रविवार, मार्च 31, 2013

क्षण जो लिखित रूप में मौजूद हैं

दिन बढिया इतवार का, सबसे अच्छा यार,
सोओ देर तक तानकर, कोई न पूछनहार।

कोई न पूछनहार ,नाश्ता भी मिलता आराम से,
दफ़्तर तो जाना नहीं, व्यस्त रहो बेकाम से।

व्यस्त रहो बेकाम से, और हांको बातें लंबी चौड़ी,
पड़े रहो घर में अजगर से, छोड़ के भागा-दौड़ी।


-कट्टा कानपुरी

आज की शुरुआत कट्टा कानपुरी के इस कलाम से हुई।  नेट पर कालेज के साथी मिल गये अधीर सिंघल। उन्होंने याद दिलाया कि हम लोग हास्टल में वाल मैगजीन बोले तो भित्ति पत्रिका निकाला करते थे -नाम था सृजन। हर शनिवार की रात देर तक कागज में लिखते कुछ इधर-उधर की बातें और मेस के नोटिस बोर्ड पर सटा कर सो जाते। सुबह देर तक सोते रहते फ़िर जाकर देखते कि लोग हमारे लिखे को बांचकर कुछ कुछ-कुछ कमेंट करके जा रहे हैं। ये फ़ेसबुक की वाल भी हमें अपने अपने हास्टल की मेस का नोटिस बोर्ड सी लगती है। जो मन में आये साट दो। जिसको जो कहना होगा कहेगा। अपने मन में मती रखो। वहां मेस में लोग कुछ कमेंट जबानी करते थे यहां फ़ेसबुक पर जबाबी कमेंट कीर्तन होता  है। जैसे देखिये हमारे इतवारी आराम के गुब्बारे में पिन चुभाते हुये बिहारी बाबू लिखते हैं:

अपनी किस्मत में कहाँ "कट्टा" सा आराम,
निकालेंगे अब काम पर लौटेंगे फिर शाम,
लौटेंगे फिर शाम, भले ही तुम हो अजगर,
हमरी छुट्टी खाय, पड़े रहना तुम घर पर!!

 बहरहाल चलिये अब आपको बताते हैं एक ब्लॉग के बारे में ! ब्लॉग का नाम है क्षण! जो लिखित रूप में मौजूद हैं ब्लॉग की मालकिन हैं बनारस की रहने वाली और सम्प्रति इलाहाबाद  विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म और मासकॉम की पढ़ाई कर रही हैं। जैसे कि बुद्धिजीवी लोग होते हैं वैसे ही स्वभाव से आलसी हैं। अपने आसपास की घटनाओं को सहज और संवेदनशील ढंग से धर देती है अपने ब्लॉग में। हमको उनका लिखा पसंद आता है सो तारीफ़ कर देते हैं। इस पर  अनामिका का कहना होता है -खाली तारीफ़ मत करिये, कमी भी बताइये। अब भला हम क्या कमी बतायें जब कुछ दिखे तब न। 

अच्छा छोड़िये इधर-उधर की। अब आइये आपको अनामिका के ब्लॉग पोस्टों की कुछ झलकियां दिखाते हैं। शुरुआत करते हैं उनके मकान मालिक के किस्से से। उनकी आपसी बातचीत आपै देखिये:
महिनें में कई दिन ऐसे होते है…जब सुबह मकान मालिक से लड़ाई होती है….शाम को हमें बिजली से मुक्त कर अपने छोटे लड़के से लालटेन भेजवाते है … ना जाने कौन सी करामात करके रात को नल से पानी ही गायब कर देते हैं …..इतने नखरे झेलने पड़ते है मक्कान मालिक के…
.एक दिन अप्पन को गुस्सा आ गया…और पूछ ही लिया…क्यों यार अंकल जी क्यों माता-पिता की लाडलियों पर आप जुल्लम कर रहे हैं आप जी….तो कहनें लगे सुबह इत्ते देर से उठती हो तुम लोग….फिर दांत माजने में इत्ते टेम लगते है…तब तक तुममें से कोई फटाफट उत्तर देकर मिस इंडिया का ताज लेकर दरवज्जे पर आ जाये…
बाकी का पता नहीं लेकिन ये  देर तक दांत मांजने वाली बात सही लगती है। क्योंकि अनामिका आलस को अपना स्वाभाविक मित्र बताती हैं। 

