखरेपन को शामिल करवाना चाहते हैं। हम कोई पैगाम देंगे तो लोग भले न हंसे हमको खुद हंसी आयेगी कि हम भी पैगाम देने लगे।

यह भी हो सकता है कि सतीश जी ने व्यंग्य लिखना शुरू किया है उसी की कड़ी का कोई कमेंट हो यह कि अनूप शुक्ला से अमन का पैगाम लिखवाया जाये। :)

इस बीच देखा सतीश पंचम पूरी तन्मयता के साथ शब्दों को लम्बा करने में लगे हैं। इस बारे में विस्तार से फ़िर कभी लेकिन यह उनकी रेलवे शौचालय कथा देखिये।

फ़िलहाल इतना ही। अभी तो दुकान खोली है अब क्या पता नियमित ही हो जाये कुछ दिन के लिये।


ऊपर वाला फ़ोटो पिछले दिनों कलकत्ता प्रवास के दौरान एक सुबह का है। बाकी के चित्र देखना चाहें तो इस कड़ी पर देख सकते हैं http://www.facebook.com/album.php?aid=85630&id=1037033614&l=3692c2e1d6

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43 टिप्‍पणियां:

  1. अनूप शुक्ला जी सतीश भाई तो हर नेक काम मैं हाथ बांटने आ ही जाते हैं, यह तो उनकी इंसानियत है. मुझे यकीन है आप बहुत कुछ सदेश दे सकते हैं अमन और शांति पे. मैं भी आप से आग्रह करता हूँ, यदि समय मिले तो कुछ कहें. ख़ुशी होगी.

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  2. दुकान खुल गयी हैं हम हाज़िर हैं

    आदत के अनुसार आपत्ति के साथ

    सारी पोस्ट केवल और केवल अपने बड़े भाई के ऊपर ही लिख दी और दूसरो को आप ने शायद नहीं पढ़ा !!!!

    कभी आप बड़े भाई कहलाते थे अब वो आप के भी बड़े भाई हैं यानी अँधा बांटे ...................

    "भाई" शब्द आज कल ज़रा डर ज्यादा पैदा करता हैं !!!!!!!

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  3. दूकान खोलने के लिए आपको धन्यवाद और सबको बधाई.
    आपको प्रणाम!

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  4. सिर्फ दुकान
    बंद करके कान
    कान भी खुले रखें
    हमें मालूम हैं
    सबके दुई कान हैं
    जो तीसरा कान है
    उसकी महिमा अपरंपार है
    और अब चौथा कान
    ब्‍लॉगदुनिया के रूप में विद्यमान है
    छिपी हुई कलियों यानी छिपकलियों का कहना है कि बिन बोले अब मुझे, नहीं कहना है

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  5. आपका साथ अभिभूत करने वाला था अगली बार फुर्सत से ही आउंगा.
    ब्लोगिंग विचार अभिव्यक्ति का मंच है. साहित्यिक चर्चा का २१ वी सदी में माध्यम है. आपने सही कहा था इंसान अपनी अच्छाइयो और बुराइयों के साथ लिखता है. फिर भी यह कोशिश होनी चाहिए कि राशन की दूकान मोहल्ले में रहे.
    आभार

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  6. @मासूम भाई, अमन की बात हम कहेंगे तो सच में ब्लॉगहंसाई होगी। इत्ते अच्छे-अच्छे लोग लिख रहे हैं उनके साथ हमारा लिखा रखेंगे तो सच्चे अमन पसंद लोग आपसे बिदक जायेंगे। हमारी शुभकामनायें आपके साथ हैं।

    @ रचना जी, हमने अभी लिखना शुरू ही कहां किया है। अभी तो बस दुकान का ताला खुला है। आपका एतराज तो इस तरह है कि ताला खुलते ही धांधली का आरोप लगा दिया जाये। और फ़िर सतीश भाई की पोस्टों का जिक्र हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा?

