शनिवार, मार्च 23, 2013

शहीद दिवस, अर्थ आवर और होली का हुड़दंग

 धूल के कण रक्त से धोए गए हैं,
विश्व के संताप सब ढोए गए हैं।
पांव के बल मत चलो अपमान होगा,
सिर शहीदों के यहां बोए गए हैं। 
-स्व.राजबहादुर’विकल’
 
आज शहीद दिवस है। आज के ही दिन सन 1931 को कांत्रिकारी भगत सिंह और उनके साथियों को फ़ांसी की सजा सुनाई गयी थी। आज कई साथियों ने अमर  शहीदों को याद करते हुये पोस्टें लिखीं। महेन्द्र नेह ने शहीद भगत सिंह और उनके क्रान्तिकारी विचार के बारे में जानकारी दी। रेखाजी ने शहीदों को श्रद्धांजलि दी। युवा दखल के आशुतोष चंदन ने मीडिया द्वारा भगतसिंह के ग्लैमराइज किये जाने की  बात  कही:
दरअसल मीडिया भगत सिंह की जो रोमांटिक क्रांतिकारी वाली तस्वीर भुनाती है ,आज का युवा सिर्फ उसी से परिचित है । भगत सिंह से उसका मतलब फांसी के फंदे पर हँसते-हँसते झूल जाने वाला दिलेर है , जो इंकलाब ज़िन्दाबाद का नारा देता था । भगत सिंह से शहीद भगत सिंह तक की यात्रा से , भगत सिंह के इंकलाब के मायने से उनका दूर-दूर तक कुछ लेना देना नहीं है । इस अर्थ में वो सिर्फ उसे चेहरे को पहचानते है जो फिल्मी हीरोइज़्म से भरा हो । भगत सिंह के विचारों की सान से उसका कोई राबता नहीं ।
शहीद दिवस के मौके पर  ‘अर्थ-आवर’ मनाने को चोचला जैसा ही तो बता रहे हैं आशुतोष जब वे यह कहते हैं:
तो  ऐसे समय में, ऐसे युवाओं और ऐसे बौद्धिकों (?) के बीच हमें तय करना है कि हम ‘अर्थ-आवर’ “सेलीब्रेट” करती “इंडिया” के साथ हैं या शहीद भगत सिंह, शहीद सुखदेव, शहीद राजगुरु के भारत की जनता के साथ हैं ? महज़ 1 घंटे तक बिजली की बरबादी का रोना रोने वाले हैं या अपने अमर शहीदों की शहादत और उनके मकसद को याद करते हुये, अपनी ऐतिहासिक विरासत को जानने-समझने और  उन  सपनों पर बात करने वाले हैं जो भारत की ही नहीं पूरी दुनिया की बेहतरी के लिए ज़रूरी हैं ?..

भगतसिंह एक क्रांतिकारी के साथ-साथ विचारक भी थे। उनका लेख मैं नास्तिक क्यों हूं उनके द्वारा लिखे गये लेखों में सबसे चर्चित लेख है। इसमें उन्होंने ईश्वर के संबंध में अपने विचार रखते हुये लिखते हैं:
ईश्वर में विश्वास और रोज़-ब-रोज़ की प्रार्थना को मैं मनुष्य के लिये सबसे स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ। मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा हे, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया। अतः मैं भी एक पुरुष की भाँति फाँसी के फन्दे की अन्तिम घड़ी तक सिर ऊँचा किये खड़ा रहना चाहता हूँ।
बलिदान से पूर्व 20 मार्च 1931 भगतसिंह अपनी अन्तिम भेंट में भगतसिंह ने कहा था:
'अंगरेजों की जड़ हिल चुकी है, वे पन्द्रह सालों में चले जाएँगे, समझौता हो जाएगा, पर उससे जनता को कोई लाभ नहीं होगा, काफ़ी साल अफरा-तफरी में बीतेंगे, उसके बाद लोगों को मेरी याद आएगी'। 
भगतसिंह ने जो जीवन जिया वह आने वाली पीढियों के नायकों के लिये आदर्श बना।  जे.एन.यू. के छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे चंदशेखर, जो कि सीवान में एक जनसभा करते हुये  मारे गये , ने एक सवाल-जबाब के दौरान कहा था:
“हां, मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है- भगतसिंह की तरह जीवन, चेग्वेआरा की तरह मौत"
 आज के ही दिन पंजाबी के क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश भी शहीद हुए थे। पाश ने 23 शहीद दिवस के मौके पर शहीद भगत सिंह के लिये जो कविता लिखी थी वह उन पर भी लागू होती है:
उसकी शहादत के बाद

देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोगों ने 
अपने चेहरे से आँसू नहीं, नाक पोंछी 
गला साफ़ कर बोलने की 
बोलते ही जाने की मशक की 

उससे सम्बन्धित अपनी उस शहादत के बाद 
लोगों के घरों में, उनके तकियों में छिपे हुए
कपड़े की महक की तरह बिखर गया 

शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह
लेकिन ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था
शहीद दिवस के मौके पर शहीदों को विनम्र श्रद्धांजलि।

आज सफ़लता के मायने क्या रह गये हैं इसका इशारा करते हुये चंद्रभूषण लिखते हैं:मेरी कोई सलाह तुम्हारे काम की नहीं
उपमा में नहीं, सच में हम दो अलग-अलग दुनियाओं में हैं।

कैसे कहूं,
मुझे डर लगता है, जब देखता हूं तुम्हें किसी मंजिल के करीब।

क्या तुम कीचड़ में धंसते चले जाओगे?
गढ़ डालोगे इसका ही कोई सौंदर्यशास्त्र?

या कि कांटे छेद डालेंगे
शरीर के साथ-साथ तुम्हारी आत्मा भी?                                                                                                               

शहीद दिवस और अर्थआवर से अलग संतोष त्रिवेदी होली में हुड़दंग मचाते दिखे:




  
संतोष त्रिवेदीहोली में देकर दगा,गई हसीना भाग ,
पिचकारी खाली हुई ,नहीं सुहाती फाग !!
नहीं सुहाती फाग,बुढउनू खांसि रहे हैं,
पोपले मुँह मा गुझिया, पापड़ ठांसि रहे हैं।
अखर रहे पकवान,नीकि ना लगै रंगोली।
चूनर लेती जान, कहे आई अस होली।।
 इस हुड़दंग से  अलग संतोष त्रिवेदी के गुरुजी को अपना मनपसंद विषय मिल गया तो उस पर उन्होंने अपनी राय ठेल दी और सेक्स की सही उम्र की जानकारी दे दी!

उधर डा.दराल को  ब्लॉग लिखने के लिये आइडिया ही नहीं मिल रहा वे लिखते हैं:
जोर लगाने पर भी कोई आइडिया नहीं आ रहा जिस पर कुछ लिखा जाये। ठीक वैसा हाल है जैसा  किसी प्रोस्टेट के मरीज़ का होता है कि पेशाब करने के लिए  जितना जोर लगाओ उतना ही अवरुद्ध होता है।
हमारी शिकायत इससे एकदम उलट रहती है। हमारे पास इत्ते आइडिया रहते हैं कि उन पर अमल न होने पर वे भुनभुनाते रहते हैं और कहते हैं:
 हम पर फ़ौरल अमल किया जाये। आप हमारे सेवक हैं। अगर हम पर अमल न हुआ तो हम फ़ौरन अनशन पर बैठ जायेंगे। आमरण अनशन कर देंगे।
 वैसे ब्लॉग और फ़ेसबुक की रगड़-घसड़ पर कल ही हमारे फ़ेसबुक मित्र अजय त्यागी ने अपनी दीवाल पर लिखा:
ये ब्लाग वाले फेसबुक वालों की लाईक-कामेंट संपन्नता देख-देखकर इतना जलते क्यों हैं। जब देखो कोई ना कोई पीछे पडा रहता है.....:)
 वैसे खुशदीप ने एक डायनासोर की डरावनी फोटू अपने ब्लाग पर लगाकर स्टेटस लिखा था:
हिंदी ब्लॉगर और डॉयनासोर...कुछ कुछ मिलता ही मामला है...जब डॉयनासोर्स ने बढ़ते बढ़ते अति कर दी थी तो दुनिया से विलुप्त हो गये...बस उनके जीवाश्म (फॉसिल) ही रह गए...कहीं ब्लॉगर्स के साथ भी तो ये नहीं हुआ...

लेकिन अपन को ब्लॉग और फ़ेसबुक की लड़ाई नहीं करवानी। सो अपने न दोनों का गठबंधन करा दिया और ब्लॉग के कमेंट फ़ेसबुक पर तथा फ़ेसबुक के ब्लॉग पर जाने की सुविधा लगा ली। धन्यवाद रवि रतलामी और हमारे दफ़तर के सुबि सैमुअल जिनके प्रताप से यह सुविधा लग गयी।

मेरी पसंद

घोसले में आई चिड़िया से
पूछा चूजों ने,
मां आकाश कितना बड़ा है?