लाईफ़बॉय है जहां में अनामिका अपने बचपन के लाईफ़बॉय से साफ़  होने और तन्दुरुस्त होने  के किस्से बताते हुये इस  साबुनिया झांसे की तरफ़ इशारा करती हैं:
लेकिन कैसे भी करके हम इसी साबुन से नहा कर तंदुरुस्त हुए….. तब तक यह बस नहाने का ही साबुन था…और हाथ धोने के लिए रिन साबुन के टुकड़े रखे जाते थे….लेकिन कुछ समय बाद लोग गमगमाने वाली किसी साबुन की तरफ आकर्षित हुए उस समय मुहल्ले के कई घरों में टेलिविजन आ चुका था….औऱ लोग सोनाली वेंद्रे के साबुन को घसने के इच्छुक हुए…औऱ घर के साबुनदानी मे खूशबुदार निरमा का निवास हो गया… .कुछ दिनों बाद नीबू की खूशबु वाला सिंथॉल भी आया…औऱ लाईफ़बॉय को लोगों ने हाथ धोने का साबुन बना दिया….तब तक लाईफ़बॉय का हैण्डवॉश विकसित नही हुआ था….और ऐसा लगता है कि लोगों से प्रेरित होकर ही हिन्दुस्तान यूनिलीवर नें लाईफ़बॉय का हैण्डवॉश परोसा….. और टेंशनियाकर कुछ दिन बाद लाईफ़बॉय में भी खुशबू झोंक दिया…साबुन के रैपर को नया रुप दिया…
सब्जी वाली भौजाई अनामिका की एक बहुत संवेदनशील पोस्ट है इसकी शुरुआत देखिये :
किसी ठकुराईन से कम नहीं लगती है वह सब्जी वाली …वुमेन हास्टल के पास वाले चौराहे पर दिन ढलते ही ठेले पर सब्जियों को करीने से तैयार करती है..जैसे मां अपनें ब्च्चे को स्कूल भेजनें के लिए रोज तैयार करती है.. सब्जियों को सजाते वक्त उसके हाथ की लाल चूड़िया हरी हरी सब्जियों के बीच ऐसे इठलाती है मानों सावन में कोई फसल पर कर लाल पड़ गयी हो…लेकिन वह कभी ध्यान नहीं देती अपनी सुंदरता पर..वह तो सब्जियों को सजानें में व्यस्त रहती है…और हमेशा अपनें को एक सब्जी वाली ही मानती है…
आगे वे लिखती हैं सब्जी वाली भौजाई के बारे में:
शाम होते ही हास्टल की लड़कियों से घिर जाती है वह..हंसते बोलते बतियाते हुए सब्जी तौलती है…देखनें में ऐसा लगता है जैसे फागुन में कई सारी ननदों नें मिलकर भौजाई को घेर रखा हो…लेकिन कुछ तो है उसके अंदर जो लोगों को अच्छा लगता है…चाहे वह सब्जी तौलते-तौलते उसे छौंकनें की विधि बता दे..चाहे बिन मांगे मुफ्त के हरे धनिया मिर्चा से विदाई कर दे..चाहे पैसे कम पड़नें पर कभी और लेने का हिम्मतपूर्ण वादा करवा ले…लेकिन कुछ है उसमें… उसके सरल और आत्मीय शब्दों में जो एक अजनबी शहर में अपनें मुहल्ले की चाची भाभी की हंसी ठिठोली का आनंद दिलाती है
एक लड़की नाजियाकी दास्तां बताती हैं अनामिका इस पोस्ट में:
बीस साल की उम्र पूरी करते बच्ची की तरह दिखने वाली एक लड़की की गोद में खुद एक बच्ची आ गई…जो संपूर्ण औरत बन गई थी…लेकिन अभी भी वह लड़ रही थी अपनें ससुराल वालों से कि उसे पढ़ाया जाये…पहले तो वह इसलिए पढ़ना चाहती थी ताकि कुछ कर सके…लेकिन अब वह बेटी के लिए पढ़ना चाहती है ताकि कल को उसकी बेटी को उसका पति ये जवाब ना दे कि अपनें घर से ही अपनें पैरों पर खड़ा होकर क्यों नहीं आयी…
