गुरुवार, अप्रैल 23, 2009

निर्वाचन के ऊपर हावी चुनाव, चरणों वाला मतदान और नया दामाद

बड़ी गर्मी है जी. मंदी की मारी दुनियाँ और गर्मी का मारा भारत, दोनों लस्त-पस्त हुए जा रहे हैं. मंदी की मारी दुनियाँ में तमाम विद्वान कंज्यूमर कांफिडेंस इंडेक्स को निहार रहे हैं. गर्मी का मारा भारत चिंतित है. चिंता इस बात की है कि गर्मी का मारा १६ मई के बाद कहीं चुनाव का मारा न निकले.

माहौल बड़ा चकाचक है. गाडियाँ दौड़ रही हैं. लाऊडस्पीकर भाषण दे रहे हैं. सडकों पर राजनीतिक दलों के झंडे वैसे ही लहलहा रहे हैं जैसे पकने के बाद खेतों में धान और गेंहू लहलहाते हैं.

उम्मीदवार उम्मीद से हैं. जो उम्मीदवार नहीं हैं, उनके लिए उम्मीद की कोई वजह नहीं. वे या तो गाली दे रहे हैं या फिर वोट.

अपने नक्सली भाई लोग भी इस बार पूरा जोर लगाकर राष्ट्र की मुख्यधारा में 'लौक' रहे हैं. अभी कल ही इनलोगों ने एक रेलगाड़ी अगवा कर ली थी. इनके लिए मुख्यधारा में आने का मतलब यही है. या तो ट्रेन की पटरी उड़ा दो या फिर उससे भी आगे जाकर ट्रेने हाईजैक कर लो. बीच में पुलिस-उलिस वाले मिल जाएँ तो उनको सलटा कर राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल हो जाओ.

अब बात आगे निकल गई है. आचार संहिता टूटन के दिनों से आगे. पहले चरण का मतदान हो चुका है. मतलब पहले चरण का पूजन संपन्न. अब दूसरे चरण के लिए मतदान किया जा रहा है. जैसे ही दूसरे चरण के लिए मतदान संपन्न हो जायेगा, हम मान लेंगे कि दूसरे चरण का पूजन भी संपन्न.

(आप मानें या न मानें, टेलीविजन चैनल पर पहले चरण का मतदान, दूसरे चरण का मतदान वगैरह सुनकर यही लगता है कि किसी विराट धार्मिक अनुष्ठान की बातें हो रही हैं. जैसे किसी देवता के चरण वगैरह पूजे जाने की बातें हो रही हैं.)

लेकिन यह तो चुनाव की बात है. चुनाव इंसान जैसा नहीं होता. उसके केवल दो चरण नहीं होते. चुनाव तो कई चरणों वाला होता है. तीसरा चरण...चौथा चरण...पांचवां चरण.

मतलब चुनाव केवल चार चरणों वाला जानवर नहीं है. उससे भी आगे कुछ है.

दो चरणों वाला वोटर न जाने कितने चरणों वाले चुनाव (?) पर "जोर लगा के हई सा" करते हुए पिल पड़ा है. अब चुनाव में खैर नहीं. (चुनाव में खैर नहीं?)...

चलिए, लिख देते हैं कि चुनाव की खैर नहीं.

अरविन्द मिश्र जी लिखते हैं;

"मन में क्षोभ था कि बनारस जैसी बुद्धिजीवियों की नगरी में महज ४४ प्रतिशत लोगों ने मतदान किया. विश्वविख्यात शिक्षा के केन्द्र बनारस हिन्दू विश्विद्यालय के परिसर में ही बने मतदान केन्द्र पर भी केवल १८ फीसदी लोगों -प्रोफेसरों ने मतदान किया जहाँ एक आदरणीय ब्लॉगर अफलातून जी भी रहते हैं ।"


बुद्धिजीवियों के लिए मतदान करने का शायद कोई कारण नहीं होगा. आखिर संविधान में तो क्या किसी कानून में नहीं लिखा गया है कि वे मतदान नहीं करेंगे तो उनका बुद्धिजीवी वाला सर्टिफिकेट खारिज हो जायेगा. उनकी 'बुद्धिजीवियत' जाती रहेगी.