    @ शिव कुमार जी, आप बधाई और प्रणामी से फ़ुरसत पाकर जरा एकाध चर्चा काउंटर देखिये। बहुत काम पड़ा है। सब निपटाना है।

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  7. ताला खुल गया हैं और खुलते ही धंधला शुरू , "भाई" शब्द ,सार्थक परमार्थक और निरर्थक
    आप कैसे भाई हो जी और आप के भाई कौन से भाई हैं जी इस पर दूकान कि सफाई इत्यादि हो जाए तो बता दे । बहुत दिन बंद रही हैं जाला लग गया होगा । बोर्ड तो पहले जब खुली थी तभी चोरी होगया था वो तो भला हो कुश का नया रंग पेंट दिया वरना सड़क पर तो आ ही गए थे "भाई" लोग
    सो अब खुला रखे और चौकीदार भी रख ही ले
    हम प्रणाम कहना भूल गये थे सो प्रणाम

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  8. दुकान में क्या क्या माल मिलेगा? ये तो बताया नहीं।

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  9. हम टिप्पणी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले गरीब ब्लोगरों को कितना राशन मिलेगा|

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  10. अनूप भाई !
    ब्लॉग जगत में निर्मल हास्य या तो है ही नहीं या लोगों को हँसना नहीं आता , आपके अतिरिक्त सिर्फ ताऊ रामपुरिया को मैं इस श्रेणी में पाता हूँ !

    यकीन करें ( कर लो यार ) जब भी हिंदी ब्लॉगजगत में व्यंग्य रचनाओं की बात होगी, अनूप शुक्ल अवश्य ही शीर्ष में होंगे !
    सुना है शिव कुमार मिश्र आपसे मिलने से, बचने के लिए कलकत्ते से भाग गए और जब तक नहीं लौटे जब तक आप वहां से चले नहीं गए ???

    मज़ा आ गया सुनकर शिव भैया को बधाई कि वे अनूप भाई को झेलने से बच गए ! ;-))

    हो सके तो एक बार दिल्ली आने की सहमति दो ! पिछली बार की तरह नहीं कि चुपचाप अपने खास मित्रों से मिलकर चले गए.... कुछ ब्लॉगजगत के चर्चित मित्रों के साथ बैठेंगे ..चाय वे पियेंगे ! आशा है बात मान जाओगे ! भरोसा रखना ..शिव जी की तरह अकेला छोड़ भागेंगे नहीं... :-), वैसे उन्होंने ऐसा किया क्यों ...

    कुछ प्रकाश डालिए न आपके पास तो बड़ी टार्च है ??

    बहुत कम लोग हैं जो पत्थर खा कर भी अपने ऊपर व्यंग्य (वास्तविक अवास्तविक पता नहीं ...) लिखने का सफल प्रयत्न करें ! और पत्थर हँसते हुए सह लें !

    हार्दिक शुभकामनायें !

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  11. यहां-वहां लड़-भिड़कर आया वो कई दिनों के बाद
    भैया जी ने बेमतलब समझाया कई दिनों के बाद
    नखरेवाली के नक्शे देखे फ़िर कई दिनों के बाद
    बिना बात सबको हड़काया फ़िर कई दिनों के बाद । फ़ुरसतिया

    मज़ा आ गया अनूप जी फुरसतिया टाइप कविता पढ़कर . अच्छा हुआ आपने दुकान खोल ली. अब राशन बटना भी शुरू होगा.

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  12. फोटो चर्चा से ज्यादा अच्छा है ......


    ओर हाँ आपकी आमद सुखद है !!!!!

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  13. अनूप भाई !
    ताला खुलते ही रचना दी पंहुची सामान खरीदने और दूकान में जला लगे होने की शिकायत करते हुए माल भी नहीं ख़रीदा ! अब क्या करोगे ....
    बोनी ख़राब हो गयी ! तीर्थयात्रा पर दिल्ली आ जाओ ! मुझ पर भरोसा रखें !
    सादर आपका
    भाई ( लोगों को यहाँ भी तकलीफ है ....दोस्त कहना कैसा लगेगा ?? :-)) )

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  14. अनूप जी आपने अच्छा किया जो राशन की दुकान खोल दी क्योकि जीने के लिये राशन जरूरी ही नही अनिवार्य है ।
    और आपकी राशन की दुकान मे तो हमेशा सेहतमंद सामान(स्वस्थ रचनायें)ही मिलती हैं जिनके बहुत से लोग तलबगार है ।

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  15. कहाँ सुत्तल थे महाराज...