दिल्ली में हुई बलात्कार की घटना के बाद अनामिका ने अपने लेख मानसिकता की जय हो......में लिखा:
शहरों गांवों में चलनें वाले बस आटो पर गरीबों के बच्चे कंडक्टरी करते हैं…इस दौरान वे दारु पीना सीखते हैं फूहड़ और भद्दे भोजपुरी गानें सुनकर जवान होते हैं…अपनें मालिकों की अश्लील बातें सुनते हैं…अश्लील काम को देखते है…फिर इनको इतना तजुर्बा हासिल हो जाता है कि…बलात्कार जैसी घटना को अंजाम देना इनके बाएं हाथ का खेल हो जाता है….और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे कैसे उत्तेजित होते हैं ये हर वो मध्यमवर्गीय परिवार जानता है जो सिर्फ मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की का बलात्कार होनें पर मामले को हवा देता हैं…वरना रोज ही दलितों की बेटियां किसी ना किसी मालिक के हवस का शिकार बनती हैं…..पहले के समय में किसी का बेटा पुलिस दरोगा बन जाता तो बेटी का बाप अपनी बेटी के लिए वर के रुप में उसे लालटेन लेकर खोजता था……अब पुलिस दरोगा जिस तरह से बाप की बेटी को देख रहे हैं…पूरा देश जानता हैं
अनामिका के लेखन का अंदाज जैसा देखा-सुना वैसा लिखा वाला है। अपनी तरफ़ से नमक-मिर्च नहीं लगाती तो कड़वे सच को छिपाती भी नहीं। बलात्कार की बतकही में दिल्ली कांड के बाद की कहानी बताती हैं:
उनमें से एक लड़का जोर से अपनें दोस्तों पर चिल्ला रहा था…और कह रहा था.."साल्ले मना किया था तुझे न….अभी दिल्ली वाली लड़की के साथ बलात्कार हुआ है और सुना है मर भी गई है वो…कुछ दिन में सब शान्त हो जावेगा साल्ले तब तक के लिेए शरीफ बन जा बेटा आयी बात समझ में….और ये पुलिस भोंसड़ी के ना अप्पन का पहले कुछ उखाड़ी है ना ही आज उखाड़ती…अगर लड़की वाला बलात्कार का मामला पूरे देशवा में ना फैला होता..ये पुलिस वाले साले खुद रोज लड़कियां छेड़ते हैं और भोंसड़ी के आज हमीं को दौड़ाये हैं"…
सहज करुणा अनामिका के व्यक्तित्व का मूल भाव है। उनकी एक और संवेदनशील पोस्ट का अंश देखिये:
अपनी बातों पर मुझे हंसते हुए देखकर उनमें से एक ने कहा…जाने दो दीदी तुम्हारे पास फुटकर पैसे नहीं हैं तो…लेकिन हमारी एक फोटो ले लो….अम्मा जाती हैं…एक बड्डे से साहब के घर बर्तन माजने…उन्होंने अपनी लड़की का फ्राक मेरे लिए दिया है..आज वही पहिने हूं….तो हमार फोटो ले लो….. उनकी बातें सुनकर ना जाने मुझे किस तरह का दुख हो रहा था…उसे कोई शब्द देकर मैं नहीं बयां कर सकती….मैं उन्हें दस रुपए दी और वहां से चल दी….लेकिन दिमाग मे उन बच्चियों की खनकती हुई आवाज शोर मचा रही थी….एक रुपया दे दो दीदी…एक रुपया दे दो भैया…
 आम तौर पर लेख लिखने वाली अनामिका  कवितायें भी लिखती हैं:
सीने से चिपकी है मेरे
आज भी वो गर्माहट
जो तुम्हारे आगोश में आकर मिलती थी