चूजों को 
पंखों के नीचे समेटती
बोली चिड़िया
सो जाओ
इन पंखों से छोटा है।

-रामकुमार तिवारी

और अंत में

आज के लिये फ़िलहाल इतना ही। बाकी फ़िर जब मन आयेगा। तब तब मजा करिये।

नीचे का चित्र देवेंद्र पांडेय 'बेचैन आत्मा’ के ब्लाग से। इसका परिचय देते हुये लिखते हैं:
सूर्योदय का समय है। एक आदमी बैठकी लगा रहा है। एक ध्यान मग्न है। एक जाल समेट रहा है, पंडित जी गंगा स्नान को जा रहे हैं और एक स्त्री घाट किनारे बैठी है। दूसरा चित्र और उसका विवरण उनके ब्लॉग पर देखिये।

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8 टिप्‍पणियां:

  1. कुल मिलाकर जब वैसा जी नहीं रहे तो सिर्फ जन्मदिन भर से याद कर लेने से क्या होगा? हम पूर्णतः भ्रष्ट होने की कगार पर हैं। औरों को आपत्ति हो सकती है लेकिन अगर मैं अपनी ही बात कहूं तो इस भौतिक युग में सुख, सुविधा के आगे आदमी हार खाया हुआ है। एक लिमिट तक ही ईमानदारी रख पाते हैं, वो भी अपनी सुविधानुसार।
    शरीर, मन और ज़मीर इतना ढीठ बन चुका है कि जन्मदिन या कुछ ऐसे मौकों पर दसियों पेज का ललित निबंध लिखा जा सकता है और आप यदि मुझे अनुबंध पर रखें कि रेडियो पर इसी थीम पर चार परिचर्चा, दो टी.वी. प्रोग्राम और तमात लीडिंग समाचार पत्र में साढ़े आठ सौ शब्दों का स्तंभ लिख कर दो इतने पैसे मिलेंगे तो हम यह भी कर देंगे।
    थोड़ा बुरा लगेगा मगर ये सच है कि आज ऐसे मौके बस दीप जलाने और सरकार के वित्तीय वर्ष में कुछ इस मद में भी रखे गए राशि को खर्च करना मात्र रह गया है।

    भगत सिंह बहुत आकर्षित करते हैं, बल्कि कहूं कि मेरे सिर चढ़ कर नाचते हैं। इतने कि आप उनके बारे में जितना सोचते जाएं आपकी हैरानी बढ़ती जाएगी। मात्र 23 साल और विचार और कर्म में इतनी गहराई। 'मैं नास्तिक क्यों हूं' को पढ़ने पर लगता है कहां ज़माना आगे बढ़ा है? फेसबुक, गूगल और ओरेकल कंपनियों में तनख्वाह और सुविधाएं सही मिलने से नहीं होगा। आप अपने काम में भी भगताइयत ला सकते हैं। राइटर लेखन में बगावत लाएं से लेकर जो जिस पेशे से जुड़ा है उसमें वो बागी बन सकता है।
    मेरा मंटो उसकी किताब अपने घर में रखता था। एक जीवन का बागी था एक साहित्य का। कथाकार संजीव के वो आइडियल हैं।

    अंतिम समय में तोल्सतोय ने र्गोकी कहा था - इतना लिख गया मगर कुछ नहीं हुआ, दुनिया पहले की अपेक्षा खराब ही हुई है, फिर भी...... ’’

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  2. कोई बोले राम राम -- कोई शिवाय ! हमें तो दोनों सुहाय।
    गुरु भी सही , चेला भी सही। :)
    टिप्पणियां स्वैप करने वाली बात तो क्रन्तिकारी है।

    शहीदों से प्रेरणा लेने के लिए हमें बहुत गहराई में उतरना होगा।
    interesting and meaningful post .

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  3. फेसबुक के कमेंट ब्लॉग पर और ब्लॉग के कमेंट फेसबुक पर...वाकई फ्यूज़न का ये क्रांतिकारी प्रयोग है...

    जय हिंद...

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    1. @वाकई फ्यूज़न का ये क्रांतिकारी प्रयोग है.....

      theek hai na veerji.........'god particals' yahin se niklega........P:


      pranam.

      हटाएं

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