बुधवार, अप्रैल 08, 2009

बड़का ब्लॉगर आवे ज्ञान-वान दे औ समझावे


पंकज उपाध्याय

कल दैनिक जागरण के पत्रकार जरनैल सिंह ने एक पत्रकार वार्ता में गृहमंत्री चिदम्बरम पर जूता फ़ेंका। चिदम्बरम जी ने इसे पत्रकार के भावुक आक्रोश की अभिव्यक्ति बताते हुये अपनी तरफ़ से तुरंत माफ़ कर दिया। पत्रकार जनरैल सिंह ने कहा कि व्यक्तिगत तौर पर चिदम्बरम जी और कांग्रेस का विरोधी नहीं है लेकिन सन १९८४ में दंगों की जांच में सी.बी.आई. की भूमिका से वह क्षुब्ध था। दैनिक जागरण प्रबंधन ने इस घटना के लिये माफ़ी मांगी है। इस मसले कई लोगों ने अपने विचार व्यक्त किये। कुछ पोस्टों के लिंक ये हैं:
  1. आज पत्रकारों के लिये काला दिन है

  2. शर्मसार हुई पत्रकारिता,नेता बने जरनैल सिंह

  3. चिदम्बरम दूसरे भारतीय जिन पर जूता फ़ेंका गया

  4. जरनैल का जूता

  5. जूता एक क्रांतिकारी हथियार

  6. जरनैल के जूते से गृह मंत्री सन्न

  7. जूता जो अब आवाज़ बनेगा ...?

  8. नोट, जूता और भारतीय राजनीति

  9. जूता नम्बर 8- जनरैल सिंह अंदर की बात

  10. जब तोप मुकाबिल हो...

  11. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे जूते में है...

  12. दम-ए-दुश्वार या दिमागी दिवालियापन

  13. भारत के लोकतंत्र में चप्पल के बाद जूता भी

  14. जूता मारकर भी जीते इनाम

  15. जूते दौड़ रहे हैं



समीरलाल जी की पुस्तक बिखरे मोती का
अंतरिम विमोचन जबलपुर में हुआ। अंतिम यानि कि मुख्य विमोचन कनाडा में होगा। महेन्द्र मिश्रजी ने बताया कि अंतरिम विमोचन महीने भर पहले ६ मार्च को ही हो चुका था। मतलब संस्कारधानी में तिथिभेद बरकरार है। यह कविता संग्रह समीरलालजी ने अपनी मां के नाम समर्पित किया है। इस मौके पर उन्होंने अपनी मां को याद करते हुये कविता लिखी:

बिखरे मोती
मुझे पता है
जानता हूं न बचपन से
तेरा लुटेरा पन.
तू ही तो लूटा करती थी
मेरी पीड़ा
मेरे दुख
मेरे सर की धूप
और छोड़ जाती थी
अपनी लूट की निशानी
एक मुस्कान
एक रस भीगा स्पर्श
और स्नेह की फुहार
अब सब कुछ लुट गया है!!

समीरलाल जी को इस मौके पर बधाई। उनके अगले कविता संग्रह का संभावित नाम सिमटे मोती हो सकता है।

अब कुछ प्रयोग बोले कि एक्सपेरीमेन्ट करते हैं प्रमोदसिंह जी के साथ:
देयर इज़ समथिंग रॉंग समव्‍ह्येर. समथिंग इज़ अमिस. व्‍हॉट, व्‍हॉट, एक्‍स फैक्‍टर? पेरीमच पॉसिबल. वेल, वी ऑल नो एक्‍स इज़ ऑलवेज़ द क्रूशल कनेक्‍शन. दॉ इट माइट बी ‘एक्‍स’ सो व्‍हॉट! निक हार्नबी की ‘हाई फिडेलिटी’ के इतने पता नहीं कितने पेज़ेस (इन फैक्‍ट 323 पेज़ेस) एक्‍सों का हिसाब-किताब समझने की कसरत ही तो है? ओह एक्‍स. देन फिर आह, एक्‍स. वेरी फ़न्‍नी. ऑर, पेरी पनी. पैरी पैणा नहीं. दैट वुड बी गिविंग इन टू टू मच. Xxxtremme in submissiveness. लेट एक्‍सेज़ स्‍टे एज़ एक्‍स. नथिंग लेस, नॉर मोर. इट्स यूअर दिल दैट मांगे मोर, नॉट एक्‍सेज़ हू आर आस्किंग एनीथिंग, आर दे? नो, दे आर नॉट. ओह, पेरीमेंटल! ऑर जस्‍ट मेंटल?