खैर, अरविन्द जी के मन उपजे इस क्षोभ की वजह से क्या हुआ, उन्ही से सुनिए. वे लिखते हैं;

"इन स्थितियों से उपजे क्षोभ ने मुझे आत्मपीडा भी सहकर वोट देने को वह भी एक सामान्य मतदाता के रूप मे मजबूर कर दिया."


सामान्य मतदाता के रूप में मजबूर हुए अरविन्द जी जा पहुंचे अपने पैत्रिक गाँव और वोट दे डाला. गोपनीयता का मान रखते हुए उन्होंने बताया कि;

"मैंने तो एक राष्ट्रीय पार्टी के पक्ष में मतदान किया है मगर परिवार के दूसरे लोगों ने किस के पक्ष में मतदान किया यह मुझे नही मालूम है -मतदान की गोपनीयता बरकरार है और इस गोपनीयता का सम्मान भी किया जाना चाहिए."


हमें उनकी यह पोस्ट बहुत प्रेरणादायक लगी. मतदान करने के बाद जो ख़ुशी मिलती है, उसका अंदाजा आप अरविन्द जी का फोटो देखकर लगा सकते हैं. वो फोटो जो उनकी भतीजी, स्वस्तिका ने उतारी है. स्वस्तिका ने अरविन्द जी के साथ बैठकर हम चिट्ठाकारों से अपील भी की है कि हम मतदान ज़रूर करें.

चाहे जिस चरण में करने को मिले.

निर्वाचन शब्द के ऊपर चुनाव शब्द बहुत भरी पड़ता है. कारण है आम जन और संचार माध्यमों द्बारा ज्यादातर चुनाव शब्द का इस्तेमाल किया जाना. निर्वाचन की जगह चुनाव शब्द का इस्तेमाल क्यों किया जाता है? यह जानने के लिए अजित जी की आज की पोस्ट पढिये.

पोस्ट का समापन करते हुए वे लिखते हैं;

"निर्वाचन पर गौर करें तो इस शब्द की व्याख्या उसी तर्क प्रणाली पर आधारित जान पड़ती है जो इलेक्शन की है। इलेक्शन शब्द की रिश्तेदारी लैक्चर शब्द से है जिसमें पुस्तक से पाठ चुनने का जो भाव है वही भाव निर्वचन से बने निर्वाचन में आ रहा है यानी बहुतों में से एक को चुनना। विडम्बना है कि निर्वाचन जैसे गूढ़ दार्शनिक भावों वाले इस शब्द और प्रकारांतर से प्रक्रिया को वोट देने जैसी औपचारिकता का रूप दे दिया गया है। राजनीतिक पार्टियां ही प्रत्याशी तय करती हैं। वहां निर्वाचन के पवित्र अर्थ का ध्यान नहीं रखा जाता। भ्रष्ट-अपराधी अगर उम्मीदवार है तो उसका पार्टी स्तर पर उसका निर्वाचन सही कैसे कहा जा सकता है? महान राजनीतिक दलों को बहुतों में से एक परम सत्य के रूप में अगर अपराधी और दागी चरित्र के लोग ही जनप्रतिनिधि के रूप में विधायी संस्थाओं में देखने है तो यह निर्वाचन शब्द की घोर अवनति है। दो हीन चरित्रों वाले प्रत्याशियों में से किसी एक के निर्वाचन से देश में शांति, स्थिरता और समृद्धि कैसे आएगी, जिन्हें पाने के लिए लोकतंत्र के इस यज्ञ का आयोजन होता है? "


बहुत ही बढ़िया पोस्ट है. आप ज़रूर पढें. केवल अंश पढ़कर इस पोस्ट के महत्व को समझना मुश्किल है.