    न ब्लॉग पर ना इधर ... आखिर हुआ क्या था ? चलिए.. अब शुरू कीजिये फिर से... हमारा भी इधर उधर झाँकने का रोशनदान कोहरे में कुछ दब सा गया था... शायद अब खुल जाए :)

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  16. वाह अनूप जी ,
    बड़ी तेज़ नज़रों से ब्लॉग्स का निरीक्षण करते हैं
    बहुत दिनों बाद नज़र आए लेकिन आए अपने मख़सूस अंदाज़ में,
    अपनी चर्चा में मेरा शेर शामिल करने का शुक्रिया,हालांकि डर भी लग रहा है कि हो सकता है कि कहीं ये आप का व्यंग्य न हो

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  17. @ सक्सेना ज़ी,

    मैं अनूप ज़ी से बचकर इसलिए कलकत्ता छोड़ गया क्योंकि कलकत्ते के अपने पिछले तीन दौरों के दौरान (सरकारी अफसर के लिए ही दौरा शब्द का आविष्कार हुआ है) उन्होंने मुझे एक बार भी महान नहीं बताया. न तो मुझसे व्यक्तिगत तौर पर कहा और न ही अपने ब्लॉग पर लिखा. अब आप ही बताइए, डेढ़ वर्ष से ज्यादा के इन्जार के बाद मेरा धैर्य जवाब देगा कि नहीं? तीन वर्ष से ज्यादा ब्लागिंग करने का क्या फायदा जब कोई एक बार भी महान न कहे? ऐसी ब्लागिंग का क्या फायदा?

    जितनी बार अनूप ज़ी कलकत्ते आते, घर के लोग़ भी पूछते; "इस बार महान कहा कि नहीं उन्होंने?"

    और जब मैं ना में जवाब देता तो वे ऐसे देखते जैसे कह रहे हों; "इससे अच्छा तो यह होता कि सक्सेना ज़ी ही एक बार कलकत्ते आ जाते. पहली बार में ही महानता का सर्टिफिकेट थमा जाते तुम्हें."

    मैं यह सोचता कि जब मेरे बड़े भाई ने मुझे महान नहीं कहा तो उनके बड़े भाई मुझे महान कैसे कहेंगे? आखिर सरकारी अफसरों की बात है. सबकुछ थ्रू प्रोपर चैनल ही तो होगा?

    खैर, मैंने कलकत्ता छोड़कर जाने का कारण बता दिया है.

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  18. पिछली टिप्पणी से आगे...

    @सक्सेना ज़ी,

    आपको प्रणाम!!

    (पिछली टिप्पणी में प्रणाम करना भूल गया था..)

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  19. सतीश सक्सेना जी बेशक अपने को जवान कहते हो पर भारतीये संस्कृति कि परम्परा निभाते हुए अपने से कम और समान आयु वाली ब्लॉगर को माँ और दीदी के संबोधन से ना नवाजा करे । सार्वजनिक स्थल पर रिश्तो के प्रदर्शन से एक गुट का आभास होता हैं जिस को वो परिवार कहते हैं । आभासी दुनिया मे महान / माँ / दी उनको कहे जो इनकी कद्र करते हो हम ठहरे परम्परा भंजक सो परमपराओ के बोझ से मुक्त रखे

    अनूप जब नॉएडा मिलने सतीश से गए थे { चित्रों के माध्यम से पता चला } तो हम भी शिव जी कि तरह उनसे नहीं मिले पर हम महान नहीं कहलाना चाहते थे इस लिये नहीं मिले

    सब को प्रणाम पहुचे

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  20. वाह अनूप भाई क्या बात है.. !
    इतने दिनों बाद दुकान खुली देखकर बहुत ख़ुशी हुई.. रचना दी का कहना भी ठीक है.. गौर करिए
    वैसे महान तो आपने हमें भी नहीं कहा.. कुछ ना कुछ तो करना पड़ेगा..