अचला दीप्ति कुमार

अचला दीप्ति कुमार टोरंटो स्कूल की एक रिटायर्ड शिक्षिका हैं। उनके एक छात्र से जुड़े संस्मरण को मानसी ने अपने ब्लाग
पर प्रस्तुत किया है। मानसी ने संस्मरण की पहली किस्त में लिखा:
बहुत दिनों से इसे पोस्ट करने का मन बना रही थी, मगर आज हो पा रहा है। जब इसे पहली बार अचला जी ने मुझे पढ़ कर सुनाया था, तो मेरे आँखों से निर्झर आँसू बहे थे। ये बस आज ही टाइप हो कर पूरा हो पाया है। अचला जी को लिखने की कला महादेवी वर्मा जी से विरासत में मिली है। वो टोरांटो में ही रहती हैं और अब टोरांटो स्कूल की एक रिटायर्ड शिक्षिका हैं।


अचलाजी ने अपने संस्मरण की शुरुआत करते हुये शिक्षकों की मानसिकता के बारे में लिखा:
हम शिक्षकों को सिर्फ़ दो ही तरह के विद्यार्थी छाप छोड़ने वाले प्रतीत होते हैं - बहुत प्रखर बुद्धि और अच्छे व्यवहार वाले या मन्द बुद्धि व उद्दंड व्यवहार वाले। अभाग्यवश डेविड की गिनती इस दूसरे श्रेणी के विद्यार्थियों में होगी।


इसके बाद की किस्तों में डेविड के बारे में विस्तार से बताते हुये उन्होंने बड़ों के प्रति उसके आक्रोश, अनुकूल माहौल मिलने पर सुधार , आगे भी वही अध्यापक मिलने का आश्वासन पाने पर खुशी , अध्यापकीय माहौल की राजनीति और फ़िर डेविड के मन के टूटने और फ़िर उसी राह चलने की कहानी है जिधर वह सुधरना करने के पहले चल रहा था। बाद में अध्यापक का अपराध बोध है:

वह किसी का भी अपराधी क्यों न हो, आज यह स्वीकार करने में मुझे कोई दुविधा नहीं कि उसकी विश्वास भावना को ठेस पहुँचा कर मैंने उसके प्रति अक्षम्य अपराध किया है। इस मामले का निपटारा कौन करेगा, मैं नहीं जानती। किन्तु यदि यह कल्पना सच है कि अपने अपराधों का दंड हमें जीवनोपरांत भी मिलता है, तो मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि मेरा न्यायाधीश डेविड ही बने, मेरी सज़ा का निर्णय वही ले। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे अपराध पर विचार करते समय भवें कुंचित कर, अपनी नीली आँखों की प्रखर दृष्टि को मुझ पर केंद्रित कर वह यही कहेगा," आइ विल जस्ट अक्सेप्ट अन अपालाजी, फ़्राम यू, मिसेज़ कुमार"।


गुजरात बम धमाकों के मास्टर माइंड कहे जाने वाले अबू बशर के घर की कहानी सुनिये शम्स ताहिर खान से।

मनविन्दर भिम्बर के बारे में जानकारी दे रहे हैं विस्तार से इरशाद अली।

ज्ञानजी मांग पर मनोज मिश्र जी ने चचा बनारसी के कुछ रचनायें पेश कीं। एक बानगी देखिये:

वैद हकीम मुनीम महाजन साधु पुरोहित पंडित पोंगा ,
लेखक लाख मरे बिनु अन्न,चचा कविता करी का सुख भोगा|
पाप को पुण्य भलो की बुरो ,सुरलोक की रौरव कौन जमोगा,
देश बरे की बुताय पिया हरखाय हिया तुम होहु दरोगा ||


अब सुनिये एक सस्ता शेर:

इस दर पे सीखा है ज़ालिम, मैंने
ब्लॉगिंग का ककहरा!
इस ब्लॉग पे सीखा है ज़ालिम, मैंने ब्लॉगिंग का ककहरा!
मना लेन दे ऐ खबीस यहीं मुज्को ,दीवाली ईद, दशहरा !!