भारत किसानों का देश था. नेताओं का देश हुआ. सुरेश चिपलूनकर जी की मानें तो धीरे-धीरे अब 'दामादों' का देश हो लिया है. हमारी संस्कृति में दामादों को बहुत मान-सम्मान मिलता है. सुरेश चिपलूनकर जी के अनुसार शायद इसी संस्कृति रक्षा कार्यक्रम के तहत ही महान आतंकवादी अजमल कसाब को भी यही सम्मान मिल रहा है.

देश की आतंरिक सुरक्षा से ज्यादा सुरेश जी का ब्लॉग सुरक्षित है. इसलिए लेख का अंश देना मुमकिन नहीं. आप पूरी पोस्ट उनके ब्लॉग पर ही पढिये.

मोह-माया क्या केवल इंसानों के साथ हो जाती है? शायद नहीं.

यही बता रही हैं राधिका जी. शायद घर केवल अच्छी और चमकदार चीजों से नहीं बनता. चीजों के अलावा भी बहुत सारी बातें हैं जिनसे एक घर का निर्माण होता है.

आप राधिका जी की यह पोस्ट पढिये. बहुत प्यारी पोस्ट है. वे लिखती हैं;

"कुछ ऐसी चीजे जो घर में बरसो सिर्फ़ रखी रहती हैं,उनका कोई उपयोग नही होता लेकिन उनका मोह भी नही छूटता ।

कुछ आधे अधूरे शब्द लिखे कागज़ ,कुछ सूखे हुए फुल ,कुछ सालो पुराने गहने ,कुछ फटी किताबे और न जाने कितनी अनुपयोगी वस्तुए । बड़े शहरो में इंसानों के रहने के लिए घर नही,चार चार लोग एक कमरे के घर में जैसे तैसे अपना जीवन गुजारते हैं ,ऐसे में इन सब चीजों को सम्हाल कर रखना ......!!लेकिन कभी कभी इंसानों से ज्यादा प्यारी कुछ चीजे होती हैं न ।"


कबाड़खाना पर आज अशोक पांडे जी ने गुलाब बाई के बारे में लिखा है. दीप्ति प्रिया मेहरोत्रा द्बारा लिखी किताब 'गुलाब बाई: द क्वीन ऑव नौटंकी थियेटर' का जिक्र करते हुए अशोक जी लिखते हैं;

"'लैला मजनूं' में लैला, 'राजा हरिश्चन्द्र' में तारामती, 'बहादुर लड़की' में फ़रीदा और 'शीरीं फ़रहाद' में शीरीं जैसे रोल निभाने वाली गुलाब बाई सन १९४० तक आते आते अपनी लोकप्रियता के चरम पर पहुंच चुकी थीं. १९४० के दशक के आते आते गुलाब बाई की तनख़्वाह सवा दो हज़ार रुपये प्रति माह के आसपास थी, जो उस ज़माने के हिसाब से अकल्पनीय रूप से बड़ी रकम थी."


आप पोस्ट पढें. और अगर प्रेरणा मिले तो किताब भी पढें. अशोक जी के मुताबिक

"ख़ैर छोड़िये, इन तफ़सीलात के बारे में जानना हो तो किताब खोज कर पढ़ें. मैं कोशिश में हूं कि किसी तरह इस किताब के अनुवाद के अधिकार हासिल कर लूं और जल्द से जल्द हिन्दी के पाठकों के सम्मुख इसे रख सकूं. यह मास्टर फ़िदा हुसैन नरसी के लिए मेरी व्यक्तिगत श्रद्धांजलि भी होगी और गुलाब बाई के जीवन वृत्त के माध्यम से लोग क्रूरतापूर्वक बिसरा दी गई एक विधा का इतिहास हिन्दी में पढ़ सकेंगे.
आमीन!"


अशोक जी को हमारी तरफ से शुभकामनाएं. हमें विश्वास है कि वे अपने इस संकल्प में सफल होंगे.

कल शास्त्री जी ने अस्मत लुटाने के फार्मूले बताये. शास्त्री जी के फार्मूलों वाली इस पोस्ट पर कई टिप्पणियां आईं. इसी पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए अरविन्द मिश्र जी ने लिखा;

पक्ष विपक्ष तो हो गए अब निष्पक्ष भी विचार आने चाहिए !