लेकिन
ना जाने कहां से
आंखों से गिरने लगे
पानी के कुछ टुकड़े 
जो सारी यादें बहा ले गए

और दीवार पर लगी
तुम्हारी तस्वीर भी
धुंधली पड़ गई
दिन के घने कुहरे की तरह

एक और कविता में महिलाओं के बारे में लिखती हैं अनामिका:
आटे की तरह
रिश्तों में सनी औरत
मर्द जिसका लोई बनाकर
समाज के तवे पर सेंकता है
पूड़ी कचौड़ी की भांति।

जरुरत और सुविधा के मुताबिक
औरत इंसान नहीं है
उसका तो परिचय ही
मां-बहन और बीबी है
साड़ी गहने और परिवार
में उलझी औरत
सारा जीवन देखती है
बस एक ही मंजर
और इन्हीं के नाम का रंग चढ़ाकर
गुजार देती है जीवन अपना
सिर्फ एक ही परिचय से
अन्ततः मां-बहन और बीबी बनकर...


गांव कैसे बदल रहे हैं आज के समय में । अनामिका लिखती हैं:
गांव में अब दूरदर्शन और डीडी न्यूज देखने वाले लोग गए तेल लेने…..लोग सैकड़ो चैनल का मजा नोच रहे हैं……
और उसी मिट्टी में सानकर अब बच्चों को गढ़ रहे हैं…. मतलब गांव के बच्चे को
गांव में ही शहरी बाबू के रंग में रंगा जा रहा है…बच्चे को चम्मच से खाना सीखा रहे हैं…..
पैर छूना भुलवाकर नमस्ते बोलना सीखा रहे हैं……गांव की एक अलग-थलग
महक चैन-सुकून, सोंधी खुशबू टाइप जिस संस्कृति पर हमें गूरूर है
ना उसे हमारे अपने ही कुचल रहे हैं…धरासाई हो रही है हमारी विरासत…
फ़िलहाल अनामिका के कोचिंग वाले गुरु जी का यह किस्सा बताकर अपनी बात खतम करते हैं:
दूसरा कह रहा है….एक गो गुरु जी हमरा कोचिंग में भी हैं…गुरु ऑक्सफोर्ड से पढ़ के आयल हौवें…….
हिन्दी से त एतना नफरत बा जइसे ठाकुर चमार से करता है…..कहते हैं
साले इलाहाबाद वाले हमरी अंगरेजी खराव कर दिये….हियां आके हमहुं ई जंगली भाषा बोले लगे……
तभी बीच में कोई बोला….हमरे गुरु जी को तो अंगरेजी आता ही नहीं है…..
ऊ हमके भुगोल पढाते हैं और हम उनको अंगरेजी….. एक बार फिर से डिब्बे मे अट्ठाहास गूजां……..
तब तक ट्रेन इलहाबाद पहुंच चुकी थी……
नवंबर 12 से शुरु होकर मार्च 13 तक कुल जमा 23 पोस्टों में से कुछ का जिक्र किया यहां पर।
उनके लेखन का अंदाज सहज, संवेदनशील और गैरबनावटी है। आप उनकी बाकी की पोस्टें पढ़ें और उनपर अपनी राय बतायें।

आज की चर्चा फ़िलहाल इतनी ही। बाकी की फ़िर कभी।

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13 टिप्‍पणियां:

  1. ई काम बहुत अच्छा किया आपने..बनारस वालों पर आपकी कृपा दृष्टि बनी रहे।

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    1. बनारस वाले किसी की कृपा के क्या मोहताज। उनका इकबाल ऐसे ही बुलंद रहता है।

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  2. आज तो त्रिलोक अनामिका जी पर ही लुटा दिए :-) नए ब्लागरों को प्रोत्साहित करना ही चाहिए -मैं सहमत हूँ!

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    1. त्रिलोक लुटाना और इन्द्रलोक खलियाना ये सब आपके विशेषाधिकार हैं। बाकी अनामिका का लिखना अच्छा लगा सो आज चर्चा की। आप भी पढिये उसकी पोस्टें। बनारस की हैं तो और हक बनता है उसका आपसे तारीफ़ पाना। :)

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  3. अभी तो यहीं पढ़े हैं अनामिका की पोस्टें. किसी दिन एक चक्कर मारकर ब्लॉग का ऑपरेशन करेंगे :)

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  4. मेरी टिप्पणी गायब हो गयी. अनामिका से यहाँ मिलकर अच्छा लगा. किसी दिन उनके ब्लॉग पर भी डेरा जमायेंगे.

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