एक लाइना



  1. बमबाज बनिये या बैंकर :और किसी धंधे में बरक्कत नहीं आजकल

  2. खराब हुई इज्जत वापस नही लौटती : ताऊ शेरू महारज :कोई बात नहीं मंदी है, नई खरीद लेंगे पांच-दस किलो

  3. पहली मोहब्बत के चक्कर में जब मार खायी :तो दुबारा फ़िर हिम्मत नहीं पड़ी मोहब्बत करने की

  4. करोड़पति बनने की ओर अग्रसर: ही बने रहना है बस ...

  5. जूते दौड़ रहे हैं टिप्पणी की आश में :


चलते-चलते


  1. अब लौटत आवत देखि गुरू,मन का उतसाह न जाइ कहा
    कल की चरचा की निहारत राह लिखौ कछु ठीक सौ लेख महा
    जब सुकुल अनूप,पढे़ गीता इनने इतिहास रचा न रचा ?
    यहु ब्लॉग बरे कि बुताय गुरु हरखाय हिया जो करौ चरचा !



  2. बिखरे सब मोती जो गाँठि खुली जब लाल समीर लिखे कविता
    यह खूब इमोशन फ़ेंकत हैं बुक होगी इमोशन की सरिता
    मिलि आऔ बिलागर यार सभी इनको दें बधाई विमोचन की
    हर एक बिलागर पाये किताब फिरी यहु बात है सोचन की :)

विवेक सिंह की टिप्पणी



और अंत में



कल शिव कुमार मिश्रजी ने जाने कहां से आरोपित ब्लाग वैराग्य को त्याग दिया और ये कविता लिख मारी:

शिव कुमार
जब रोवे ब्लॉगर अज्ञानी
आँखों से बरसावे पानी
तब-तब बड़का ब्लॉगर आवे
ज्ञान-वान दे औ समझावे

जिस स्थिति में तुम हो भाई
तुम्हें देख आँखें भर आई
हमें पता है तुम्हरी पीड़ा
हमरे भी त फटी बेवाई

कहते इसे ब्लॉग वैराग्य
समझो है तुम्हरा सौभाग्य
जो हम तुमको हैं समझाते
कौन बताता हम न आते?

इस स्थिति से निकलो जल्दी
लगे फिटकरी या फिर हल्दी
चिरकुट सा लेखन कर डालो
ब्लॉग-पेज को तुम भर डालो

एक बार वैराग्य जो छूटे
माया आकर तुमको लूटे
माया भी तो तरह-तरह की
कहीं पहेली कहीं जिरह की

अद्भुत माया टिप्पणियों की
ब्लॉग पोस्ट की औ कड़ियों की
कैसे इससे बच पाओगे ?
ब्लॉग-वाग को रच पाओगे?


अब जब कविता मार दी तो कल चर्चा भी मारेंगे। जो कविता कर सकता है उसके लिये चर्चा तो बायें हाथ का खेल है।

आपका दिन चकाचक बीते। मौज से रहें। जो होगा देखा जायेगा।

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21 टिप्‍पणियां:

  1. अनूप जी,

    चर्चा को रोचक बनाने का हुनर खूब जानते हैं. समीरलाल जी की कविता भावुक कर देती है. उन्हें बधाईयाँ, संग्रह की तस्वीर बड़ी खूबसूरत है, प्रकाशक श्री पंकज सुबीर को बधाईयाँ.

    हम तो चचा बनारसी के राग में कवि ही भले भई दारोगा होने से तो रहे.

    साधुवाद.

    मुकेश कुमार तिवारी

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  2. अब लौटत आवत देखि गुरू,मन का उतसाह न जाइ कहा
    कल की चरचा की निहारत राह लिखौ कछु ठीक सौ लेख महा
    जब सुकुल अनूप,पढे़ गीता इनने इतिहास रचा न रचा ?
    यहु ब्लॉग बरे कि बुताय गुरु हरखाय हिया जो करौ चरचा !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बिखरे सब मोती जो गाँठि खुली जब लाल समीर लिखे कविता
    यह खूब इमोशन फ़ेंकत हैं बुक होगी इमोशन की सरिता
    मिलि आऔ बिलागर यार सभी इनको दें बधाई विमोचन की
    हर एक बिलागर पाये किताब फिरी यहु बात है सोचन की :)