पता नहीं इसके बाद जो विचार आये वे निष्पक्ष थे या नहीं. लेकिन शास्त्री जी ने कुछ टिप्पणियों में की गई आलोचनाओं का जवाब देते हुए आज फिर पोस्ट लिख दी है.

ऐसी पोस्ट के प्रीक्वल पर ध्यान न देने की वजह से ही शायद ऐसी पोस्ट के सीक्वल लिखने की ज़रुरत होती है. शास्त्री जी ने लिखी भी है. आप पढिये और पक्ष, विपक्ष और निष्पक्ष टिप्पणी दीजिये.

जब ब्लागिंग नहीं करते थे, तब छुट्टी का मतलब होता था आफिस से निकले. दो-चार दिन कहीं रहे. वापस आये और आफिस ज्वाइन कर डाला. लेकिन जब से ब्लागिंग आई है, छुट्टी का मतलब चेंज हो गया है. अब छुट्टी पर जाना है उससे पहले एक पोस्ट. छुट्टी से वापस आये तो कई पोस्ट.

अभिषेक छुट्टी पर गए थे. छुट्टी के दिनों का हिसाब दे रहे हैं. एक से बढाकर एक मजेदार किस्से. आप ज़रूर पढिये. और अगली छुट्टी आने का इंतजार करें. जब पोस्टें बनेंगी.

हिंदी के लिए देह धारण किया उन्होंने. हिंदी के लिए ही कवि बने. आगे चलकर महाकवि बने. उससे काम नहीं बना तो वाया कहानीकार समीक्षक तक बन लिए. लेकिन इतना सबकुछ बनने के बाद भी दुखी और परेशान हैं. उपेक्षा से इतने तंग हुए कि नाम बदलने का मन बना लिया है.

शायद शेक्सपीयर जी की बात गांठ बांध ली है उन्होंने. क्या कहा कौन सी बात? अरे वही कि; "नाम में क्या रखा है?"

शेक्सपीयर बाबू को गलत साबित करने के लिए नाम बदलने पर आमादा है. बोधिसत्व जी ने कुछ नाम सुझाए हैं.

आप भी नामदान कर डालें. उससे पहले इन सज्जन के बारे में अनुमान ज़रूर लगईयेगा. सब लगा रहे हैं.

काल चक्र पर धूमिल की कविता प्रजातंत्र पढिये. पढ़कर पता चलेगा कि धूमल और धूमिल में फरक क्या है.

रवि कुमार स्वर्णकार जी की कविता "हमारी आँखें लुप्त हो रही हैं" पढिये.

ताऊ जी के ब्लॉग पर मेजर गौतम राजरिशी का परिचयनामा पढिये और उनके बारे में जानिए. बहुत ही पठनीय है. ताऊ जी को धन्यवाद मेजर राजरिशी से परिचय करवाने का.

आज के लिए बस इतना ही. थोडी देर में कुछ एक लाइना लिखकर गुरुदेव को भेजूंगा. अगर उन्होंने आज ही सुधार कर दिया तो रात को पोस्ट कर डालूँगा.

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23 टिप्‍पणियां:

  1. चर्चा-उर्चा तो बढ़िया है पर 'चुनाव केवल चार चरणों वाला जानवर नहीं है. उससे भी आगे कुछ है' इसका जवाब नहीं !

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  2. चर्चा बढ़िया है. मजा आया..शास्त्री जी के तो अभी बहुत पोस्ट आने पड़ेंगे..मामला सुलटते तक. :)

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  3. सही है..........चिठाकार और टिप्पणीकार "दोनों लस्त-पस्त हुए जा रहे हैं."