    प्रणाम!!
    (इसी टिपण्णी में प्रणाम करना याद है)

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  21. @ रचना ,
    हम नहीं मानते ...
    अनूप भाई के शब्द कहूं तो कल्लो जो कन्ना हो....
    हटो जब मस्ती में होंगे तो रचना दी ...जब गंभीर होंगे तो रचना और जब तुमसे प्यार की उम्मीद करेंगे तब माँ भी कहेंगे ...
    हमारी भावनाएं तो ऐसी ही हैं रचना दी अब तुम नाराज होगी तो वह भी सहेंगे....

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  22. चलिए शुकर है ताला तो खुला अब उम्मीद है माल भी अच्छा मिलेगा.बहुत दिनों से बंद दूकान देख कर कोफ़्त होती थी.

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  23. देख रहा हूँ कि दूकान उसी फॉर्म में चल भी रही है ! सब चुस्त-दुरुस्त-चकाचक ! वैसी ही सदाबहार लोकपावन बहसें , विशेषतः टीपों में देखने को मिलीं !

    वैसे आज आपकी दोनों पोस्टों में विषय की एकता से लगा कि लंबा अंतराल भी विषय का वैविध्य लाने में सक्षम नहीं होता ! आभार !

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  24. @ शिव भाई ,

    तब तो आपकी नाराजी बिलकुल जायज़ है , वैसे मैं तो अभी महान कहे देता हूँ भैया, यहाँ सर्टिफिकेट बांटने में खुला दिल है हालांकि कई बार बड़े भाइयों ने मज़ा भी चखा दिया !

    रचना दीदी से आज एक नयी बात मालूम पड़ी कि अनूप शुक्ल मुझसे मिलने नॉएडा आये थे ! यह अनूप भाई ने कभी बताया ही नहीं !
    सुकुल जी के शब्दों में कहूं तो धन्य हो गए हम ...अब तो यकीनन बड़े ब्लॉगर बन गए :-))

    अब आज और कमेन्ट करने का मन ही नहीं है इस ख़ुशी के कारण पाँव जमीन पर ही नहीं पड़ रहे !

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  25. ओफ्फो मैं भी भूल गया .... :-(
    प्रणाम शिव भैया को..
    प्रणाम रचना दीदी को ...मुझे पता है तुम प्रणाम नहीं लेने वाली मगर करना जरूरी है ब्लागिंग के लिए !
    अनूप दादा से आशीर्वाद कि चाह है...मगर इनकी मुस्कराहट देख डरता हूँ......
    जय हो

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  26. भाई साहब,

    अगर फ्री की राशन मिलती तो बना कर देखने में भी क्या हर्ज था भला, मगर ....!!

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  27. ई चर्चा पढ़ने में समय का खर्चा ज्यादा हो गया । टीप दर टीप भी बाचना पड़ा। लगता है फुरसतिया के आते ही सब बेचैनिया गए!

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  28. प्रणाम टू तमाम .

    कहीं औरों की तरह मैं भी प्रणाम करना भूल न जाऊँ सो मैं सबसे पहले प्रणाम ही कर लेता हूँ एक को नहीं बल्कि सबको ।

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  29. फीड सुना सुना लग रहा था बहुत दिनों के बाद एक पोस्ट दिखी है आज. दूकान रेगुलर होनी चाहिए. प्रणामपंथ का बड़ा व्यापक असर दिख रहा है :)

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  30. अच्छी पोस्ट,सुन्दर प्रस्तुति ! अंदाजे बयान भी लाजवाब !