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  4. जूता प्रकरण के जरिये कई सारे ब्लागों के बारे में जानकारी मिली इस पाठक को।
    मिसिर जी की कविता न्यारी।
    इस मेहनती चिट्ठाचर्चा के लिए आपको धन्यवाद है तहे दिल से।

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  5. भाई समीरलाल जी के अंतरिम[अंतिम नहीं:)]पुस्तक लोकार्पण पर बधाई। आशा है विवेक सिंह जी की अभिलाषा पूरी की जाएगी- उडन तश्तरी में बैठकर कनाडा जाने से पहले:)
    "देयर इज़ समथिंग रॉंग समव्‍ह्येर. " लुक्स लैक एवरीथिंग इस रांग एवरीवेर:):)

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  6. ब्लॉग विराग जो मिटाये
    कलजुग में फुरसतिया कहलाये!

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  7. ब्लॉग वैराग्य तजि के हमें ख़ुशी हुई. ऊ आप नहीं बताते तो हमें तो पता ही नहीं चलता कि ब्लॉग वैराग्य भी कछु होत है. हम तो एही समझते हलकान हो रहे होते कि जैसे ब्लागेरिया नामक कलेष होता है वैसे ही ब्लॉगफोबिया नामक कलेष भी होता होगा.

    किताब के विमोचन पर समीर भाई को बधाई. चर्चा करने का कोशिश करेंगे. ज़रूर करेंगे.

    अब शिष्य विवेक से कुछ...

    जब शिष्य के मन उतसाह दिखा, गुरु हर्ष किये अपने मन माही
    अचरज करि देखि कमेन्ट कहें कंह शिष्य मिलौ ई विवेक की नाही
    हरखाय हिया बस शिष्यन कौ, एहि कारन कालि करू चरचा
    ऊ ब्लॉग बरे कि बुताय सखा, चाहे अब टेंट सहे खरचा

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  8. पूर हिंदी ब्लॉग जगत ही जूतामय हो गया.

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  9. हम कितने ही उछल कूद कर लें , पर गुरु अपनी गुराहट(यह गुर्राहट से अलग कोई चीज है) दिखाकर हमें तुरन्त शान्त कर देते हैं !

    इसीलिए तो शास्त्रों में कहा गया है : गुरु ! तुसी ग्रेट हो :)

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  10. "चिदम्बरम जी ने इसे पत्रकार के भावुक आक्रोश की अभिव्यक्ति बताते हुये अपनी तरफ़ से तुरंत माफ़ कर दिया।"

    इस पत्रकार को एक ब्लॉग बना लेना चाहिए. ब्लॉगर बनने के सारे गुण हैं इनके अन्दर. जूतमपैजार करना, अभिव्यक्ति को भावना देना...वगैरह वगैरह.

    और अगर भावुक अभिव्यक्ति की बात हो तो इन्हें कविता-ब्लॉग बना लेना चाहिए.

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  11. समीर जी की कविता वाकई मार्मिक है, ब्लाग वैराज्ञ के गुण धर्मों की जानकारी देती महा फ़ुरसतिया पोस्ट.

    आज की विशेषता : जय श्री जूता देवाय: नमै:

    रामराम.

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  12. समीर जी की कविता दिल को छूती है।समीर जी को बधाई।

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  13. सुन्दर चर्चा के लिये धन्यवाद । समीर जी को बधाई ।

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  14. श्री समीरलाल ’ समीर ’ जी संप्रति व्यक्तिगत बलैंयाँ नहीं स्वीकार रहे,
    आग्रह है, कि कृपया यहाँ चर्चा-मंच पर पधार कर स्वीकारें,

    चर्चा के लिंक देख देख यही लग रहा कि ’ ज़ूतामय हम सब जग जानी ’

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  15. हमेशा की तरह आज भी सुंदर चर्चा .आज तो आप भी चच्चा बनारसी के रंग में रंग गए .

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  16. ये लिजिये जनाब, आ गये व्यक्तिगत बलैंयाँ स्वीकारने. अनूप भाई का सूचना देने हेतु और आप सबकी शुभकामनाओं हेतु बहुत बहुत आभार.

    आप सबके स्नेह के बिना यह संभव नहीं था.

    भविष्य में भी आप सबके मार्गदर्शन का आकांक्षी रहूँगा.

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  17. समीर चचा को बधाई.
    आज तो चर्चा ज़रा शायराना थी.
    मिसिर चचा की कविता जोरदार लगी.

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