शनिवार, अप्रैल 11, 2009

निर्भय निर्गुण गुण गाऊंगा रे मैं तो: संगीत चिट्ठा चर्चा

कभी कभी आलसी व्यक्‍ति एकदम से जब सक्रिय होता है तो बढ़िया कमाल चीजें खोज लेते आता है। हमारे यूनुस भाई को ही लीजिये या तो वे महीनों पोस्ट नहीं लिखेंगे या फिर जब लिखेंगे तो कमाल करेंगे। महीनों से पिछले कई महीनों से दो पोस्ट के औसत से पोस्ट लिखने वाले भाई साब इस हफ्ते दो पोस्ट लेकर आये। और पोस्ट क्या लाये कमाल कर गये। पहली पोस्ट में कुमार गन्धर्व और वसुताई ( श्रीमती वसुन्धरा कोमकली जी) की आवाज में कबीर के निर्गुण भजन निर्भय निर्गुण गुण रे गाउंगा पोस्ट किया है| इस सुन्दर पोस्ट के लिये रेडियोवाणी के प्रशंसक रविकान्तजी को भी धन्यवाद देना चाहिये जिन्होने इन निर्गुण-गीतों की फरमाइश की और हमें इतनी बढ़िया गीत सुनने को मिले।
दूसरी पोस्ट में रेडियोनामा को दो साल पुरा होने के उपलक्ष्य में युनुस भाई उस्ताद बरकत अली खाँ की गाई एक गज़ल लेकर आये हैं गज़ल के बोल हैं दोनों जहां तेरी मोहब्बत में हार के
मेरे पसंदीदा रागों में से एक है देस राग और इसी देसराग को अफलातूनजी जी आगाज़ पर उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में सुनवा रहे हैं, आप इसे ध्यान से सुनिये देखिये आपका मन किसी दूसरी दुनिया में चला जाता है। हो सकता है आपको देसराग पर आधारित फिल्म्स डिविजन की वे डॉक्यूमेंट्री भी याद आ जायें जो आप बचपन में दूरदर्शन पर सुना-देखा करते थे।
हिन्द युग्म का संगीत ब्लॉग बड़ा जल्दी जल्दी अपडेट होता है। इस पर आज एक ही दिन में दो तीन पोस्ट्स आई हैं पर सबसे बढ़िया पोस्ट है महफिल-ए-गज़ल श्रेणी में विदुषी बेगम अख्तर की गज़ल खुशी ने मुझको ठुकराया है, दर्दो ग़म ने मुझे पाला है

आपने येसुदास के स्वर में गीत का करूं सजनी आये ना बालम ... सुना ही होगा पर क्या आप जानते हैं इसे उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ साहब ने भी गाया है? नहीं सुना ना तो महेनजी के ब्लॉग की मुलाकात लीजिये, वहां उस्तादजी का यह मधुर और दुर्लभ ठुमरी आपका इन्तजार कर रही है। यह ठुमरी आप पुरा सुने क्यों की पूरी होते होते राग मालकौंस में एक बंदिश है जो बिना सुने रुकने से आप एक बहुत ही सुन्दर बंदिश को सुनने का आनन्द नहीं ले पायेंगे।

मनीषभाई अपने ब्लॉग पर सुनवा रहे हैं आशा ताई और सुरेशवाडेकर का गाया हुआ गीत
प्यार के मोड़ पे छोड़ोगे जो बाहें मेरी
तुमको ढूँढेगी ज़माने में निगाहें मेरी

जिन चिट्ठों पर गीत- संगीत पोस्ट होता है उन चिट्ठों की चर्चा "एकलाइना" में करना उनके साथ न्यायसंगत नहीं होगा और समयाभाव के कारण पूरे चिट्ठे देख नहीं पाया, आज बहुत से लिंक छूट गये हैं, क्षमा चाहता हूँ।

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9 टिप्‍पणियां:

  1. "कभी कभी आलसी व्यक्‍ति एकदम से जब सक्रिय होता है तो बढ़िया कमाल चीजें खोज लेते आता है। "
    भाई सागर जी, आपने तो कमाल कर दिया। इधर शुक्ल जी ने सहायता के लिए आवाज़ लगाई और आपने यह बढिया, सुरीला पोस्ट टांक दिया। बधाई।

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  2. कई सुरीले चिट्ठों की जानकारी मिली। आभार। सार्थक चर्चा की आपने।

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  3. सुन्दर संगीत चिट्ठा चर्चा । धन्यवाद ।

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  4. बहुत सुरीली चर्चा रही जी.

    रामराम.

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  5. देर से सही.. मन मोरा धिनक धिन ता कर गई नन्हीं सी चर्चा !

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  6. सागर भाई शुक्रिया । इस आलस से मुक्ति पाने की कोशिश बहुत कर रहे हैं । पर कमबख्‍त छूटता ही नहीं । अब देखिए ना चालीस डिग्री पर चिलचिलाती गरमी कह रही है कि मियां मुंह तान पर सो जाओ । ( जमुहाई.........खर्राटे......राम राम)

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  7. सुन्दर चर्चा! एकलाइना की कॊई जरूरत नहीं महसूस हुई। ऊ त हम लोग लिख ही लेते हैं। लेकिन कम समय में ऐसी संगीत मय चर्चा मन खुस कर दिया आपने!

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