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  31. देखिये, आप लोग बहुत मिट्ठी मिट्ठी बातें कर रहे हैं एक दूसरे से। एकाध टिप्पणी में तो व्यंग्य विधा के जानकारों की जानकारी पर ही सवाल उठाया गया है। इस तरह से ज्यादा मिट्ठी मिट्ठी बातें करने से कहीं डायबिटीज न धर ले। फिर दौड़ते रहियेगा बाबूराव गणपतराव आपटे की तरह बाथरूम....ससुरा आधा जिनगी गुगल के द्वारा उपलब्ध 'सुलभ ब्लॉगर केन्द्र' में ही दौड़ते दौड़ते गुजर जायेगा। इस लिये थोड़ा सा खटपना बनाये रखिये :)

    और हां, व्यंग्य विधा के लिये एकाध कोचिंग ओचिंग की शुरूवात करवानी हो तो द ग्रेट भ्यंगकार सिरी छप्पन जी 'अजोर' से सम्पर्क करें। आजकल हर जगह अजोर करते, उजाला करते दिख जायेंगे। जहां कहीं ब्लॉगजगत में उजाला दिखे तो समझ जाइये वहीं कहीं सिरी छप्पन जी 'अजोर' होंगे :)

    प्रणाम. . . . . 'n' times :)

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  32. हम तो सभी प्राणमिऑ को प्रणाम करके जा रहे हैं !
    जय हो !

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  33. हा हा हा! आप की दुकान का ताला खुल गया, दुकान सजा लीजिए फ़िर माल खरीदने आ जायेगें। वैसे आज आप की पोस्ट से ज्यादा शिव जी का जवाब मजेदार रहा। शिकायत करने वालों की लाइन लंबी होने वाली है जिन्हें महान होने का सर्टिफ़िकेट नहीं मिला। आखिर सीनियोरटी के हिसाब से महान कहलाना ब्लोगसिद्ध अधिकार है, उससे आप ने सब को वंचित कर रखा है।

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  34. ` सार्वजनिक स्थल पर रिश्तो के प्रदर्शन से एक गुट का आभास होता हैं '

    हम सहमत है... और वह भी भाई के सम्बोधन से... ऐसा लग्ता है जैसे हाजी मस्तान और दाउद भाई बात कर रहे हों :)

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  35. thank god... दुकान खुली तो...यहां तो राशन के लाले पड़ गये थे.सुन्दर चर्चा.

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  36. महागुरुदेव,
    इस दुकान पर बादाम रोगन भी मिलता है क्या...

    जय हिंद...

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  37. a chotu itthe-kitthe ......... dos, jara ot me rehne de .... nahi-nahi .... chal-chal .......
    nikal le yahan se .... kyon .... bette dekh nahi
    raha bare bhai logan ki-batchit chal rai hai....
    koi bat nahi ... chala jata hoon ..... bas aaya
    hoon to kam-se-kam pranam to kar loon....ab pitega
    bachhe ... dekh nahi raha ..... kaise sab
    ek-doosre ko parnam phenk rahe hai .... tere
    wale to koi dekhega bhi nahi ... bara aaya hai..
    chal nikal-phoot yahan se....

    thik hai jata hoon katar bhrastachar ke karan
    titar-bitar ho gaya hai ... kal phir line lagaunga......

    jinko dil kare asirwad dai dena.....

    उत्तर देंहटाएं
  38. .
    वाह, क्या चहल पहल है, क्या हिलोर है
    क्या किलकारियाँ और क्या कल्लोल हैं ?
    बाबा हरसित भये.. फुर्रर्र होते फुरसतिया मुँडेरी पर मँडराये ।
    श्री अनूप जी, धन्यवाद दो शीब भाई को, जो अबकी बचा ले गये
    प्रणाम की लाज़ बचाने को आपके बदले खुद फरारी के दिन काट आये
    यह भले लिखो, चर्चा-योग्य पोस्ट आउट आफ़ स्टॉक है,.. लेकिन चर्चा पर अब कोई पोस्ट आइँदा ब्लैक में न लगाना !
    चिट्ठा चर्चा हिन्दी चिट्ठामंडल का अपना मंच है ।
    इसके सभी पाठक आपकी ज़मानत लेने वाले बेनामी का शुक्रिया अदा करते हैं ।

    उत्तर देंहटाएं

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