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  4. सही कहा आपने कि अजीत जी की प्रविष्टियों को कुछ अंश पढ़कर समझना ठीक नहीं । अद्भुत सामग्री है उनके ब्लॉग पर ।

    "उम्मीदवार उम्मीद से हैं. जो उम्मीदवार नहीं हैं, उनके लिए उम्मीद की कोई वजह नहीं." इस एक पंक्ति को पढ़ने के बाद चर्चा पूरी की पूरी अच्छी लगने लगी ।

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  5. अरे हां, यह तो लिखना ही भूल गया कि चुनाव और रावण में एक ही तो अंतर है - रावण के कई सिर थे और चुनाव के कई चरण:)

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  6. बुद्धिजीवी शायद ये सोच कर वोट नहीं डालते..कि कल को कहीं देश का बंटाधार करने के लिए उन्हें जिम्मेदार न ठहराया जाये.

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  7. असहमत होने का कोई कारण ही नहीं दिखता,
    आज बहुत गरमी है.. ..
    धन्यवाद !

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  8. थोड़ी देर मतलब

    लाईनां लाईनां ही रहें

    बिंदु न बन जाएं।

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  9. आप मेरी खुशी के साझीदार बने मन मुदित हुआ -अब बनारस प्रयाण की तैयारी है .

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  10. ऐसी पोस्ट के प्रीक्वल पर ध्यान न देने की वजह से ही शायद ऐसी पोस्ट के सीक्वल लिखने की ज़रुरत होती है.

    प्रिक्वेल शायद हाथ से निकल गया.

    -कौतुक

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  11. आपकी चर्चा में चर्चारम्भ बड़े कमाल का होता है.. आपकी शुरूआती लाईनों पर तो हम यही कहेंगे 'हाय मैं वारा जाऊ '

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  12. राजनीति के फुटकर नोट यही पढ कर बाकि पोस्ट पढने जा रहे है.

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  13. अच्छे चिठ्ठा-फूल चुने हैं और बढ़िया चर्चा की है उनपर।

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  14. लगभग 2 हफ्ते की अनुपस्थिति के बाद अपने प्रिय चिट्ठा-चर्चा पर पहुंचा तो दिखा कि अनूप शुक्ल (हमेशा के समान) समां बांधे हुए हैं. साधुवाद.

    आज की चर्चा कुछ अलग हटके से है, और खानपान के बीच बदले खाने का मजा देता है.

    चर्चा सार्थक है.

    सीक्वेल/प्रीक्वेल एक अच्छा प्रयोग है और विषय को सही पृष्ठभूमि में दिखाता है.

    सस्नेह -- शास्त्री

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  15. लगभग 2 हफ्ते की अनुपस्थिति के बाद अपने प्रिय चिट्ठा-चर्चा पर पहुंचा तो दिखा कि अनूप शुक्ल (हमेशा के समान) समां बांधे हुए हैं. साधुवाद.

    This charcha was done by shiv kumar mishra . its a request that before commenting o charcha please leave your "assumptions" behind only then healthy discussions can be done . readers should read and comment "not just gloss over"
    and its not possible the there is a typing error to write shiv instead of anup

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  16. बढ़िया। एकलाइना अब हमारे पास भेजने की कोई जरूरत नहीं। अब आप’सेल्फ़ सर्टिफ़िकेशन’ के तहत उनको पेश किया करें!

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  17. Thanks Rachna for calling attention to my mistake. It was indeed a slip of the mind.

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  18. अरविंद जी की चिन्‍ता को यहॉं पर जगह मिली, यह देखकर प्रसन्‍नता हुई। वर्ना तो ज्‍यादातर ऐसी गम्‍भीर बातें हवा में ही उडा दी जाती हैं।

    -----------
    मॉं की गरिमा का सवाल है
    प्रकाश का रहस्‍य खोजने वाला वैज्ञानिक

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  19. बहुत अच्छी चर्चा ,चुनाव के माहौल हैं मैं भी वोट देना तो चाहती हूँ ,पर मैं यहाँ, वोट देने का मेरा शहर kahan ,दुखी हूँ इस बात से .
    वैसे इस चर्चा को पढ़कर अच्छा लगा ,आपको मेरी पोस्ट पसंद आई ,आपका आभार

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